Shakti ke Shiv - 9 sheetal द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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Shakti ke Shiv - 9

रात के लगभग साढ़े नौ बजे थे।

सिंह परिवार के घर की ऊपरी मंज़िल पर बना स्टडी रूम हमेशा की तरह शांत था। दीवारों पर सजी किताबें, बीच में रखी विशाल सागौन की मेज़ और खिड़की के बाहर पसरा बनारस का सन्नाटा पूरे कमरे को एक गंभीर वातावरण दे रहा था।

शिवाय प्रताप सिंह खिड़की के सामने खड़े बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह वही ठहराव था, लेकिन आँखों में वर्षों से अधूरी एक तलाश साफ़ झलक रही थी।

तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।

"Come in"

दरवाज़ा खुला और कुशल अंदर आया।

"बड़े भाई सा..."

कुशल का शिवाय से कोई ख़ून का रिश्ता नहीं था, लेकिन बचपन से उनके साये में पलने की वजह से वह उन्हें अपने बड़े भाई सा से कम कभी नहीं मानता था।

शिवाय ने बिना मुड़े कहा—

"आ जाओ, कुशल।"

कुशल आगे बढ़ा और मेज़ पर एक भूरी फ़ाइल रख दी।

"बड़े भाई सा... हमारे source से खबर आई है।"

अब शिवाय उसकी तरफ़ मुड़े।

कुशल ने धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा—

"जिस जानकारी का हम इतने वर्षों से इंतज़ार कर रहे थे... उससे जुड़ा एक अहम सुराग मिला है।"

कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।

शिवाय की नज़रें कुशल के चेहरे पर टिक गईं।

"कितना भरोसा किया जा सकता है इस जानकारी पर?"

"पूरी तरह नहीं... लेकिन source वही है जिसने पहले भी हमें कभी ग़लत जानकारी नहीं दी।"

कुशल ने फ़ाइल खोलते हुए आगे कहा—

"उनके मुताबिक़... कुँवर रानी सा से जुड़ा एक धागा बनारस तक आकर जुड़ता है। अभी हमारे पास सिर्फ़ एक सुराग है, कोई पक्का सबूत नहीं... लेकिन पिछले तेईस सालों में पहली बार हमें इतना मज़बूत संकेत मिला है।"

शिवाय ने धीरे से आँखें बंद कर लीं।

कुछ क्षण तक कमरे में सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।

फिर उन्होंने गहरी साँस ली और शांत स्वर में बोले—

"तेईस साल..."

उनकी आवाज़ में दर्द साफ़ महसूस हो रहा था।

"इन तेईस सालों में न जाने कितने सुराग मिले... और हर बार हम खाली हाथ लौटे।"

उन्होंने फ़ाइल उठाकर अपने हाथों में ली।

"उम्मीद करना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था, कुशल... लेकिन तलाश करना कभी नहीं छोड़ा।"

कुशल चुपचाप उनकी बात सुनता रहा।

"बड़े भाई सा... इस बार मुझे लगता है हम सही दिशा में हैं।"

शिवाय ने फ़ाइल बंद की और दृढ़ स्वर में कहा—

"लगता है नहीं..."

उन्होंने कुशल की आँखों में देखते हुए कहा—

"हमें यक़ीन करना नहीं... सच तक पहुँचना है।"

वह अपनी कुर्सी से उठे।

"इस जानकारी के बारे में परिवार में भी किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए। जब तक हर बात की पुष्टि न हो जाए... यह बात इसी कमरे तक रहेगी।"

"जी, बड़े भाई सा।"

"और..."
शिवाय की आवाज़ पहले से अधिक गंभीर हो गई।

"कल सुबह सबसे पहले हम इसी सुराग से शुरुआत करेंगे। इस बार एक भी गलती की गुंजाइश नहीं है।"

"जी, बड़े भाई सा।"

कुशल ने आदर से सिर झुका दिया। दोनों स्टडी रूम से बाहर निकल गए। उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...

जिसकी तलाश में शिवाय ने अपनी ज़िंदगी के तेईस साल गुज़ार दिए...

__

अगली सुबह...

दिल्ली एयरपोर्ट।

सुबह की हल्की धूप पूरे एयरपोर्ट परिसर में फैल चुकी थी। यात्रियों की भीड़ अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी।

उसी भीड़ के बीच शक्ति और अलिशा तेज़ क़दमों से आगे बढ़ रही थीं।

दोनों के हाथों में केवल ज़रूरी सामान था। शक्ति के चेहरे पर हमेशा की तरह वही गंभीरता थी, जबकि अलिशा लगातार फ़ोन पर यात्रा से जुड़ी औपचारिकताएँ पूरी कर रही थी।

कुछ ही देर बाद दोनों विमान में अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुकी थीं।

विमान ने धीरे-धीरे रनवे पर रफ़्तार पकड़नी शुरू की।

अलिशा ने खिड़की से बाहर देखते हुए मुस्कुराकर कहा—

"मैडम... पहली बार बनारस जा रही हूँ। सुना है वहाँ की सुबह और घाट दोनों बहुत खूबसूरत होते हैं।"

शक्ति की नज़र अब भी सामने थी।

"हम घूमने नहीं... केस पर जा रहे हैं, अलिशा।"

अलिशा हल्का-सा मुस्कुराई।

"पता है, मैडम... लेकिन अगर समय मिला तो एक बार गंगा आरती देखना तो बनता है।"

शक्ति ने उसकी तरफ़ देखा।

उसके होंठों पर बेहद हल्की मुस्कान उभरी... जो अगले ही पल गायब भी हो गई।

"पहले केस खत्म करते हैं... फिर बाकी बातें सोचेंगे।"

"जी, मैडम।"

इतने में विमान ने उड़ान भर ली।

दोनों की नज़रें खिड़की के बाहर फैले आसमान पर टिक गईं।

__

करीब डेढ़ घंटे बाद...

शक्ति और अलिशा बनारस पहुँच चुकी थीं।

एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही बनारस की हलचल, भीड़ और सड़कों की अलग-सी रौनक साफ़ महसूस हो रही थी।

बाहर पहले से ही उत्तर प्रदेश पुलिस की एक सरकारी गाड़ी उनका इंतज़ार कर रही थी।

गाड़ी के पास खड़े एक पुलिस अधिकारी ने दोनों को देखते ही सलामी दी।

"जय हिंद, मैडम। मैं इंस्पेक्टर अजय त्रिपाठी। मुझे आपको Banaras Crime Branch तक सुरक्षित पहुँचाने की ज़िम्मेदारी दी गई है।"

शक्ति ने हल्का-सा सिर हिलाया।

"जय हिंद।"

"सारा इंतज़ाम हो चुका है, मैडम।"

"चलते हैं।"

कुछ ही देर बाद सरकारी गाड़ी एयरपोर्ट से निकल चुकी थी।

रास्ते भर शक्ति खिड़की के बाहर देखती रही।

बनारस की संकरी गलियाँ... पुराने मंदिर... सड़क किनारे उमड़ती भीड़... और हर तरफ़ फैली अलग-सी संस्कृति।

यह शहर दिल्ली से बिल्कुल अलग था...

लेकिन शक्ति का पूरा ध्यान सिर्फ़ अपने मिशन पर था।

करीब चालीस मिनट बाद गाड़ी Banaras Crime Branch Headquarters के बाहर जाकर रुकी।

शक्ति नीचे उतरी।

उसने एक नज़र सामने खड़ी इमारत पर डाली और बिना समय गंवाए अंदर की ओर बढ़ गई।

मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर पहले से ही कुछ वरिष्ठ अधिकारी उनका इंतज़ार कर रहे थे।

सबने एक साथ सलामी दी।

"जय हिंद, मैडम।"

शक्ति ने भी सलामी का जवाब दिया।

तभी उनमें से एक अधिकारी आगे बढ़ा।

"मैं एसीपी विक्रम सिंह। Banaras Crime Branch."

उन्होंने सम्मानपूर्वक कहा—

"आपके आने की सूचना हमें कल रात ही मिल गई थी। आपके रहने की व्यवस्था और बाकी सभी तैयारियाँ पूरी कर दी गई हैं।"

शक्ति ने शांत स्वर में कहा—

"Thank you, Officer."

एसीपी विक्रम ने आगे कहा—

"मैडम, पहले आप थोड़ा आराम कर लें... उसके बाद हम केस की पूरी briefing शुरू कर देंगे।"

शक्ति ने बिना देर किए जवाब दिया—

"आराम बाद में कर लेंगे, Officer."

उसकी आवाज़ पहले की तरह दृढ़ थी।

"पहले मुझे केस की पूरी फ़ाइल दिखाई जाए।"

एसीपी विक्रम और बाकी अधिकारी एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे।

अगले ही पल उन्होंने सिर हिलाया।

"जी, मैडम... इस तरफ़।"

शक्ति और अलिशा उनके पीछे-पीछे कॉन्फ्रेंस रूम की ओर बढ़ गईं...

जहाँ इस मिशन की पहली आधिकारिक ब्रीफिंग उनका इंतज़ार कर रही थी।

__

कॉन्फ्रेंस रूम का दरवाज़ा खुलते ही शक्ति अंदर दाखिल हुई।

कमरा काफ़ी बड़ा था। बीच में एक लंबी मेज़, सामने बड़ी LED स्क्रीन और दीवार पर बनारस शहर का विस्तृत नक्शा लगा हुआ था। मेज़ पर कई फ़ाइलें करीने से रखी थीं।

कमरे में मौजूद सभी अधिकारी सम्मान में खड़े हो गए।

"जय हिंद, मैडम।"

"जय हिंद।"

शक्ति ने संक्षिप्त उत्तर दिया और मेज़ के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसके दाईं ओर अलिशा बैठ गई।

एसीपी विक्रम सिंह ने पहली फ़ाइल उठाई।

"मैडम, पिछले आठ महीनों में बनारस और उसके आसपास के इलाकों से कुल सत्ताईस लड़कियों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई है!

