दिनभर की लगातार भागदौड़ और जाँच-पड़ताल के बाद शाम ढल चुकी थी।
सूरज की आख़िरी किरणें गंगा के जल में समाकर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं।
शक्ति अपनी सरकारी गाड़ी से उस होटल पहुँची, जहाँ उसके ठहरने की व्यवस्था की गई थी।
जैसे ही वह कमरे में पहुँची, उसने थककर अपना बैग एक ओर रखा और गहरी साँस ली।
पूरा दिन पुरानी हवेलियों, गुप्त कमरों और अधूरे सुरागों में बीत गया था।
उसका सिर हल्का-हल्का भारी हो रहा था।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
"आइए।"
दरवाज़ा खुला और अलिशा मुस्कुराते हुए अंदर आई।
"मैडम..."
"एक बात कहूँ?"
शक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा।
"कहो।"
"हम पहली बार बनारस आए हैं..."
"सुना है यहाँ की गंगा आरती पूरी दुनिया में मशहूर है।"
"सोचा... अगर आपको ठीक लगे तो आज शाम गंगा आरती में चलें।"
"दिनभर काम ही किया है..."
"थोड़ी देर मन भी शांत हो जाएगा।"
शक्ति कुछ पल खामोश रही।
फिर खिड़की से बाहर डूबते सूरज को देखते हुए बोली—
"ठीक है..."
"आधे घंटे में निकलते हैं।"
अलिशा के चेहरे पर खुशी आ गई।
"जी, मैडम!"
वह तुरंत कमरे से बाहर चली गई।
शक्ति अलमारी के सामने जाकर खड़ी हो गई।
कुछ देर सोचने के बाद उसने बैंगनी रंग की साड़ी निकाली।
हल्की सिल्वर किनारी वाली वह साड़ी बेहद सादगी भरी, लेकिन आकर्षक थी।
उसने अपने खुले, लंबे बालों को वैसे ही रहने दिया।
हल्की-सी बिंदी, कानों में छोटे-से झुमके और हाथ में अपनी घड़ी...
बस इतना ही।
आईने में खुद को देखकर उसने एक गहरी साँस ली।
शायद कई दिनों बाद वह वर्दी के बिना कहीं जा रही थी।
उधर...
शिवाय प्रताप सिंह भी अपने पुश्तैनी घर पहुँच चुके थे।
दिनभर की भागदौड़ के बाद जैसे ही वह अपने कमरे की ओर बढ़े, पीछे से एक चुलबुली आवाज़ सुनाई दी—
"भैया सा...!"
शिवाय मुड़े।
सामने उनकी छोटी बहन मुस्कुराते हुए खड़ी थी।
"इतने दिनों बाद बनारस आए हैं..."
"और आज भी सीधा कमरे में बंद हो जाएँगे क्या?"
शिवाय हल्का-सा मुस्कुराए।
"तो फिर?"
"आज गंगा आरती में चलते हैं।"
"हर बार काम के चक्कर में टाल देते हैं।"
"इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा।"
शिवाय ने कुछ क्षण सोचा।
फिर धीमे से बोले—
"ठीक है..."
"चलते हैं।"
बहन खुशी से मुस्कुरा उठी।
कुछ देर बाद...
शिवाय तैयार होकर नीचे आए।
उन्होंने काली शर्ट और काली पैंट पहन रखी थी।
हाथ में वही घड़ी...
चेहरे पर वही शांत गंभीरता...
और व्यक्तित्व में वही शाही गरिमा।
उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...
कि आज की शाम...
गंगा के पावन तट पर...
किस्मत पहली बार उनकी मुलाकात उस लड़की से कराने वाली थी...
जिसकी तलाश वे बरसों से कर रहे थे...
करीब आधे घंटे बाद...
शक्ति अपने कमरे से बाहर निकली।
बैंगनी रंग की सादगी भरी साड़ी, खुले लंबे बाल, माथे पर छोटी-सी बिंदी और हाथ में एक साधारण-सी घड़ी... उसके व्यक्तित्व में सादगी और गरिमा का अनोखा मेल था।
ड्रॉइंग रूम में पहले से बैठी अलिशा ने जैसे ही उसे देखा, उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
"वाह मैडम... ये बैंगनी रंग की साड़ी आप पर बहुत अच्छी लग रही है।"
शक्ति मुस्कुराई।
"बस-बस... ज़्यादा तारीफ़ मत करो।"
"मैं सच कह रही हूँ। अगर कोई आपको पहली बार देखे, तो ये सोच भी नहीं सकता कि आप क्राइम ब्रांच की डीआईजी हैं।"
शक्ति हल्का-सा हँस दी।
"और यही तो चाहिए।"
"हर जगह अपनी पहचान बताकर चलना समझदारी नहीं होती।"
"वर्दी और सरकारी गाड़ी सिर्फ़ ड्यूटी के लिए होती है..."
"बाकी समय जितना सामान्य रहो, उतना बेहतर।"
अलिशा ने सिर हिलाया।
"सही कहा आपने।"
दोनों घर से बाहर निकल आईं।
मुख्य सड़क पर हलचल थी।
अलिशा ने मोबाइल निकालकर एक कैब बुक कर दी।
कुछ ही मिनटों बाद सफेद रंग की कैब उनके सामने आकर रुकी।
ड्राइवर ने शीशा नीचे करते हुए पूछा—
"कहाँ चलना है, मैडम?"
"दशाश्वमेध घाट।"
ड्राइवर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
"जी, बैठ जाइए।"
दोनों पीछे की सीट पर बैठ गईं।
कैब धीरे-धीरे बनारस की गलियों से होकर आगे बढ़ने लगी।
शाम ढल चुकी थी।
सड़कों के दोनों ओर फूलों और प्रसाद की दुकानें जगमगा रही थीं।
घाटों की ओर बढ़ते श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी।
कहीं शंखनाद सुनाई दे रहा था, तो कहीं मंदिरों की घंटियाँ वातावरण को भक्तिमय बना रही थीं।
"हर-हर महादेव...!"
जयकारों की गूँज पूरे शहर में फैल रही थी।
अलिशा खिड़की से बाहर देखते हुए बोली—
"सच में... बनारस की शाम जितनी सुनी थी, उससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत है।"
शक्ति भी बाहर का नज़ारा देख रही थी।
उसके चेहरे पर दिनभर की थकान अब धीरे-धीरे कम होती दिखाई दे रही थी।
"शायद..."
वह धीमे से बोली—
"यही वजह है कि लोग बार-बार इस शहर की ओर खिंचे चले आते हैं।"
कैब बनारस की व्यस्त गलियों को पार करती हुई धीरे-धीरे दशाश्वमेध घाट की ओर बढ़ती चली गई...
कुछ ही देर बाद...
दशाश्वमेध घाट के आसपास की सड़कें श्रद्धालुओं से खचाखच भरी हुई थीं।
चारों ओर फूलों की दुकानों की महक फैली हुई थी।
घाट की ओर जाने वाले रास्तों पर पुलिसकर्मी भीड़ को व्यवस्थित करने में लगे थे।
कैब थोड़ी दूर जाकर रुक गई।
ड्राइवर ने पीछे मुड़कर कहा—
"मैडम, आगे गाड़ी नहीं जा सकती। आज बहुत भीड़ है। आपको थोड़ा पैदल जाना होगा।"
"ठीक है।"
शक्ति और अलिशा कैब से उतर गईं।
दोनों धीरे-धीरे भीड़ के साथ घाट की ओर बढ़ने लगीं।
उधर...
घाट के दूसरे रास्ते से एक काली एसयूवी आकर रुकी।
कुशल गाड़ी से उतरा और पीछे का दरवाज़ा खोला।
"सर... आगे से पैदल जाना पड़ेगा।"
शिवाय ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
उनकी छोटी बहन उत्साहित होकर बोली—
"जल्दी चलिए भैया सा, नहीं तो सामने की जगह नहीं मिलेगी।"
तीनों भी उसी दिशा में चल पड़े।
कुछ ही मिनटों बाद...
शक्ति और अलिशा फूलों की एक दुकान के सामने रुक गईं।
अलिशा ने पूजा की एक छोटी-सी थाली खरीदनी शुरू की।
उसी समय...
सड़क के दूसरी ओर से शिवाय, कुशल और उनकी बहन वहाँ से गुज़रे।
उनके बीच मुश्किल से दस-बारह कदमों का फ़ासला था।
भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी।
अचानक कुछ श्रद्धालु बीच में आ गए।
एक साधुओं का समूह "हर-हर महादेव" का जयघोष करता हुआ दोनों के बीच से निकल गया।
जब रास्ता साफ़ हुआ...
शक्ति अपनी जगह से आगे बढ़ चुकी थी।
और शिवाय भी दूसरी ओर मुड़ चुके थे।
किस्मत...
एक बार फिर उन्हें आमने-सामने लाने की कोशिश करके...
चुपचाप मुस्कुरा रही थी।
एक ओर शक्ति और अलिशा...
दूसरी ओर शिवाय, कुशल और उनकी बहन...
सिर्फ़ कुछ कदमों की दूरी पर थे।
लेकिन उनके बीच मौजूद भीड़...
अब भी किस्मत का पर्दा बनी हुई थी।
गंगा के तट पर आरती शुरू होने में अब बस कुछ ही पल बाकी थे...
और शायद...
उनकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय भी।
जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv।