कालू की पहाड़ी - 11 RAAHULL SHARMA द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कालू की पहाड़ी - 11

कार्तिक ने अपने झोले से भगवान शंकर की वह पवित्र भस्म निकाली जो थोड़ी सी बची थी।


उसने उस भस्म को अपने हाथ में लिया और आँखें बंद कर 'अघोर मंत्र' का जाप शुरू किया। उसने वह भस्म हवा में उन गिरे हुए पेड़ों की ओर उछाली।



जैसे ही भस्म का एक कण उन लकड़ियों से टकराया, वे पेड़ जो कालू की काली शक्ति से जुड़े थे, धीरे-धीरे सुलगने लगे।



उनमें से आग की लपटें नहीं, बल्कि सफ़ेद धुआँ निकलने लगा। कार्तिक ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस दीवार को धक्का दिया।



उधर पहाड़ी पर, रूही ने महसूस किया कि कार्तिक भारी संकट में है। उसने अपने मंत्रों की गति बढ़ा दी और सभी दोस्तों ने एक सुर में 'हर हर महादेव' का जयकारा लगाया। उनकी सामूहिक प्रार्थना की गूँज उस जंगल तक पहुँची।




कार्तिक के स्पर्श और मंत्रों के प्रभाव से, वे भारी भरकम पेड़ धीरे-धीरे सरकने लगे। कालू यह देखकर पागलों की तरह चीखने लगा। 



वह समझ गया था कि कार्तिक की शक्ति उसके शारीरिक बल में नहीं, बल्कि उसकी अटूट आस्था में है।



कार्तिक ने उस बाधा को पार किया और सीधे उस गांव की सीमा पर जा खड़ा हुआ। कालू की सीमा टूट चुकी थी। अब कार्तिक उस सच के सामने था जिसे कालू दुनिया से छुपाना चाहता था।




कार्तिक जैसे ही उस  गाँव की सीमाओं के भीतर पहुँचा, उसे चारों ओर एक ऐसी खामोशी महसूस हुई जो किसी कब्रिस्तान जैसी थी। 



मिट्टी के घरों की दीवारें जर्जर हो चुकी थीं और खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। हालाँकि गाँव में कुछ लोग अब भी रहते थे, लेकिन कालू के खौफ ने उन्हें ज़िंदा लाश बना दिया था।



कार्तिक ने एक-एक करके कई दरवाज़े खटखटाए। खट-खट-खट!


"कोई है? कृपया दरवाज़ा खोलिए! मुझे आपकी मदद चाहिए!" कार्तिक चिल्लाया।



पर अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। गाँव वालों को लगा कि यह कालू का ही कोई नया छलावा है, जो किसी परदेसी की आवाज़ में उन्हें बाहर बुलाकर उनका शिकार करना चाहता है।




उन्हें लगा कि कालू आज बहुत क्रोध में है और वह किसी को नहीं छोड़ेगा।



कार्तिक ने हार नहीं मानी। वह एक पुराने लकड़ी के दरवाज़े को ज़ोर-ज़ोर से पीटने लगा। "मेरी बात सुनिए! मैं कालू का कोई साया नहीं हूँ। मैं एक यात्री हूँ। मेरे नौ दोस्तों की जान खतरे में है। 



कालू आज रात तांडव मचा रहा है! मुझे उसका सच जानना है ताकि मैं उसे रोक सकूँ। महादेव के लिए दरवाज़ा खोलिए!"




कार्तिक पागलों की तरह एक के बाद एक दरवाज़ा पीट रहा था, लेकिन हर तरफ से सिर्फ सन्नाटा और बंद किवाड़ों की आवाज़ आ रही थी। तभी, एक जर्जर और पुराने मकान का भारी लकड़ी का दरवाज़ा धीरे से चरमराया।




अंदर से एक लगभग 80 साल का बुजुर्ग हाथ में एक पुरानी लालटेन लेकर बाहर निकला। लालटेन की पीली रोशनी जैसे ही कार्तिक के चेहरे पर पड़ी, उस बुजुर्ग की आँखें फटी की फटी रह गई।



वह बुज़ुर्ग ठिठक गया—उसे याद आया कि यह वही लड़का है जिसे कुछ समय पहले गाँव वालों ने पहाड़ी की ओर जाने से मना किया था।




बुजुर्ग के मन में बिजली की तरह एक विचार कौंधा, "हे भगवान! इसका मतलब बाकी सब मारे गए? सिर्फ यही अकेला बचकर यहाँ तक आ पाया है?"




कार्तिक ने जैसे ही कुछ कहना चाहा, "बाबा! सुनिए, मेरे दोस्त..."



पर उस बुजुर्ग ने कार्तिक की एक न सुनी। उसने न तो कोई सवाल किया और न ही कार्तिक को बोलने का मौका दिया। 



उसने फुर्ती से कार्तिक का हाथ पकड़ा और उसे झटके से अपने घर के अंदर खींच लिया। कार्तिक के अंदर आते ही उसने भारी दरवाज़ा बंद किया और उस पर लोहे की बड़ी सांकल चढ़ा दी।




बुजुर्ग हाँफ रहा था। उसने लालटेन को मेज़ पर रखा और कांपती हुई उंगली से बाहर की ओर इशारा करते हुए दबी आवाज़ में कहा:



"चुप! एकदम चुप! अगर उसे पता चल गया कि तू यहाँ है, तो वह इस पूरे घर को श्मशान बना देगा। तू ज़िंदा यहाँ तक पहुँच कैसे गया? उस पहाड़ी से आज तक कोई अकेला वापस नहीं आया।"




घर के अंदर का माहौल बहुत ही रहस्यमयी था। चारों तरफ पुरानी जड़ी-बूटियाँ लटक रही थीं और एक कोने में महादेव की एक प्राचीन मूर्ति रखी थी, जिस पर ताज़ा सिंदूर चढ़ा था।




कार्तिक ने सिसकते हुए कहा, "बाबा, मेरे दोस्त मरे नहीं हैं! वे अभी भी उस पहाड़ी पर एक सुरक्षा घेरे में फंसे हैं। कालू उन पर हमला कर रहा है। 



मुझे उसकी सच्चाई जाननी है, मुझे उसे रोकना होगा! वह 'मीना' कौन थी? और वह उसे आज भी क्यों ढूँढ रहा है?"



बुजुर्ग के चेहरे पर पसरी झुर्रियां मीना का नाम सुनते ही डर और हैरानी से खिंच गईं। जैसे ही कार्तिक की जुबान से वह नाम निकला,



बुजुर्ग के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। पहले तो उन्हें लगा था कि यह कालू की कोई चाल है, लेकिन जब उन्होंने कार्तिक की आँखों में वह सच्चा दर्द, माथे पर पसीने की बूंदें और उसकी टूटती हुई सांसें देखीं, तो उन्हें पक्का यकीन हो गया।



बुजुर्ग ने राहत की एक ठंडी सांस ली और धीमी आवाज़ में कहा:



"तू सच कह रहा है बेटा... तू सचमुच एक इंसान है। कालू की मायावी शक्ति यहाँ इस घर की चौखट पार नहीं कर सकती, 



क्योंकि यहाँ महादेव का पहरा है। और जिस हिम्मत से तूने उस नाम को लिया है, उसने मुझे यकीन दिला दिया कि तू मौत के डर से ऊपर उठ चुका है।"



बुजुर्ग ने कार्तिक को लकड़ी की एक पुरानी बेंच पर बिठाया और खुद उसके सामने बैठ गए। उन्होंने लालटेन की लौ को थोड़ा तेज़ किया और उस सच को उगलना शुरू किया जो कही सालों से इस गाँव के सीने में दफन था:



पर कार्तिक को बिल्कुल भी चैन नहीं था उसे अपने दोस्तों की जान बचाने थी इसलिए वह उसे बुजुर्ग व्यक्ति से कहने लगा कि दादाजी जल्दी बताइए मुझे उसे कालू और उस मीना की सच्चाई जानी है।



ताकि मैं कालू की रूह को मुक्ति दिला सकूं इस नर्क की आग से आजाद कर सकूं 


इसके बाद कार्तिक को व्यक्ति करता है ठीक है मैं तुम्हें को सब बताऊंगा जिससे कालू को मुक्ति मिल सके 



"बैठो बेटा... अगर तुम उस रूह को मुक्ति दिलाना चाहते हो, तो तुम्हें उस जख्म को समझना होगा जो आज भी इस पहाड़ी के सीने में हरा है। 



यह कहानी तब की है जब भारत अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, लेकिन हमारा यह गाँव किसी जन्नत से कम नहीं था।"



खुशहाल गाँव और भोला चरवाहा



बुजुर्ग ने बताना शुरू किया कि उस समय यह गाँव ऐसा वीरान और डरावना नहीं था। हर तरफ हरियाली थी, पहाड़ों से झरने गिरते थे और हवाओं में चमेली की खुशबू महकती थी।



गाँव के लोग सीधे-साधे थे, जहाँ अमीर-गरीब का भेद नहीं था। लोग एक-दूसरे के दुख में शरीक होते थे।



इसी गाँव में रहता था कल्याण सिंह। लंबा-चौड़ा कद, मजबूत कंधे और चेहरे पर एक अबोध बालक जैसी मासूमियत।



उसे छल-कपट छूकर भी नहीं गया था। वह पेशे से एक चरवाहा था। सुबह सूरज की पहली किरण के साथ वह अपनी गायों और भेड़ों को लेकर ऊँची पहाड़ियों पर निकल जाता था। 



उसकी बांसुरी की धुन जब वादियों में गूँजती थी, तो ऐसा लगता था मानो खुद प्रकृति नाच रही हो।



कल्याण सिंह भगवान भोलेनाथ का अनन्य भक्त था। पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर एक छोटा सा प्राचीन शिवलिंग था, जहाँ वह रोज़ ताज़ा दूध और जंगली फूल चढ़ाता था।



उसका मानना था कि यह पहाड़ महादेव का घर है और वह महादेव का चौकीदार। वह अपनी कमाई का आधा हिस्सा गरीबों में बाँट देता था। 


अगर गाँव में कोई बीमार होता, तो कल्याण सिंह आधी रात को भी जड़ी-बूटियाँ लेने पहाड़ पर चढ़ जाता था।



उसके जीवन के दो ही केंद्र थे—एक उसकी बूढ़ी माँ, जिसकी आँखों का वह इकलौता तारा था, और दूसरी वह मीना, जिससे उसने अपनी रूह तक का सौदा कर लिया था।


मेले का मिलन और मीना का छलावा


गाँव में हर साल सावन के महीने में एक बहुत बड़ा मेला लगता था। झूलों की आवाज़, मिठाई की खुशबू और रंग-बिरंगी चूड़ियों की खनक से पूरा गाँव गूँज उठता था।



इसी मेले में कल्याण सिंह की किस्मत ने करवट ली।
कल्याण सिंह एक बड़े से लकड़ी के झूले पर बैठा था। तभी बगल वाले झूले में उसने एक लड़की को देखा।



गुलाबी दुपट्टा, हिरणी जैसी आँखें और चेहरे पर एक ऐसी चमक जिसे देखकर कल्याण सिंह अपना आपा खो बैठा। वह और कोई नहीं मीना थी। 



मीना जितनी सुंदर थी, उतनी ही चंचल और तेज़। दोनों की नज़रें मिलीं, मीना ने उसे देखकर एक शरारती मुस्कान दी, और बस, कल्याण सिंह के सीधे-साधे दिल में प्रेम का अंकुर फूट गया।