सूर्यकुल का सूर्यास्त - 7 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 7

अध्याय 7 ठोस नींव का सिद्धांत

सभा भवन से आने के बाद विराज अपने घर के आंगन में आ गया। शाम को जब नौकर रामू उसके घर में खाना बनाने और घर के काम करने के लिए फिर से आया, तब विराज ने रामू से पूछा—"घर में कितने दिन का राशन बचा हुआ है?"

विराज की आवाज़ में एक सामान्य जिज्ञासा थी, मानो वह केवल एक रोज़मर्रा के हिसाब-किताब का प्रश्न पूछ रहा हो।

रामू के चेहरे पर न तो कोई आश्चर्य था, न ही कोई घबराहट—बल्कि एक अजीब सी शांति थी, मानो वह इस प्रश्न के लिए पहले से ही तैयार था।

क्योंकि सुरेश को पहले से ही इस बात की शंका थी कि जब वह इंदौर शहर में नहीं होगा, तो उसके परिवार के अन्य सदस्य जो उससे मन ही मन नफरत करते हैं, वे विराज पर अपना गुस्सा निकालेंगे और उसे तरह-तरह से परेशान करेंगे। सुरेश ने देखा था कि कैसे शक्ति के मोह ने उसके ही भाइयों को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया था। 

इसलिए, इन सब से पहले ही सुरेश ने पूरी तैयारी कर दी थी। और इसके लिए उन्होंने रामू को सारे निर्देश दे दिए थे। रामू कोई साधारण नौकर नहीं था—वह वही था जिसने सुरेश के सबसे कठिन दिनों में भी उसका साथ नहीं छोड़ा था। इसीलिए सुरेश ने रामू को ही विराज की सेवा में हमेशा लगाए रखा था।

रामू ने एक गहरी सांस ली, और पूरे आदर के साथ कहा—"छोटे मालिक, आपके ससुर बड़े मालिक सुरेश ने पहले ही मुझे साल भर की तनख्वाह दे दी है।" रामू की आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी। "और घर में एक साल के राशन का इंतज़ाम कर दिया है।"

विराज ने यह सुनकर अपनी भौंहें थोड़ी ऊपर उठाईं। सुरेश ने इतनी दूरदर्शिता दिखाई थी।

फिर रामू ने धीरे-धीरे अपनी जेब में हाथ डाला। और फिर, उसने अपनी झोली वाली जेब के अंदर से एक छोटी सी, पीतल की चमकती हुई चाबी निकाली। 

रामू ने वह चाबी विराज के सामने बढ़ाते हुए कहा "बड़े मालिक को पता था कि एक दिन आप मुझसे यही प्रश्न पूछेंगे। उसके लिए उन्होंने मुझे यह चाबी दे रखी थी और कहा था—'रामू, जिस दिन छोटे मालिक तुमसे पूछें कि घर में कितने दिन का राशन बचा है, उसी दिन तुम यह चाबी उन्हें दे देना।' उन्होंने मुझसे कहा था कि यह चाबी ऊपर वाले कमरे की है।"

यह सुनने के बाद विराज को एहसास होता है कि सुरेश उसके लिए काफी ज्यादा वफादार था। 

विराज ने चाबी को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया और कहा—"धन्यवाद, रामू।"

रामू ने सिर झुकाया और विनम्रता से बोला—"मैं तो केवल अपने मालिक का आदेश का पालन कर रहा हूँ, छोटे मालिक।"

विराज चाबी लेकर अपने घर के ऊपर की मंजिल पर जाता है। और वहां पहुंचकर चाबी को ताले में डाला, एक साफ-सुथरी 'क्लिक' की आवाज़ आई, और दरवाजा खुल गया।

विराज कमरे को खोलकर अंदर चला जाता है।

जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा। कमरा पूरी तरह से विराज की जरूरत की चीजों से भरा हुआ था। एक बड़ी सी लकड़ी की अलमारी थी, उस अलमारी के भीतर कई कपड़े भरे हुए थे। इसके अलावा, कमरे के एक कोने में चमड़े के जूतों की एक पूरी कतार थी, विभिन्न अवसरों के लिए। दूसरे कोने में यात्रा के लिए कई सारी जरूरत मंद सामान रखे थे।

उस कमरे में खड़े होकर विराज ने चारों ओर देखा। उसकी दृष्टि हर वस्तु पर एक-एक करके टिकती गई। फिर, अचानक, उसकी नज़र कमरे के बीच की टेबल पर रखे संदूक पर पड़ती है।

फिर विराज ने संदूक को अपने दोनों हाथों से पकड़ा—वह काफी भारी था। वह संदूक को खोलता है तो उसमें उसे सोने के सिक्के दिखाई देते हैं। सिक्कों की चमक से पूरा कमरा एक पल के लिए और भी उज्जवल हो गया। 

विराज ने धीरे-धीरे सिक्कों को गिनना शुरू किया—पहले दस, फिर पचास, फिर एक सौ। सिक्कों की एक-एक परत उठाते ही नीचे और सिक्कों की चमक निकलती जा रही थी। जब उसने लगभग गिनना समाप्त किया, तो ये 500 सोने के सिक्के थे।

अगर देखा जाए तो विराज इस समय जिस तरह का जीवन जी रहा था, उसके लिए दस सोने के सिक्के प्रति माह पर्याप्त थे।

उसने संदूक का ढक्कन बंद किया, सिक्कों को फिर से उसी तरह रख दिया जैसे वह पहले रखे हुए थे।

सभी चीजों का आकलन करने के बाद विराज फिर से कमरे से बाहर निकल जाता है। वह सीढ़ियों से नीचे उतरा, और फिर से उस आंगन में आकर खड़ा हो गया। 

अगले दिन भोर होते ही एक सामान्य घोड़े पर सवार होते हुए, विराज इंदौर शहर से बाहर घने जंगल की ओर शिकार के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के शहर के फाटक की ओर बढ़ रहा था। विराज ने जानबूझकर कोई शानदार या नस्ली घोड़ा नहीं चुना था, क्योंकि उसे किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं करना था। उसका उद्देश्य था—चुपके से, शांतिपूर्वक, बिना किसी बाधा के अपने मार्ग पर बढ़ना।

वैसे तो विराज को न तो राशन की जरूरत थी, न अपने नौकर रामू को तनख्वाह देने की जरूरत थी, और उसका जीवन यापन करने के लिए भी उसके पास पर्याप्त धन थे। उसके पास संदूक में 500 से अधिक सोने के सिक्के थे, जो एक सामान्य व्यक्ति को चार-पाँच साल तक आराम से गुजारने के लिए काफी थे। रामू को सुरेश ने पहले ही एक साल की तनख्वाह दे दी थी, और घर में राशन भी एक साल के लिए पर्याप्त मात्रा में संग्रहीत था। देखा जाए तो विराज को इस समय आर्थिक रूप से किसी भी प्रकार की कोई चिंता नहीं थी—न भूख की, न कपड़े की, न आश्रय की।

परंतु साधना के मार्ग में इतना धन बिल्कुल भी मायने नहीं रखता है। लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और भी है।

साधना के मार्ग में बढ़ने के कई तरीके होते हैं। बहुत सारे लोग अपनी साधना को जल्दी-जल्दी बढ़ाकर ऊँचाइयों पर पहुँचना चाहते हैं, जिससे वे अधिक ताकतवर हो जाएँ—शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से, या आध्यात्मिक रूप से। वे ऊँचे स्तर की साधना के बारे में सुनते हैं, उनके मन में उन ऊँचाइयों तक पहुँचने की ललक पैदा हो जाती है, और वे अपनी वर्तमान स्थिति को छोड़कर झटपट आगे बढ़ने की कोशिश करने लगते हैं। वे सोचते हैं कि जितनी तेज़ी से वे आगे बढ़ेंगे, उतनी ही शीघ्रता से वे महानता को प्राप्त कर लेंगे। परंतु यह तरीका बिल्कुल गलत है।

विराज अपने पुराने जीवन में भी ऐसी बहुत सारी गलतियाँ कर चुका था। वह भी साधना के उच्चतम मार्ग पर पहुँचना चाहता था, इसीलिए वह जल्दी-जल्दी साधना के मार्ग पर आगे बढ़ता जा रहा था—बिना सोचे-समझे, बिना यह विचार किए कि एक ठोस साधना एक तीव्र साधना से कहीं ज्यादा बेहतर होती है। उस समय उसे यह बात समझ में नहीं आई थी—उसे लगता था कि सफलता केवल इस बात में है कि तुम कितनी जल्दी पहुँच गए, न कि इस बात में कि तुम कितने मज़बूत होकर पहुँचे।

