आध्यात्मिक कथा कहानियाँ पढ़े और PDF में डाउनलोड करे

Stories and books have been a fundamental part of human culture since the dawn of civilization, acting as a powerful tool for communication, education, and entertainment. Whether told around a campfire, written in ancient texts, or shared through modern media, Spiritual Stories in hindi books and stories have the unique ability to transcend time and space, connecting people across generations and...Read More


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जुआ मत खेलो By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या "अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ --जुआ मत‌ खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ) के दुष्परिणामों से सावधान करता है और पर...

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महाभारत की कहानी - भाग 236 By Ashoke Ghosh

महाभारत की कहानी - भाग-२४० पाण्डवों का हस्तिनापुर लौटना और जनमेजय के यज्ञ में परीक्षित का प्रकट होना   प्रस्तावना कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक मे...

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 82 By CHIRANJIT TEWARY

अघोरी कहता है"" हम्म्..! ठीक है । दक्ष ये बात मेरे और तुम्हारे बिच ही रहनी चाहिए इस बारे मे चेतन को पता नही चलनी चाहिए ।" दक्षराज हैरानी से कहता है:" पर चेतन तो आपका ...! "इतना बोल...

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जुआरी का पतन By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या- “जाया तप्यते कितवस्य हीना” भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।ऋग्वेद १०.३४.१० (अक्षसूक्त)यह मंत्र ऋग्वेद १०.३४.१० के “अक्षसूक्त” (जुए...

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बच्चों को जितना हो सके जंक फूड कम खाने के लिए कैसे मार्गदर्शन करें? By Nitya Oswal

बच्चों को जितना हो सके जंक फूड कम खाने के लिए कैसे मार्गदर्शन करें?वर्तमान समय में बच्चे विकासशील दुनिया और आधुनिक भोजन से प्रभावित हो रहे हैं। वे करी और रोटी के बजाय कोल्ड ड्रिंक्...

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आत्मजागृति By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या "कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जा...

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आलस्य मत‌ करो By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

  ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्या ऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत‌ करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत करो, पीछे मत हटो।”यहाँ—मा...

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सत्य का प्रकाश By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्या त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--ऋगुवेद,--१/११/२२भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो। मंत्र —“त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ…”— ऋग...

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ईश्वर की कृपा By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२३) की व्याख्या मंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”पदच्छेद--पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानःशाब्दिक अर्थ--पितेव = पिता के समाननः = हमारीशृणुहि &#...

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ईश्वर से मित्रता By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या “अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४भावार्थ --हे प्रभु ! मैं ‌तेरी मित्रता से इन्कार नहीं ‌करता।पदच्छेद-- अघृणे — हे प्रकाशस्वरूप, दयालु (...

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अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 10 By Shivraj Bhokare

दोहा:१९कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।भक्ति करै कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय॥कथा: "शर्तों वाली भक्ति"एक बहुत बड़ा व्यापारी था, जिसका मन हमेशा मुनाफे और वासनाओं में उलझा रहता था।...

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भय से मुक्ति By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त,...

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भक्त को भय नहीं By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त,...

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स्वर्ग का दरवाजा - 4 By Author Pawan Singh

बाक़ी धर्म से कैसे अलग है सनातन?   शैतान सबसे ज़्यादा शैतानी तब करता है जब वह सामाजिक प्रतिष्ठा, नैतिक इज्जत या ईमानदारी के मुखौटो के पीछे छुपा होता है।  ये बात एलिज़ाबेथ बैरेट ने...

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उपकारहीन कृपण By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२६) की व्याख्या मंत्र:अपृणन्तिमभि सं यन्ति शोका:।— ऋग्वेद १.१२५.७भावार्थ --उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है।पदच्छेद--अपृणन्तिम् + अभि + सं + यन्ति + शोकाःशब्दार्थ--...

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सत्य पथ पर चलो By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२७) की व्याख्या  मन्त्र —“मा प्रगाम पथोवयम्”  ऋग्वेद_ १०.५७.१भावार्थ --हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।पदच्छेदमा — नहींप्रगाम — आगे बढ़ें / जाएँपथः — मार्ग सेवयम् — हम...

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ज्ञानी भ्रमित नहीं होता By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२८) की व्याख्या  मन्त्र--“उत देवा अवहित देवा: उन्नदेवा पुनः:”। --ऋग्वेद १०.१३७.१भावार्थ --गिरे हुओं को पुनः उठाओं।यह मन्त्र ऋग्वेद के दशम मण्डल, १३७वें सूक्त का प्र...

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स्वभाव धर्म ओर आत्मा की खोज By Vedanta Life Agyat Agyani

स्वभाव का तात्विक विवेचन: दर्शन, मनोविज्ञान और आध्यात्मिक धर्म का एक व्यापक अनुसंधानhttps://orcid.org/0009-0000-8083-0685vedanta 2.0 life - pen name -Agyat agyani—𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲“जो स...

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शून्य-बिंदु: खंडित जगत से समग्र बोध की ओर By Vedanta Life Agyat Agyani

  शून्य-बिंदु: खंडित जगत से समग्र बोध की ओर जीवन कोई ऐसी पहेली नहीं है जिसे बाहर की कोई सत्ता (धर्म, विज्ञान या राजनीति) सुलझा सके। यह एक बहती हुई धारा है, जिसका आनंद केवल 'अभी' और...

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दुख का कारण 'अति' By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति- (२९) की व्याख्या बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।ऋगुवेद --१/१६४/३२भाव--बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।मंत्र:“बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।”— ऋग्वेद १/१६४/३२पदच्छेद--बहु-प...

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भक्त का रक्षक भगवान By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति- (३०) की व्याख्या यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल 7, सूक्त 32, मन्त्र 14) है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है।मन्त्र---कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति।(ऋग्वेद...

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शून्य की सत्ता और चेतना का आधुनिक विज्ञान By Vedanta Life Agyat Agyani

वेदान्त 2.0: शून्य की सत्ता और चेतना का आधुनिक विज्ञान — एक वृहद शोध रिपोर्ट प्रस्तुत शोध रिपोर्ट 'अज्ञात अज्ञानी' (Agyat Agyani) द्वारा प्रतिपादित 'वेदान्त 2.0' के दार्शनिक और वैज...

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स्त्री - दृश्य नहीं, दर्शन है By Vedanta Life Agyat Agyani

Vedanta 2.0 Life स्त्री — दृश्य नहीं, दर्शन है धर्म, पाखंड और विश्वगुरु का मौन सत्यजब पुरुष स्त्री को समझ नहीं पाया, तभी धर्म पैदा हुआ। जब प्रेम नहीं समझा गया, तभी शास्त्र लिखे गए।...

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आन्तरिक पुकार By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद (31)की व्याख्या "इमं न: श्रणुहवम्"ऋगुवेद --10/26/9भावार्थ--हे ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुनो। ऋग्वेद में प्रयुक्त पद “इमं नः शृणु हवम्” (मेरी/हमारी प्रार्थना को सुनो) कई सूक्त...

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अप्प दीपो भवः...- बोधार्थी रौनक़ । By Raunak

रांची की वह सुबह आज भी याद है...ठंडी हवा थी...सड़कें धीरे-धीरे जाग रही थीं...और मैं किताबों की तलाश में था।किताबें...जो सिर्फ पन्ने नहीं होतीं...कई बार वे मनुष्य को नया मनुष्य बना...

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वेदान्त 2.0 - भाग 39 By Vedanta Life Agyat Agyani

 ,  वेदांत 2.0: 'अज्ञात अज्ञानी' के अस्तित्व-दर्शन और वैज्ञानिक अद्वैत का गहन विश्लेषणआधुनिक दार्शनिक चिंतन के धरातल पर 'वेदांत 2.0' का उद्भव एक ऐसी क्रांतिकारी घटन...

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‌परम शक्ति By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति- (32) की व्याख्या "स्तोतुर्मघवन काममा पृण"। ऋगुवेद ---१/५७/५भावार्थ --हे प्रभु! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो। मंत्र :“स्तोतुर्मघवन् काममापृण।”— ऋगुवेद --1.57.5पदच्छेद...

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चेतना का स्रोत By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(३३) की व्याख्या"विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि"भावार्थ --हे प्रभु ! सारी विद्याओं का आदि‌ मूल‌ तू ही‌‌ है।मंत्र —विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि--2.23.2पदच्छेद-विश्वेष...

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Hero - 4 By Ram Make

लेकिन जतिन जैसे ही कमरे से बाहर निकलता है । अरुण जतिन से पूछता है। "जतिन महागुरु तुमसे क्या कह रहे थे। " फिर जतिन कहता है महागुरु ने कहा है। जो उन्होंने कहा है वह किसी को भी मत बता...

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वह देवों का देव By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(34) की व्याख्या-- "देवो देवनामसि"ऋग्वेद- 1-94-13अर्थ--हे प्रभु ! तू देवों का देव है।विस्तृत भावार्थ :इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वोच्चता बताई गई है। संसार में जो भी...

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मुक्ति की कामना By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या "स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भावार्थ--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् । अति । द्विषः शब्दार्थसः – वह (परमात्...

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जुआ मत खेलो By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या "अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ --जुआ मत‌ खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ) के दुष्परिणामों से सावधान करता है और पर...

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महाभारत की कहानी - भाग 236 By Ashoke Ghosh

महाभारत की कहानी - भाग-२४० पाण्डवों का हस्तिनापुर लौटना और जनमेजय के यज्ञ में परीक्षित का प्रकट होना   प्रस्तावना कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक मे...

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 82 By CHIRANJIT TEWARY

अघोरी कहता है"" हम्म्..! ठीक है । दक्ष ये बात मेरे और तुम्हारे बिच ही रहनी चाहिए इस बारे मे चेतन को पता नही चलनी चाहिए ।" दक्षराज हैरानी से कहता है:" पर चेतन तो आपका ...! "इतना बोल...

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जुआरी का पतन By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या- “जाया तप्यते कितवस्य हीना” भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।ऋग्वेद १०.३४.१० (अक्षसूक्त)यह मंत्र ऋग्वेद १०.३४.१० के “अक्षसूक्त” (जुए...

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बच्चों को जितना हो सके जंक फूड कम खाने के लिए कैसे मार्गदर्शन करें?वर्तमान समय में बच्चे विकासशील दुनिया और आधुनिक भोजन से प्रभावित हो रहे हैं। वे करी और रोटी के बजाय कोल्ड ड्रिंक्...

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आत्मजागृति By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या "कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जा...

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आलस्य मत‌ करो By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

  ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्या ऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत‌ करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत करो, पीछे मत हटो।”यहाँ—मा...

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सत्य का प्रकाश By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्या त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--ऋगुवेद,--१/११/२२भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो। मंत्र —“त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ…”— ऋग...

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ईश्वर की कृपा By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२३) की व्याख्या मंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”पदच्छेद--पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानःशाब्दिक अर्थ--पितेव = पिता के समाननः = हमारीशृणुहि &#...

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ईश्वर से मित्रता By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या “अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४भावार्थ --हे प्रभु ! मैं ‌तेरी मित्रता से इन्कार नहीं ‌करता।पदच्छेद-- अघृणे — हे प्रकाशस्वरूप, दयालु (...

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अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 10 By Shivraj Bhokare

दोहा:१९कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।भक्ति करै कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय॥कथा: "शर्तों वाली भक्ति"एक बहुत बड़ा व्यापारी था, जिसका मन हमेशा मुनाफे और वासनाओं में उलझा रहता था।...

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भय से मुक्ति By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त,...

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भक्त को भय नहीं By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त,...

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स्वर्ग का दरवाजा - 4 By Author Pawan Singh

बाक़ी धर्म से कैसे अलग है सनातन?   शैतान सबसे ज़्यादा शैतानी तब करता है जब वह सामाजिक प्रतिष्ठा, नैतिक इज्जत या ईमानदारी के मुखौटो के पीछे छुपा होता है।  ये बात एलिज़ाबेथ बैरेट ने...

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उपकारहीन कृपण By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२६) की व्याख्या मंत्र:अपृणन्तिमभि सं यन्ति शोका:।— ऋग्वेद १.१२५.७भावार्थ --उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है।पदच्छेद--अपृणन्तिम् + अभि + सं + यन्ति + शोकाःशब्दार्थ--...

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सत्य पथ पर चलो By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२७) की व्याख्या  मन्त्र —“मा प्रगाम पथोवयम्”  ऋग्वेद_ १०.५७.१भावार्थ --हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।पदच्छेदमा — नहींप्रगाम — आगे बढ़ें / जाएँपथः — मार्ग सेवयम् — हम...

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ज्ञानी भ्रमित नहीं होता By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२८) की व्याख्या  मन्त्र--“उत देवा अवहित देवा: उन्नदेवा पुनः:”। --ऋग्वेद १०.१३७.१भावार्थ --गिरे हुओं को पुनः उठाओं।यह मन्त्र ऋग्वेद के दशम मण्डल, १३७वें सूक्त का प्र...

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स्वभाव धर्म ओर आत्मा की खोज By Vedanta Life Agyat Agyani

स्वभाव का तात्विक विवेचन: दर्शन, मनोविज्ञान और आध्यात्मिक धर्म का एक व्यापक अनुसंधानhttps://orcid.org/0009-0000-8083-0685vedanta 2.0 life - pen name -Agyat agyani—𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲“जो स...

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शून्य-बिंदु: खंडित जगत से समग्र बोध की ओर By Vedanta Life Agyat Agyani

  शून्य-बिंदु: खंडित जगत से समग्र बोध की ओर जीवन कोई ऐसी पहेली नहीं है जिसे बाहर की कोई सत्ता (धर्म, विज्ञान या राजनीति) सुलझा सके। यह एक बहती हुई धारा है, जिसका आनंद केवल 'अभी' और...

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ऋगुवेद सूक्ति- (२९) की व्याख्या बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।ऋगुवेद --१/१६४/३२भाव--बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।मंत्र:“बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।”— ऋग्वेद १/१६४/३२पदच्छेद--बहु-प...

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ऋगुवेद सूक्ति- (३०) की व्याख्या यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल 7, सूक्त 32, मन्त्र 14) है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है।मन्त्र---कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति।(ऋग्वेद...

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शून्य की सत्ता और चेतना का आधुनिक विज्ञान By Vedanta Life Agyat Agyani

वेदान्त 2.0: शून्य की सत्ता और चेतना का आधुनिक विज्ञान — एक वृहद शोध रिपोर्ट प्रस्तुत शोध रिपोर्ट 'अज्ञात अज्ञानी' (Agyat Agyani) द्वारा प्रतिपादित 'वेदान्त 2.0' के दार्शनिक और वैज...

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स्त्री - दृश्य नहीं, दर्शन है By Vedanta Life Agyat Agyani

Vedanta 2.0 Life स्त्री — दृश्य नहीं, दर्शन है धर्म, पाखंड और विश्वगुरु का मौन सत्यजब पुरुष स्त्री को समझ नहीं पाया, तभी धर्म पैदा हुआ। जब प्रेम नहीं समझा गया, तभी शास्त्र लिखे गए।...

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ऋगुवेद (31)की व्याख्या "इमं न: श्रणुहवम्"ऋगुवेद --10/26/9भावार्थ--हे ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुनो। ऋग्वेद में प्रयुक्त पद “इमं नः शृणु हवम्” (मेरी/हमारी प्रार्थना को सुनो) कई सूक्त...

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वेदान्त 2.0 - भाग 39 By Vedanta Life Agyat Agyani

 ,  वेदांत 2.0: 'अज्ञात अज्ञानी' के अस्तित्व-दर्शन और वैज्ञानिक अद्वैत का गहन विश्लेषणआधुनिक दार्शनिक चिंतन के धरातल पर 'वेदांत 2.0' का उद्भव एक ऐसी क्रांतिकारी घटन...

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‌परम शक्ति By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति- (32) की व्याख्या "स्तोतुर्मघवन काममा पृण"। ऋगुवेद ---१/५७/५भावार्थ --हे प्रभु! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो। मंत्र :“स्तोतुर्मघवन् काममापृण।”— ऋगुवेद --1.57.5पदच्छेद...

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चेतना का स्रोत By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(३३) की व्याख्या"विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि"भावार्थ --हे प्रभु ! सारी विद्याओं का आदि‌ मूल‌ तू ही‌‌ है।मंत्र —विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि--2.23.2पदच्छेद-विश्वेष...

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Hero - 4 By Ram Make

लेकिन जतिन जैसे ही कमरे से बाहर निकलता है । अरुण जतिन से पूछता है। "जतिन महागुरु तुमसे क्या कह रहे थे। " फिर जतिन कहता है महागुरु ने कहा है। जो उन्होंने कहा है वह किसी को भी मत बता...

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वह देवों का देव By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(34) की व्याख्या-- "देवो देवनामसि"ऋग्वेद- 1-94-13अर्थ--हे प्रभु ! तू देवों का देव है।विस्तृत भावार्थ :इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वोच्चता बताई गई है। संसार में जो भी...

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मुक्ति की कामना By GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या "स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भावार्थ--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् । अति । द्विषः शब्दार्थसः – वह (परमात्...

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