दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन आकर रुकी। भीड़, शोर, और भागते हुए लोग… सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन किशिराज के चेहरे पर कोई सामान्यता नहीं थी।उसकी आँखें लगातार इधर-उधर घूम रही थीं।
उसने धीमे से कहा -
कुछ गड़बड़ है…
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शुभिका उसके पीछे थी, घूंघट में छुपी हुई।
उसका दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था—
मम्मी-पापा… बस वो सुरक्षित हों…
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और तभी…किशिराज का फोन वाइब्रेट हुआ। एक अनजान वीडियो कॉल। उसने कॉल उठाई।
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स्क्रीन पर जो दिखा…उससे किशिराज की आँखें सख्त हो गईं।
विक्रांत खड़ा था…और उसके पीछे शुभिका के मम्मी-पापा घुटनों पर बैठे थे। उन पर gun तनी हुई थी।
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विक्रांत मुस्कुराया।
वो बोला -
आ गए तुम दिल्ली…
उसकी आवाज़ में ज़हर था।
विक्रांत बोला -
अब असली सौदा होगा।
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किशिराज की मुट्ठियाँ कस गईं।
वो बोला -
उन्हें छोड़ दे विक्रांत…
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विक्रांत हँसा और बोला -
छोड़ दूँ?
उसने gun और सख्त दबाई।
वो बोला -
तुम्हारी वजह से ही मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ।
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और तभी कॉल कट हो गया।
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किशिराज ने तुरंत चारों तरफ देखा। उसकी आँखें अब पहले से ज्यादा तेज़ थीं।
किशीराज बोला -
वो पास ही है…
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और अगले ही पल स्टेशन के बाहर सड़क पर चीख-पुकार मच गई।
काली गाड़ियाँ आकर रुकीं…और उनमें से विक्रांत बाहर निकला।
gun हाथ में…और उसके पीछे शुभिका के मम्मी-पापा को घसीटा जा रहा था।
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विक्रांत ने दूर खड़े किशिराज को देखा।
और मुस्कुराते हुए बोला—
शामिल हो जाओ…या अपने परिवार को खो दो…
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और तभी किशिराज ने कदम आगे बढ़ाया। उसकी आँखों में अब कोई hesitation नहीं था…सिर्फ एक फैसला था। लड़ाई अब आखिरी मोड़ पर थी।
विक्रांत की नज़र जैसे ही शुभिका पर पड़ी…उसकी आँखों में वही पुराना पागलपन फिर से जाग उठा।
वो बोला -
शुभिका…
उसने धीमे से कहा, जैसे उसे अब भी अपनी चीज़ समझ रहा हो।
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किशिराज तुरंत उसके सामने आ गया।
उसकी आवाज़ सख्त थी—
उसकी तरफ मत देख।
वो मेरी पत्नी है।
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विक्रांत एक पल के लिए रुका। फिर हल्का सा हँसा… लेकिन वो हँसी डरावनी थी।
वो बोला -
पत्नी?
तुमने उससे शादी कर ली?
उसकी आँखें और तेज़ हो गईं।
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किशिराज ने एक कदम आगे बढ़ाया।
वो बोला -
आज फैसला होगा विक्रांत…
उसकी आवाज़ अब बिल्कुल ठंडी हो गई।
किशीराज बोला -
या तू जिंदा रहेगा…या मैं।
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विक्रांत ने gun ऊपर की और बोला -
फैसला तो पहले से हो चुका है…
तुमने बस देरी की है।
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और फिर—
धड़ाम!!!
पहली गोली चली। किशिराज तुरंत साइड में झुका। गोली पीछे खड़ी गाड़ी में लग गई।
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अगले ही पल चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। विक्रांत के आदमी आगे बढ़े, किशिराज भी पीछे नहीं हटा।
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शुभिका चीख उठी—
रुको!!
लेकिन उसकी आवाज़ शोर में दब गई।
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किशिराज ने एक आदमी को गिरा दिया…विक्रांत ने दूसरी गोली चलाई…और दोनों के बीच दूरी खत्म हो चुकी थी।
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विक्रांत गुर्राया—
तुम मुझे कभी नहीं हरा सकते!