आप इसे इस तरह समझ सकते हैं कि एक इमारत को बनाने के लिए आप चार स्तंभों पर उसकी पहली मंजिल बना सकते हैं। ये चार स्तंभ एक सामान्य इमारत के लिए पर्याप्त होते हैं, जब तक कि इमारत पर कोई अतिरिक्त दबाव न पड़े। फिर, इसी तरह, आप उस पहली मंजिल पर चार और स्तंभ लगाकर दूसरी मंजिल बना सकते हैं। तीसरी मंजिल के लिए फिर से चार स्तंभ, और चौथी मंजिल के लिए भी चार स्तंभ। दिखने में यह इमारत काफी ऊँची और भव्य दिखाई देगी—चार मंजिल, सीधी खड़ी हुई, शायद पूरे इलाके में सबसे ऊँची। लोग उसे देखकर वाह-वाह करेंगे, उसकी प्रशंसा करेंगे, और उस इमारत के मालिक को बधाई देंगे कि उसने इतनी अद्भुत संरचना खड़ी कर दी।

परंतु जब यह चार मंजिला इमारत एक ऐसी एक मंजिला इमारत से टकराती है, जिस पर चार स्तंभों के बजाय बीस स्तंभ लगे हों, तो क्या होगा? शायद पहली नज़र में कोई यही सोचेगा कि चार मंजिला इमारत तो ऊँची है, वह एक मंजिला को आसानी से कुचल देगी। परंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है। चार मंजिला ऊँची इमारत पूरी तरह से तहस-नहस हो जाएगी। उसके स्तंभ टूट जाएँगे, उसकी दीवारें चटक जाएँगी, और वह इमारत अपने ही मलबे में तब्दील हो जाएगी। जबकि उस सामने वाली एक मंजिला इमारत बिना हिले-डुले वैसे ही खड़ी रहेगी, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

क्योंकि बेशक चार मंजिला इमारत का ढाँचा बहुत ऊँचा था, वह बहुत ऊँची दिखाई देती थी, परंतु उसके स्तंभ बहुत कमज़ोर थे, और उसमें बहुत सारी कमियाँ थी जो बाहर से दिखाई नहीं दे रही थीं। बस उसकी भव्यता उसकी चार मंजिले थीं—एक बाहरी आवरण, जिसके पीछे एक खोखलापन छिपा था। उस इमारत के स्तंभ केवल नाममात्र के थे, उनमें कोई गहराई नहीं थी, कोई मजबूती नहीं थी। वे केवल इसलिए खड़े थे क्योंकि अभी तक कोई झटका नहीं आया था। जैसे ही कोई वास्तविक शक्ति उनसे टकराती, वे धराशाई हो जाते।

जबकि उसके सामने की इमारत केवल एक मंजिला थी, जो चार मंजिला इमारत के सामने बहुत ही छोटी, साधारण, और नगण्य दिखाई दे रही थी। एक नज़र से देखने वाला उसे कोई महत्व नहीं देता, उसे अनदेखा कर देता। परंतु उस एक मंजिला इमारत में बीस स्तंभ लगे हुए थे—प्रत्येक स्तंभ मोटा, गहरा, उसके नींव तक गढ़ा हुआ। वे बीस स्तंभ मिलकर उस छोटी-सी इमारत को इतनी अधिक ताकत प्रदान कर रहे थे कि वह अपने से कहीं ज्यादा ऊँची दिखाई देने वाली उस चार मंजिला इमारत को भी आसानी से धराशायी कर सकता था। उस एक मंजिला इमारत को हिलाने के लिए किसी बहुत बड़ी शक्ति की आवश्यकता होती, क्योंकि उसकी नींव उसकी सूरत से कहीं अधिक गहरी थी।

