कालू की आवाज़ किसी फटे हुए नगाड़े की तरह गूँजी। उसका क्रोध अब सातवें आसमान पर था। उसकी काली छाया के भीतर से बिजली जैसी लपटें निकलने लगीं।
"बता कार्तिक! कौन है वह जिसने प्रेमचंद बनकर मेरी पीठ में खंजर घोंपा?
और कहाँ है वह मीना, जिसके लिए मैंने अपना सब कुछ लुटा दिया? मैं उनके टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा! उन्हें इस पहाड़ी की मिट्टी में चबा जाऊँगा!" कालू की आँखों से दहकता हुआ लावा जैसे उबल रहा था।
कार्तिक ने अपना संतुलन बनाए रखा और अस्थि-कलश को कालू की आँखों के ठीक सामने कर दिया। कलश की पवित्र चमक ने कालू को एक पल के लिए पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
कार्तिक ने कड़कती हुई आवाज़ में कहा:
"कल्याण! शांत हो जा! प्रतिशोध की अग्नि ने तुझे इतना अंधा कर दिया है कि तुझे अपनी माँ की तड़प भी सुनाई नहीं दे रही? देख इस कलश को... ये तेरी माँ की अस्थियां हैं, जो कहीं साल से उस खंडहर में दबी थीं क्योंकि तूने उन्हें कभी विदा ही नहीं किया।
तेरी माँ की रूह आज भी उस स्वर्ग के दरवाज़े पर खड़ी तेरा इंतज़ार कर रही है, और तू यहाँ नफरत के दलदल में फंसा है।"
कार्तिक ने नदी की बहती धार की ओर इशारा किया और आगे बोला:
"अगर तूने अभी अपनी माँ को विदा नहीं किया, तो तू कभी उन कातिलों का चेहरा नहीं देख पाएगा। यह नदी 'पापमोचनी' है।
जब तक तू अपनी ममता का कर्ज नहीं उतारेगा, महादेव तुझे तेरे गुनाहगारों तक पहुँचने का रास्ता नहीं देंगे। चल मेरे साथ... पहले माँ को मुक्ति दे, फिर मैं तुझे तेरे दुश्मनों के सामने खड़ा कर दूँगा।"
कालू, जो अभी तक किसी को भी चीरने के लिए तैयार था, 'माँ' और 'मुक्ति' शब्द सुनकर अचानक निढाल सा हो गया। उसके भारी कदम नदी की रेतीली ज़मीन पर पड़ने लगे।
जैसे ही कार्तिक और कालू का विशाल साया नदी के तट की ओर बढ़ने लगे, कार्तिक ने एक बहुत ही जोखिम भरा कदम उठाया।
उसने कालू का ध्यान भटकाने के लिए उसे अपनी माँ की कहानियों में उलझाए रखा और बड़ी चालाकी से अपने कंधे पर टंगा झोला पीछे की ओर उन दोस्तों की तरफ फेंक दिया, जो अभी भी सुरक्षा घेरे के पास सहमे हुए खड़े थे।
वह झोला सीधा रूही के हाथों में जाकर गिरा। रूही ने घबराहट में झोला खोला, तो उसमें से एक कागज़ का टुकड़ा और पुराने ज़माने के कुछ कपड़े निकले।
कागज़ पर कार्तिक ने जल्दबाजी में लिखा था:
"अगर ज़िंदा बचना है, तो जैसा मैं कह रहा हूँ वैसा करो। दीपक, तुझे जागीरदार 'प्रेमचंद' का रूप धरना होगा और अभिलाषा, तुझे 'मीना' बनना होगा। झोले में रखे ये पुराने कपड़े तुरंत पहन लो।
मोहित, तुझे वह बाँसुरी बजानी होगी जैसे ही कालू क्रोधित होकर तुम पर झपटे। यह हमारा आखिरी मौका है, कालू को यह यकीन दिलाना होगा कि उसका इंतज़ार खत्म हुआ।"
तैयारी: रूही ने तुरंत दीपक और अभिलाषा को वे कपड़े दिए। दीपक ने वह रेशमी कुरता पहना और अभिलाषा ने वह पुरानी ओढ़नी सिर पर ओढ़ ली। उनके हाथ-पांव कांप रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि वे मौत का स्वांग रचने जा रहे हैं।
बाँसुरी की ज़िम्मेदारी: मोहित ने कांपते हाथों से वह पुरानी बाँसुरी थाम ली। उसे पता था कि उसे वही धुन निकालनी है जो कालू के दिल को पिघला सके।
उधर, कार्तिक और कालू नदी के जल के करीब पहुँच चुके थे। कालू का क्रोध शांत होने का नाम नहीं ले रहा था, पर माँ की अस्थियों के कलश ने उसे एक अदृश्य बंधन में बाँध रखा था।
कार्तिक ने कलश को ऊँचा उठाकर कहा, "कल्याण, देख... इस पवित्र जल में आज तेरी माँ विलीन होगी। तू बस एक बार अपनी माँ को याद कर, तेरा सारा प्रतिशोध इस जल के साथ बह जाएगा।"
जैसे ही कार्तिक ने कलश का ढक्कन खोला और अस्थियां पवित्र जल में प्रवाहित कीं, नदी की लहरों में एक अलौकिक सफ़ेद प्रकाश उठा।
उस प्रकाश में कालू को अपनी माँ की धुंधली सी मूरत दिखाई दी, जो उसे मुस्कुराकर बुला रही थी। एक पल के लिए कालू के गले से एक दर्द भरी आह निकली— "माँ..."