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किशिराज ने उसकी आँखों में देखा।
वो बोला -
आज देख लेता हूँ…
उसने धीमे से कहा -
कौन किसको खत्म करता है।
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और उसी पल दोनों के बीच असली लड़ाई शुरू हो गई…जहाँ हर सेकंड फैसला बदल सकता था।
दोनों के बीच लड़ाई अब सिर्फ दो लोगों की नहीं रही थी…पूरा माहौल एक खुले मैदान जैसे इलाके में बदल चुका था—जहाँ चारों तरफ टूटे हुए कंटेनर, गिरी हुई गाड़ियाँ और धूल उड़ती हवा थी।
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किशिराज और विक्रांत के लोग एक-दूसरे से भिड़ चुके थे।
हर तरफ चीखें, दौड़ते कदम और गोलियों की आवाज़ें गूंज रही थीं—
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
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कई गुंडे वहीं जमीन पर गिर चुके थे। कुछ घायल होकर रेंग रहे थे… कुछ उठ ही नहीं पा रहे थे। हवा में बारूद की गंध फैल चुकी थी।
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दूर सड़क किनारे पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं…लेकिन कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
एक अफसर ने दबी आवाज़ में कहा -
विक्रांत का इलाका है…ऑर्डर ऊपर से है… अभी रुकना है।
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मैदान के बीच में किशिराज और विक्रांत आमने-सामने खड़े थे।दोनों की साँसें तेज थीं… लेकिन आँखों में कोई डर नहीं था।
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विक्रांत ने खून से सना चेहरा साफ किया और हँसा—
देखा… तुम्हारी पुलिस भी तुम्हें बचाने नहीं आई।
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किशिराज ने जवाब नहीं दिया। उसने बस चारों तरफ देखा गिरे हुए आदमी… टूटा हुआ माहौल… और दूर खड़ी शुभिका, जो सब देख रही थी।
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विक्रांत आगे बढ़ा और बोला—
ये सब खत्म हो सकता था…
उसकी आवाज़ भारी थी।
वो बोला -
अगर तुम बीच में नहीं आते।
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किशिराज की आँखें ठंडी हो गईं।
उसने धीरे से कहा -
नहीं…ये सब तब शुरू हुआ था… जब तुमने उसे छुआ था।
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और अगले ही पल दोनों फिर आमने-सामने भिड़ गए। किसी को नहीं पता था कि कौन जीतेगा…लेकिन इतना साफ था आज कोई एक ही इस मैदान से जिंदा जाएगा।
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दूर खड़ी शुभिका की आँखों में आँसू थे…
और उसके दिल में सिर्फ एक ही बात थी—
ये लड़ाई अब खत्म हो… किसी भी तरह।
मैदान में लड़ाई और भी तेज़ हो चुकी थी…गोलियों की आवाज़, चीखें और धूल—सब कुछ मिलकर एक डरावना माहौल बना रहे थे। किशिराज और विक्रांत आमने-सामने थे… लेकिन उसी बीच शुभिका के पास एक परछाई आकर खड़ी हो गई।
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वो रहस्यमयी लड़की…शांत थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी, जैसे बहुत पुरानी आग अब बुझने वाली हो।
वो बोली -
कैसा लग रहा है?
उसने हल्के से कहा -
आज मेरी बरसों पुरानी आग बुझ रही है…
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शुभिका ने कांपते हुए पूछा—
मतलब…?
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लड़की ने मैदान की तरफ देखते हुए कहा—
मतलब ये कि जिस शुभिका की ये दोनों बात कर रहे हैं…वो तुम नहीं हो…
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शुभिका की आँखें फैल गईं।
वो बोली -
क्या…?
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लड़की ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।
वो बोली -
तुम उसकी हमशक्ल हो… उसकी हमनाम भी।
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शुभिका पूरी तरह हिल गई थी।
वो बोली -
ये… क्या बोल रही हो तुम?
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लड़की की आवाज़ अब भारी हो गई—
किशिराज उससे प्यार करता था…और विक्रांत ने उसे जबरदस्ती अपनी ज़िंदगी में खींच लिया।
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शुभिका का दिल तेज़ धड़कने लगा।
शुभिका बोली -
फिर…
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लड़की ने आँखें सिकोड़ लीं।
बोली -
फिर उसे मार दिया गया…बालकनी से धक्का देकर।
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शुभिका काँप गई।
वो बोली -
क्यों…?
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लड़की ने ठंडी हँसी हँसी और बोली -
क्योंकि उसके चेहरे पर चोट लग गई थी…और विक्रांत को बिगड़ा हुआ चेहरा पसंद नहीं था।
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शुभिका की सांस रुक गई।
शुभिका बोली -
नहीं…
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लड़की उसके करीब आई।
उसकी आवाज़ अब बेहद धीमी थी वो बोली—
पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…वो लड़की मर नहीं गई थी…
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शुभिका ने धीरे से पूछा—
तो फिर…
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लड़की ने सीधे उसकी आँखों में देखा और बोली—
जानना चाहोगी वो लड़की कौन थी?
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शुभिका की आवाज़ काँप गई वो बोली—
कौन…?
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लड़की ने एक सेकंड रुका…
फिर मुस्कुराई और बोली—
मैं।
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उस पल मैदान की आवाज़ें जैसे दूर हो गईं…शुभिका का दिमाग सुन्न पड़ गया…और दूर विक्रांत और किशिराज की लड़ाई और भी खतरनाक होती जा रही थी…लेकिन अब असली सच सामने खड़ा था…और खेल अब और भी गहरा हो चुका था।
To be continued…