यही तरीका साधना के अंदर भी पाया जाता था। ज्यादातर लोग साधना में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित रहते थे—उनका पूरा ध्यान साधना के नए स्तरों को प्राप्त करने की ओर होता था। वे सोचते थे कि जितना ऊँचा वे जाएँगे, उतने ही शक्तिशाली बन जाएँगे। वे अपनी वर्तमान अवस्था में कभी संतुष्ट नहीं होते थे, हमेशा आगे और आगे बढ़ने की होड़ में लगे रहते थे। लेकिन इस प्रक्रिया में, वे अपने आधार को मजबूत करना भूल जाते थे। उनके पास तो बहुत सारी मंजिलें थीं, लेकिन हर मंजिल के नीचे केवल चार-चार कमजोर स्तंभ थे। उनकी साधना ऊँची तो थी, परंतु जैसे ही कोई बड़ी परीक्षा आती—जैसे ही कोई प्रबल विरोधी, कोई कठिन परिस्थिति, या कोई आतंरिक दुविधा उत्पन्न होती—वे टूट जाते थे। उनकी सारी ऊँचाई, उनकी सारी प्रगति, धूल में मिल जाती थी।

जबकि साधना के मार्ग में अपनी साधना के स्तर को हमेशा मजबूत करना अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए। स्तर कितना भी नीचे क्यों न हो, परंतु यदि वह स्तर ठोस और दृढ़ है, तो वह अंततः उस ऊँचे स्तर पर पहुँचने वालों को भी पीछे छोड़ सकता है। यही असली रहस्य है—क्षणिक लाभ का लालच छोड़कर, स्थायी सार को पकड़ना। यही कारण है कि कई बार देखा जाता है कि एक धीमे गति से लेकिन गहरी साधना करने वाला साधक, एक तेज गति से लेकिन उथली साधना करने वाले साधक को बहुत आसानी से पराजित कर देता है, भले ही बाहर से तेज साधक अधिक शक्तिशाली दिखता हो।

लोगों को यह ज्ञान बहुत बाद में जाकर मालूम पड़ता है, जब उनके सामने वह क्षण आता है जहाँ उनकी सारी साधना—जिसे बनाने में उन्होंने वर्षों लगा दिए—एक झटके में ढह जाती है। लेकिन जब तक उन्हें यह समझ में आता है, तब तक उनके लिए समय निकल चुका होता है। वे पीछे मुड़कर नहीं देख सकते, केवल अपने टूटे हुए स्तंभों के बीच खड़े हुए पछता सकते हैं कि काश उन्होंने थोड़ा धीमा किया होता, काश उन्होंने अपनी नींव को मजबूत किया होता।

विराज का तो पुनर्जन्म हुआ था। उसके पास अपने पुराने जीवन की पूरी यादें थीं—हर सफलता, हर असफलता, हर वह मोड़ जहाँ उसने गलत रास्ता चुन लिया था। उसने उन गलतियों को अपनी आँखों से देखा था, अपने जीवन में महसूस किया था, और उनके परिणामों को अपने पूरे अस्तित्व में झेला था। इसलिए वह इस बार वही गलतियाँ दोबारा नहीं दोहराना चाहता था।

उसका पूरा ध्यान इस समय अपनी साधना को अधिक से अधिक स्थिर करके, मजबूत करके, आगे बढ़ने पर था। वह नहीं चाहता था कि यह जीवन भी पिछले जीवन की तरह अधूरा रह जाए—ढेर सारी मंजिलें, लेकिन कोई ठोस नींव नहीं। उसने ठान लिया था कि वह अपनी साधना के हर स्तर को पूरी तरह से पक्का करेगा, चाहे उसे उस पर कितना भी समय क्यों न लगाना पड़े। धीमा होना उसके लिए कोई समस्या नहीं थी, जब तक उसकी प्रगति वास्तविक और अटल थी।

जिसके लिए उसे अधिक ज्यादा संसाधनों की जरूरत पड़ती। क्योंकि एक ठोस आधार बनाने के लिए केवल समय और परिश्रम ही पर्याप्त नहीं थे—उसके लिए आवश्यक थे बाहरी साधन भी।

और उन संसाधनों को हासिल करने के लिए, उसके पास जो 500 सोने के सिक्के थे, वह पर्याप्त नहीं थे। ये सिक्के एक साधक के लिए केवल एक महीने की वस्तुएँ ही खरीद पाते। और उसके बाद, वह फिर से खाली हाथ हो जाता। इसलिए उसे एक ऐसा नियमित स्रोत चाहिए था जो उसे लगातार संसाधन दे सके—जैसे कोई नदी, जो कभी सूखती नहीं।

इसीलिए उसे जंगल में जाकर आध्यात्मिक जीवों का शिकार करना था, उन जीवों को बेचकर उनके बदले आध्यात्मिक सामग्रियाँ हासिल करनी थीं।

इसके लिए विराज ने रामू से पहले ही कह दिया था कि वह कुछ दिनों के लिए जंगल में शिकार के लिए जा रहा है। और उसने रामू को साफ-साफ निर्देश दे दिए थे—"रामू, यदि इस दरमियान कोई भी मेरे बारे में पूछता है, या कोई मुझसे मिलने आता है, तो उसे बाहर से ही जाने के लिए कह देना। मैं अभी किसी से मिलना नहीं चाहता। यह उन्हें बता देना। क्योंकि मैं नहीं चाहता हूं, कि किसी को पता चले कि मैं शिकार के लिए गया हूं।"

रामू ने विराज की इस आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार किया था। उसने कोई प्रश्न नहीं पूछा, कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई। रामू इतना समझदार था कि वह सब कुछ समझता था। 

घर से निकलने से पहले विराज ने एक अच्छी शिकारी वाली पोशाक पहन रखी थी। यह पोशाक ऊपर वाले कमरे में रखी हुई थी, उसी कमरे में जहाँ सुरेश ने विराज के लिए सब कुछ संजोकर रखा था। 

इसके साथ उसने भंडारण अंगूठी भी अपनी उंगली में पहन रखी थी, जिसमें उसने अपने लिए काफी सारे सामान रखे हुए थे। 

इसके अलावा, विराज ने अपनी कमर में एक आध्यात्मिक तलवार बाँध रखी थी। यह एक निम्न लेवल की आध्यात्मिक तलवार थी। इसका ब्लेड लगभग ढाई फुट लंबा था, और उस पर कुछ रून्स उकेरे गए थे—जो प्रकाश को एकत्र करके उसे काटने की क्षमता में बदल देते थे। इसका हथा चमड़े में लिपटा था, जिससे पकड़ मजबूत हो जाती थी। यह तलवार किसी महान योद्धा या साधक का अस्त्र नहीं थी; यह केवल एक सामान्य, प्रारंभिक स्तर की तलवार थी, जो बाजार में कुछ सोने के सिक्कों में मिल जाती थी।

विराज के अभी के स्तर को देखते हुए, यह निम्न लेवल की आध्यात्मिक तलवार उसके लिए पर्याप्त थी। उसे अभी किसी ऊँचे स्तर के अस्त्र की आवश्यकता नहीं थी—न तो उसकी साधना इतनी उन्नत थी, न ही उन जीवों की जिनका वह शिकार करने वाला था, वे इतने शक्तिशाली थे जिनके लिए उच्चस्तरीय अस्त्र की आवश्यकता पड़े। एक साधारण आध्यात्मिक तलवार, उसकी स्वयं की साधना के साथ मिलकर, उसके लिए पर्याप्त सुरक्षा और आक्रमण क्षमता प्रदान करती थी।

विराज ने पीछे मुड़कर शहर की दीवार की ओर देखा, और एक बार अपने घर की ओर सिर उठाकर देखा। वह जानता था कि वह कुछ दिनों तक वापस नहीं लौटेगा। 

उसने अपनी कमर में बँधी तलवार को एक बार सहलाया, अपनी अंगूठी में संग्रहीत सामानों को मानसिक रूप से एक बार पुनः सूचीबद्ध किया, और अपनी साधना की स्थिरता को महसूस किया। फिर, उसने अपने घोड़े को थोड़ी तेज गति देने का संकेत दिया, और दोनों—साधक और उसका घोड़ा—घने जंगल की ओर बढ़ गए, जहाँ दिन का प्रकाश अभी तक पेड़ों के घने मुकुटों को भेद नहीं पाया था। जंगल उन्हें अपने अंदर समा रहा था, मानो कोई विशाल हरा द्वार उनके लिए खुल गया हो।