महा-सुरक्षा कवच का निर्माण
कार्तिक ने अपने झोले से बचा हुआ सारा सामान निकाला। उसने पवित्र विभूति (भस्म) से उन आठों बेहोश दोस्तों के चारों ओर एक विशाल घेरा बनाना शुरू किया।
वह साधारण घेरा नहीं था, बल्कि उसने हर दोस्त के माथे पर तिलक लगाया और फिर उनके चारों तरफ ॐ की आकृति बनाई।
उसने रूही से कहा, "रूही, तुम त्रिशूल लेकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठो और निरंतर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करो। मैं इस घेरे को गंगाजल से अभिमंत्रित करता हूँ।"
कार्तिक ने गंगाजल की बोतल उठाई। जैसे ही उसने मंत्रों के साथ जल की बूंदें ज़मीन पर छिड़कना शुरू किया, वह भस्म की लकीर चांदी की तरह चमकने लगी।
एक अदृश्य गुंबद जैसा कवच उन दसों को ढकने लगा। उस घेरे के अंदर की हवा अचानक शुद्ध और गर्म हो गई, जबकि बाहर पहाड़ी पर बर्फीली और डरावनी हवाएं चल रही थीं।
गंगाजल का अभिषेक और होश की वापसी
अब सबसे कठिन काम था—कालू के उस जहरीले भोजन के असर को खत्म करना। कार्तिक एक-एक करके अपने दोस्तों के पास गया।
सबसे पहले वह डेविड के पास पहुँचा। डेविड का चेहरा अभी भी पीला था और उसके होंठ नीले पड़े थे।
कार्तिक ने अपने हाथ में गंगाजल लिया और पूरे विश्वास के साथ डेविड के चेहरे पर छिड़का। उसने ज़ोर से कहा, "उठो डेविड! अंधकार का त्याग करो और शिव की शरण में आओ!"
जैसे ही गंगाजल की पवित्र बूंदें डेविड की त्वचा से टकराईं, उसके शरीर में एक बिजली सी दौड़ी। उसके गले से एक घुरघुराहट निकली और उसने काली मिट्टी की उल्टी की—वही 'मरण-भोग' जो उसने खाया था।
धीरे-धीरे उसकी आँखों की पुतलियाँ वापस अपनी जगह पर आईं और उसने एक लंबी सांस ली।
"कार्तिक... भाई... मैं कहाँ हूँ?" डेविड ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।
कार्तिक ने उसे चुप रहने का इशारा किया और यही प्रक्रिया मलाइका, दीपक, मोहित, आरजू, साहिल, अभिलाषा और बाकी सब के साथ दोहराई। जैसे-जैसे गंगाजल का स्पर्श उन्हें मिल रहा था, कालू का सम्मोहन टूट रहा था।
सुरक्षा घेरे में वापसी
एक-एक करके सभी आठ दोस्त होश में आने लगे। वे सब बहुत कमज़ोर महसूस कर रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में अब वह डरावना सफ़ेदपन नहीं था।
वे सब समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ क्या हुआ है, पर उन्हें यह अहसास था कि वे मौत के मुँह से वापस आए हैं।
रूही ने सबको घेरे के केंद्र में इकट्ठा किया। उसने सिसकते हुए कहा, "कोई भी इस रेखा को पार नहीं करेगा। जब तक सूरज नहीं निकल जाता, हम इसी सुरक्षा कवच के अंदर रहेंगे।"
बाहर अंधेरे में कालू की भयानक गर्जना सुनाई दे रही थी। वह उस चमकते हुए कवच को देख रहा था पर उसके अंदर आने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
गंगाजल और भस्म ने एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी जिसे भेदना किसी भी प्रेत-शक्ति के लिए नामुमकिन था।
कार्तिक ने त्रिशूल को घेरे के बीचों-बीच ज़मीन में गाड़ दिया। अब वे दसों दोस्त उस छोटे से घेरे में एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे थे।
उनकी दोस्ती, जिसे कालू ने मोहरा बनाया था, अब उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई थी। सुबह होने में अभी कुछ घंटे बाकी थे, और यह उनकी ज़िंदगी की सबसे लंबी रात थी।
डेविड, जिसका व्यक्तित्व हमेशा एक अभेद्य दीवार की तरह था, आज भीतर से पूरी तरह टूट चुका था। वह लड़का जो विज्ञान की डिग्री और तर्कों के पीछे छिपकर
धर्म, आस्था और अदृश्य शक्तियों का मज़ाक उड़ाता था, आज उसी की आँखों के सामने विज्ञान के सारे नियम धरे के धरे रह गए थे।
