और जैसे ही वो परछाई सामने आई…शुभिका का दिल बैठ गया।
वो बोली -
व… विक्रांत…
वो सच में वही था। बारिश से भीगे बाल आँखों में वही पागलपन…
और चेहरे पर ठंडी मुस्कान।
वो बोला -
कहाँ भाग रही हो शुभिका?
उसकी आवाज़ इतनी शांत थी कि डर और बढ़ गया।
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शुभिका ने एक सेकंड भी नहीं रुका। वो मुड़ी और पूरी ताकत से फिर भाग पड़ी।
वो बोली -
नहीं… मैं अब नहीं रुकूँगी…
उसके पीछे विक्रांत की आवाज़ गूँजी—
तुम जहाँ भी जाओगी… मैं वहाँ पहुँच जाऊँगा।
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जंगल खत्म हुआ तो सामने सड़क आ गई। और वहीं दूर दिखा—
रेलवे स्टेशन। शुभिका बिना सोचे-समझे दौड़ पड़ी। उसके पैर खून से लथपथ थे…साँसें टूट रही थीं…लेकिन उसे बस एक ही चीज़ चाहिए थी दूरी।
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स्टेशन पर भीड़ थी। लोग आ-जा रहे थे…ट्रेन की आवाज़ें…
सीटी…और अफरा-तफरी। शुभिका भीड़ में घुस गई।
उसने खुद से कहा -
बच जाऊँगी…
तभी एक ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी। दरवाज़े खुलते ही लोग अंदर जाने लगे। शुभिका ने बिना देखे छलांग लगा दी।
वो बोली -
Excuse me… excuse me…
वो धक्के खाते हुए किसी तरह अंदर घुस गई। और ट्रेन के एक खाली कोने में गिर पड़ी।
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उसका पूरा शरीर काँप रहा था। वो हांफ रही थी…आँखों में आँसू थे…
वो बोली -
मैं बच गई…
लेकिन तभी ट्रेन ने धीरे-धीरे चलना शुरू किया। खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे जाने लगा। शुभिका ने राहत की साँस ली…और सिर पीछे दीवार से लगा दिया। शुभिका सीट के नीचे पूरी तरह झुककर बैठी थी। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं…दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे बाहर निकल आएगा।
ट्रेन की आवाज़—
छुक… छुक…
धीरे-धीरे तेज़ हो रही थी। खिड़की से बाहर स्टेशन पीछे छूट रहा था…और जंगल, सड़क, सब कुछ दूर होता जा रहा था।
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शुभिका ने घुटनों के बीच सिर छुपा लिया।
वो बोली -
अब मैं बच गई…
लेकिन उसके दिमाग में एक ही डर घूम रहा था—
विक्रांत। क्या वो सच में यहाँ भी आ सकता है?
नहीं…इस बार नहीं। ये ट्रेन…अब उसे बहुत दूर ले जा रही थी।
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ट्रेन के अंदर लोगों की आवाज़ें धीरे-धीरे कम होने लगीं। किसी ने टिकट चेक किया…किसी ने सामान रखा…लेकिन शुभिका को कुछ भी साफ सुनाई नहीं दे रहा था। वो बस अपनी धड़कन सुन रही थी। टिक… टिक… टिक…तभी एक आवाज़ आई।
अनाउंसमेंट शुरू हुआ -
Next station…
शुभिका ने डरकर सिर उठाया।
स्टेशन का नाम धीरे-धीरे गूंजा—
Agyaat Junction…
शुभिका चौंक गई और बोली -
ये कौन सा स्टेशन है…?
उसने घबराकर बाहर देखा। खिड़की के बाहर अब सिर्फ़ घना अंधेरा था। न शहर…न गांव…न कोई lights। सिर्फ़ सुनसान track और जंगल।
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तभी ट्रेन के डिब्बे में हल्की हलचल हुई। किसी के कदमों की आवाज़। टक… टक… टक… शुभिका का दिल रुक गया।
वो सीट के नीचे और अंदर घुस गई।
वो खुद से बोली -
प्लीज़… मुझे मत देखो…
उसने सांस रोक ली। कदमों की आवाज़ पास आती गई…और फिर उसके ठीक ऊपर रुक गई।
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कुछ देर तक ट्रेन चलती रही…फिर अचानक छुक्क्क…ट्रेन की गति धीमी हुई और रुक गई। डिब्बे में हल्की हलचल मच गई। लोग उठने लगे… सामान संभालने लगे। शुभिका अभी भी सीट के नीचे कांप रही थी। कुछ सेकंड तक उसने हिम्मत नहीं की। फिर धीरे-धीरे बाहर झांका…कोई नहीं दिखा। न विक्रांत…न कोई आदमी…सिर्फ़ यात्रियों की सामान्य आवाज़ें।
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उसने कांपते हुए खुद से पूछा -
क्या… वो चला गया?
