Shakti ke Shiv - 14 sheetal द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Shakti ke Shiv - 14

पुरानी हवेली की पहली मंज़िल...


हवा के हर झोंके के साथ टूटी हुई खिड़कियाँ चरमराने लगती थीं।


चारों ओर फैली धूल और सन्नाटा इस जगह को और भी रहस्यमयी बना रहे थे।


शक्ति अपनी टीम के साथ पूर्वी हिस्से की तलाशी ले रही थी।


हर कमरा, हर दीवार और हर कोना उसकी पैनी नज़रों से गुजर रहा था।


"मैडम..."


अलिशा ने धीरे से आवाज़ दी।


"इधर आइए।"


शक्ति तुरंत उसकी ओर बढ़ी।


कमरे की एक दीवार बाकी दीवारों से अलग दिखाई दे रही थी।


उस पर जमी धूल के बीच कुछ जगह साफ़ थी, जैसे हाल ही में किसी ने उसे छुआ हो।


शक्ति ने हथेली से दीवार पर हल्का दबाव डाला।


ठक... ठक...


दीवार का एक हिस्सा खोखला सुनाई दिया।


एसीपी विक्रम भी पास आ गए।


"लगता है... इसके पीछे कुछ है।"


शक्ति ने दीवार को ध्यान से देखा।


उसकी आँखों में वही चमक लौट आई, जो हर नए सुराग के मिलने पर दिखाई देती थी।


"इस हिस्से को सावधानी से हटाइए..."


"मुझे लगता है..."


"...हम सही जगह पहुँच चुके हैं।"

____

पुलिसकर्मियों ने सावधानी से दीवार के उस हिस्से पर दबाव डालना शुरू किया।


कुछ क्षणों तक कुछ नहीं हुआ।


फिर...


घर्र...


पत्थर घिसने जैसी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।


दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे अंदर की ओर सरक गया।


उसके पीछे एक संकरा, अंधेरा रास्ता दिखाई दिया।


कमरे में मौजूद सभी लोग कुछ पल के लिए चुप रह गए।


एसीपी विक्रम ने टॉर्च जलाई।


"मैडम... लगता है ये कोई गुप्त रास्ता है।"


शक्ति ने बिना देर किए टॉर्च अपने हाथ में ली।


"सब लोग सतर्क रहिए।"


"कोई भी चीज़ बिना दस्ताने के हाथ नहीं लगाएगा।"


"जी, मैडम।"


धीरे-धीरे सभी उस संकरे रास्ते से आगे बढ़ने लगे।


करीब बीस कदम चलने के बाद वे एक छोटे-से बंद कमरे में पहुँचे।


कमरा खाली था...


लेकिन उसकी दीवारों पर समय की गहरी छाप साफ़ दिखाई दे रही थी।


कोने में एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था।


उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।


अलिशा ने धीमे स्वर में कहा—


"लगता है... वर्षों से किसी ने इसे छुआ तक नहीं।"


शक्ति संदूक के सामने झुकी।


उसने ताले को ध्यान से देखा।


ताला टूटा हुआ था।


उसकी आँखें तुरंत गंभीर हो गईं।


"नहीं..."


"यह संदूक पहले ही खोला जा चुका है।"


एसीपी विक्रम चौंक गए।


"मतलब...?"


शक्ति ने कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया।


फर्श पर धूल बिखरी थी...


लेकिन उसके बीच कुछ ताज़ा जूतों के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।


शक्ति ने गहरी साँस ली।


"हम देर से पहुँचे हैं..."


"कोई हमसे पहले यहाँ आ चुका है।"


कमरे में फिर एक बार सन्नाटा छा गया...

___

उधर...


हवेली के पश्चिमी हिस्से में।


शिवाय और कुशल पुराने गलियारे से आगे बढ़ रहे थे।


अचानक शिवाय के कदम रुक गए।


उन्होंने दीवार पर हाथ फेरते हुए कहा—


"रुको..."


कुशल ने हैरानी से उनकी ओर देखा।


"क्या हुआ, सर?"


