डॉक्टर सरला का युद्ध क्षेत्र Wajid Husain द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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डॉक्टर सरला का युद्ध क्षेत्र

              वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी   

घर का छोटा सा कमरा-एक अलमारी, कुछ शीशियां, एक स्टेथोस्कोप कोने में रखे चिकित्सा उपकरण, और मद्धिम सी रोशनी डॉक्टर सरला का युद्ध क्षेत्र था। शहर उस रात चुप था। सर्द हवा खिड़की के पर्दों को बार-बार हिला रही थी जिसमें डर की नमी थी। घर के बंद दरवाज़े में दबे स्वर थे। बाहर दो क़ौमो के अलग-अलग नारों की गूंज। सरला सोचती है, दुनिया दो हिस्सों में बट गई है।

 दरवाज़े पर दस्तक होती है-धीमी, कांपती हुई। वह झिरी से झांकती है-बुर्का ओढ़े लड़की, पीछे उसकी बूढ़ी मां। "डॉक्टर साहिबा... मेरी बेटी..."

सरला तुरंत उन्हें अंदर खींच लेती है। लड़की दर्द से तड़प रही है। मां की आंखों में एक अजीब सी घबराहट थी। "मेरी बच्ची को बचा लीजिए डॉक्टर साहिबा," उसकी आवाज़ कांप रही थी। 

वह एक चौदह-पंद्रह साल की दुबली पतली लड़की थी। उसके कपड़े फटे हुए थे, चेहरा नीला पड़ा था। 

"क्या हुआ इसे?"

औरत ने रोते हुए बताया,"दंगाई उठा कर ले गए थे, अब वह कुछ बोल भी नहीं रही। बहुत खून बह चुका है।"

घर के भीतर की रोशनी थरथराई जैसे उस कमरे में दुआ और डर एक साथ सांस ले रहे हो।

सरला अपने क्लीनिक में ऐसी महिलाओं का इलाज करती है जिन्हें अपनी पहचान गुप्त रखनी है, इसमें अमूमन दो तरह की औरतें हैं, एक जिनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती हुई होती है या वे जो किसी मजबूरी में मरहम के बिना इलाज कराने आती हैं। 

सरला ने लड़की का चेकअप किया-लेकिन यह काम अकेले नहीं हो सकता था। उसने अपनी पुरानी मेडिकल अस्सिटेंट सरोज को फोन किया जो अब घर में कैद थी। 

"क्या तुम मेरी मदद करोगी?" 

सरोज को जवाब देने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उस रात जब शहर सो गया वह चेहरे पर लंबा नकाब डालकर सरला के घर पहुंची। सरोज का अतीत भी सरला की तरह किसी जंग से कम नहीं था।

 सरला का गला सूख गया। उसके लिए वह अभी तक का सबसे भयावह था-अगर मैं पकड़ी गई तो? नहीं! अगर मैंने इस बच्ची की मदद नहीं की तो वह मर जाएगी। क्या एक डॉक्टर होने की यही कीमत है? 

"हमें इसे छुपाना होगा।"सरला ने घबराकर कहा। 

"वह जानती थी, अगर यह बात बाहर गई तो कानून नहीं, भीड़ फैसला करेगी।"

पर वे सोचने में समय नहीं गंवा सकती थी। उसने जल्दी से लड़की के जख्मों को साफ किया, उसे दवा दी और घर के अंदर सबसे सुरक्षित जगह पर लिटा दिया। 

"लड़की के हाथ कांप रहे थे। उसकी सूनी आंखों में अतीत की चीख़ें अब भी गूंज रही थी। वह बेसुध पड़ी थी, उसकी सांसे उखड़ रहीं थी। उसकी आंखें खाली थी, जैसे उसमें अब कोई रोशनी बची ही न हो। उसकी कलाई पर उभरे नीले निशान चीख- चीखकर उसकी कहानी सुना रहे थे। 

सरला ने उसकी नब्ज़ टटोली-बेहद धीमी। सरोज ने सुई लगाई। मौत उसके बेहद करीब थी लेकिन उसकी आंखों में एक सवाल था,"क्या मैं बच जाऊंगी?"

"अब सांस थोड़ी स्थिर थी,"सरला ने हल्के से उसका माथा छुआ और कहा, "तुम्हें कुछ नहीं होगा।" दवा ग्लूकोज़ और इंजेक्शन ने अपना असर दिखना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद उसने आंखें खोली। 

"नाम।"सरला ने धीरे से पूछा।

होंठ हिले-"आयशा..."