शक्ति ने बिना कुछ कहे फ़ाइल खोल ली।

विक्रम आगे बोले—

"शुरुआत में सभी मामलों को अलग-अलग मानकर जाँच की गई थी, लेकिन बाद में हमें कुछ समानताएँ दिखाई दीं।"

उन्होंने रिमोट का बटन दबाया।

सामने लगी स्क्रीन पर शहर का नक्शा उभर आया।

कुछ जगहों पर लाल निशान बने हुए थे।

"ये सभी वो स्थान हैं, जहाँ आख़िरी बार पीड़िताओं को देखा गया था।"

शक्ति की नज़रें स्क्रीन पर टिक गईं।

वह हर बिंदु को ध्यान से देख रही थी।

"कोई प्रत्यक्ष गवाह?"

उसने शांत स्वर में पूछा।

"नहीं, मैडम।"

"सीसीटीवी?"

"ज़्यादातर जगहों पर कैमरे बंद मिले... और जहाँ चालू थे, वहाँ फुटेज या तो गायब थी या छेड़छाड़ की गई थी।"

शक्ति ने फ़ाइल बंद नहीं की।

उसकी आँखें अब भी हर दस्तावेज़ को बारीकी से पढ़ रही थीं।

कुछ क्षण बाद उसने अगला सवाल किया—

"इस केस का सबसे मज़बूत सुराग क्या है?"

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

एसीपी विक्रम ने धीरे से मेज़ पर रखी एक अलग फ़ाइल उठाई।

उसका रंग बाकी फ़ाइलों से अलग था।

उन्होंने फ़ाइल शक्ति की ओर बढ़ाते हुए कहा—

"मैडम... यही एक वजह है जिसके कारण इस केस को आपकी टीम को सौंपा गया है।"

शक्ति ने बिना कुछ बोले फ़ाइल अपने हाथ में ले ली।

उसने जैसे ही पहला पन्ना पलटा...

उसकी आँखें एक पल के लिए उसी पर ठहर गईं।

कमरे में मौजूद सभी अधिकारी उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहे थे...

__

शक्ति ने धीरे से फ़ाइल का पहला पन्ना पलटा।

कुछ सेकंड तक उसकी नज़र उसी पर टिकी रही।

फिर उसने दूसरा पन्ना खोला...

और उसके चेहरे के भाव एकदम गंभीर हो गए।

हर लड़की की तस्वीर के साथ उसकी उम्र, आख़िरी लोकेशन और गुमशुदगी की तारीख़ दर्ज थी।

लेकिन एक बात ने शक्ति का ध्यान सबसे ज़्यादा खींचा।

सभी लड़कियाँ लगभग एक ही उम्र की थीं...

और सभी बिना कोई ठोस सबूत छोड़े अचानक गायब हो गई थीं।

उसने फ़ाइल बंद नहीं की।

बिना नज़र उठाए उसने पूछा—

"इन सभी मामलों में आख़िरी बार किस पर शक गया था?"

एसीपी विक्रम ने जवाब दिया—

"मैडम... हर केस में संदिग्ध अलग था। लेकिन जाँच आगे बढ़ते ही या तो वो बेगुनाह निकला... या फिर अचानक गायब हो गया।"

"मतलब..."

शक्ति ने पहली बार उनकी तरफ़ देखा।

"...कोई बहुत सोच-समझकर सबूत मिटा रहा है।"

"जी, मैडम।"

कमरे में फिर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

शक्ति कुर्सी से उठी और सामने लगी बनारस के नक्शे वाली स्क्रीन के पास जाकर खड़ी हो गई।

उसकी नज़र लाल निशानों पर घूम रही थी।

कुछ क्षण बाद उसने पूछा—

"इन सभी जगहों में कोई समानता?"

एक अधिकारी ने तुरंत जवाब दिया—

"मैडम... अभी तक हमें ऐसी कोई समानता नहीं मिली।"

शक्ति ने हल्की-सी मुस्कान दी।

वो मुस्कान आत्मविश्वास की थी।

"नहीं..."

उसने नक्शे पर नज़रें टिकाए हुए कहा—

"समानता हमेशा होती है..."

"बस उसे देखने का नज़रिया सही होना चाहिए।"

कमरे में मौजूद सभी अधिकारी उसकी तरफ़ देखने लगे।

शक्ति ने धीरे से मेज़ पर रखी फ़ाइल उठाई।

"आज से इस केस की जाँच नए तरीके से होगी।"

उसकी आवाज़ शांत थी...

लेकिन उसमें ऐसा आत्मविश्वास था कि पूरे कमरे का माहौल बदल गया।

"और इस बार..."

उसने एक-एक अधिकारी की तरफ़ देखते हुए कहा—

"हम अपराधियों के पीछे नहीं भागेंगे..."

"उन्हें हमारे पास आने पर मजबूर करेंगे।"

कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

किसी ने कुछ नहीं कहा...

लेकिन सभी समझ चुके थे—

अब इस केस की कमान एक ऐसे अधिकारी के हाथ में थी, जो अपराधी की सोच से भी आगे सोचती थी।

आख़िर इन गुमशुदगी के पीछे कौन था?
क्या शक्ति इस रहस्य की पहली कड़ी तक पहुँच पाएगी?

जारी रहेगा...

जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv।