कालू की पहाड़ी - 3 RAAHULL SHARMA द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कालू की पहाड़ी - 3

यह तय हुआ कि वे एक दिन मनाली में आराम करेंगे और अगली सुबह अपनी प्राइवेट ज़िपसी (Gypsy) से उस अनजानी पहाड़ी की ओर निकल पड़ेंगे।



वे नहीं जानते थे कि डेविड जिसे 'पाखंड' और 'दुकानदारी' कह रहा था, वह दरअसल एक ऐसी सच्चाई थी जो उनकी समझ से कोसों दूर थी। 



मनाली की उस ठंडी रात में, जब वे सो रहे थे, तो बाहर हवाओं की सरसराहट ऐसी लग रही थी जैसे कोई दूर से उन्हें चेतावनी दे रहा हो। 



लेकिन बेंगलुरु के इन 'मॉडर्न' युवाओं ने अपने कानों में हेडफ़ोन लगा रखे थे।


अगली सुबह का सूरज उनके लिए एक नई उमंग लेकर आने वाला था, या फिर उनके जीवन की सबसे काली सुबह की शुरुआत होने वाली थी?


मनाली की अगली सुबह बहुत ही खुशनुमा थी। सूरज की सुनहरी किरणें बर्फ से ढकी चोटियों पर चमक रही थीं, जिसे देखकर किसी के मन में भी डर का ख्याल आना मुश्किल था।



ये दसों दोस्त सुबह जल्दी उठकर तैयार हो गए। मनाली के मॉल रोड पर उनकी चहल-पहल देखते ही बनती थी। उन्होंने अगले एक महीने के लंबे सफर के लिए पूरी तैयारी शुरू कर दी:



शॉपिंग और रसद: उन्होंने पहाड़ी रास्तों के लिए भारी जैकेट, दस्ताने और मज़बूत जूते खरीदे। साथ ही, ढेर सारा सूखा खाना, डिब्बाबंद जूस और एनर्जी बार्स भी पैक किए।



कैश का इंतजाम: दीपक ने सबको सलाह दी कि आगे की पहाड़ियों में नेटवर्क और एटीएम नहीं मिलेंगे, इसलिए उन्होंने एटीएम से भारी मात्रा में कैश भी निकाल लिया।



हंसी-मजाक: डेविड और मोहित अभी भी पुरानी कहानियों का मज़ाक उड़ा रहे थे। डेविड एक दुकान से टॉर्च खरीदते हुए बोला, "ये टॉर्च इसलिए है ताकि जब हम उस पहाड़ी पर पहुँचें, तो मैं कालू की आँखों में रोशनी मारकर देख सकूँ कि उसका चश्मा कितने नंबर का है!"



लेकिन इस शोर-शराबे और मस्ती के बीच, कार्तिक और रूही के चेहरे पर वह चमक नहीं थी। वे बाकी सब की तरह उत्साहित नहीं दिख रहे थे।



कार्तिक ने रूही का हाथ धीरे से दबाया और फुसफुसाते हुए कहा, "रूही, मुझे अंदर से बहुत अजीब महसूस हो रहा है।


हम जो करने जा रहे हैं, वो बहादुरी नहीं, पागलपन लग रहा है। कोई भी पूरी बस्ती या पूरा समाज बिना किसी ठोस कारण के इतना नहीं डरता।"



रूही ने गहरी साँस ली और कहा, "मुझे भी यही लग रहा है, कार्तिक। अगर ऋषिकेश के उन महात्माओं की बात सच है, तो हम अपनी जान दांव पर लगा रहे हैं। 



लेकिन देखो इन सबको, ये किसी की सुनने को तैयार नहीं हैं। अगर हमने मना किया, तो ये कहेंगे कि हम डरपोक हैं।"



कार्तिक ने मॉल रोड की भीड़ को देखा और फिर दूर दिख रही उन काली पहाड़ियों की ओर, जो धीरे-धीरे धुंध में छिप रही थीं। उसके मन में एक शंका थी कि शायद ये उनकी आखिरी शॉपिंग ट्रिप हो।



शाम तक सारा सामान पैक हो गया। उन्होंने एक बड़ी ऑफ-रोडर गाड़ी (4x4 Gypsy) किराये पर ली।


ड्राइवर को जब उन्होंने 'कालू की पहाड़ी' की तरफ जाने को कहा, तो उसने पहले तो मना कर दिया और कांपते हाथों से अपनी माला जपते हुए बोला, "साहब, उधर मौत का पहरा है, मैं आपको सिर्फ 20 किलोमीटर दूर तक छोड़ सकता हूँ, उसके आगे आपको खुद जाना होगा।"



दीपक ने ड्राइवर की बात पर कंधे उचका दिए और गाड़ी की चाबी खुद थाम ली। "कोई बात नहीं चाचा, हम अपनी गाड़ी खुद चला लेंगे।"



अगली सुबह उन्हें निकलना था। विधाता की बिसात बिछ चुकी थी—सामान तैयार था, शिकार तैयार थे और शिकारी (कालू) भी इंतज़ार कर रहा था।



अभिशप्त गाँव और विनाश की ओर पहला कदम


मनाली की चकाचौंध पीछे छूट चुकी थी। जैसे-जैसे उनकी 4x4 जिप्सी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे कुदरत का रंग बदलने लगा था।


देवदार के घने पेड़ अब काले और सूखे नज़र आने लगे थे। रास्ता इतना संकरा और पथरीला था कि टायर हर पत्थर पर चीख रहे थे। 


शाम ढलते-ढलते वे उस पुराने गाँव की सीमा पर पहुँच गए जहाँ सदियों पहले कालू और मीना रहा करते थे।



गाँव में खौफनाक सन्नाटा


गाँव में कदम रखते ही हवा का मिजाज़ बदल गया। वहाँ की हवा में एक अजीब सी भारीपन थी, जैसे कोई अदृश्य हाथ आपका गला घोंट रहा हो। 


शाम के सात बज रहे थे, लेकिन गाँव की गलियों में एक भी इंसान नज़र नहीं आ रहा था। तभी जिप्सी की तेज़ हेडलाइट्स एक पुराने, विशाल बरगद के पेड़ पर पड़ी।



उस पेड़ की लटकती हुई जड़ें ऐसी लग रही थीं जैसे सैकड़ों हाथ नीचे की ओर इशारा कर रहे हों।



दीपक ने ब्रेक मारे। गाड़ी रुकते ही कुछ बूढ़े और डरे हुए चेहरे खिड़कियों और दरवाजों की झिर्रियों से बाहर झांकने लगे।



इन दसों दोस्तों को देखकर गाँव वालों की आँखों में हैरानी से ज़्यादा बेचैनी थी। वे जानते थे कि ये शहर के 'पढ़े-लिखे' बच्चे यहाँ क्यों आए हैं।



जब दीपक और डेविड गाड़ी से नीचे उतरे और रहने की जगह पूछी, तो एक बुजुर्ग, जिनकी कमर झुक चुकी थी, हाथ जोड़कर आगे आए। 


उन्होंने कांपती आवाज़ में पूछा, "बेटा, इतनी रात गए यहाँ? क्या रास्ता भटक गए हो?"



डेविड ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं चाचा, हम रास्ता भटकते नहीं, रास्ता बनाने आए हैं। हम बेंगलुरु से हैं और सुना है यहाँ पास में ही 'कालू की पहाड़ी' है। बस वही देखने आए हैं।"



'कालू की पहाड़ी' का नाम सुनते ही जैसे पूरे गाँव में सन्नाटा जम गया। बुजुर्ग की आँखें फैल गईं और उनके हाथ की लाठी थरथराने लगी। 


"नहीं साहब! ये गलती मत करना। वो पहाड़ी जन्नत नहीं, जिन्दा लोगों का कब्रिस्तान है। आप लोग नौजवान हो, साथ में आपकी पत्नियाँ और प्रेमिकाएं हैं। 



कालू को प्रेमी जोड़ों से नफरत है। वो अपनी मीना के धोखे को भूलता नहीं और हर प्रेमी जोड़े को उसी बेदर्दी से मारता है जैसे वो खुद मरा था।"



तर्क का अहंकार


डेविड ज़ोर से हँसा। उसकी हँसी उस सुनसान रात में बहुत डरावनी लग रही थी। "चाचा, ये सब डराने की बातें हैं। 


चाचा जी हम सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स हैं, हम भूतों में नहीं, कोडिंग में यकीन रखते हैं। आज रात हमें यहाँ रुकने दीजिए, सुबह हम खुद देख लेंगे कि कालू में कितनी जान है।"



गाँव वालों ने उन्हें एक पुरानी धर्मशाला में रुकने की जगह दी। खाना खाते समय भी गाँव वालों ने उन्हें ऋषिकेश के महात्मा और उन तांत्रिकों के किस्से सुनाए जिनकी मौत का राज़ आज तक नहीं सुलझा।


कार्तिक और रूही का चेहरा सफेद पड़ चुका था। उन्हें लग रहा था कि वे मौत की दावत में आए हैं।


कार्तिक ने धीरे से कहा, "दीपक, अभी भी वक्त है। सुबह होते ही वापस मनाली चलते हैं। ये लोग झूठ नहीं बोल रहे।"


लेकिन दीपक और डेविड ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए उसे 'डरपोक' घोषित कर दिया। रात के सन्नाटे में सब सो गए, पर गाँव के कुत्ते पूरी रात रोते रहे, जैसे वे किसी के आने की आहट सुन रहे हों।



रात का आखिरी पहर: सुबह 4:00 बजे
अंधेरा अभी घना था। चारों तरफ धुंध की एक सफेद चादर लिपटी हुई थी।



अचानक डेविड की आँख खुली। उसने घड़ी देखी—सुबह के चार बज रहे थे। यह वही समय था जब गाँव वाले गहरी नींद में थे और कालू की पहाड़ी पर सबसे ज़्यादा कोहरा होता था।



डेविड ने दबे पाँव सबको उठाया। "उठो! यही सही समय है। अगर सूरज निकल गया तो ये गाँव वाले हमें कभी जाने नहीं देंगे। हमें उस पहाड़ी का सूर्योदय देखना है।"



कार्तिक और रूही ने हाथ जोड़कर मिन्नतें कीं। रूही की आँखों में आँसू थे, 


"डेविड भाई, मत करो ऐसा। ये अंधेरा कुछ ठीक नहीं लग रहा। मेरा दिल कह रहा है कि हम वापस नहीं आएंगे।"