अध्याय 22 पांच दिलों का जागरण
इस समय राघव जोशी जमीन पर घुटनों के बल बैठ चुका था। उसका सिर झुका हुआ था, और उसके कंधे समय-समय पर कांप रहे थे। बेशक विराज ने उसकी पिटाई नहीं लगाई थी, फिर भी वह किसी डरपोक कुत्ते की तरह सिकुड़ गया था।
वह एक बुजदिल की तरह व्यवहार कर रहा था, ठीक वैसे ही जैसे वह हमेशा से था। ताकत होने पर शेर बनने वाला, और ताकत के सामने आते ही चूहा बन जाने वाला। विराज, जो पुराने जन्म में महान अपराजित तलवार योद्धा के नाम से प्रसिद्ध था, उसके लिए किसी बुजदिल व्यक्ति पर हमला करना उचित नहीं था।
इसीलिए वह राघव पर ध्यान दिए बिना सीधे निखिल जोशी की ओर बढ़ जाता है।
विराज से पिटाई के बाद निखिल की हालत बहुत खराब थी। उसके सीने की हड्डियाँ दर्द कर रही थीं - हर सांस के साथ उसे लगता था जैसे कोई चाकू उसकी छाती में चुभ रहा हो।
निखिल को ऊपर देखना पड़ रहा था - और जो दृश्य उसे दिख रहा था, वह उसके लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। विराज का शरीर उसके ऊपर खड़ा था, उसकी परछाई निखिल के पूरे शरीर को ढक रही थी, और उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
उसका दिल तेजी से घबरा रहा था - धड़क-धड़क-धड़क, इतनी तेजी से कि उसे लग रहा था कि उसकी छाती फट जाएगी। वह जानता था कि अब उसके साथ कुछ बुरा होने वाला है - कुछ ऐसा जिससे वह कभी उबर नहीं पाएगा।
तभी विराज ने अपने मुक्के से निखिल के चेहरे की ओर तेजी से हमला किया। उसकी मुट्ठी हवा में सीटी बजाती हुई नीचे की ओर आ रही थी - उसकी गति इतनी तीव्र थी कि उसके आस-पास की हवा भी घूमने लगी थी।
यह देखकर निखिल की चीख निकल गई, जैसे कोई जानवर वधशाला में ले जाते समय चीखता है।
वहीं पास में बुजदिल राघव भी चिल्लाता है, और शायद पहली बार उसकी आवाज में अपने भाई के लिए सच्ची चिंता थी - "छोड़ दो मेरे भाई को!"
पल्लवी और उसके दोस्त भी काफी घबरा जाते हैं। उनके चेहरों का रंग उड़ गया था, उनके हाथ उनके मुंह पर आ गए थे। क्योंकि उन्हें साफ दिख रहा था कि विराज का मुक्का निखिल जोशी के चेहरे की तरफ जा रहा था। और मुक्के की जो गति थी, और अभी उन्होंने जो विराज की ताकत देखी थी, जिसने उच्च लड़ाकू योद्धा के चौथे स्तर के साधक को एक ही लात में ढेर कर दिया था, इन दोनों को जोड़कर वह यह अनुमान लगा सकते थे कि जैसे ही यह मुक्का निखिल के चेहरे पर पड़ेगा, उसके चेहरे की हड्डियाँ टूट जाएंगी, और उसकी मृत्यु निश्चित हो जाएगी।
उनके हिसाब से, बेशक निखिल एक बुरा व्यक्ति था, एक अत्याचारी, एक ऐसा आदमी जिसने कितनी ही लड़कियों की जिंदगियाँ बर्बाद कर दी थीं। परंतु उसके लिए मृत्युदंड देना बहुत ही ज्यादा हो जाता।
और इसका असर उनकी जिंदगियों पर भी पड़ता, क्योंकि इस समय वे पांचों भी वहाँ मौजूद थे।
इसीलिए पल्लवी और उसके सभी दोस्तों ने भी चिल्लाकर विराज को रुकने के लिए कहा।
परंतु विराज कहाँ रुकने वाला था? उसका मुक्का टकराया - इतनी जोर से कि फर्श भी चटक गया। टाइल्स के टुकड़े उड़ गए, धूल का गुबार उठ गया, और पूरे हॉल में एक भयानक धमाके की गूंज फैल गई।
निखिल ने डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं, उसकी पलकें इतनी जोर से बंद हुईं कि उसकी आंखों के आस-पास की मांसपेशियाँ दर्द करने लगीं। उसका शरीर जोर-जोर से कांप रहा था।
उसने मौत को अपने बिल्कुल करीब महसूस किया। परंतु मुक्का टकराने की आवाज तो हुई, परंतु उसे वह अपने चेहरे पर महसूस नहीं हुई।
जब उसने अपनी आंखें खोलीं, धीरे-धीरे, डरते-डरते, तो उसने देखा कि विराज का मुक्का उसके बगल में, फर्श पर लगा था। मुक्का फर्श में धंसा हुआ था, उसके चारों ओर टाइल्स के टुकड़े बिखरे पड़े थे, और एक छोटा सा गड्ढा बन गया था। विराज की मुट्ठी उसके कान से बस एक इंच की दूरी पर थी, इतनी करीब कि वह उसकी मुट्ठी की गर्माहट महसूस कर सकता था।
विराज अपनी जगह से खड़ा हो जाता है। उसने अपनी मुट्ठी खोली, अपने हाथ पर लगी धूल झाड़ी, और फिर एक गहरी सांस ली। उसने निखिल की ओर देखा और फिर उसने अपनी नजरें हटा लीं।
अगर यह विराज का पुराना समय होता, और वह पुराना विराज होता - वह अपराजित तलवार योद्धा, तो अब तक वह निखिल को मार चुका होता। परंतु इस जिंदगी में रवीना ने उसे बहुत ज्यादा प्रभावित कर रखा था।
वह कहती थी, "जिसने जितना तुम्हारे साथ गलत व्यवहार किया है, उसे उतनी ही सजा मिलनी चाहिए। अगर तुम उससे ज्यादा सजा दे दोगे, तो तुम खुद अत्याचारी बन जाओगे।" उसकी ये बातें उसके हर निर्णय को प्रभावित कर रही थीं। इसी कारण से विराज ने निखिल की जिंदगी बख्श दी थी।
निखिल पूरी तरह से घबरा चुका था। यहाँ तक कि उसने अपने कपड़ों में पेशाब भी कर दिया था, और उसकी बदबू उसके आस-पास फैलने लगी थी।
राघव घुटनों के बल रेंगता हुआ अपने भाई के पास पहुंचा, उसके बगल में बैठ गया, और उसके सिर को अपनी गोद में उठा लिया।
तभी अचानक मुख्य दरवाजा खुलता है, और अधीर अंदर आ जाता है। इस हॉल के बदले हुए माहौल को देखकर वह पूरी तरह से आश्चर्यचकित रह जाता है।
क्योंकि निखिल जोशी जब राघव जोशी और अपने चार अनुयायियों के साथ आकर होटल रिसेप्शनिस्ट से पूछता है, "पल्लवी चौहान की जन्मदिन की पार्टी इस होटल में कहाँ हो रही है, और क्या विराज चौहान इस पार्टी में आ चुका है?" - उस समय अधीर पास ही खड़ा था, और उसने यह सब सुन लिया था।
वह तुरंत स्थिति को समझ जाता है, क्योंकि लगभग 10 दिन पहले उसने एक अफवाह सुनी थी कि चौहान परिवार के मशहूर मुफ्तखोर घर जमाई ने जोशी परिवार के राघव जोशी और उसके दोस्तों की मुख्य बाजार में पिटाई की है।
पहले तो यह उसे एक अफवाह ही लगी - उसने सोचा था कि यह सिर्फ कोई लोगों की मनगढ़ंत बात है, क्योंकि उसे नहीं लगा था कि ऐसा होना संभव है।
लेकिन अब जब राघव जोशी अपने बड़े भाई निखिल जोशी को लेकर आया है, और सीधे हॉल नंबर 5 में घुस गया है, तो यह मात्र एक अफवाह नहीं रह जाती है, जरूर ऐसा ही कुछ हुआ होगा। नहीं तो जोशी परिवार के लोग इतने बड़े दल के साथ यहाँ क्यों आते?