उसका वह अहंकार, जो उसे खुद को दूसरों से श्रेष्ठ और समझदार महसूस कराता था, कालू के एक ही प्रहार में कांच की तरह चकनाचूर हो गया था।
जैसे ही गंगाजल के स्पर्श से डेविड की चेतना वापस आई, उसने अपने कांपते हाथों से ज़मीन की मिट्टी को छुआ। उसे याद आया कि कैसे उसने उस 'मायावी भोजन' को लालच में आकर खाया था
और कैसे वह एक ज़िंदा रोबोट बन गया था। ग्लानि और शर्मिंदगी के बोझ से उसका सिर झुक गया।
वह लड़खड़ाते हुए घुटनों के बल चलकर कार्तिक के पास पहुँचा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे—ये आँसू डर के नहीं, बल्कि पछतावे के थे।
उसने कार्तिक का कंधा पकड़ा और रुंधी हुई आवाज़ में बोला:
"कार्तिक... मेरे भाई... तुम सही थे। मैं आज खुद को तुम्हारी नज़रों में गिरा हुआ महसूस कर रहा हूँ। मेरा वह सारा ज्ञान, मेरा वह विज्ञान और मेरा वह घमंड... सब एक पल में राख हो गया।
मैं जिसे 'पाखंड' कहता था, आज उसी आस्था और तुम्हारी इसी भस्म ने मेरी जान बचाई है।"
डेविड ने सिसकते हुए चारों ओर उन बाकी दोस्तों को देखा जो अभी भी होश जो अभी अभी होश में आए थे। उसने आगे कहा:
"मैं सिर्फ तुम्हारा गुनहगार नहीं हूँ कार्तिक, मैं इन सबका अपराधी हूँ। मेरा अहंकार इतना बड़ा था कि मैंने सबकी जान जोखिम में डाल दी।
मैंने मंदिर का मज़ाक उड़ाया, मैंने तुम्हारी चेतावनियों को अनसुना किया। मुझे लगा मैं सबसे बुद्धिमान हूँ, लेकिन आज समझ आया कि मैं कितना बड़ा मूर्ख था।
कार्तिक... रूही... मुझे माफ कर दो। अगर आज तुम दोनों अपनी श्रद्धा पर अड़े न रहते, तो हम सब आज कालू के गुलाम बन चुके होते, और वो अभी तक हम सब को मार चुका होता।
कार्तिक ने चुपचाप डेविड के हाथ को थाम लिया। उसने देखा कि डेविड की आँखों में अब वह पुरानी अकड़ नहीं थी, बल्कि एक नया बोध था।
डेविड ने अपने कान पकड़ते हुए सबके सामने कहा, "आज के बाद मैं कभी किसी की आस्था का मज़ाक नहीं उड़ाऊँगा।
मैंने देख लिया कि जहाँ हमारा विज्ञान हाथ खड़े कर देता है, वहाँ से उस परम शक्ति का चमत्कार शुरू होता है। तुम लोगों ने मुझे एक नई ज़िंदगी दी है।"
पहाड़ी की ठंडी हवाओं के बीच डेविड का यह आत्मसमर्पण बाकी दोस्तों के लिए भी एक सीख बन गया।
जो दोस्त डेविड की बातों में आकर मौत को खेल समझ रहे थे, आज वे सब कार्तिक और रूही के उस 'सुरक्षा कवच' की अहमियत समझ चुके थे।
कार्तिक ने डेविड को सहारा देकर बिठाया और कहा, "माफी खुद से मांगो डेविड, क्योंकि आज से तुम्हें एक नया इंसान बनकर जीना है।"
घेरे के बाहर अंधेरा अभी भी घना था, लेकिन घेरे के अंदर अब एक नई वैचारिक रोशनी पैदा हो चुकी थी।
डेविड, जो अभी-अभी अपने अहंकार से मुक्त हुआ था, कार्तिक की बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था। कार्तिक ने अपनी नज़रें उस गहरी धुंध की ओर टिका दीं, जहाँ से रह-रहकर कालू की भारी साँसों की आवाज़ आ रही थी।
कार्तिक ने बहुत ही गंभीर स्वर में कहना शुरू किया:
"दोस्तों, सिर्फ खुद को बचा लेना काफी नहीं है। अगर हम आज यहाँ से भाग भी गए, तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा।
कालू की भटकती रूह इस पहाड़ी पर एक ज़हरीले नासूर की तरह है। वह अपनी 'मीना' की तलाश में और उस 'आशिक' के इंतज़ार में न जाने कितने और निर्दोष मुसाफिरों को अपना शिकार बनाएगा।
यह खूबसूरत पहाड़ी हमेशा के लिए एक वीरान श्मशान बनी रहेगी।"
उसने रूही की ओर देखा और फिर सबकी तरफ मुड़कर कहा:
"हमें कालू को मुक्ति दिलानी होगी। हमें उस नफरत को खत्म करना होगा जो उसे इस दुनिया से बाँधे हुए है।
लेकिन उसके लिए हमें यह जानना होगा कि कालू असल में कौन था? वह यहाँ क्या करता था?
उसे किस चीज़ से लगाव था और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या थी? हर रूह का एक सच होता है, और हमें कालू का वह सच ढूँढना होगा।"