नाम हवा में ठहर गया। 

सुबह तक हालत थोड़ी संभली, लेकिन ख़तरा टला नहीं था। दवाइयां ख़त्म हो रही थी।

सरला ने सरोज को फिर से कुछ ज़रूरी दवाइयां मंगवाने की हिदायत दी। 

"लेकिन डॉक्टर साहिबा, दवाओं की जांच हो रही है। कल बाज़ार से लौटते वक्त एक आदमी को पकड़ लिया। इसलिए कि उसके पास दवाइयों से भरा एक थैला था।" सरोज ने धीमी आवाज़ में कहा।

कमरे में इलाज करती सरला अब बाहर से आती हुई हर आवाज़ पर चौकन्नी थी।

अगर अब कोई बाहरी मदद ली तो उन पर शक किया जा सकता था। पर इधर बच्ची की आंखों में बुझती रोशनी का दीपक टिमटिमा रहा था जिसने उसे कुछ सोचने का अवसर ही नहीं दिया-"कुछ करना होगा,"उसने कहा। इधर गली में फुसफुसाहटें उठने लगी-"किसी ने दंगाइयों को खबर दी है।

वे डॉक्टर और नसों के बारे में पूछ रहे हैं।"

सरला का दिल धड़क उठा। क्या यह उसके लिए था या सिर्फ अफवाह थी? लेकिन इस सवाल का जवाब उसे जल्द ही मिलने वाला था। और जिसका सामना करना आसान नहीं होगा। 

वह दवा लेने के लिए घर से निकली। उसे महसूस हुआ कि कोई उनकी हर हरकत पर नज़र रख रहा है। पड़ोस की औरतों ने भी इशारों- इशारों में आगाह किया-"ज़्यादा बाहर मत निकला करो। दंगाई पूछताछ कर रहे हैं।"

सरला अब अकेली थी। उनकी आंखों में एक अजीब सी घबराहट थी। लेकिन एक शपथ ने जो उसे डॉक्टरी के पेशे से पहले दिलाई गई थी- उसके कदम रुकने नहीं दिए। वह केमिस्ट की दुकान पर पहुंच गई। दवा, इंजेक्शन और ग्लूकोज लेकर आ गई। 

अगले दिन गली में हलचल मची थी। किसी ने दंगाइयों को ख़बर दी है कि यहां उल्टे सीधे काम हो रहे हैं। 

सरला की धड़कनें तेज़ हो गई। क्या कोई ग़द्दारी कर चुका था? क्या अब उनका राज़ खुलने वाला था? 

सरला ने घड़ी की ओर देखा। सुबह के पांच बज रहे थे। खिड़की के बाहर से किसी के आने की आवाज़ सुनाई दी। उसकी सांसे तेज़ हो गई। दरवाज़े पर पड़ती धीमी-धीमी दस्तक अब किसी हथौड़े की तरह उसके दिल पर चोट कर रही थी। सरला की सांसें थम गई। सरोज ने एक पल के लिए आंखें मूंद ली थी। दरवाज़े पर फिर से टक- टक हुई- "डॉक्टर, बाहर निकलो।"

सरला ने सरोज की ओर देखा। उसकी आंखों में दहशत थी। 

"अब क्या करें?" सरोज की आवाज़ कांप रही थी।

सरला ने गहरी सांस ली और फुसफुसाकर कहा,"लड़की को रज़ाई से ढक दो। अगर ज़रूरत पड़े तो कह देना वह तुम्हारी बीमार बहन है, मैं देखती हूं कि क्या हो सकता है?" 

सरला ने दरवाज़ा खोला। बाहर चार दंगाई खड़े थे, लंबी दाढ़ियां, कंधों पर हथियार, आंखों में कठोरता। 

"तुम डॉक्टर सरला हो?" एक ने रूखी आवाज़ में पूछा।"हमें खबर मिली है कि तुम रेप वाली औरतों का इलाज कर रही हो!"

"नहीं।"

एक दंगाई ने अंदर झांकने की कोशिश की।" तुम्हारे साथ और कौन रहता है?"

"मेरी बहन, वह बीमार है, इसलिए घर से बाहर नहीं जाती।"

दंगाइयों ने एक दूसरे को देखा और कहा, "हम अंदर जांच करेंगे।"

"ठीक है।"

वे भीतर आ गए। एक आदमी सीधे बिस्तर की ओर बढ़ा। उसने रजाई खींच दी। 

आयशा ने आंखें खोलीं। उसने सामने खड़े आदमी को देखा।

होंठ कांपे -"भाई...जान... क्या उनमें तुम भी थे?"

आदमी जैसे जम गया।

"आ... आयशा?"

उसके हाथ से बंदूक गिर गई। बाकी तीन आदमी दरवाज़े की ओर खिसक गए-जैसे उन्हें अचानक कोई काम याद आ गया हो। 

बूढी मां आगे आई। उसने उसका कालर पकड़ लिया- "पहचाना? यह तेरी बहन है।"

कमरे में सन्नाटा भर गया। 

आदमी घुटनों पर बैठ गया। "मुझे माफ कर दो..."

कुछ देर बाद उसने कांपती आवाज़ में कहा- "मैं... इसे घर ले जाऊंगा..."

"कौन सा घर?"

वह चुप। "वही घर... जहां तू ख़ुद नहीं रहता? जहां तू भीड़ के साथ रहता है?"

कमरे में ख़ामोशी छा गई। 

आयशा की सांसे चल रही थीं-धीमी, लेकिन मौजूद। उसके होंठ कांपे-"मैं मुंह दिखाने के क़ाबिल नहीं रही।" उसकी सांसे तेज़ चलने लगी फिर हमेशा के लिए शांत हो गई।

आयशा की मैयत को लोग कंधों पर ले जा रहे थे। दरवाज़े पर सरला खड़ी थी-"निशब्द...।" 

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