अध्याय 8 आचार्य विदुर का अटूट निर्णय
वहीं दूसरी तरफ मगध साम्राज्य की राजधानी के अंदर स्थित नालंदा गुरुकुल में दो आकृतियां मुख्य छात्रों को रहने के लिए आवंटित घरों की श्रृंखला की सड़क पर चले जा रहे थे। सुरेश और गीता, जो इंदौर शहर के सम्मानित नागरिक थे, अब धीमे कदमों से उन भव्य हवेलियों के बीच से गुजर रहे थे। उनके मन में अपनी बेटी रवीना से मिलने की उत्कंठा थी, और हर कदम के साथ वह उत्कंठा और गहरी होती जा रही थी। सात महीने का लंबा अंतराल उनके और उनकी बेटी के बीच खिंच गया था, और अब वह पल निकट था जब वह उसे फिर से अपनी आँखों से देख सकेंगे।
कुछ देर चलने के पश्चात वह एक भव्य हवेली के सामने रुक गए। वह हवेली नालंदा गुरुकुल के सबसे प्रतिष्ठित हवेलीयों में से एक थी।
बाहर मौजूद चौकीदारों ने उन्हें नहीं रोका, क्योंकि वह चौकीदार जानते थे कि यहां आने वाले और कोई नहीं बल्कि मुख्य छात्रा रवीना के माता-पिता थे।
वैसे तो सुरेश और गीता को इंदौर शहर से यहां तक पहुंचने में उन्हें 7 दिन का समय लगता परंतु शकुंतला ने उन्हें कई सारे काम दे दिए थे, जिसकी वजह से उन्हें कई शहरों में रुकना पड़ा, जिसकी वजह से उन्हें यहां आने में 1 महीने से ज्यादा समय लग गया। लेकिन इस समय वह सब कुछ अब इस पल में फीका पड़ गया था। गीता ने सोचा, ‘एक महीने की थकान तो बस इसी पल के लिए थी।’ सुरेश के चेहरे पर थकावट साफ दिख रही थी, परंतु उसकी आँखों में चमक थी – अपनी बेटी से मिलने की चमक।
घर के अंदर आते ही उन्होंने देखा, इस समय बड़े हॉल में कोई भी मौजूद नहीं था, वहां केवल एक व्यक्ति बैठा हुआ था।
जैसे ही सुरेश की नजर उन पर पड़ी वह उन्हें पुकारते हुए कहता है "प्रणाम पिताजी" और उनकी ओर बढ़ जाता है। उसकी आवाज में एक बेटे की तरह आदर और अपनापन था।
दरवाजा खुलने के बाद हॉल में बैठे व्यक्ति की नजर भी दरवाजे की ओर जाती है, और उसके चेहरे पर खुशी आ जाती है। उसने झट से अपनी सीट छोड़ी और दो कदम आगे बढ़ा।
यह व्यक्ति कोई और नहीं शकुंतला का दूसरा पति सुभाष था, और यह सुरेश का पिता भी था। उसकी आँखों में अनुभव की गहराई थी, और उसके स्वर में एक अदृश्य गंभीरता थी जो उसे अन्य लोगों से अलग करती थी। फिर भी, अपने परिवार के सामने वह एक स्नेही पिता और पति में बदल जाता था।
सुरेश जाकर उसके पैर छूता है और उसके साथ उसकी पत्नी गीता भी उसके पैर छूती है। सुरेश ने अपने माथे को अपने पिता के चरणों से लगाते हुए गहरी श्रद्धा का अनुभव किया, और गीता ने भी वैसा ही किया। यह संस्कार उनके परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा था – बड़ों का आशीर्वाद लिए बिना कोई भी कार्य शुरू नहीं होता था।
सुभाष उन दोनों को आशीर्वाद देता है और कहता है, "तुम दोनों सफर से थक गए होंगे, चलो थोड़ा सा आराम कर लो, मैंने तुम दोनों का कमरा तैयार करा दिया है।" उसकी आवाज में वही कोमलता थी जो एक पिता अपने बच्चों के लिए रखता है।
सुरेश अपने कमरे में जाते हुए पूछता है, "बाकी के सब लोग कहां हैं?" उसकी दृष्टि पूरे हॉल में घूम चुकी थी, और जब वह अपनी माता शकुंतला और बड़े पिता राजेश को नहीं देख पाया, तो उसके मन में जिज्ञासा उठी।
सुभाष ने उन्हें बताते हुए कहा, "रवीना बिटिया अपने गुरु के पास प्रशिक्षण लेने गई है, दिन के समय वह हमारे साथ ही खाना खाएगी। और रही बात तुम्हारी माता शकुंतला और तुम्हारे बड़े पिता राजेश की तो वह दोनों किसी काम के चलते मगध साम्राज्य के बाहर गए हुए हैं, वहां का काम पूरा हो जाने के बाद तुम्हारी मां शकुंतला सीधे इंदौर शहर के लिए निकल जाएगी, और बड़े भाई राजेश नालंदा गुरुकुल के लिए आ जाएंगे।" यह कहते समय सुभाष के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी, मानो वह उन कार्यों के बारे में कुछ और अधिक जानता हो, परंतु अभी कहना उचित नहीं समझ रहा था।
दोपहर का खाना खाने के बाद सभी लोग हॉल में बैठे हुए थे और बातें कर रहे थे।
गीता को लगता है, कि उसकी बेटी साधना में तेजी से तरक्की कर रही है, इसीलिए वह अपनी बेटी रवीना को देखते हुए कहती है, "तुम तो साधना में बहुत तरक्की कर रही हो, बेटा। इससे कोई परेशानी तो नहीं होगी? साधना में इतनी तेजी से तरक्की करना घातक होता है।" गीता के मन में मातृत्व की वह गहरी चिंता थी जो हर माँ को अपने बच्चे के लिए होती है। उसने अपने जीवन में ऐसे कई उदाहरण देखे थे जहाँ अत्यधिक तीव्र गति से साधना करने वाले साधक या तो विक्षिप्त हो गए या उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा ने ही उन्हें नष्ट कर दिया। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी के साथ ऐसा हो।
तभी गीता के ससुर सुभाष कहते हैं, "तुम्हारी आशंका बिल्कुल जायज़ है गीता बहू। परंतु तुम इसकी चिंता मत करो। रवीना की साधना और उसकी प्रगति पर, स्वयं मेरी और इसके बड़े दादाजी राजेश की पूरी तरह से नज़र है। और इसके साथ-साथ इसकी दादी शकुंतला समय-समय पर रवीना का मार्गदर्शन करती रहती हैं, और शकुंतला के मार्गदर्शन पर शायद तुम्हें शक नहीं करना चाहिए।" सुभाष ने यह बात इतने विश्वास के साथ कही कि गीता को अपनी चिंता पर ही संकोच होने लगा। उसने आगे कहा, "वह साधना की उस परम्परा की प्रतिनिधि हैं जिसकी जड़ें सैकड़ो वर्ष पुरानी हैं।"
"और यदि तुमको शक भी है तो तुम्हें यह सोचकर बिल्कुल निश्चिंत हो जाना चाहिए, कि रवीना नालंदा गुरुकुल के सबसे वरिष्ठ गुरु आचार्य विदुर की मुख्य शिष्या है। पूरे मगध साम्राज्य में इस समय उनसे बड़ा प्रतिभावान गुरु कोई नहीं है। उनके मुख्य शिष्य के रूप में हमारी रवीना बिटिया बहुत अच्छी तरक्की करेगी।" सुभाष के स्वर में गर्व की झलक थी, क्योंकि आचार्य विदुर जैसे गुरु का शिष्य होना अपने आप में एक उपलब्धि थी। पूरे मगध साम्राज्य में हजारों साधक ऐसे थे जो जीवन भर उनके दर्शन मात्र के लिए तरसते थे।
यह सुनने के बाद सुरेश और गीता के चेहरे पर संतुष्टि आ जाती है, उन्हें इतने सारे काबिल लोगों के नीचे अपनी बेटी की प्रतिभा की तरक्की पर कोई शक नहीं था। फिर भी, सुरेश एक पिता होने के कारण, अपनी बेटी की प्रगति को स्वयं परखना चाहता था। आखिरकार, वह भी एक साधक था और साधना के विभिन्न स्तरों को समझता था।
सुरेश अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का एक हल्का सा प्रवाह रवीना की तरफ पहुंचाते हुए यह जानना चाहता था कि उसकी बेटी रवीना इस समय साधना के किस स्तर पर है। जब उसे उसका स्तर पता चलता है तो उसके चेहरे पर अविश्वास और विस्मय का मिश्रण साफ झलक रहा था।
क्योंकि रवीना का साधना स्तर बस उससे एक स्तर नीचे था। सुरेश स्वयं उच्च लड़ाकू योद्धा के नौवें स्तर पर था, और रवीना आठवें स्तर पर। इसका अर्थ था कि केवल सात महीनों में, उस बालिका ने वह हासिल कर लिया था जिसे कई साधकों को वर्षों लग जाते थे। वह आश्चर्यचकित भाव से उसकी ओर देखते हुए कहता है, "रवीना बिटिया, जब तुम नालंदा गुरुकुल आई थी, तब तुम्हारा साधना स्तर लघु लड़ाकू योद्धा को पार करके उच्च लड़ाकू योद्धा के प्रथम स्तर में प्रवेश किया था, और आज तुम्हारा साधना स्तर उच्च लड़ाकू योद्धा के आठवें स्तर पर है। तुम बस मुझसे एक स्तर नीचे हो।" उसकी आवाज में गर्व और आश्चर्य दोनों थे। उसकी अपनी बेटी, जिसे उसने अपनी बाँहों में झुलाया था, आज उसकी बराबरी पर आ रही थी।
सुभाष हंसते हुए कहता है, "हमारी रवीना बिटिया तरक्की करेगी क्यों नहीं इतनी जल्दी, जब रवीना बिटिया इंदौर शहर में थी तब 3 सालों तक उसने हमारे परिवार की मदद से लघु लड़ाकू योद्धा स्तर को पार कर लिया था, और उच्च लड़ाकू योद्धा के स्तर में पहुंच गई थी। और जब नालंदा गुरुकुल में आई, मैंने और उसके बड़े दादाजी और उसकी दादी ने जो इतने सालों से नालंदा गुरुकुल में उसकी साधना बढ़ाने के लिए जितने भी संसाधन इस्तेमाल किए थे, उनकी मदद से 7 महीने में इस स्तर तक पहुंचना उसके लिए अति आवश्यक था।"
यह सुनकर गीता भी चौंक जाती है। उसने अपनी बेटी की तरफ देखा, और उसकी आँखों में एक बड़ी उपलब्धि की चमक थी, परंतु उससे भी बढ़कर था – माँ का गर्व। उसे वे दिन याद आ गए जब रवीना पहली बार अपने पैरों पर खड़ी हुई थी, और आज – आज वह एक योद्धा थी।
वह बड़े भावुक और खुशी भरे मन से बेटी की ओर देखती है, उसकी आँखों में हल्के से आँसू आ जाते हैं और वह उसे गले से लगाते हुए कहती है, "मुझे तुम्हारी प्रतिभा पर कोई शक नहीं है मेरी बेटी, तुम मेरा नाम रोशन करोगी।" गीता की बाँहों में रवीना ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं, और माँ-बेटी का वह मिलन किसी मौन प्रार्थना से कम नहीं था।
कुछ समय तक बाहर चारों इसी तरह की बातें करते हैं – पुराने संस्मरण, इंदौर के समाचार, पारिवारिक किस्से। सुभाष ने बताया कि कैसे पिछले महीने गुरुकुल में एक बड़ी प्रतियोगिता हुई थी जिसमें रवीना ने तीन बड़े योद्धाओं को पराजित किया था। तभी सुरेश अपनी जेब में से एक पत्र निकालता है और रवीना को देते हुए कहता है, "यह पत्र विराज ने तुम्हारे लिए दिया है।" उस पत्र को देखते ही रवीना के चेहरे के भाव बदल गए। एक क्षण पहले वह माँ की गोद में खोई हुई बालिका थी, अब वह एक पत्नी बन गई जिसके मन में अपने पति के लिए अनेक भावनाएँ उठ रही थीं।
रवीना वह पत्र अपने पिता के हाथ से लेती है और अपने कमरे की तरफ चली जाती है। उसके कदम पहले धीमे थे, फिर तेज हो गए, मानो वह पत्र उसे कहीं दूर बुला रहा हो। कमरे का दरवाजा बंद होते ही, वह अकेले में उस पत्र को खोलने की प्रतीक्षा कर रही थी।
रवीना का दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था, पिछले 7 महीने से उन दोनों के बीच कोई भी बात नहीं हुई थी।