जैसे ही विसर्जन पूरा हुआ, कार्तिक ने पलटकर पहाड़ी की ओर देखा। वहाँ से दीपक (प्रेमचंद) और अभिलाषा (मीना) धीरे-धीरे नीचे की ओर आ रहे थे।
मोहित ने बाँसुरी पर एक मंद सी, विरह भरी धुन छेड़ दी थी।
कालू ने जैसे ही उस बाँसुरी की आवाज़ सुनी और उन दो सायों को अपनी ओर आते देखा, उसका शरीर फिर से कांपने लगा।
उसकी आँखों में वही पुरानी आग लौट आई।
"वो आ गए..." कालू की आवाज़ में मौत का सन्नाटा था। "मीना! प्रेमचंद!"
कार्तिक ने अपनी सांसें थाम लीं। उसने मन ही मन प्रार्थना की कि दीपक और अभिलाषा अपनी भूमिका में कोई गलती न करें, क्योंकि कालू अब एक ऐसी शक्ति बन चुका था जिसे ज़रा सा भी धोखा फिर से हिंसक बना सकता था।
"अब समय आ गया है कल्याण... अपना हिसाब पूरा कर!" कार्तिक ने चिल्लाकर कहा।
कालू का वह अट्टहास पूरी घाटी में गूँज उठा, जैसे सैंकड़ों साल का दबा हुआ लावा एक साथ फूट पड़ा हो।
उसका साया इतना विशाल हो गया कि चाँद की बची-कुची रोशनी भी छिप गई। वह पलक झपकते ही नदी के तट से उड़कर उस पहाड़ी की चोटी पर दीपक (प्रेमचंद) और अभिलाषा (मीना) के सामने जा खड़ा हुआ।
उसकी आँखों से निकलता लाल धुआँ दीपक और अभिलाषा के चेहरों को झुलसा रहा था।
दीपक और अभिलाषा थर-थर काँप रहे थे, पर कार्तिक के कहे अनुसार उन्होंने अपनी भूमिका नहीं छोड़ी।
कालू अपनी विशाल कुल्हाड़ी ज़मीन पर पटकते हुए दहाड़ा:
"देख मीना! देख प्रेमचंद! काल फिर से तुम्हारे सामने खड़ा है! तुम क्या समझे थे कि उस रात मुझे खाई में धक्का देकर तुम सुखी रहोगे?
तुमने मेरी पीठ पर वार किया था, मेरी वफा का गला घोंटा था। मैं सदियों से इस प्रतिशोध की आग में जल रहा हूँ... मेरी आत्मा इस पहाड़ी की हर ईंट और पत्थर में तुम्हारे खून की प्यासी होकर भटकी है!"
कालू अपनी उंगली उनकी ओर तानते हुए बोला:
"आज किस्मत ने फिर तुम्हें मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया है। पर याद रखना, मैं तुम जैसा कायर नहीं हूँ। तुमने मुझे धोखे से मारा था,
पर मैं तुम्हें इन सबके सामने—पूरी दुनिया के सामने दण्ड दूँगा। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी रूहें भी उसी तरह तड़पें जैसे मैं सदियों तक तड़पा हूँ।
तुमने मुझे महलों की रानी बनने के लिए मारा था न मीना? देख! आज तेरा वह जागीरदार और तू, मेरे कदमों में पड़े हो!"
क्या माँ की अस्थियों का विसर्जन और उस अलौकिक प्रकाश का दिखना कालू के हृदय में वास्तव में कोई बदलाव लाएगा, या यह शांति केवल 'तूफान से पहले की खामोशी' है?