मौत से भागती दुल्हन - 9 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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मौत से भागती दुल्हन - 9

किशिराज कमरे से बाहर निकल चुका था। होटल के गलियारे में हल्की-हल्की लाइटें जल रही थीं… और दूर कहीं शहर की आवाज़ गूँज रही थी।उसने अपने फोन पर एक नंबर डायल किया। कुछ ही रिंग के बाद कॉल उठ गई।

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वो बोला - 
हाँ…

किशिराज की आवाज़ शांत लेकिन सख्त थी।

वो बोला - 
विक्रांत के पास से उस लड़की के parents को safe जगह पहुँचाना है।

दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर एक भारी आवाज़ आई—
समझ गया।

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किशिराज ने धीरे से आगे कहा—
कोई गलती नहीं होनी चाहिए।

उसकी आँखें थोड़ी और तेज़ हो गईं और बोला - 
विक्रांत को अगर ज़रा भी शक हुआ…

वो रुका और बोला - 
तो वो उन्हें खत्म कर देगा।

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कॉल कट हो गया। किशिराज ने फोन जेब में रखा और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। उसके कदम तेज़ थे… लेकिन चेहरे पर अजीब सा नियंत्रण था। जैसे वो अंदर से किसी बहुत बड़े तूफ़ान को रोक रहा हो।

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उधर होटल के कमरे में शुभिका अभी भी सदमे में बैठी थी।

उसके दिमाग में सिर्फ़ एक ही बात घूम रही थी—
क्या मेरे मम्मी-पापा सुरक्षित हैं?

उसके हाथ काँप रहे थे।

वो बोली - 
अगर उन्हें कुछ हो गया…

वो अपने ही विचारों से डरने लगी।

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तभी दरवाज़ा फिर से खुला। किशिराज वापस आया था। शुभिका तुरंत खड़ी हो गई।

वो बोली - 
क्या हुआ?!

किशिराज ने उसे देखा और बोला - 
मेरे लोग निकल चुके हैं।

उसकी आवाज़ थोड़ी नरम थी वो बोला - 
अब विक्रांत उन्हें छू नहीं पाएगा।

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शुभिका की आँखों में पहली बार हल्की राहत आई… लेकिन डर अभी भी था।

वो बोली - 
तुम इतना सब क्यों कर रहे हो मेरे लिए?

किशिराज कुछ पल चुप रहा।

फिर धीरे से बोला—
क्योंकि ये लड़ाई सिर्फ तुम्हारी नहीं है।

उसने खिड़की की तरफ देखा।

वो बोला - 
ये मेरी भी है…

और बाहर मुंबई की रात फिर से भारी हो चुकी थी…क्योंकि अब दो शिकार नहीं थे अब एक शिकार था… और दो शिकारी।

शुभिका अब भी उसी दुल्हन के भारी जोड़े में बैठी थी…कपड़े मिट्टी से सने हुए थे, दुपट्टा बिखरा पड़ा था। उसके पैरों में जंगल के कांटे गहरे चुभ चुके थे…हर हल्की हरकत पर दर्द तेज़ हो जाता था।
सिर पर चोट के निशान थे, जहाँ भागते समय वो कई बार गिर चुकी थी। हाथों पर खरोंचें थीं, और मेहँदी अब खून और धूल में मिल चुकी थी। वो चुपचाप दीवार से टिककर बैठी थी। जैसे शरीर हार चुका हो… लेकिन डर अभी भी ज़िंदा था।

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किशिराज कुछ देर उसे देखता रहा। उसकी आँखों में कोई मज़ाक नहीं था… न ही कोई हल्कापन। सिर्फ़ एक ठंडी समझ। वो धीरे-धीरे आगे आया और फर्श पर उसके सामने बैठ गया।

वो बोला - 
तुम्हारा शरीर अब भागने लायक नहीं रहा…

उसकी आवाज़ शांत थी।

वो बोला - 
लेकिन दिमाग अभी भी लड़ रहा है।

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शुभिका ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

शुभिका बोली -
मेरे मम्मी-पापा…

उसकी आवाज़ टूट गई।

वो बोली - 
वो ठीक तो हैं ना?

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किशिराज ने सिर थोड़ा झुकाया।

वो बोला - 
अभी के लिए…

फिर उसने गंभीर होकर कहा—
विक्रांत उन्हें ढूंढ रहा है।

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शुभिका की साँस अटक गई बोली - 
तो फिर तुमने मुझे झूठ क्यों कहा था…

उसकी आँखों में डर और गुस्सा दोनों थे।

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किशिराज ने उसकी तरफ सीधे देखा और बोला - 
मैंने झूठ नहीं कहा था।
मैंने समय खरीदा था।

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कमरे में सन्नाटा फैल गया। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।खिड़की से पानी की हल्की आवाज़ अंदर आ रही थी…टप… टप… टप…

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किशिराज धीरे से उठा और बोला - 
अब तुम्हें एक फैसला लेना होगा शुभिका।

उसने दरवाज़े की तरफ देखा और बोला - 
या तो तुम इसी डर में जियो…या फिर मेरे साथ आकर इस डर को खत्म करो।

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शुभिका चुप थी। उसकी आँखों में आँसू थे… दर्द था… और एक अधूरी उम्मीद भी। 
क्योंकि अब उसकी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक सवाल बचा था—
क्या वो विक्रांत से कभी बच पाएगी… या ये खेल और गहरा होने वाला है?

किशिराज उसके पास ही बैठ गया था। उसके हाथ में फर्स्ट-एड किट था। वो बहुत धीरे-धीरे शुभिका के पैर के घाव साफ कर रहा था… कांटे निकाल रहा था… और दवा लगा रहा था।

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जैसे ही दवा घाव पर लगी—

शुभिका की आँखें बंद हो गईं।

वो चिल्लाई -
आह…

उसके होंठों से दर्द की हल्की सी आवाज़ निकल गई। उसका पूरा शरीर काँप गया।

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किशिराज ने तुरंत अपनी पकड़ हल्की की।

वो बोला - 
सॉरी…

उसकी आवाज़ थोड़ी नरम हो गई।

किशीराज बोला - 
थोड़ा और सह लो…

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शुभिका दाँत भींचकर बैठी रही। उसकी आँखों में आँसू भर आए थे, लेकिन वो रो नहीं रही थी…क्योंकि वो अब रोते-रोते थक चुकी थी।

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किशिराज बहुत ध्यान से उसके घाव साफ कर रहा था। हर कांटा निकालते समय वह रुक जाता… जैसे उसे दर्द का अंदाज़ा हो।

उसने धीरे से कहा -
तुम बहुत दूर तक भागी हो…

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शुभिका ने हल्की आवाज़ में जवाब दिया—
मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था…

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किशिराज ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब हल्की सी चिंता थी।

वो बोला - 
अब है…लेकिन वो आसान नहीं होगा।

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वो दवा लगाते हुए आगे बोला—
विक्रांत सिर्फ ताकतवर नहीं है…वो बहुत खतरनाक सोच रखता है।

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शुभिका ने उसकी तरफ देखा और बोली - 
तुम उसे जानते हो… इतना गहराई से क्यों?

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किशिराज कुछ पल चुप रहा।

फिर बहुत धीमे स्वर में बोला—
क्योंकि उसने सिर्फ तुम्हारी ज़िंदगी नहीं तोड़ी…

उसकी आँखें थोड़ी सख्त हो गईं।

वो बोला - 
उसने मेरी भी ज़िंदगी अधूरी छोड़ दी थी।

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कमरे में सन्नाटा फैल गया। शुभिका अब उसे अलग नज़र से देख रही थी डर के साथ… लेकिन अब थोड़ा भरोसा भी।

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किशिराज ने आखिरी पट्टी बांधी और उठ गया।

वो बोला - 
अब आराम करो…

उसने दरवाज़े की तरफ देखा और बोला - 
हम अगला कदम जल्द उठाएंगे।

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शुभिका चुपचाप बैठी रही…उसके पैरों में दर्द अभी भी था…लेकिन अब सबसे बड़ा दर्द उसके मन में था ये लड़ाई अब सिर्फ भागने की नहीं रही थी… अब सामना करने की थी।

किशिराज की आवाज़ कमरे में धीरे-धीरे गूँजी। वो खिड़की की तरफ खड़ा था, बाहर बारिश तेज़ हो रही थी।

उसने बहुत धीमे, लेकिन भारी स्वर में कहा—
उसने मेरी शुभिका को भी मुझसे छीन लिया था…

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शुभिका ने ये सुना तो उसका दिल एक पल को रुक गया। वो चुपचाप उसे देखने लगी।

वो बोली - 
तुम्हारी… शुभिका?

उसकी आवाज़ में confusion था।

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किशिराज ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में दर्द था… गुस्सा भी… और कुछ पुरानी यादें भी।

वो बोला - 
हाँ…

वो थोड़ी देर रुका फिर बोला - 
एक लड़की थी…जो मुझे सच में समझती थी।

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कमरे में सन्नाटा छा गया। बारिश की आवाज़ अब और तेज़ लगने लगी थी। टप… टप… टप…

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किशिराज धीरे-धीरे आगे आया और दीवार के सहारे खड़ा हो गया।

वो बोला - 
विक्रांत उससे शादी करके ने उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल किया…

उसकी मुट्ठियाँ कस गईं वो बोला - 
और फिर…

वो रुक गया। उसकी आवाज़ भारी हो गई।

वो बोला - 
वो भी इस दुनिया से चली गई।

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शुभिका की आँखें फैल गईं और बोली - 
तो इसलिए तुम…

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किशिराज ने उसकी तरफ देखा और बोला - 
इसलिए मैं अब किसी और को नहीं खो सकता।

उसकी आवाज़ अब बहुत साफ थी।

वो बोला - 
खासकर तुम्हें नहीं।

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शुभिका चुप हो गई। उसके मन में डर भी था… लेकिन अब एक अजीब सा जुड़ाव भी। क्योंकि दोनों ही विक्रांत से कुछ न कुछ खो चुके थे।

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किशिराज ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
ये लड़ाई अब सिर्फ बदले की नहीं है…ये उसे खत्म करने की है।

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और बाहर मुंबई की बारिश जैसे और तेज़ हो गई…मानो आने वाले तूफान का इशारा दे रही हो।

To be continued…