क्योंकि शादी के अगले दिन ही रवीना को जल्दबाजी में नालंदा गुरुकुल के लिए निकलना पड़ा था। वह शादी, जो उसके जीवन का सबसे सुखद दिन होना चाहिए था, वास्तव में एक विदाई का दिन बन गया था। विराज को केवल इतना कहने का अवसर मिला था – "जल्दी लौटना।"
वह धीरे-धीरे पत्र खोलती है। पत्र के शुरुआत में विराज ने उसके हाल-चाल के बारे में पूछा था और अपनी स्थिति के बारे में बताया था कि वह कैसे रह रहा है।
उसकी स्थिति के बारे में सुनकर रवीना को थोड़ा सा अफसोस हुआ, क्योंकि वह जानती थी कि अगर उसकी सगाई रवीना से नहीं हुई होती तो शायद उसकी मौजूदा स्थिति कुछ बेहतर हो सकती थी, पर रवीना की प्रतिभा के कारण हमेशा उसे दोषी ठहराया गया था कि वह उसके लायक नहीं है।
पत्र के अंत में विराज ने रवीना के लिए एक संदेश लिखा था। उस संदेश को पढ़ने से पहले ही रवीना को एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई, मानो कोई बड़ा तूफान आने वाला हो।
उसमें विराज ने कहा था, "अब समय आ गया है कि दुनिया को मेरे बारे में पता चले। मेरे परिवार, मेरे माता-पिता, जिस समय यह खुलेगा कि मैं कहां से हूं और किस परिवार से मेरा संबंध है, उस समय पूरे मगध साम्राज्य में भूकंप आ जाएगा। हर किसी की जबान पर केवल मेरा ही नाम होगा। उस समय इस मगध साम्राज्य में हमारे दुश्मनों की संख्या अनंत हो जाएगी। हर कोई मुझसे अपनी दुश्मनी निकालना चाहेगा, या किसी को खुश करने के लिए मुझे नुकसान पहुंचाना चाहेगा। इसीलिए मैं चाहता हूं कि अब से तुम केवल नालंदा गुरुकुल की सीमा में ही रहो, और किसी भी तरह से आचार्य विदुर के संरक्षण से बाहर मत जाना। अगर तुम आचार्य विदुर के संरक्षण से बाहर जाती हो, तो वे लोग मुझे नुकसान पहुंचाने के लिए तुम्हें अपना निशाना बना सकते हैं।"
पत्र को पूरी तरह से पढ़ने के बाद और विराज की चेतावनी पढ़ने के बाद रवीना का चेहरा थोड़ा उदास हो गया, बेशक वह विराज के अतीत के बारे में नहीं जानती थी कि वह किस परिवार से था, लेकिन उसके पिता ने उसे एक बार बताया था, कि विराज की पृष्ठभूमि इतनी महान है, कि मगध साम्राज्य तो छोड़ ही दो, अन्य साम्राज्यों की खूबसूरत लड़कियां भी उसकी दासी बनने के लिए तैयार हो जाएंगी। उस दिन उसने अपने पिता से पूछा था, "तो फिर वह यहाँ क्यों है? इतनी महान पृष्ठभूमि होते हुए भी वह इतने साधारण जीवन में क्यों जी रहा है?" उसके पिता ने केवल इतना कहा था, "कुछ लोग छिपना चुनते हैं, बेटी। तब तक जब तक उनका समय नहीं आता।"
उसके बाद से उसने कभी भी अपने पिता से यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि विराज का परिवार कौन सा है, बस उसे यह पता था कि समय आने पर विराज स्वयं अपने परिवार का नाम लेगा। और वह दिन, ऐसा लगता है, बहुत दूर नहीं था।
इधर रवीना अपने घर में अपने माता-पिता के साथ थी, उधर नालंदा गुरुकुल के अंदर ही आचार्य विदुर अपनी हवेली के हॉल में बैठकर फलों के रसों का जूस पी रहे थे। हॉल का वातावरण शांत और गंभीर था, जैसे कोई मंदिर हो। आचार्य विदुर एक साधारण सफेद वस्त्र पहने थे, उनके लंबे बाल सफेद हो चुके थे और उनके चेहरे पर वह चमक थी जो केवल वर्षों की साधना से आती है। दिखने में उनकी उम्र हमारी पृथ्वी के व्यक्ति के 50 या 55 साल के बराबर लगती थी, परंतु उनकी उम्र 200 साल थी। उनके शरीर पर बुढ़ापे का कोई चिह्न नहीं था; उनकी आँखें उतनी ही तीक्ष्ण थीं जितनी किसी युवा योद्धा की होती हैं, और उनकी आवाज में इतनी गहराई थी कि वह सीधे आत्मा से संवाद करती थी। रही बात उनकी ताकत की तो वह मगध साम्राज्य के शक्तिशाली 10 लोगों में गिने जाते थे। उनका साधना स्तर बहुत ऊंचा था, वह एक शक्तिमान योद्धा थे। उनकी उपस्थिति मात्र से ही हॉल में एक अदृश्य दबाव बना रहता था, जैसे कोई सिंह अपने क्षेत्र में विश्राम कर रहा हो।
