किशिराज की बात हवा में रुक-सी गई—
तुम्हें मुझसे शादी करनी होगी।
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कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। बारिश की आवाज़ भी जैसे धीमी पड़ गई हो। शुभिका उसे घूरकर देखती रह गई। कुछ सेकंड तक उसे समझ ही नहीं आया कि उसने सुना क्या है।
वो बोली -
क्या…?
उसकी आवाज़ काँप गई।
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किशिराज ने उसकी तरफ देखा, चेहरा बिल्कुल शांत था। लेकिन आँखों में वही ठंडा फैसला था।
उसने धीरे से कहा -
ये मज़ाक नहीं है शुभिका।
विक्रांत तुम्हें सिर्फ इसलिए ढूंढ रहा है क्योंकि तुम अकेली हो।
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शुभिका पीछे हट गई, दर्द के बावजूद।
वो बोली -
तो इसका मतलब…तुम मुझे बचाओगे या मुझसे शादी करके मुझे फँसा दोगे?
उसकी आवाज़ टूट रही थी, लेकिन सवाल सीधा था।
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किशिराज कुछ पल चुप रहा।
फिर बहुत धीरे से बोला—
ये शादी… असली नहीं होगी।
ये सिर्फ एक cover होगा।
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शुभिका हैरान थी।
वो बोली -
Cover…?
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किशिराज ने समझाते हुए कहा—
अगर तुम मेरी legally protection में आ गई…तो विक्रांत तुम्हें सीधे हाथ नहीं लगा पाएगा।
उसकी आँखें थोड़ी सख्त हो गईं।
वो बोला -
और मुझे उसके करीब जाने का पूरा मौका मिल जाएगा।
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कमरे में फिर खामोशी। शुभिका की साँसें धीमी हो गईं। वो डर भी रही थी… और सोच भी रही थी।
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उसने धीरे से कहा -
लेकिन…तुम मुझसे सच में कुछ नहीं छुपा रहे ना?
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किशिराज ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसकी आवाज़ थोड़ी नरम थी।
वो बोला -
मैं अगर तुम्हें नुकसान पहुँचाना चाहता…तो अब तक कर चुका होता।
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शुभिका चुप हो गई। उसकी आँखों में अभी भी भरोसा पूरी तरह नहीं था…लेकिन अब एक बात साफ थी—
वो अगर यहाँ रुकी… तो विक्रांत उसे ढूंढ लेगा। और अगर वो गई… तो शायद बच भी जाए।
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किशिराज ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा—
फैसला तुम्हारा है शुभिका।
डर में मरना है…या जिंदा रहने के लिए ये खेल खेलना है।
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शुभिका नीचे देखती रही…उसके हाथ काँप रहे थे। और बाहर बारिश अब और तेज़ हो चुकी थी… जैसे कोई बड़ा तूफान आने वाला हो।
शुभिका बहुत देर तक चुप रही…उसके मन में डर भी था, सवाल भी थे, और अपने मम्मी-पापा की चिंता सबसे ज्यादा।
लेकिन आखिरकार उसने हल्की आवाज़ में कहा—
ठीक है…
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किशिराज ने उसकी तरफ देखा।
वो बोला -
पर एक बात याद रखना…
उसकी आवाज़ गंभीर थी वो बोला -
तुम इस शादी के जोड़े में नहीं रहोगी।
वो थोड़ी देर रुका और बोला -
ये विक्रांत की पहचान है।
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अगले ही दिन…किशिराज उसे एक छोटे से पुराने मंदिर ले आया।
शहर की भीड़ से दूर… शांत जगह। घंटियों की आवाज़ और हवा की हल्की सरसराहट के बीच सब कुछ अलग सा लग रहा था।
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शुभिका साधारण साड़ी में थी। डर अभी भी उसकी आँखों में था… लेकिन अब उसमें एक उम्मीद भी जुड़ गई थी अपने मम्मी-पापा को बचाने की।
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मंदिर में पंडित मंत्र पढ़ रहा था…और किशिराज उसके सामने खड़ा था, शांत लेकिन पूरी तरह तैयार।
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कुछ ही समय बाद…शादी पूरी हो गई। कोई शोर नहीं… कोई भीड़ नहीं…सिर्फ दो लोग, एक फैसला, और एक नई शुरुआत।
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शुभिका ने हल्के से मंगलसूत्र को देखा।
उसके दिल में अभी भी एक ही बात थी—
मम्मी-पापा कैसे हैं…
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किशिराज ने उसकी चुप्पी को समझ लिया।
वो बोला -
चिंता मत करो…
उसने धीरे से कहा -
मेरे लोग उन्हें सुरक्षित जगह पर ले आए हैं।
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शुभिका की आँखों में हल्की राहत आई… लेकिन वो पूरी तरह शांत नहीं हो सकी। क्योंकि अब भी एक नाम बाकी था , विक्रांत।
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मंदिर के बाहर हवा तेज़ चल रही थी। किशिराज ने दूर आसमान की तरफ देखा।
वो बोला -
अब असली खेल शुरू होगा…
उसकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन उसमें आग थी। और शुभिका चुपचाप खड़ी थी…अपने दिल में सिर्फ एक ही बात लिए। अब उसे सिर्फ भागना नहीं था… अब उसे लड़ना था।
दोनों वापस उसी होटल के कमरे में आ गए। कमरा अब भी वैसा ही था , हल्की रोशनी, खामोशी, और बाहर शहर की दूर से आती आवाज़ें।
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किशिराज ने दरवाज़ा लॉक किया और शांत होकर बोला—
सब planned है।
उसने अपनी घड़ी देखी और बोला -
कल सुबह हमें तुम्हारे घर दिल्ली निकलना होगा।
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शुभिका चुप खड़ी थी। उसके दिमाग में अभी भी बहुत कुछ चल रहा था, विक्रांत… मम्मी-पापा… और ये नया रास्ता।
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किशिराज ने उसे देखा और थोड़ा नरम होकर कहा—
तुम अभी सो जाओ।
तुम्हें आराम की जरूरत है।
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शुभिका ने धीरे से सिर हिलाया लेकिन आँखों में नींद नहीं थी।
वो बोली -
अगर वो हमें ढूंढ लेगा तो?
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किशिराज ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—
इस बार नहीं।
उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, लेकिन भरोसे से भरी हुई।
वो बोला -
मैंने हर चीज़ पहले से सेट कर दी है।
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वो कुछ सेकंड रुका, फिर आगे बोला—
हम सीधा दिल्ली जाएंगे… तुम्हारे parents से मिलेंगे…
और फिर विक्रांत का असली खेल वहीं खत्म करेंगे।
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शुभिका धीरे-धीरे बेड पर बैठ गई। थकान उसके चेहरे पर साफ दिख रही थी। लेकिन मन अभी भी बेचैन था।
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किशिराज ने लाइट थोड़ी dim कर दी।
वो बोला -
अब आँखें बंद करो। कल लंबा दिन है।
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शुभिका ने धीरे-धीरे आँखें बंद कर लीं…लेकिन नींद अभी भी दूर थी। उसके मन में एक ही सवाल बार-बार घूम रहा था—
क्या ये सच में अंत की शुरुआत है… या एक और बड़े खतरे की शुरुआत?
और बाहर रात और गहरी होती जा रही थी…
सुबह का समय था। स्टेशन पर हल्की भीड़ थी…ट्रेन की सीटी गूंज रही थी…और दोनों एक डिब्बे में चढ़ चुके थे।
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किशिराज ने चारों तरफ एक बार ध्यान से देखा। उसकी नजर हर चेहरे पर थी… हर हरकत पर। वो जानता था कि विक्रांत के आदमी अभी भी कहीं न कहीं आसपास ही होंगे।
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उसने धीरे से शुभिका की तरफ देखा।
वो बोला -
सुनो…
उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन सतर्क वो बोला -
तुम्हें अभी घूँघट में ही रहना होगा।
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शुभिका ने हल्का सा सिर हिलाया और अपने पल्लू को चेहरे पर खींच लिया। उसकी आँखों में डर अब भी था… लेकिन वो कोशिश कर रही थी खुद को संभालने की।
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ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ी। छुक… छुक… खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटने लगा।
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किशिराज सीट के किनारे बैठा था, पूरी तरह alert।
उसने धीरे से कहा—
अगर सब ठीक रहा…तो कुछ घंटों में हम दिल्ली पहुंच जाएंगे।
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शुभिका ने घुँघट के अंदर से ही पूछा—
और अगर वो हमें ढूंढ ले?
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किशिराज ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आवाज़ और भी ठंडी हो गई—
इस बार वो हम तक नहीं पहुंच पाएगा।
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ट्रेन की आवाज़ तेज़ हो रही थी…और बाहर की दुनिया पीछे छूट रही थी। लेकिन दोनों जानते थे ये सफर जितना शांत दिख रहा था… उतना ही खतरनाक भी था। क्योंकि कहीं न कहीं…विक्रांत अब भी खेल में था।
To be continued…