इसीलिए उसने कुछ करने की नहीं सोची। परंतु उसकी सोच के अनुसार कुछ नहीं हुआ, तो वह तुरंत ऊपर की ओर आता है।
और जैसी कि उसे आशंका थी, वैसा ही सब हो रहा था, निखिल जोशी की हालत बहुत खराब थी। राघव जोशी उसे सहारा दे रहा था, और उसके साथ आए चारों अनुयाई भी हॉल में इधर-उधर पड़े हुए थे और उठने की कोशिश कर रहे थे। हॉल की हालत और विराज का आकलन करने के बाद वह सब कुछ जान चुका था कि यहाँ क्या हुआ होगा।
वह तुरंत विराज के सामने आता है, अपने हाथ जोड़ता है, अपना सिर झुकाता है, और विराज से क्षमा मांगते हुए कहता है, "यह हमारे होटल की गलती है कि आपके साथ यह सब हुआ। हमें आपको बचाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन हम असफल रहे। परंतु अब हम आपसे विनती करते हैं कि हमारे होटल की प्रतिष्ठा की खातिर निखिल जोशी को यहाँ से जाने दीजिए।"
विराज अधीर की आँखों में आँखें डालकर कहता है "जब स्थिति तुम्हारे अनुमान से अलग होने लगी, तो तुम्हें अपने होटल की प्रतिष्ठा याद आ गई। अगर सब कुछ तुम्हारी सोच के समान होता - अगर मैं यहाँ पिट रहा होता, अगर निखिल जोशी जीत रहे होते - तो क्या तुम कभी यहाँ आते?" उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया, अपनी आँखों में एक तीखी चमक लाई, और कहा "या तब तुम्हारे होटल की प्रतिष्ठा अलग थी?"
यह सुनने के बाद अधीर की बोलती पूरी तरह से बंद हो चुकी थी। उसके मुंह से कोई आवाज नहीं निकली। उसे नहीं पता था कि जो वह सोच रहा था। विराज को वह सब कुछ पहले से ही पता था। परंतु अब वह कुछ नहीं कर सकता था।
यह कहने के बाद विराज पल्लवी की तरफ देखता है, "तमाशा खत्म हो चुका है। तुम्हें यहाँ रहना है या अपने-अपने घर भी चलना है?"
यह बोल कर विराज हॉल के बाहर जाने लगता है। पल्लवी अपने सभी दोस्तों के साथ, अपने सारे तोहफे उठाती है,और फिर वे विराज के पीछे-पीछे चल देती हैं।
उसके बाद राघव जोशी निखिल जोशी और अपने चारों अनुयाइयों के साथ हॉल से निकल जाता है।
अधीर अपने कर्मचारियों से हॉल को फिर से सही करने को कहता है - "जल्दी करो, सब कुछ ठीक करो, टूटी चीजें हटाओ, फर्श साफ करो, और ध्यान रखना कि किसी को पता न चले कि यहाँ क्या हुआ।" और उसके कर्मचारी इस काम में लग जाते हैं।
परंतु अधीर वहीं खड़ा रहता है, और सोचता है "आज जो हुआ है, मुझे नहीं लगता कि जोशी परिवार इस पर खामोश बैठेगा। अगले कुछ दिनों में तूफान आएगा। बस मुझे डर है कि इस तूफान का असर मुझ पर कितना पड़ेगा।"
फिर उसकी सोच एक और दिशा में मुड़ती है, "परंतु सबसे आश्चर्य की बात कुछ और भी है। निखिल जोशी जितने भी अधीनस्थ लाया था, वह सब उच्च लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर से चौथे स्तर के बीच में थे। और निखिल जोशी स्वयं भी उच्च लड़ाकू योद्धा के तीसरे स्तर पर था। पर विराज ने इन सभी को बड़ी आसानी से हरा दिया, जैसे कोई बाघ बिल्ली के बच्चों से लड़ रहा हो।"
"यह तो मेरी कल्पना से भी परे है। अगर बाहर शहर में, मैं यह किसी को बताऊंगा - कि इंदौर शहर के मुफ्तखोर घर जमाई ने यह सब किया है, तो कोई भी इस पर विश्वास नहीं करेगा और इसे एक अफवाह मानेगा। लोग कहेंगे - 'अधीर भाई, कुछ ज्यादा ही शराब पी ली तुमने' या फिर 'कोई नया सपना देखा है क्या?'"