उनके साथ इस समय हॉल में उनका सेवक किशन उनके बगल में खड़ा हुआ था। किशन एक मध्यम कद का व्यक्ति था, जिसके चेहरे पर संयम और धैर्य की रेखाएँ उकेरी गई थीं। उसने अपना पूरा जीवन आचार्य विदुर की सेवा में बिता दिया था, और उनसे उसने जो कुछ भी सीखा था, वह अमूल्य था। किशन भी एक साधक था, उसका साधना स्तर शक्ति सम्राट के अंतिम चरण में अटका हुआ था, और वह कभी भी महाशक्ति सम्राट योद्धा बन सकता था – बस आखिरी छलांग की आवश्यकता थी। परंतु वह छलांग उसके लिए बहुत कठिन साबित हो रही थी। उसने आचार्य विदुर से कई बार मार्गदर्शन माँगा था, परंतु आचार्य विदुर का कहना था कि कभी-कभी सबसे अंतिम कदम व्यक्ति को स्वयं ही उठाना पड़ता है।
किशन आचार्य विदुर का एक अधीनस्थ था, उनका मुख्य शिष्य नहीं था। वह स्वयं को भाग्यशाली मानता था कि उसे उनकी सेवा करने का अवसर मिला था। आचार्य विदुर के अब तक चार मुख्य शिष्य रहे थे, जिन्होंने साधना के मार्ग पर बहुत तरक्की की थी और मगध साम्राज्य को छोड़कर अपनी साधना के मार्ग पर आगे निकल गए थे और इस दुनिया की खोज में निकल चुके थे। उन चारों शिष्यों के बारे में कहा जाता था कि उन चारों ने प्रतिभा के मामले में अपने गुरु को भी पीछे छोड़ दिया था। उनके नाम आज भी पूरे मगध में श्रद्धा के साथ लिए जाते थे। उसके बाद आचार्य विदुर ने कभी भी किसी शिष्य को अपना मुख्य शिष्य नहीं बनाया, परंतु अचानक से डेढ़ महीने पहले उन्होंने रवीना को अपनी पाँचवी मुख्य शिष्या के रूप में चुन लिया था। यह निर्णय इतना अप्रत्याशित था कि पूरे गुरुकुल में हलचल मच गई थी।
यह चीज पूरे नालंदा गुरुकुल तो छोड़ ही दो, मगध साम्राज्य के लिए भी एक बहुत बड़ी बात थी। और किशन भी जानना चाहता था, कि आचार्य विदुर ने रवीना को मुख्य शिष्य क्यों बनाया, आज उसने हिम्मत करके आचार्य विदुर से इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए कहा, "आचार्य, आप मुझे क्षमा करें तो क्या मैं आपसे एक प्रश्न का उत्तर जान सकता हूं? मैं काफी समय से इस प्रश्न को लेकर काफी ज्यादा चिंतित हूं।"
आचार्य विदुर किशन की तरफ देखते हैं। वह जानते थे कि वह किसी प्रश्न से विचलित है, परंतु फिर भी उन्होंने मुस्कान दिखाते हुए उसे हाथ के इशारे से प्रश्न बोलने के लिए कहा।
किशन पूछता है, "मैं यह जानना चाहता हूं कि आपने इतने सालों के बाद रवीना को अपनी मुख्य शिष्या के रूप में क्यों स्वीकार किया?" यह प्रश्न पूछते ही उसने अपना सिर नीचे कर लिया, मानो उसने कोई अपराध कर दिया हो।
आचार्य विदुर अपने हाथ में पड़ा शरबत का प्याला नीचे रखते हैं और कहते हैं, "रवीना को चुनने की दो वजह थी। पहली वजह थी रवीना की प्रतिभा और उसके खून में जो शक्ति बहती है। वह कोई मामूली शक्ति नहीं है। हमारे ग्रह पर कुछ चुनिंदा लोगों में ही वह शक्ति पाई जाती है। वह लड़की अपने आप में एक नया खजाना है, जिसे पाने के लिए कोई भी साम्राज्य किसी भी हद तक जा सकता है।" उन्होंने आगे कहा, "वह शक्ति पीढ़ियों से छिपती आई है, और अब वह इस लड़की के माध्यम से फिर से जागृत होने वाली है। परंतु ऐसे खजानों का एक दुष्परिणाम भी होता है – जितने अधिक लोग इसे पाना चाहेंगे, उतने ही अधिक इसे नष्ट भी करना चाहेंगे।"
किशन को समझ में आ गया था कि उसके गुरु ने रवीना को क्यों चुना था। उसे पहले लगता था कि रवीना को उसकी प्रतिभा की वजह से चुना गया है, परंतु अब उसे पता चल गया था कि उसके खून में उपस्थित शक्ति के कारण उसके गुरु ने उसे चुना है। किशन ने सिर झुकाया, और उसके मन में एक नई समझ पैदा हुई – कि इस संसार में केवल परिश्रम ही सफलता नहीं दिलाता, कभी-कभी तो सफलता तुम्हारे रक्त में ही बहती है, और तुम्हें बस उसे पहचानने की देर होती है।
वहीं दूसरी ओर आचार्य विदुर आगे कहते हैं, "दूसरी वजह है उसका पति।" यह सुनकर किशन थोड़ा आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि उसने रवीना के परिवार के बारे में जानकारी हासिल कर ली थी, और उसे पता चला था कि उसका पति एक गोद लिया हुआ बेटा है, जिसका पालन पोषण बचपन से रवीना के परिवार में किया गया है, और उसकी साधना का स्तर शून्य था। उसने सोचा, ‘एक शून्य स्तर का साधक, जो एक दत्तक पुत्र भी है – वह कितना बड़ा प्रभाव डाल सकता है?’ परंतु उसने अपना संशय मन में ही रखा।
आचार्य विदुर यह देखकर मुस्कुराए और उन्होंने आगे बताते हुए कहा, "जब उस लड़के की सच्चाई दुनिया के सामने आएगी, तो वह एक ज्वालामुखी के समान होगी, जिसका प्रभाव केवल हमारे एक साम्राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के साम्राज्यों तक में बिखर जाएगा। हर कोई उसकी चपेट में आ जाएगा। क्योंकि वह लड़का कोई साधारण व्यक्ति नहीं है – वह उस वंश का अंतिम प्रतिनिधि है, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह कभी नष्ट नहीं होगा। और आज, वह एक साधारण परिवार में छिपा हुआ है। वह तूफान आने वाला है, किशन। और हमें तैयार रहना होगा।"
"आज तुम्हें यह सच्चाई पता चल गई है, तो मैं तुम्हें एक कार्य देता हूं। तुम्हें गुप्त रूप से, समय पड़ने पर, रवीना के पति विराज को वे जानकारियाँ पहुँचानी होगी जिसकी उसे आवश्यकता हो। यह तुम्हारे लिए बहुत मामूली काम है।" आचार्य विदुर ने यह कार्य ऐसे सौंपा जैसे कोई साधारण काम हो, परंतु किशन जानता था कि कोई भी कार्य जो आचार्य विदुर देते हैं, वह साधारण नहीं होता।
बेशक आचार्य विदुर की बातों को सुनकर किशन आश्चर्यचकित था, पर वह यह जानता था कि उसके आचार्य विदुर अगर कह रहे हैं तो विराज की पृष्ठभूमि वाकई में बहुत भयानक होगी। उसने एक बार फिर सिर झुकाया और मन ही मन सोचा, ‘यह विराज कौन है, जिसका नाम सुनकर आचार्य विदुर जैसे महान योद्धा भी गंभीर हो जाते हैं? और उस लड़के के सामने आने से पूरा मगध साम्राज्य क्यों हिल जाएगा?’ उसके पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं थे, परंतु उसे यह विश्वास था कि समय ही उसे सब कुछ दिखा देगा। और तब, वह उस तूफान का साक्षी होगा – या तो उसका भागीदार।