सुबह के करीब साढ़े आठ बजे...
Banaras Crime Branch के कॉन्फ़्रेंस रूम में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।
मेज़ पर पिछले कई महीनों की केस फ़ाइलें खुली पड़ी थीं।
शक्ति एक-एक दस्तावेज़ को बेहद ध्यान से देख रही थी।
अलिशा उसके सामने लैपटॉप खोले बैठी थी, जबकि एसीपी विक्रम और बाकी अधिकारी नए अपडेट का इंतज़ार कर रहे थे।
कुछ क्षण बाद शक्ति ने पहली पीड़िता की फ़ाइल बंद की।
"कल हमने उस जगह को देखा..."
"...लेकिन वहाँ जवाब नहीं थे।"
कमरे में बैठे सभी अधिकारी उसकी ओर देखने लगे।
शक्ति ने अगली फ़ाइल खोली।
"कई बार अपराध की शुरुआत वहीं नहीं होती जहाँ घटना होती है..."
"...बल्कि वहाँ होती है जहाँ अपराधी पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज करता है।"
उसने फ़ाइल का एक पन्ना एसीपी विक्रम की ओर बढ़ाया।
"इन तीनों पीड़िताओं की आख़िरी लोकेशन अलग-अलग है..."
"...लेकिन इनकी आवाजाही का एक रास्ता बार-बार दोहराया गया है।"
एसीपी विक्रम ने पन्ने पर नज़र डाली।
"राजघाट..."
उन्होंने अनायास पढ़ा।
अलिशा भी चौंककर शक्ति की तरफ़ देखने लगी।
शक्ति कुर्सी से उठ खड़ी हुई।
"लगता है... आज हमारी अगली मंज़िल तय हो गई है।"
उसने अपनी घड़ी की ओर देखा और शांत स्वर में कहा—
"चलते हैं... राजघाट।"
कुछ ही पलों बाद पूरी टीम Crime Branch से निकल चुकी थी...
उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...
कि उसी समय...
राजघाट पर कोई और भी उसी अतीत की परतें खोलने में लगा हुआ था।
करीब एक घंटे बाद...
शक्ति की गाड़ी राजघाट की ओर जाने वाली सड़क पर पहुँच चुकी थी।
गंगा के किनारे की हवा में एक अलग ही ठंडक थी।
सड़क के दोनों ओर पुराने मकान, छोटी दुकानें और वर्षों पुरानी इमारतें दिखाई दे रही थीं।
गाड़ी रुकते ही शक्ति बाहर उतरी।
उसकी नज़र एक पल में पूरे इलाके पर घूम गई।
राजघाट पहली नज़र में बिल्कुल सामान्य लग रहा था।
कुछ लोग घाट की सीढ़ियों पर बैठे थे, कुछ नावों की ओर जा रहे थे और कुछ अपने रोज़मर्रा के काम में व्यस्त थे।
लेकिन शक्ति जानती थी...
अक्सर सबसे बड़े राज़ सबसे सामान्य दिखने वाली जगहों पर ही छिपे होते हैं।
एसीपी विक्रम उसके पास आए।
"मैडम, हमने आसपास के लोगों की सूची तैयार कर ली है। यहाँ के पुराने दुकानदारों और कुछ स्थानीय लोगों से पूछताछ की जा सकती है।"
शक्ति ने हल्का-सा सिर हिलाया।
"सबसे पुराने लोगों से शुरू करते हैं।"
"जी, मैडम।"
उसी समय उसकी नज़र घाट के किनारे खड़ी एक पुरानी चाय की दुकान पर पड़ी।
दुकान बहुत साधारण थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वह कई दशकों से वहीं मौजूद हो।
शक्ति कुछ पल उसे देखती रही।
फिर बोली—
"विक्रम, कभी-कभी फ़ाइलों से ज़्यादा यादें काम आती हैं।"
"पहले उस दुकान पर चलते हैं।"
इतना कहकर वह चाय की दुकान की ओर बढ़ गई।
उसे नहीं पता था...
कि उसी राजघाट पर, उससे कुछ ही दूरी पर...
शिवाय भी एक ऐसे व्यक्ति से बात कर रहा था, जो अतीत का एक भूला हुआ पन्ना खोलने वाला था।
उधर...
राजघाट की सबसे पुरानी सीढ़ियों के पास।
शिवाय और कुशल उस वृद्ध के सामने खड़े थे।
वृद्ध की नज़र कुछ पल तक शिवाय के चेहरे पर टिकी रही, फिर उसने गंगा की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा—
"बेटा... लोग यहाँ मोक्ष ढूँढ़ने आते हैं।"
"तुम किसकी तलाश में आए हो?"
शिवाय का जवाब संक्षिप्त था।
"सच की।"
वृद्ध हल्का-सा मुस्कुराया।
"सच..."
"वो कभी किसी एक जगह नहीं मिलता।"
कुछ पल की खामोशी के बाद उसने पूछा—
"किसका सच?"
शिवाय ने जेब से वह पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ निकाला और उसकी ओर बढ़ा दिया।
वृद्ध ने काँपते हाथों से कागज़ लिया।
जैसे ही उसकी नज़र उस पर लिखे "राजघाट" शब्द पर पड़ी...
उसके चेहरे के भाव अचानक बदल गए।
उसने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
मानो कोई पुरानी याद अचानक ज़िंदा हो उठी हो।
कुशल ने बेचैनी से पूछा—
"बाबा... क्या आप इसे पहचानते हैं?"
वृद्ध ने धीरे से आँखें खोलीं।
"पहचानता हूँ..."