"पर इसमें एक और बात चौंकाने की है, विराज एक दुर्लभ प्रतिभा का धनी है। यह प्रतिभा अगर सही दिशा में जाए, तो वह बहुत ऊँचाइयों तक पहुँच सकती है। परंतु मुझे डर है, चौहान परिवार अपने अहंकार में ऐसी प्रतिभा पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देगा। और दूसरे लोग इस प्रतिभा को खिलने से पहले ही पूरी तरह से नष्ट कर देंगे। जोशी परिवार पहले ही उसके पीछे पड़ चुका है। यह लड़ाई तो पहले से ही तय लगती है।"
वह एक गहरी साँस लेता है, अपना सिर हिलाता है, और खुद से कहता है - "लेकिन जो भी हो, आज का दिन मैं कभी नहीं भूलूंगा। आज मैंने देखा कि एक तितली तूफान कैसे बन सकती है।"
वहीं होटल से बाहर निकलने के बाद, पल्लवी और उसके दोस्त विराज के पीछे चल रहे थे। उन्होंने जिस तरह पहले विराज के साथ व्यवहार किया था, वह उसके लिए अपने आप को दोषी मान रहे थे। और इसलिए वे विराज से क्षमा मांगना चाहते थे, परंतु इनमें से किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि विराज से बात कर सके।
अंततः पल्लवी आगे बढ़ती है। और विराज को पुकारते हुए कहती है "सुनिए जीजा जी।"
विराज रुक जाता है। फिर वह पल्लवी की तरफ घूम जाता है।
पल्लवी कहती है, "आज आपने जो मेरे लिए किया है, मैं उसके लिए आपका शुक्रिया अदा करती हूँ।"
विराज उसकी तरफ देखते हुए कहता है, "मैंने तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं किया है। अगर उसने मुझ पर हमला नहीं किया होता, तो मैं तुम्हारे बीच में बोलता भी नहीं।"
विराज सच कह रहा था - बेशक पल्लवी रवीना के ताऊजी की बेटी थी, वह दोनों एक-दूसरे को अपनी बहन की तरह मानती थीं, उनके बीच गहरा लगाव था। परंतु इस घटना के बाद अगर विराज उसकी तरफ से नहीं बोलता, तो भी रवीना उसे दोषी नहीं ठहराती।
क्योंकि रवीना विराज के स्वभाव को जानती थी, पल्लवी ने विराज के लिए कभी कुछ नहीं किया था। तो विराज उसकी मदद क्यों करता?
लेकिन विराज पल्लवी से कहता है, "तुम रवीना की बहन हो, तो मैं तुम्हें एक बात बता देता हूँ। दूसरों से उम्मीद करना छोड़ दो, पहले स्वयं के लिए लड़ना सीखो।" विराज ने उसकी आँखों में सीधा देखते हुए कहा, "जब निखिल ने तुम्हारे गाल को छुआ था, तब तुम वहीं खड़ी थीं। तुमने उस पर कोई हमला नहीं किया, तुमने उसका विरोध नहीं किया।"
यह कहकर विराज जैसे ही घूमने वाला था, तभी अचानक से अनूप बीच में बोलने लगता है, "आपने जो बात कही है, वह बिल्कुल सत्य है। परंतु मैं तो आपको धन्यवाद दे सकता हूँ कि आपने मेरी सबसे कीमती चीज़ की हिफाज़त की।" उसने अपनी नजरें पल्लवी की तरफ घुमाईं, और फिर वापस विराज पर लाकर रोक दीं, "इसके लिए मैं आपका जीवन भर आभारी रहूँगा।"
विराज अनूप की तरफ देखकर कहता है, "तुम तो पल्लवी से भी ज्यादा बेकार हो।" यह सुनते ही अनूप का चेहरा सफेद पड़ गया, उसके हाथ काँपने लगे, उसकी सांसें रुक गईं। विराज आगे कहता है - "जिस व्यक्ति को तुम अपना समझते हो, और जिसे तुमने अपनी नियति मान रखा है - समय पड़ने पर तुम उसके लिए खड़े भी नहीं हुए। क्योंकि तुम्हारे रास्ते में तुमसे ज्यादा ताकतवर शख्स आ गया था, तो तुमने उसकी ताकत को स्वीकार कर लिया। जिस पर तुम अपना हक समझते हो, तुम बिल्कुल भी उसके लायक नहीं हो।"
विराज आगे कहता है, "प्यार सिर्फ कहने का नाम नहीं है, प्यार करने का नाम है। और प्यार करने का मतलब है साथ खड़ा होना, चाहे सामने कोई भी हो। तुमने जो किया है, यह उस व्यक्ति का अपमान है जिसे तुम प्यार करने का दावा करते हो।"
यह कहने के बाद विराज फिर से घूमता है, और आगे की तरफ चल देता है।
वह पांचों दोस्त अभी भी अपनी जगह पर एक मूर्तियों के समान खड़े हुए थे।
क्योंकि विराज ने जो कहा था, वह पूरी तरह से सत्य था। यह वह आईना था जिसे वे देखना नहीं चाहते थे। क्योंकि उस आईने में उन्होंने अपनी असली तस्वीर देखी थी - कमजोर, डरपोक, निर्भर, बेबस। और उस तस्वीर ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था।
अब पल्लवी को एहसास हो चुका था कि उसे स्वयं के फैसले खुद लेने चाहिए। अनूप उसकी जिंदगी का हिस्सा है, वह उसे अपनाएगी, परंतु वह स्वयं आत्मनिर्भर बनेगी, आज के बाद कोई अन्य निखिल आकर उसके साथ ऐसी कोई बदतमीजी नहीं कर पाएगा।
लगभग लगभग यही हाल अनूप का भी था। उसे भी आत्मबोध का ज्ञान हुआ था - अब वह जान गया था कि जिस चीज को तुम अपना समझते हो, उसके लिए किसी भी हद तक जाना चाहिए, चाहे उसके बाद परिणाम जो भी निकले।
और रही बात लता, उषा और रूपा की - तो उन्होंने एक सबक सीखा था। उन्होंने जाना कि जो व्यक्ति जैसा दिखता है, वैसा नहीं होता है। पार्टी में आने से पहले और कई सालों तक उन्होंने विराज के बारे में जो भी बातें सुनी थीं, आज वह सब बातें पूरी तरह से झूठ साबित हो चुकी थीं। उनके मनों में जो कांच के महल बने हुए थे, वे कांच के महल आज पूरी तरह से टूट चुके थे।
आज इन पांचों के जीवन में एक नई शुरुआत हुई थी - एक ऐसी शुरुआत जो इनके भविष्य की नींव रखने वाली थी। आज से वे पहले जैसे नहीं रहेंगे - आज से वे बदलेंगे, सीखेंगे, बढ़ेंगे। आज से वे अपनी ताकत को पहचानेंगे, अपनी कमजोरियों को स्वीकारेंगे, और अपने भाग्य को खुद लिखेंगे। यह कोई छोटा बदलाव नहीं था - यह एक क्रांति थी, एक परिवर्तन था, एक नए जीवन का सूत्रपात था। और इस क्रांति का नाम था - विराज चौहान, वह घर जमाई जिसने आज पांच दिलों को बदलकर रख दिया था।