सूर्यकुल का सूर्यास्त - 4 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 4

अध्याय 4 आध्यात्मिक सागर की नींब

इस समय विराज आंगन में अकेला खड़ा था। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था, केवल कभी-कभार हवा का हल्का झोंका पेड़ों की पत्तियों को सरसरा देता था। 

तभी वह फिर से उसी पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया जहाँ वह पहले बैठा था। विराज ने अपनी आँखें बंद कीं, गहरी साँस ली, और संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल करने लगा। उसके शरीर का हर रोम, हर अणु, इस साधना के लिए तड़प रहा था—मानो वह जानता हो कि अब समय आ गया है।

विराज के पुराने जन्म में उसके सूर्यकुल में दो साधना विधियों का इस्तेमाल किया जाता था। उनकी साधना विधियाँ सदियों के तप और परिश्रम का परिणाम थीं, जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा गया था।

पहली साधना विधि का नाम था सूर्य साधना विधि, और दूसरी साधना विधि थी पूर्ण सूर्य साधना विधि। सूर्यकुल में पहली साधना विधि—सूर्य साधना विधि—हर किसी को सिखाई जाती थी, चाहे वह साधारण योद्धा ही क्यों न हो। यह मूलभूत विधि थी, जिससे हर कोई अपनी साधना की शुरुआत करता था। लेकिन दूसरी साधना विधि, जिसका नाम पूर्ण सूर्य साधना विधि था, वह विशेष योद्धाओं को सिखाई जाती थी—उन्हें जो अपने कुल के लिए कुछ असाधारण करने के लिए चुने गए थे।

विराज के पुराने ग्रह—बृहस्पति ग्रह पर पूर्ण सूर्य साधना विधि सबसे उत्कृष्ट विधि मानी जाती थी। उसके बारे में यहाँ तक कहा जाता था कि इससे ज्यादा अच्छी साधना विधि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई नहीं थी। यह वह विधि थी जिसने सूर्यकुल के महानतम योद्धाओं को निर्मित किया था, जिसने साम्राज्यों की नींव हिला दी थी।

परंतु सत्य कुछ और ही था। विराज ने जब मृत पूर्वजों की परीक्षा दी थी—वह परीक्षा जिसमें केवल चुनिंदा योद्धा ही सफल हो पाते थे, जो साधना के अत्यंत दुर्गम पड़ावों को पार करने के बाद ही मिलती थी—उसमें उसके परिणामस्वरूप उसे कई सारे इनाम हासिल हुए थे। वे इनाम ऐसे थे जिनके बारे में सुनकर सामान्य योद्धाओं की आँखें फटी की फटी रह जातीं।

उसमें से एक इनाम के रूप में उसे सूर्यकुल के मृत पूर्वजों ने संपूर्ण सूर्य साधना विधि दी थी। यह वह विधि थी जो पूर्ण सूर्य साधना विधि से भी ऊपर थी—जो समय की परतों में कहीं खोई हुई थी। मृत पूर्वजों ने स्वयं विराज को यह विधि दी थी, उसके अद्वितीय पराक्रम और अटूट संकल्प को देखते हुए।

उस समय से, अपने पुराने जीवन में, विराज ने पूर्ण सूर्य साधना विधि को छोड़कर संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल करने लगा। यह कोई साधारण बदलाव नहीं था—यह उसके साधना मार्ग का एक ऐसा मोड़ था, जिसने उसके भविष्य को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। जैसे कोई साधारण तलवार को छोड़कर अमर तलवार को थाम ले।

जिससे उसकी साधना में बहुत तेजी से तरक्की हुई। जितनी तेजी से बिजली आसमान को चीरती है, उससे कहीं अधिक तेजी से विराज की साधना के आयाम बढ़ने लगे। परंतु यह साधना विधि उसकी प्रारंभ में हुई गलतियों को सुधार नहीं पायी। क्योंकि मिट्टी के बर्तन को तोड़कर नया बनाना तो संभव है, परंतु उस बर्तन की प्रारंभिक कमियों को उस पर सोना चढ़ाकर नहीं मिटाया जा सकता।

इसका अर्थ यह निकलता है कि जब विराज ने साधना शुरू की थी तो उसने पूर्ण सूर्य साधना विधि के कारण इसकी नींव में ही कई सारी कमियाँ आने दी थीं। वह उन गलतियों को बाद में कभी सुधार नहीं सका, क्योंकि प्रारंभ की गलतियाँ इतनी गहरी होती हैं कि वे समय के साथ और अधिक मजबूत हो जाती हैं—जैसे पेड़ की जड़ें जमीन में और अधिक गहरी उतरती जाती हैं।

संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल प्रारंभ में हुई कमियों को दूर नहीं कर सका था। वह तो केवल एक अत्यंत शक्तिशाली विधि थी, कोई चमत्कारिक जड़ी-बूटी नहीं। यदि नींव ही कमजोर हो, तो चाहे तुम उस पर महल ही क्यों न खड़ा कर दो, वह एक दिन ढह जाता है।

लेकिन अब विराज के पास बहुत अच्छा मौका था। क्योंकि अब वह फिर से साधना के मार्ग पर चलने वाला था—एक नई शुरुआत, एक स्वच्छ स्लेट। उसके सामने ऐसा अवसर था जो बहुत कम लोगों को मिलता है: जीवन में दूसरा मौका। और वह अपनी नींव का पहला पत्थर रखने वाला था। इस बार वह कोई गलती नहीं करेगा, क्योंकि उसे पता था कि पहले कहाँ चूक हुई थी। वह उन सब सीखों को समेटे हुए था, जो उसके पिछले जन्म के अंतिम क्षणों ने उसे दी थीं।

इस समय से अगर वह संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल करता है—सही तरीके से, बिना किसी जल्दबाजी के, बिना किसी कमी के—तो उसकी नींव से उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा उसके पुराने जन्म की विराज की आध्यात्मिक ऊर्जा से बहुत ज्यादा उत्कृष्ट और भयानक होगी। यह कोई साधारण अंतर नहीं होगा; यह वह अंतर होगा जैसे आकाश और पाताल का। उसकी नई आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी शुद्ध और शक्तिशाली होगी कि उसके सामने उसके पुराने जन्म की सारी उपलब्धियाँ केवल एक धूमिल परछाई मात्र रह जाएँगी।

इसका मतलब यहाँ यह होगा कि जैसे-जैसे इस जन्म में विराज की उम्र बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे अगर उसके पुराने जन्म से उसकी उम्र की तुलना की जाए, तो इस समय का विराज कहीं ज्यादा शक्तिशाली होगा। यहाँ तक कि उसी उम्र में, जब पुराने जन्म में वह संघर्ष कर रहा था, इस जन्म में वह युद्ध के मैदान में अजेय साबित होगा। उसकी प्रत्येक साधना, प्रत्येक साँस, उसे उस ऊँचाई की ओर ले जा रही थी, जहाँ से उतरना असंभव था।

पूरे छह घंटे बाद संपूर्ण सूर्य साधना विधि का लगातार इस्तेमाल करने के बाद विराज अपनी जगह से खड़ा होता है। छह घंटे—वह समय जो एक सामान्य व्यक्ति के लिए नींद, भोजन, या दिनचर्या का कोई साधारण हिस्सा होता है—विराज के लिए वह किसी युद्ध से कम नहीं था। उसके शरीर का हर अंग, हर मांसपेशी, हर नाड़ी, इस साधना की तपिश को भली-भाँति महसूस कर रही थी। परंतु जब वह खड़ा हुआ, तो उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी—वह मुस्कान जो केवल वही व्यक्ति दे सकता है, जिसने अपने ही सीमाओं को पार कर लिया हो।

वह महसूस कर पा रहा था कि उसके शरीर में आध्यात्मिक सागर बन चुका था। यह कोई रूपक नहीं था—यह वास्तविकता थी। उसके अन्दर, उसके हृदय से लेकर उसके मस्तिष्क तक, नाड़ियों के उस जाल में जहाँ साधारण मनुष्य केवल खालीपन या अराजकता महसूस करते हैं, वहाँ अब एक शांत, गहरा, और अथाह सागर विद्यमान था। वह सागर किसी सामान्य जल से नहीं, बल्कि शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ था।

उसका आध्यात्मिक सागर इस समय एक बाल की मोटाई के बराबर था। सुनने में यह बहुत छोटा लग सकता है—इतना छोटा कि कोई सामान्य व्यक्ति इसपर हँस भी दे। परंतु यह वह बाल नहीं था जो सिर पर उगता है; यह वह सूक्ष्मता थी, जिसका अर्थ केवल वही समझ सकता है, जिसने साधना के गहरे रहस्यों को छुआ हो। एक बाल की मोटाई का सागर—परंतु उसके अंदर उपस्थित आध्यात्मिक ऊर्जा शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा थी। शुद्धता का वह स्तर कि उसके सामने अन्य सभी साधकों की ऊर्जा गंदे पानी की तरह थी।

जिसकी तुलना इस संसार में किसी से भी नहीं की जा सकती थी। कोई राजा, कोई योद्धा, कोई ऋषि, कोई भी—विराज की इस ऊर्जा को देखता या महसूस करता, वह चकित रह जाता। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। यह सत्य था। क्योंकि विराज के पास अब वह ज्ञान था, और वह विधि थी जो उसके कुल में भी केवल किंवदंती थी। उसने दोनों को मिला दिया था—और परिणाम कुछ ऐसा था जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

अब विराज को मूल लड़ाई की तकनीक पर ध्यान देना था। उसका आध्यात्मिक सागर बन चुका था और धीरे-धीरे यह विकसित होगा—जैसे एक छोटा पौधा बढ़कर विशाल वृक्ष बन जाता है, उसी प्रकार उसका सागर भी फैलेगा, गहरा होगा, और अधिक शक्तिशाली बनेगा। परंतु मार्शल आर्ट ऐसी कोई चीज नहीं थी जिसे बिना अभ्यास के हासिल किया जा सकता था। जैसे कोई व्यक्ति तलवार के हर रहस्य को जानता हो, परंतु जब तक वह तलवार को हाथ में लेकर नहीं घुमाता, तब तक वह योद्धा नहीं बन सकता। ज्ञान केवल आधा रास्ता है; दूसरा आधा केवल पसीने और रक्त से ही पूरा होता है।

बेशक विराज के पुराने जन्म में उसकी मार्शल आर्ट बहुत ही उच्च कोटि की थी, और वह लड़ाई में उसकी मार्शल आर्ट का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता था—उसकी हर चाल, हर प्रहार, हर बचाव में सदियों का अनुभव झलकता था। परंतु यह सब उसके पुराने शरीर के साथ था। वह शरीर, जो उस अनुभव का अभ्यस्त था, जिसकी मांसपेशियों को उन गतियों की आदत थी, जिसकी हड्डियाँ अथक अभ्यास से ढली थीं।

बेशक उसे लड़ाई की कई सारी तकनीकें आती थीं। उसके पास वह ज्ञान था जिसे पाने में सामान्य योद्धा जीवन भर लगा देते। वह संसार के हर प्रकार के युद्ध के बारे में जानता था—एक-पर-एक से लेकर सेनाओं के बीच महायुद्ध तक। परंतु उसका यह नया शरीर उन लड़ाइयों को लड़ने के लिए सक्षम नहीं था। यह एक साधारण कारण था: जिस तरह एक शेर के बच्चे में शुरू में वह शक्ति और चपलता नहीं होती जो एक वयस्क शेर में होती है, उसी प्रकार विराज का यह नया, किशोर शरीर अभी उस विकास के शिखर पर नहीं पहुँचा था। बेशक उसका यह शरीर ताकत में मजबूत था—जो की एक सामान्य व्यक्ति भी अपनी उम्र में होता है—परंतु मार्शल आर्ट ऐसी चीज है जिसको आपके ज्ञान होने के बाद भी आप उसका लड़ाई में संपूर्ण इस्तेमाल तब तक नहीं कर सकते, जब तक आपने उसके साथ अभ्यास न किया हो। यह ज्ञान का प्रश्न नहीं है; यह शरीर के प्रशिक्षण का प्रश्न है। तुम चाहे जितनी भी पुस्तकें पढ़ लो तैरने की, जब तक तुम पानी में नहीं कूदोगे, तब तक तुम तैर नहीं सकते।

