Shakti ke Shiv - 13 sheetal द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Shakti ke Shiv - 13

सुबह का समय...

राजघाट से कुछ दूरी पर स्थित पुरानी हवेलियों का इलाका वर्षों से वीरान पड़ा था।

टूटी हुई दीवारें...

जंग लगे लोहे के फाटक...

और चारों तरफ़ फैली खामोशी...

मानो समय यहाँ आकर ठहर गया हो।

एक काली एसयूवी धीरे-धीरे सबसे बड़ी हवेली के सामने आकर रुकी।

कुशल नीचे उतरा और चारों ओर सतर्क नज़र दौड़ाई।

"सर... यही जगह है।"

शिवाय भी गाड़ी से उतरे।

उन्होंने हवेली की ओर देखा।

वर्षों की धूल से ढका विशाल फाटक अब आधा खुला हुआ था।

शिवाय कुछ पल तक उसे देखते रहे।

फिर धीमे स्वर में बोले—

"ये दरवाज़ा हमने नहीं खोला..."

कुशल तुरंत सतर्क हो गया।

"मतलब...?"

शिवाय ने फाटक पर पड़े ताज़ा पैरों के निशानों की ओर इशारा किया।

"हमसे पहले भी कोई यहाँ आया है।"

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

अब मामला सिर्फ़ पुराने रहस्य का नहीं रहा था...

कोई और भी उसी सच तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था।

शिवाय ने बिना देर किए कहा—

"सावधान रहना..."

"अब एक भी छोटी गलती हमें सच से दूर कर सकती है।"

इतना कहकर दोनों हवेली के भीतर दाखिल हो गए...


उधर...

करीब बीस मिनट बाद...

दो पुलिस की गाड़ियाँ पुरानी हवेलियों वाले इलाके के बाहर आकर रुकीं।

शक्ति सबसे पहले गाड़ी से उतरी।

उसने एक नज़र पूरे इलाके पर डाली।

चारों तरफ़ टूटी हुई हवेलियाँ, झाड़ियों से ढके रास्ते और वर्षों से बंद पड़े मकान...

मानो समय ने इस जगह को भुला दिया हो।

एसीपी विक्रम उसके पास आए।

"मैडम... इस इलाके में अब कोई नहीं रहता।"

शक्ति ने बिना उनकी ओर देखे पूछा—

"पक्का?"

विक्रम कुछ कह पाते, उससे पहले शक्ति की नज़र ज़मीन पर पड़ी।

गीली मिट्टी पर कुछ ताज़ा पैरों के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।

वह झुककर उन्हें ध्यान से देखने लगी।

कुछ पल बाद उसने धीमे स्वर में कहा—

"ये निशान पुराने नहीं हैं..."

अलिशा भी पास आ गई।

"मतलब...?"

शक्ति खड़ी हुई।

उसकी आँखों में वही गंभीर चमक लौट आई थी।

"हमसे पहले कोई यहाँ आया है।"

कुछ क्षण के लिए सब चुप हो गए।

एसीपी विक्रम ने तुरंत अपनी टीम की तरफ़ देखा।

"पूरे इलाके को घेर लो।"

"कोई भी बिना तलाशी के बाहर नहीं जाएगा।"

"जी, सर!"

पुलिसकर्मी अलग-अलग दिशाओं में फैल गए।

शक्ति ने सामने खड़ी सबसे बड़ी हवेली की ओर देखा।

उसका आधा टूटा हुआ मुख्य फाटक हवा के साथ धीरे-धीरे हिल रहा था।

उसने बिना समय गंवाए कहा—

"चलते हैं..."

"जवाब शायद हमारे इंतज़ार में नहीं होंगे..."

"...लेकिन उनके निशान अभी भी यहीं मौजूद हैं।"

इतना कहकर वह हवेली की ओर बढ़ गई।

उसे नहीं पता था...

कि उसी हवेली के दूसरे हिस्से में...

शिवाय और कुशल भी उसी अतीत की परतें खोल रहे थे।



हवेली के भीतर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।

टूटी हुई खिड़कियों से आती हवा की आवाज़ पूरे गलियारे में गूँज रही थी।

छत से झूलते जाले और धूल की मोटी परत बता रही थी कि इस जगह पर वर्षों से कोई नहीं आया था।

उधर...

हवेली के पश्चिमी हिस्से में शिवाय और कुशल सावधानी से आगे बढ़ रहे थे।

कुशल ने धीमे स्वर में पूछा—

"सर... क्या आपको सच में लगता है कि हमें यहाँ कुछ मिलेगा?"

शिवाय की नज़रें दीवारों और फ़र्श का बारीकी से निरीक्षण कर रही थीं।

"हर जगह जवाब नहीं मिलते..."

