कालू की पहाड़ी - 14 RAAHULL SHARMA द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कालू की पहाड़ी - 14

बुजुर्ग की बातें सुनकर कार्तिक के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बाबा की आँखें अब लाल हो चुकी थीं और उनकी आवाज़ किसी गहरी गुफा से आती हुई प्रतीत हो रही थी।


उन्होंने कार्तिक का कंधा ज़ोर से झकझोरा और उन तीन सबसे महत्वपूर्ण कार्यों की व्याख्या की:



पहला माँ की रूह का विसर्जन (अधूरा कर्तव्य)


बाबा ने कहा, "बेटा, कालू की रूह इसलिए तड़प रही है क्योंकि उसकी माँ की रूह को भी शांति नहीं मिली। 



जब गाँव वालों को पता चला कि कल्याण सिंह पहाड़ी से गिरकर मर गया, तो उसकी बूढ़ी माँ नंगे पाँव रोती हुई उस चोटी पर पहुँची। 



अपने बेटे की खून से सनी लाश देखकर माँ का कलेजा फट गया उन्हें यह दुर्घटना नहीं हत्या लग रही थी और इस सदमे में की थीं कौन उनके भोले भाले बेटे को मार सकता है।


और उसने वहीं दम तोड़ दिया। कालू का सबसे बड़ा दुख यह है कि वह अपनी माँ को 'बहू' (मीना) नहीं दे पाया।



उनका अंतिम संस्कार तो गांव वालों ने कर दिया था पर उनका पिण्ड दान किसी ने नहीं किया तुम्हें उस खंडहर घर के गुप्त कोठरी में जाना होगा, जहाँ उसकी माँ की अस्थियां एक कलश में रखी हैं।


उन अस्थियों को लेकर तुम्हें पहाड़ के पीछे बहने वाली 'पापमोचनी नदी' में विसर्जन करना होगा। जब तक माँ शांत नहीं होगी, बेटा तांडव करता रहेगा।"



दुसरा काम बाँसुरी का सुर और ममता का कवच



"दूसरा काम, तुम्हें उसी खंडहर घर के मलबे से वह पुरानी बाँसुरी ढूँढनी होगी। उसे गाँव वालों ने पवित्र मानकर छिपा दिया था। 



जब तुम पहाड़ी की ओर बढ़ोगे, तो कालू तुम पर काल बनकर टूटेगा। उस वक्त तुम्हें एक हाथ में अपनी माँ की अस्थियों का कलश और दूसरे हाथ में वह बाँसुरी बजानी होगी। 



उस बाँसुरी की धुन और माँ की उपस्थिति एक ऐसा सुरक्षा कवच बनाएगी कि कालू चाहकर भी तुम्हारे या तुम्हारे दोस्तों के करीब नहीं आ पाएगा। लेकिन याद रखना, सुर टूटना नहीं चाहिए!"वह अपनी बांसुरी से बहुत प्यार करता था और उसकी धुन से।



दूसरा काम अंतिम आहुति: पुनर्जन्म का स्वांग (सबसे खतरनाक)


बुजुर्ग ने कार्तिक की आँखों में आँखें डालकर कहा, "यह तीसरा काम सबसे भयानक है। कालू को शांत करने के लिए उसे यह अहसास दिलाना होगा कि उसका प्रतिशोध पूरा हो गया है। 



तुम दसों दोस्तों में से किसी एक जोड़े (एक लड़का और एक लड़की) को अपनी जान जोखिम में डालकर प्रेमचंद और मीना का रूप धरना होगा। 



उन्हें वह पुराने ज़माने के कपड़े पहनने होंगे और कालू के सामने जाकर यह नाटक करना होगा कि तुम वही पापी जोड़ा हो जिसने उसे मारा था।



तुम्हें उसके सामने घुटने टेककर माफी माँगनी होगी और उसे यकीन दिलाना होगा कि तुम्हारा दूसरा जन्म हो चुका है।



और अब तुम उसके न्याय के अधीन हो। जब वह तुम्हें अपने सामने झुका हुआ देखेगा, तभी उसका अहंकार और गुस्सा शांत होगा।"



समय की चेतावनी



इसके बाद बाबा ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "जल्दी निकल कार्तिक! 



तुम्हारे पास बात करने का समय नहीं है। अगर तुमने कलश नहीं उठाया और बाँसुरी नहीं ढूँढ पाए, तो कालू तुम्हारे दोस्तों को उस पहाड़ी का हिस्सा बना देगा। जा! भाग!"



अब उस बाबा से आज्ञा लेकर कार्तिक बिना पीछे मुड़े उस खंडहर घर की ओर भागा। 



उसे पता था कि वह अपनी और अपने दोस्तों की जान की बाजी लगाने जा रहा है। एक तरफ माँ की ममता थी, दूसरी तरफ प्रेम का संगीत, और तीसरी तरफ वह भयानक आहुति जिसका अंत कुछ भी हो सकता था।



उधर पहाड़ी पर अब कालू की कुल्हाड़ी की आवाज़ तेज़ हो गई थी— 'खटाक... खटाक... खटाक!' वह सुरक्षा घेरे की आखिरी परत को काट रहा था।



पहाड़ी पर माहौल अब कयामत जैसा हो गया था। कालू का आकार अब साधारण साये से बढ़कर बादलों को छूने लगा था। 



उसकी आँखों से निकलने वाली लाल रोशनी सुरक्षा घेरे को झुलसा रही थी। उसे अपनी आसुरी शक्तियों से आभास हो गया था कि कार्तिक ने उसके अतीत के पन्नों को पलट दिया है।




कालू की दहाड़ से पूरा पहाड़ कांप उठा: "कार्तिक! तू मुझे मुक्त करना चाहता है? तू मुझे इस मिट्टी से दूर ले जाना चाहता है?



कभी नहीं! यहीं मेरी माँ की सिसकियाँ दफन हैं और यहीं उस मीना का विश्वासघात... मैं कहीं नहीं जाऊँगा!"




कालू अब केवल एक दुखी आत्मा नहीं, बल्कि प्रेम का शत्रु बन चुका था। उसके भीतर की पीड़ा ने एक विकृत रूप ले लिया था। 



उसे लगता था कि इस दुनिया में 'प्रेम' नाम की चीज़ सिर्फ एक छलावा है, एक ज़हर है जो इंसान को कमज़ोर बनाता है। 



उसने कसम खा ली थी कि वह इस पहाड़ी पर कदम रखने वाले हर उस जोड़े को खत्म कर देगा जो एक-दूसरे की आँखों में प्रेम के सपने देखते हैं।




उधर, सुरक्षा घेरे के अंदर दोस्तों की हालत बदतर हो रही थी:



डेविड और रूही एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़े हुए थे, पर कालू की आवाज़ उनके कानों में ज़हर घोल रही थी— "छोड़ दो एक-दूसरे का हाथ! यही हाथ कल तुम्हारी पीठ में खंजर घोंपेंगे!"



घेरे की नीली रोशनी अब पीली पड़कर थरथरा रही थी। कालू अपनी विशाल कुल्हाड़ी से घेरे की दीवारों पर प्रहार कर रहा था। हर प्रहार के साथ ज़मीन फट रही थी।




कालू चिल्लाया, "मैं इस दुनिया से प्रेम का नामो-निशान मिटा दूँगा! जब मुझे वफ़ा नहीं मिली, तो किसी और को कैसे मिल सकती है? मैं इस पूरी पहाड़ी को नफरत का मंदिर बना दूँगा!"




उसी वक्त, उधर गांव में उसे खंडहर घर में कलश और बांसुरी ढूंढने के लिए कार्तिक बहुत जद्दोजहद कर रहा था।

पर ना उसे वह बांसुरी मिल रही थी और ना ही वह कलश जिसमें कालू की मां की अस्थियां रखी थी। 


पर तभी उसकी नजर उस एकांत कोने पर पड़ी उस खंडहर कोने पर पड़ी वह तुरंत उसके पास गया और वहां से उसने कुछ मिट्टी हटाई। 


खंडहर घर के मलबे से कार्तिक को वह पुरानी बाँसुरी और धूल से सना अस्थि-कलश मिल गया। जैसे ही कार्तिक ने कलश को छुआ, उसे एक ममता भरी शीतल लहर महसूस हुई। 



लेकिन उसे पता था कि असली चुनौती अभी बाकी है—उसे अपने दोस्तों में से एक जोड़े को 'प्रेमचंद और मीना' बनने के लिए तैयार करना था ताकि कालू के सदियों साल पुराने प्रतिशोध की आग को शांत किया जा सके।



खंडहर घर की दीवारें अब किसी हिंसक जानवर की तरह गुर्रा रही थीं। जैसे ही कार्तिक ने अपनी कांपती उंगलियों से वह अस्थि-कलश और बाँसुरी उठाई, मानो पूरे घर की रूह जाग उठी हो।



कालू समझ चुका था कि कार्तिक ने उसके जख्मी घाव पर हाथ फेर दिया है। 


कालू की काली शक्तियों ने उस मलबे को आदेश दिया था कि कार्तिक यहाँ से जीवित बाहर न निकल पाए।


'कड़क... धड़ाम!'


एक विशाल लकड़ी की कड़ी कार्तिक के ठीक बगल में गिरी। धूल और मिट्टी का ऐसा गुबार उठा कि कार्तिक को अपनी हथेली देखना भी मुश्किल हो गया। 


घर का ढांचा चरमराने लगा था। कार्तिक ने कलश को अपने सीने से पूरी ताकत से चिपका लिया—उसे खुद से ज़्यादा उस माँ की ममता की रक्षा करनी थी।


मलबे का चक्रव्यूह


जैसे तैसे कर कर कार्तिक मुख्य दरवाजे की और भागा कार्तिक जैसे ही दरवाज़े की ओर भागा, ऊपर से ईंटों और चूने का ढेर गिरकर रास्ता बंद कर दिया।


उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह घर छोटा होता जा रहा है, दीवारें करीब आ रही हैं उसे कुचलने के लिए।



काली बाधा: कहीं से एक पुरानी लकड़ी की शहतीर गिरी जिसने कार्तिक का पैर दबा दिया। दर्द के मारे उसकी चीख निकल गई, पर उसने कलश नहीं छोड़ा।



मिट्टी का घेरा: छत से गिरती मिट्टी उसके मुँह और आँखों में भर रही थी, उसका दम घुटने लगा था। उसे लगा कि कालू उसे यहीं जिंदा दफन कर देगा।



कार्तिक ने मन ही मन महादेव को याद किया और ज़ोर से चिल्लाया— "कल्याण सिंह! अपनी माँ को यहाँ मत दबा! वह तो तुझे ढूँढ रही है!"



एक चमत्कारिक मोड़


जैसे ही कार्तिक ने 'माँ' का नाम लिया, उस कलश से एक अलौकिक सफ़ेद रोशनी निकली। एक पल के लिए गिरता हुआ मलबा हवा में ही थम गया, जैसे समय रुक गया हो।



कार्तिक को उस धुंध में एक बूढ़ी परछाईं दिखाई दी, जिसने हाथ के इशारे से उसे एक टूटी हुई खिड़की की ओर जाने को कहा।



कार्तिक ने पूरी जान लगाकर अपना पैर मलबे से निकाला और उस खिड़की की ओर छलांग लगा दी। जैसे ही वह बाहर गिरा, पीछे वह पूरा खंडहर घर एक भयानक धमाके के साथ ज़मीनदोज़ हो गया।



क्या कार्तिक समय पर पहाड़ी पहुँच पाएगा? या कालू का 'नफरत का तांडव' सब कुछ भस्म कर देगा?