निरंतर अभ्यास ही मार्शल आर्ट और आपके शरीर के बीच संतुलन स्थापित करता है। जितना अधिक तुम अभ्यास करोगे, उतना ही तुम्हारा शरीर उन गतियों, उन चालों, उन प्रहारों को अपना लेगा। धीरे-धीरे, यह तुम्हारे शरीर का हिस्सा बन जाएगा—उतना ही स्वाभाविक जितना साँस लेना। और तभी तुम उस ज्ञान का पूरा लाभ उठा सकते हो।

इस जन्म का पुराना विराज भी मार्शल आर्ट का अभ्यास करता था—जैसे अन्य योद्धा करते थे। उसके पास कुछ बुनियादी चालों का ज्ञान था, कुछ सरल प्रहारों और बचावों का। परंतु उसका मार्शल आर्ट का अभ्यास कितना भी अधिक क्यों न हो, वह उत्कृष्ट नहीं था। यह उस लड़ाई की तुलना में कुछ भी नहीं था जो विराज ने अपने पुराने जन्म में लड़ी थी। वहाँ वह एक योद्धा था; यहाँ वह केवल एक साधारण किशोर था—या कम से कम, बाहरी तौर पर ऐसा ही लगता था।

परंतु आज उसके पास अभ्यास करने के लिए समय नहीं था, क्योंकि सूर्यास्त होने का समय हो गया था और उसका नौकर रामू किसी भी समय घर में आ सकता था। इसीलिए उसने निश्चय किया कि वह कल से मार्शल आर्ट का अभ्यास प्रारंभ करेगा—सूर्योदय के साथ, नए जोश और नए संकल्प के साथ।

अगले दिन भोर में उठते ही—विराज सबसे पहले संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल करता है। आध्यात्मिक सागर का विकास उतना ही धीमा और कठिन होता है, जितना कि पत्थर पर पानी की एक-एक बूँद गिरकर गड्ढा बनाना। परंतु विराज के पास धैर्य था, और उससे भी अधिक, उसके पास संकल्प था।

लगभग चार घंटे की साधना करने के बाद—विराज महसूस करता है कि अब उसकी साधना लघु लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर से पहले स्तर पर पहुँच गई है। यह वह क्षण था जिसकी उसे प्रतीक्षा थी। शून्य से एक में जाना—यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। यह एक नई दुनिया का द्वार खोलने के समान था। अब वह केवल एक साधक नहीं रहा था; अब वह एक योद्धा बनने की ओर पहला कदम बढ़ा चुका था।

उसका शरीर पूरा पसीने से तरबतर हो चुका था। उसके कपड़े ऐसे भीगे हुए थे मानो वह किसी नदी में गिर गया हो। परंतु यह पसीना साधारण नहीं था—यह उसके शरीर से निकलने वाली अशुद्धियों का अंतिम निशान था। इसीलिए वह स्नान करने के लिए चला जाता है। हर कदम पर वह महसूस कर सकता था कि उसका शरीर हल्का हो गया है, जैसे उसके कंधों से कोई अदृश्य बोझ उतर गया हो। पानी उसकी त्वचा को छूते ही उसे ऐसा लगा मानो वह फिर से जन्म ले रहा हो—प्रत्येक बूँद उसके भीतर की थकान को धो रही थी, प्रत्येक कण उसे नई ऊर्जा से भर रहा था।

जब तक वह स्नान करके और तैयार होकर वापस आता है, तब तक रामू ने सुबह का पूरा काम कर दिया था और उसके लिए खाना बना दिया था। उसने केवल एक थाली भोजन की विराज के सामने रख दी—गरम रोटियाँ, सब्जी, और एक कटोरी दही। साधारण भोजन, परंतु सच्चे मन से बनाया हुआ। विराज ने मुस्कुराते हुए भोजन किया।

खाना खत्म करने के बाद विराज फिर से अपने आंगन में आ जाता है। तब तक रामू भी घर से बाहर जा चुका था—अपने काम पर, अपनी दुनिया में। अब आंगन केवल विराज का था। यहाँ कोई नहीं था। उसने अपनी आस्तीनों को कसकर चढ़ाया, गहरी साँस ली, और अपने पैरों को मिट्टी पर जमाया। आज से उसका असली अभ्यास शुरू होने वाला था।

पूरे दोपहर और पूरे शाम तक विराज मार्शल आर्ट का अभ्यास करता रहता है। दोपहर की तपती धूप में उसकी पीठ झुलस रही थी, परंतु उसे उसकी परवाह नहीं थी। शाम की ठंडी हवा में उसके हाथ-पैर अकड़ रहे थे, परंतु वह रुकता नहीं था। वह पहले से ही उन सभी चालों, सभी प्रहारों, सभी बचावों को जानता था—यह केवल उन्हें अपने नए शरीर में ढालने की बात थी। बार-बार, बिना थके, बिना रुके। जब उसका दाहिना हाथ दर्द से सुन्न हो जाता, तो वह बायें हाथ से अभ्यास करता। जब उसके पैर डगमगाने लगते, तो वह एक पैर पर खड़ा होकर प्रहारों का अभ्यास करता। उसने यह संकल्प ले लिया था कि वह अपने शरीर की हर सीमा को पार करेगा, हर दर्द को सहन करेगा, हर बाधा को तोड़ेगा।

इसी तरह से पंद्रह दिन बीत जाते हैं। पंद्रह दिन—कोई बहुत लंबा समय नहीं, परंतु विराज के लिए यह पंद्रह दिन एक युग के समान थे। प्रत्येक दिन उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती, प्रत्येक दिन उसकी मार्शल आर्ट की चालें अधिक सटीक होती जातीं, प्रत्येक दिन वह अपने पुराने जन्म के उस विराज के थोड़ा और करीब पहुँचता जाता—और फिर उससे भी आगे।

विराज सुबह उठता था—सबसे पहले साधना करता था। फिर नहाता, खाना खाता। फिर मार्शल आर्ट का अभ्यास करता था—दोपहर से शाम तक, जब तक कि उसके हाथों में छाले न पड़ जाते, उसके पैरों में दरारें न पड़ जातीं, उसके शरीर का हर अंग चीखने न लगता। फिर रात का खाना खाता था—थोड़ा सा, केवल पेट भरने के लिए क्योंकि उसकी भूख से अधिक उसकी साधना की प्यास थी। फिर साधना करता था, इसी तरह उसके दिन बीत रहे थे—एक नियमित, अनवरत, अटूट यात्रा। वह उस मार्ग पर बिना पीछे देखे आगे बढ़ रहा था।

इसी बीच सुरेश—अपनी पत्नी के साथ मगध साम्राज्य की राजधानी में उपस्थित नालंदा गुरुकुल के लिए निकल गया था। सुरेश अपने उद्देश्य की ओर बढ़ रहा था—विराज के भविष्य के लिए। परंतु विराज को अब किसी गुरुकुल की आवश्यकता नहीं थी, न ही किसी के संरक्षण की। विराज स्वयं ही अपना गुरु था, स्वयं ही अपना कवच। और उसके भीतर अब वह शक्ति बीज रूप में मौजूद थी, जो एक दिन सारे मगध को झकझोर कर रख देगी। बस उसे अंकुरित होने में थोड़ा और समय चाहिए था—और वह समय भी अब बहुत दूर नहीं था।