"लेकिन हर जगह कुछ न कुछ निशान ज़रूर मिलते हैं।"

उसी समय...

हवेली के पूर्वी हिस्से से किसी के कदमों की हल्की-सी आहट सुनाई दी।

कुशल तुरंत सतर्क हो गया।

"सर... कोई है।"

शिवाय ने हाथ के इशारे से उसे शांत रहने को कहा।

दोनों बिना आवाज़ किए दीवार की ओट में खड़े हो गए।

उधर...

शक्ति अपनी टीम के साथ उसी हवेली के दूसरे हिस्से में पहुँच चुकी थी।

वह हर कमरे को ध्यान से देख रही थी।

अचानक उसकी नज़र फ़र्श पर पड़े ताज़ा जूतों के निशानों पर गई।

वह तुरंत झुक गई।

"ये पुराने नहीं हैं..."

अलिशा ने आश्चर्य से पूछा—

"मतलब यहाँ अभी कोई आया था?"

शक्ति ने गंभीर स्वर में कहा—

"नहीं..."

"...कोई अभी भी यहीं है।"

यह सुनते ही एसीपी विक्रम ने तुरंत अपनी पिस्तौल निकाल ली।

बाकी पुलिसकर्मियों ने भी सावधानी से अपनी-अपनी पोज़िशन ले ली।

दोनों तरफ़ बस एक लंबा गलियारा था...

जिसके दोनों सिरों पर दो अलग-अलग टीमें खड़ी थीं।

उनके बीच सिर्फ़ एक टूटी हुई दीवार और कुछ कदमों का फ़ासला था...

लेकिन अभी तक...

न शakti ने शिवाय को देखा था...

और न शिवाय ने शक्ति को।



हवेली के भीतर फैली खामोशी अचानक एक तेज़ आवाज़ से टूट गई।

धड़ाम...!

ऊपरी मंज़िल से किसी भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ पूरे भवन में गूँज उठी।

शक्ति और शिवाय—दोनों एक साथ चौकन्ने हो गए।

"विक्रम, ऊपर चलो!" शक्ति ने बिना देर किए आदेश दिया।

उधर शिवाय ने भी कुशल की ओर देखा।

"आवाज़ ऊपर से आई है।"

"चलो।"

दोनों अलग-अलग सीढ़ियों से पहली मंज़िल की ओर बढ़ने लगे।

पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ हर कदम पर चरमराने लगीं।

कुछ ही क्षणों बाद...

शक्ति अपनी टीम के साथ पहली मंज़िल के पूर्वी हिस्से में पहुँच गई।

उधर...

शिवाय और कुशल पश्चिमी हिस्से में थे।

दोनों के बीच सिर्फ़ एक पुरानी, बंद लकड़ी की दीवार थी।

अचानक...

दीवार के दूसरी तरफ़ किसी के कदमों की हल्की आहट सुनाई दी।

कुशल ने फुसफुसाकर कहा—

"सर... कोई ठीक दूसरी तरफ़ है।"

उधर अलिशा ने भी धीमे स्वर में कहा—

"मैडम... दूसरी तरफ़ किसी के चलने की आवाज़ आ रही है।"

शक्ति ने हाथ के इशारे से पूरी टीम को रुकने का संकेत दिया।

हवेली में फिर से सन्नाटा छा गया।

कुछ सेकंड तक...

दोनों तरफ़ खड़े लोग एक-दूसरे की मौजूदगी महसूस करते रहे।

लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं लगाई।

उसी समय...

एक ज़ोरदार हवा का झोंका टूटी हुई खिड़की से अंदर आया।

पुरानी लकड़ी की दीवार चरमराई...

और उसके पास रखा एक जर्जर अलमारी का हिस्सा गिर पड़ा।

धड़ाम...!

उड़ती धूल ने पूरे गलियारे को ढक लिया।

जब तक धूल छँटी...

दोनों टीमें अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ चुकी थीं।

उन्हें अब भी नहीं पता था...

कि वे कुछ ही कदमों की दूरी पर...

एक-दूसरे के बिल्कुल करीब होकर भी...

फिर एक बार मिलने से चूक गए थे।


हवेली की दीवारों ने एक बार फिर अपने भीतर छिपे राज़ को बचा लिया...
लेकिन अब खेल बदल चुका था।
दो अलग-अलग तलाशें...
एक ही सच के बेहद करीब पहुँच चुकी थीं।
क्या अगली बार किस्मत उन्हें आमने-सामने ले आएगी?
या फिर रहस्य एक बार फिर उनके बीच दीवार बनकर खड़ा हो जाएगा?
जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv....