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Khandhara

खंघारा

व्यंग्य

सुदर्शन वशिष्ठ

आज के युग में, जब तक खांसी न हो जाए, कोई नहीं खांसता। सर्दियों में खांसी हो जाने पर भी रोकने की कोशिश की जाती है चाहे मुंह लाल क्यों न हो जाए। और फिर मुंह के आगे रूमाल न हो तो हाथ रख कर ही खांसना होता है। मीटिंग में बैठे खउं खउं करते रहना असभ्य होने का द्योतक है। लोग तो अब सर्दी जुकाम होने पर भी खांसी नहीं होने देते। कई तरह के कफ सीरीप चल पड़े हैं। विक्स की गोलियां हैं। मुंह में डाल कर चूसते रहो। तम्बाकू तो कोई पीता ही नहीं, सिगरेट भी अब कम ही लोग पीते हैं। जिस प्रदेश में सिगरेट पीना मना है, वहां किसी अन्धेरी गली में या गंदे बाथरूम में घुस कर दो चार कश लगाने पड़ते हैं। अतः सिगरेट तम्बाकू का सेवन न करने से खांसी तो वैसे ही दूर भाग गई है।

पुराने समय में खांसी का बहुत महत्व था। खांसी हो न हो ‘खंघारे' की बड़ी महत्ता थी। पहाड़ी बोली में जोर से आवाज करते हुए खांसने को ‘ख्ांघारा' मारना कहा जाता है। वैसे भी पहले सभी तम्बाकू पीते थे अतः खांसना उनकी हॉबी हो गई थी। पूरा मंह खोल कर खांसते हुए दूसरे के ऊपर थूक गिराने से परहेज नहीं कियाा जाता। दूसरा भी इस बात का बुरा नहीं मानता चाहे मुंह पर थूक की फुहारों सी बरसात हुई हो।

खंघारा तो घण्टी की तरह कई बातों का सूचक था।

आंगन में आने से पहले रास्ते में ही बुजुर्ग जोर खंघारा मारते। बिना खांसी आए जोर से खांसने पर चाहे गले में ख़राश हो जाए। मुंह में बलगम या थूक न आने पर भी आक्‌्‌—थू कर थूकते। इससे पता चल जाता कि कोई बड़ा बुजुर्ग आ रहा है। बेटी बहुएं आंगन में लापरवाह बैठी हों तो फट से सिर पर पल्लू रख लेतीं। बहुएं तो लम्बा घूंघट ही निकाल लेतीं। घर में कहीं गूदड़ बिखेरे हो तो फट से समेटी लेतीं। उन्हें अल्प समय मिल ही जाता अपनी इज्जत ढांपने का।

अब तो लोग चुपके से चोरों की तरह ऐसे आ धमकते हैं कि सम्भलने का समय ही नहीं मिलता। कोई चादर पल्लू ले ही नहीं पाती। सीधे सामने प्रकट हो जाते हैं।

बहुतों को तो पहले खंघारे से ही पहचान लिया जाता था। बहुत दूर कोई खंघारा मारे तो फट पता लग जाता कि फलां आदमी आ रहा है। उसके आने से पहले ही समुचित व्यवस्था कर दी जाती।

बहुतों को पहले बिना खांसी के भी रात को खांसने की आदत होती थी। वे थोडी़ थोड़ी देर बाद करवट बदलते और खांसते रहते। रात को नींद में खंघारा मारने से जागे हुए होने का एहसास होता और चोर उच्चके खंघारा सुन भाग खड़े होते।

खांसी आना बहुत बार लाभदायक ही होता हो, ऐसी बात भी नहीं है। कभी खांसी समझदारी बनती है तो कभी निहायह बेबकूफाना हरकत। एक बार खांसी आने पर रोके नहीं रूकती अतः आप की उपस्थिति का वक्त वेवक्त अहसास करवा देती है। आप छिप नहीं सकते। छींक और खांसी ऐसी ही चीजें हैं। कभी खांसी रोकनी भी पड़ती है। इस सम्बन्ध में एक लोकगायिका गम्भरी के गीत के बोल याद आते हैंः

किने खोह्‌ली तेरे बंगले री खिड़की

किने मारेया खंघाारा

चत्तरे खोली मेरे बंगले री खिड़की

मूरखे मारेया खंघारा, ओ।

......तेरे बंगले की खिड़की (चोरी से भीतर आने के लिए) किसने खोली, किसने खंघारा मारा यानि अपनी उपस्थिति जग जाहिर कर दी। चतुर (व्यक्ति) ने मेरे बंगले की खिड़की खोली, मूरख ने मारा खंघारा।)

चतुर तो चुपचाप बंगले की खिड़की खोल भीतर आ गया मगर मूर्ख ने खंघारा मार अपने होने का एहसास करवा दिया।

गलत समय पर खांसी का आना या गलत समय पर खांसी करना समझदारी की निशानी नहीं होती।

मगर यह भी है कि ऐसी चीजें छिपाए नहीं छिपतीं। रहीम जी ने कहा है :

ख़ैर ख़्ाून खांसी खुसी, वैर प्रीती मदपान

रहिमन दाबे न दबे जानत सकल जहान।

वैर, प्रीती, मद्यपान जैसी चीजों की तरह खांसी भी छिपाए नहीं छिपती हालांकि कभी यह वरदान बन जाती है तो कभी अभिशाप।

(94180—85595)

सुदर्शन वशिष्ठ

जन्म : 24 सितम्बर, 1949. पालमपुर हिमाचल प्रदेश (सरकारी रिकॉर्ड में 26 अगस्त 1949)।

125 से अधिक पुस्तकों का संपादन/लेखन।

नौ कहानी संग्रह : (अन्तरालों में घटता समय, सेमल के फूल, पिंजरा, हरे हरे पत्तों का घर, संता पुराण, कतरनें, वसीयत, नेत्र दान तथा लघु कथा संग्रह : पहाड़ पर कटहल)।

चुनींदा कहानियों के चार संग्रह : (गेट संस्कृति, विशिष्ट कहानियां, माणस गन्ध, इकतीस कहानियां)।

दो लघु उपन्यास : (आतंक, सुबह की नींद)। दो नाटक : ( अर्द्ध रात्रि का सूर्य, नदी और रेत)।

एक व्यंग्य संग्रह : संत होने से पहले।

चार काव्य संकलन : युग परिवर्तन, अनकहा, जो देख रहा हूं, सिंदूरी सांझ और खामोश आदमी।

संस्कृति शोध तथा यात्रा पुस्तकें : ब्राह्‌मणत्वःएक उपाधिःजाति नहीं, व्यास की धरा, कैलास पर चांदनी, पर्वत से पर्वत तक, रंग बदलते पर्वत, पर्वत मन्थन, पुराण गाथा, हिमाचल, हिमालय में देव संस्कृति, स्वाधीनता संग्राम और हिमाचल, कथा और कथा, हिमाचल की लोक कथाएं, हिमाचली लोक कथा, लाहौल स्पिति के मठ मंदिर, हिमाचल प्रदेश के दर्शनीय स्थल, पहाड़ी चित्रकला एवं वास्तुकला, हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक संपदा।

हिमाचल की संस्कृति पर छः खण्डों में ‘‘हिमालय गाथा‘‘ श्रृंखला :देव परम्परा, पर्व उत्सव, जनजाति संस्कृति, समाज—संस्कृति, लोक वार्ता तथा इतिहास।

सम्पादन : दो काव्य संकलन : (विपाशा, समय के तेवर) ; पांच कहानी संग्रह : (खुलते अमलतास, घाटियों की गन्ध, दो उंगलियां और दुष्चक्र, काले हाथ और लपटें, पहाड़ गाथा)।

हिमाचल अकादमी तथा भाषा संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश में सेवा के दौरान लगभग सत्तर पुस्तकों का सम्पादन प्रकाशन। तीन सरकारी पत्रिकाओं का संपादन।

सम्मान : जम्मू अकादमी तथा हिमाचल अकादमी से ‘आतंक‘ उपन्यास पुरस्कृत;

साहित्य कला परिषद्‌ दिल्ली से ‘नदी और रेत‘‘ नाटक पुरस्कृत। हाल ही में ‘‘जो देख रहा हूं'' काव्य संकलन हिमाल अकादमी से पुरस्कृत। कई स्वैच्छिक संस्थाओं से साहित्य सेवा के लिए सम्मानित।

देश की विगत तथा वर्तमान पत्र पत्रिकाओं : धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान से ले कर वागर्थ, हंस, साक्षात्कार, गगनांचल, संस्कृति, आउटलुक, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य आदि से रचनाएं निरंतर प्रकाशित। राष्ट्रीय स्तर पर निकले कई कथा संकलनों में कहानियां संग्रहित।

कई रचनाओं के भारतीय तथा विदेशी भाषाओं मेें अनुवाद। कहानी तथा समग्र साहित्य पर कई विश्वविद्‌यालयों से एम0फिल0 तथा पी0एचडी0.।

पूर्व सचिव/उपाध्यक्ष हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी ; उपनिदेशक/निदेशक भाषा संस्कृति विभाग हि0प्र0।

पूर्व सदस्य : साहित्य अकादेमी दिल्ली, दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय भोपाल।

वर्तमान सदस्य : सलाहकार समिति आकाशवाणी; हिमाचल राज्य संग्रहालय सोसाइटी शिमला, विद्याश्री न्यास भोपाल।

पूर्व फैलो : राष्ट्रीय इतिहास अनुसंधान परिषद्‌ भारत सरकार

सीनियर फैलो : संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार।

संपर्क : ‘‘अभिनंदन‘‘ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला—171009.हि0प्र0

फोन : 094180—85595 (मो0) 0177—2620858 (आ0)

ई—मेल : vashishthasudarshan@yahoo.com

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