"लेकिन जिस बात को तुम जानना चाहते हो..."
"...उसे कहने से पहले मुझे यक़ीन होना चाहिए कि तुम वही हो, जिनका इतने सालों से इंतज़ार था।"
शिवाय की आँखों में पहली बार हल्की-सी चमक उभरी।
उन्होंने शांत स्वर में कहा—
"तो मेरा यक़ीन कर लीजिए..."
"...मैं बिना सच जाने यहाँ से नहीं जाऊँगा।"
वृद्ध ने कुछ क्षण तक उन्हें देखा।
फिर धीरे-धीरे उठकर घाट की सीढ़ियों से ऊपर जाने लगा।
"मेरे साथ आओ..."
"जो जवाब तुम ढूँढ़ रहे हो..."
"...वो यहाँ नहीं हैं।"
वृद्ध आगे-आगे चल रहा था।
शिवाय और कुशल बिना कुछ कहे उसके पीछे हो लिए।
घाट की भीड़ पीछे छूट चुकी थी।
तीनों संकरी गलियों से होते हुए एक पुराने, जर्जर मंदिर के सामने आकर रुक गए।
मंदिर वर्षों पुराना था। दीवारों का पलस्तर कई जगह से उखड़ चुका था, लेकिन भीतर जलता हुआ एक छोटा-सा दीपक अब भी उस जगह को जीवित होने का एहसास दे रहा था।
वृद्ध धीरे-धीरे मंदिर के अंदर गया।
उसने शिवलिंग के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर मुड़कर शिवाय की ओर देखा।
"इकतीस साल पहले..."
"...एक आदमी इसी मंदिर में आया था।"
कुशल की भौंहें सिकुड़ गईं।
"कौन आदमी?"
वृद्ध ने सिर हिलाया।
"नाम नहीं जानता..."
"लेकिन उसकी बाँहों में एक नन्ही बच्ची थी।"
शिवाय का चेहरा शांत था, पर उनकी आँखें अब पूरी तरह वृद्ध पर टिक चुकी थीं।
"उसने मुझसे सिर्फ़ एक बात पूछी थी..."
वृद्ध कुछ क्षण के लिए रुका।
"...'राजघाट से सबसे सुरक्षित रास्ता कौन-सा है?'"
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
"मैंने उसे रास्ता बता दिया..."
"और वह बच्ची को लेकर चला गया।"
कुशल एक कदम आगे बढ़ा।
"वह किस तरफ़ गया था?"
वृद्ध ने मंदिर के पिछले हिस्से की ओर इशारा किया।
"उस दिशा में..."
"जहाँ उस समय पुराने ज़मींदारों की हवेलियाँ हुआ करती थीं।"
शिवाय ने पहली बार उस दिशा में नज़र उठाई।
उन्हें महसूस हो रहा था...
कि उनकी तलाश अब एक नए मोड़ पर पहुँच चुकी है।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था...
कि उसी समय...
उन हवेलियों का नाम पहली बार शक्ति की केस डायरी में भी दर्ज होने वाला था।
उधर...
राजघाट की पुरानी चाय की दुकान पर।
शक्ति दुकान के बाहर खड़ी पूरे माहौल को ध्यान से देख रही थी।
दुकानदार की उम्र लगभग सत्तर वर्ष रही होगी।
चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, लेकिन आँखों में अब भी वर्षों का अनुभव साफ़ दिखाई देता था।
शक्ति ने शांत स्वर में पूछा—
"बाबा, आप यहाँ कब से दुकान चला रहे हैं?"
वृद्ध हल्का-सा मुस्कुराया।
"बेटी... जब से होश संभाला है, तब से यहीं हूँ।"
शक्ति ने अलिशा की ओर देखा।
अलिशा समझ गई कि अब असली पूछताछ शुरू होने वाली है।
शक्ति ने पहली पीड़िता की तस्वीर सामने रखी।
"इसे पहले कभी देखा है?"
वृद्ध ने तस्वीर को ध्यान से देखा और धीरे से सिर हिला दिया।
"नहीं..."
"लेकिन..."
शक्ति की नज़र तुरंत उसके चेहरे पर टिक गई।
"लेकिन क्या?"
वृद्ध कुछ पल सोचता रहा।
"इस लड़की को तो नहीं..."
"...पर कई साल पहले कुछ अजनबी लोग अक्सर इस तरफ़ आते थे।"
"कहाँ जाते थे?"
"घाट से पीछे..."
"...पुरानी हवेलियों की तरफ़।"
यह सुनते ही एसीपी विक्रम चौंक पड़े।
"मैडम... उस तरफ़ तो अब कोई रहता भी नहीं।"
शक्ति की आँखों में हल्की-सी चमक उभरी।
"यही वजह है कि हमें वहीं जाना चाहिए।"
उसने बिना देर किए कहा—
"विक्रम, उन सभी पुरानी हवेलियों का रिकॉर्ड निकलवाइए।"
"और..."
"आज ही वहाँ चलेंगे।"
"जी, मैडम।"
शक्ति ने एक बार फिर उन सुनसान रास्तों की ओर देखा।
उसे महसूस हो रहा था...
कि इस केस का अगला दरवाज़ा अब खुलने वाला है।
उसे नहीं पता था...
कि उसी समय...
उन्हीं पुरानी हवेलियों की ओर...
शिवाय भी बढ़ चुका था।
क्या दोनों की राहें अब टकराने वाली थीं?
या किस्मत अभी भी उन्हें एक-दूसरे से दूर रखने वाली थी?
**जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv.....