शिवाय ने दीवार के एक कोने की ओर इशारा किया।


"यहाँ देखो..."


"बाकी दीवारों पर धूल बराबर जमी है..."


"...लेकिन इस हिस्से को हाल ही में छुआ गया है।"


कुशल तुरंत पास आया।


दोनों ने मिलकर दीवार को ध्यान से टटोला।


कुछ ही क्षणों बाद...


घर्र...


वही पत्थर घिसने की आवाज़ सुनाई दी।


दीवार का दूसरा हिस्सा धीरे-धीरे खुल गया।


"तो सचमुच..."


कुशल धीमे से बोला।


"...इस हवेली में एक गुप्त रास्ता है।"


दोनों सावधानी से अंदर बढ़े।


संकरा रास्ता उन्हें उसी पुराने कमरे तक ले गया।


लेकिन कमरे में पहुँचते ही कुशल ठिठक गया।


"सर..."


"यहाँ कोई आ चुका है।"


संदूक खुला पड़ा था।


धूल पर कई पैरों के निशान बने हुए थे।


शिवाय कुछ पल तक पूरे कमरे का निरीक्षण करते रहे।


फिर झुककर फर्श से एक छोटा-सा कागज़ का फटा हुआ टुकड़ा उठाया।


उस पर आधा शब्द ही पढ़ा जा सकता था—


"...संरक्षण..."


बाकी हिस्सा फटा हुआ था।


कुशल ने पूछा—


"क्या इससे कुछ पता चलेगा?"


शिवाय ने कागज़ को ध्यान से देखा।


"अभी नहीं..."


"लेकिन इतना ज़रूर पता चल गया है..."


उन्होंने कमरे के बाहर की ओर नज़र डाली।


"...कि इस रहस्य की तलाश सिर्फ़ हम नहीं कर रहे।"


उनकी आवाज़ शांत थी...


लेकिन आँखों में पहली बार सतर्कता साफ़ दिखाई दे रही थी।

___


उधर...


शक्ति अब भी उस गुप्त कमरे का बारीकी से निरीक्षण कर रही थी।


अधिकांश संदूक खाली था।


ऐसा लग रहा था, मानो कोई वर्षों पहले उसकी सारी चीज़ें निकालकर ले गया हो।


तभी...


अलिशा की नज़र संदूक के नीचे पड़े एक पुराने कपड़े पर पड़ी।


"मैडम... ये देखिए।"


शक्ति ने दस्ताने पहनकर कपड़ा उठाया।


उसके भीतर एक छोटा-सा पीला पड़ चुका कागज़ का टुकड़ा रखा था।


समय की मार से उसके किनारे फट चुके थे।


उस पर मुश्किल से कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—


"...संरक्षण गृह..."


"...काशी..."


और सबसे नीचे...


एक गोल मोहर का आधा निशान।


एसीपी विक्रम ने उत्सुकता से पूछा—


"क्या इसका मतलब...?"


शक्ति ने कागज़ को ध्यान से देखा।


"अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी..."


"लेकिन इतना तय है..."


"...यह कागज़ इस पूरे रहस्य की सबसे अहम कड़ी बन सकता है।"


उसने सावधानी से कागज़ को सबूत वाले लिफ़ाफ़े में रख दिया।


फिर एक बार पूरे कमरे पर नज़र दौड़ाई।


"यहाँ से जो भी मिला है, उसे फॉरेंसिक लैब भेजा जाएगा।"


"और इस हवेली को पूरी तरह सील कर दीजिए।"


"जी, मैडम।"


शक्ति गुप्त कमरे से बाहर निकल आई।


उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...


कि उसी हवेली से...


कुछ देर पहले...


एक दूसरा व्यक्ति भी एक अधूरा सुराग लेकर जा चुका था।


अब दोनों के हाथों में...


एक ही सच के दो अलग-अलग टुकड़े थे।


लेकिन पूरी तस्वीर...


अभी भी अधूरी थी।


क्या ये दोनों अधूरे सुराग कभी एक साथ जुड़ पाएँगे?


जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv।