कार्तिक उस मलबे से किसी तरह बाहर निकला, उसके शरीर पर जख्म थे, लेकिन उसका संकल्प हिमालय जैसा अडिग था।
उसने आसमान की ओर देखा, सुबह होने में अब बहुत कम समय बचा था। घड़ी की सुइयाँ रात के 3:45 की ओर इशारा कर रही थीं।
यह वही समय था जब अंधेरा अपनी पूरी ताकत लगा देता है क्योंकि उसे पता होता है कि रोशनी आने वाली है।
कार्तिक के मन में बिजली की तरह विचार कौंध रहे थे, "सिर्फ 15 मिनट! अगर 4 बजे तक मैं पहाड़ी पर नहीं पहुँचा, तो कालू का तांडव मेरे दोस्तों के अस्तित्व को मिटा देगा।
एक महान ऋषि की शक्ति भी जिसके आगे फीकी पड़ गई, वहाँ हम साधारण इंसानों की बिसात क्या? लेकिन मेरे पास महादेव का आशीर्वाद और एक माँ की ममता का कलश है।"
जंगल का भयावह सफर
जैसे ही गांव से निकला पहाड़ी की ओर कार्तिक जंगल के रास्तों पर पागलों की तरह दौड़ने लगा। झाड़ियाँ उसके कपड़ों को चीर रही थीं, काँटे उसके पैरों में चुभ रहे थे, लेकिन उसे सिर्फ अपने दोस्तों के चेहरे दिखाई दे रहे थे।
जंगल की हवाएँ अब डरावनी आवाज़ें निकाल रही थीं। कालू की माया ने जंगल के रास्तों को उलझाना शुरू कर दिया था ताकि कार्तिक समय पर न पहुँच सके।
कभी उसे लगा कि रास्ता खत्म हो गया है, तो कभी पेड़ उसके सामने चलने लगे।
पर कार्तिक रुका नहीं। उसने अपने सीने से उस अस्थि-कलश को और मज़बूती से चिपका लिया।
पहाड़ी पर मौत का नंगा नाच
उधर पहाड़ी की चोटी पर, कालू अब अपने सबसे विकराल रूप में था। उसकी छाया अब पूरे आकाश को ढँक चुकी थी।
उसने अपनी विशाल कुल्हाड़ी को हवा में लहराया और एक ऐसी गर्जना की जिससे पहाड़ की चट्टानें खिसकने लगीं।
कालू मन ही मन सोच रहा था, "सुबह की पहली किरण से पहले मुझे इन सबको इस पहाड़ी की बलि चढ़ा देनी होगी।
कार्तिक ने मेरा राज़ जान लिया है, वह मुझे आज़ाद करना चाहता है... पर मैं आज़ाद नहीं होना चाहता! मैं तो जलना चाहता हूँ इस प्रतिशोध की आग में!"
उसने घेरे के अंदर बैठे रूही, डेविड और बाकी दोस्तों की ओर देखा। घेरे की नीली रोशनी अब सिर्फ एक टिमटिमाते दीये जैसी रह गई थी।
कालू ने अपनी कुल्हाड़ी को पूरी ताकत से घेरे के केंद्र पर मारा। 'कड़कड़ाती बिजली' के साथ घेरे में दरार आ गई।
डेविड चिल्लाया, "रूही! घेरा टूट रहा है! कार्तिक कहाँ है?"
रूही की आँखें बंद थीं, वह मंत्रों का जाप कर रही थी, लेकिन उसके मुँह से अब आवाज़ की जगह खून की बूंदें निकल रही थीं। वह अपनी अंतिम शक्ति झोंक रही थी।
अंतिम प्रहार
कालू ने अट्टहास किया, "तुम्हारा रक्षक नहीं आएगा! देखो, आसमान का रंग बदल रहा है। सूरज निकलने से पहले तुम्हारी रूहें मेरी गुलामी करेंगी!"
उसने अपनी कुल्हाड़ी को दोबारा उठाया। यह वार अंतिम होने वाला था। जैसे ही कुल्हाड़ी नीचे गिरने वाली थी, अचानक जंगल की गहराइयों से एक आवाज़ गूँजी— एक बाँसुरी की धुन!
वह धुन वैसी ही थी जैसी कल्याण सिंह अपनी मीना के लिए बजाया करता था। कालू का हाथ हवा में ही ठिठक गया। उसकी आँखों की लालिमा में एक पल के लिए भ्रम छा गया।
कार्तिक पहाड़ी की आखिरी ढलान पर पहुँच चुका था। उसके एक हाथ में बाँसुरी थी और दूसरे हाथ में माँ की ममता का कलश।
उसने अपनी पूरी शक्ति से चिल्लाकर कहा, "कल्याण सिंह! रुक जाओ! देखो तुम्हारी माँ तुम्हें बुला रही है!"
बाँसुरी की वह परिचित धुन सुनते ही एक पल के लिए कालू के विशाल हाथ कांपने लगे। कुल्हाड़ी की धार जो रूही के गले के पास थी, थोड़ी पीछे हट गई।
उसे याद आने लगे वे सुनहरे दिन, जब वह निर्दोष कल्याण सिंह था। उसे याद आया कि कैसे वह पहाड़ों की कंदराओं में बैठकर घंटों रियाज़ करता था और उसकी धुन सुनकर पशु-पक्षी तक ठिठक जाते थे।
उसे याद आया कि महादेव के चरणों में बैठकर जब वह राग छेड़ता था, तो उसे ब्रह्मांड का सुख मिलता था।
लेकिन जैसे ही यादों के झरोखे में मीना का चेहरा आया, कालू की आँखों में फिर से खून उतर आया। उसे याद आया कि यही वह बाँसुरी थी जिसे सुनकर मीना कहती थी, "कल्याण, तुम्हारी धुन में तो जादू है, मैं पूरी उम्र इसे सुन सकती हूँ।"
यह सब करबी यादों को याद कर कर कालू दहाड़ा, उसकी आवाज़ से पहाड़ी की चट्टानें दरकने लगीं:
"चुप कर! इस झूठी धुन को बंद कर कार्तिक! इसी बाँसुरी के सुरों ने मेरे कानों को अंधा कर दिया था। मैं संगीत में खोया रहा और वह मेरे विनाश की पटकथा लिखती रही।
इसी बाँसुरी की धुन ने मुझे यह नहीं देखने दिया कि मीना के पीछे मौत छिपी है। यह संगीत प्रेम नहीं, यह संगीत एक धोखा है!"
कालू अब और भी हिंसक हो गया। उसे लगा कि कार्तिक उस बाँसुरी के ज़रिए उसे कमज़ोर कर रहा है ताकि वह उसे दोबारा 'इंसान' बना सके—वही इंसान जिसे बड़ी बेरहमी से कुचला गया था।
कालू का आत्मघाती तांडव
कालू ने घेरे को छोड़कर सीधे कार्तिक की ओर छलांग लगाई। उसकी विशाल छाया कार्तिक के ऊपर काल बनकर मंडराने लगी।
भयानक प्रहार: कालू ने अपनी कुल्हाड़ी सीधे उस बाँसुरी पर मारी जो कार्तिक के हाथों में थी। वह संगीत को हमेशा के लिए खामोश कर देना चाहता था।
अविश्वास की आग: वह चिल्लाया, "तू मुझे मोह में फँसाकर मारना चाहता है? तू भी उसी मीना की तरह चालाक है! मैं इस बाँसुरी को मलबे में बदल दूँगा और तेरे साथ-साथ उन यादों को भी दफन कर दूँगा!"
पहाड़ी की चोटी पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कालू की वह विशाल कुल्हाड़ी, जो अभी कुछ पल पहले मौत बनकर बरस रही थी,
जैसे ही कार्तिक के सामने आई और कार्तिक के हाथ में रखा कालू की मां का वह अस्थियों का कलश माँ की अस्थियों के स्पर्श मात्र से बेजान होकर ज़मीन पर गिर पड़ी।
कालू का वह खौफनाक चेहरा, जो नफरत से भरा था, अपनी माँ की ऊर्जा महसूस करते ही असहाय और कमज़ोर पड़ गया।
कार्तिक ने बिजली की फुर्ती दिखाई। उसने गिरती हुई कुल्हाड़ी को झपटकर अपने हाथ में ले लिया और अपनी फटी हुई बाँसुरी को सुरक्षित जेब में डाल लिया।
अब बाज़ी पलट चुकी थी। कार्तिक लहूलुहान था, लेकिन उसकी आवाज़ में एक ऐसी कड़क थी जिसने उस कालू की रूह को भी कँपा दिया।
कार्तिक का अंतिम दांव
कार्तिक ने कुल्हाड़ी की धार कालू की ओर की और दहाड़कर बोला:
"कल्याण सिंह! देख, तेरी शक्ति अब मेरे हाथ में है! तेरी माँ की रूह का पहरा मुझ पर है, तू अब मुझे छू भी नहीं सकता।
तू बदला लेना चाहता है न? तू उन लोगों को ढूँढ रहा है जिन्होंने तेरी पीठ में खंजर घोंपा था? तो सुन... वे कहीं भागे नहीं हैं।
उनका दूसरा जन्म हो चुका है और वे इसी वक्त मेरे सामने इस घेरे में बैठे हैं!"
यह सुनते ही जैसे पहाड़ पर बिजली गिर गई हो।
कालू दहशत और अविश्वास में आ गया हो।
यह सुनते ही कालू की हालत: ऐसी हो गई थी कालू की लाल आँखें फटी की फटी रह गईं। वह कभी कार्तिक को देखता, तो कभी घेरे में बैठे उन डरे हुए लड़कों और लड़कियों को।
उसके गले से एक घुरघुराहट निकली, "मेरे कातिल... यहाँ? इसी वक्त?" उसके भीतर प्रतिशोध की ज्वालामुखी फिर से फटने को तैयार थी।
दोस्तों का डर: घेरे में बैठे दोस्त, जो पहले से ही मौत के साये में थे, कार्तिक की बात सुनकर सुन्न पड़ गए। डेविड ने हकलाते हुए कहा, "कार्तिक! यह तू क्या कह रहा है?
हम... हम कातिल हैं?" रूही की आँखों में दहशत थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कार्तिक उन्हें बचाने के लिए झूठ बोल रहा है या यह कोई भयानक सच्चाई है।
कार्तिक का आदेश
तभी कार्तिक ने कालू की ओर इशारा करते हुए कहा, "अगर तू चाहता है कि मैं तुझे तेरे असली गुनहगारों के हवाले कर दूँ, तो तुझे अभी इसी वक्त शांत होना होगा।
तूने कई निर्दोषों का खून बहाया है, पर आज फैसला होगा। मैं तुझे उस सच तक ले जाऊँगा, लेकिन तुझे वादा करना होगा कि तू मेरे बाकी दोस्तों को नुकसान नहीं पहुँचाएगा।"
कालू अपनी विशाल कद-काठी समेटकर छोटा होने लगा। वह घृणा और उत्सुकता के बीच झूल रहा था। उधर आसमान में 4 बजने की घड़ी नज़दीक थी।
क्या कार्तिक के दोस्तों में से कोई वास्तव में कालू की मौत का असली सौदागर है?
क्या रूही ही वह 'मीना' है जिसने कल्याण सिंह को धोखा दिया था, या सच इससे भी कहीं अधिक वीभत्स है?
कार्तिक के हाथ में मौजूद माँ की अस्थियों का कलश क्या इस प्राचीन पाप का अंत कर पाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या डेविड उस रात के राज़ का इकलौता गवाह है जो अब तक खामोश था?