धीरे-धीरे उसने सीट से खुद को बाहर निकाला। चेहरे पर धूल और डर दोनों थे। वो लड़खड़ाते हुए दरवाज़े तक पहुंची। और जैसे ही ट्रेन का दरवाज़ा खुला…तेज़ हवा उसके चेहरे से टकराई।
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वो जल्दी से प्लेटफॉर्म पर उतर गई। चारों तरफ अनजान भीड़ थी।
लोग… आवाज़ें… अजनबी चेहरे…शुभिका confused खड़ी रही।
वो बोली -
मैं कहाँ आ गई…?
उसने इधर-उधर देखा। सामने बड़ा सा बोर्ड लगा था।
उसने कांपते हाथों से पढ़ा—
Mumbai Central
शुभिका की आँखें फैल गईं।
वो बोली -
मुंबई…?
मैं… दिल्ली से यहाँ कैसे आ गई?
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उसका दिमाग घूम गया। भागते-भागते वो कितनी दूर आ चुकी थी… उसे खुद समझ नहीं आया। अब वो एक ऐसे शहर में थी…
जहाँ वो किसी को नहीं जानती थी। न घर…न सहारा…न कोई रास्ता।
बस एक नाम… जो उसके दिमाग में गूंज रहा था—
विक्रांत।
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वो प्लेटफॉर्म के किनारे बैठ गई। आँखों से आँसू बहने लगे।
वो बोली -
मैं यहाँ भी सुरक्षित नहीं हूँ…वो मुझे कहीं भी ढूंढ लेगा…
शुभिका ने जैसे ही विक्रांत को कार में देखा… उसका दिल फिर से बैठ गया।
वो बोली -
नहीं… फिर से नहीं…
उसके पीछे तुरंत कदमों की आवाज़ें गूँजने लगीं —
उधर है!! पकड़ो उसे!!
काले कपड़ों में विक्रांत के आदमी फिर उसके पीछे दौड़ पड़े।
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शुभिका बिना पीछे देखे भाग रही थी। मुंबई की भीड़, गाड़ियाँ, हॉर्न… सब कुछ उसके लिए बस शोर बन चुका था। उसकी साँसें टूट रही थीं… पैर जवाब दे रहे थे…लेकिन डर उससे तेज़ दौड़ा रहा था।
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तभी उसे सामने एक होटल दिखा। बिना सोचे वो अंदर घुस गई।
लॉबी में लोग थे, रिसेप्शनिस्ट था…लेकिन शुभिका सीधे गलियारे में भागी।
वो बोली -
प्लीज़… प्लीज़ बचा लो…
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गलियारे में दौड़ते हुए उसकी नज़र एक कमरे के खुले दरवाज़े पर पड़ी—
Room No. 307
वो एक सेकंड भी नहीं रुकी। सीधे अंदर घुस गई। और तेज़ी से दरवाज़ा बंद कर दिया।
धड़ाम!!
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कमरे में सन्नाटा था। शुभिका दीवार के सहारे फिसलकर नीचे बैठ गई। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
उसने हांफते हुए कहा -
मैं बच गई…
लेकिन तभी उसे एहसास हुआ…कमरे में कोई और भी था।
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बेड के पास हल्की पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी—
छन… छन…
बाथरूम से भाप बाहर निकल रही थी। शुभिका की साँस अटक गई।
वो बोली -
को… कौन है यहाँ?
वो धीरे-धीरे पीछे हटते हुए बेड के नीचे घुस गई।
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बाथरूम में shower चालू था। पानी की आवाज़ लगातार आ रही थी। शुभिका ने अपनी साँस रोक ली।
वो बोली -
अगर ये कोई आदमी निकला…तो मैं फँस जाऊँगी…
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तभी बाथरूम का पानी बंद हुआ।टप…टप…चुप्पी और भारी हो गई। शुभिका की धड़कन तेज़ हो गई। और अगले ही पल बाथरूम का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा…
चर्ररर…
शुभिका की आँखें फैल गईं…और बेड के नीचे से उसने देखा— एक परछाई बाहर निकल रही थी…
To be continued…