क्षितिज के उस पार तक फैला आकाश आज नीले रंग का नहीं, बल्कि ताजे बहते रक्त के समान गहरा लाल था। हवा भारी और बोझिल हो चुकी थी, जिसमें लोहे जैसी तीखी खून की महक और जलते हुए मांस की दुर्गंध घुली हुई थी। यह महक इतनी तीव्र थी कि जीवित बचे लोगों की साँसें घुट रही थीं। आकाश में हज़ारों गिद्ध और मांसाहारी जंगली पक्षी मंडरा रहे थे, जो नीचे बिछी लाशों के ढेर को अपनी भूखी निगाहों से तौल रहे थे। उनके डैने फड़फड़ाने की आवाज़ें और बीच-बीच में सुनाई देने वाली कर्कश चीखें इस वीराने को और भी डरावना बना रही थीं।
उस विशाल मैदान में, जो कभी हरियाली से लबालब रहता था, अब केवल मौत का तांडव दिखाई दे रहा था। लाखों की संख्या में योद्धाओं के शरीर एक-दूसरे के ऊपर पड़े थे। घास का एक-एक तिनका खून से भीग चुका था। इन अनगिनत लाशों के बीच, कुछ हज़ार छोटे बच्चे अपने घुटनों के बल बैठे हुए थे। उनके नन्हे चेहरों पर जमा धूल और खून के छींटे उनकी मासूमियत को निगल चुके थे। उनकी आँखों में वह डर था जिसे शब्दों में बयाँ करना असंभव है—एक ऐसा खौफ़ जो केवल पूर्ण विनाश को देखकर उपजता है।
उनकी सिसकियाँ भी अब गले में ही दम तोड़ चुकी थीं। फिर भी, अपनी काँपती पलकों और आँसुओं से धुँधलाई दृष्टि के साथ, वे ऊपर की ओर देख रहे थे। उनकी निगाहें उस ऊँचे शिखर पर टिकी थीं जहाँ उनका रक्षक खड़ा था।
तभी एक छोटी बच्ची, जिसकी आँखें आँसुओं से सूज गई थीं, फुसफुसाई, "क्या... क्या महान विराज हमें बचा लेंगे?"
उसके बगल में बैठे एक थोड़े बड़े लड़के ने, जिसकी बाँह से खून रिस रहा था, डरते हुए पर दृढ़ता से कहा, "ज़रूर बचाएँगे। माँ कहती थीं कि विराज पर सूर्यदेव की कृपा है। जब तक वे हैं, हमें कोई छू नहीं सकता। देखो, वे अभी भी हैं। वे हारे नहीं हैं।"
उन बच्चों के मन में एक अटूट, लगभग अलौकिक विश्वास था कि जब तक उनका मसीहा जीवित है, काल भी उन्हें छू नहीं पाएगा। उनके लिए वह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर का अवतार था जो इस प्रलय से उन्हें बाहर निकाल ले जाएगा।
उनका वह मसीहा, सूर्यकुल का महान योद्धा विराज, हज़ारों लाशों से निर्मित एक वीभत्स पर्वत के शिखर पर अपने घुटनों के बल बैठा था। उसकी स्थिति देख कर पत्थर का दिल भी पसीज जाए। उसके शरीर का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं था जहाँ घाव न हो। एक विशाल और क्रूर भाला उसकी नाभि को चीरता हुआ पीठ के पीछे निकल गया था, जिससे लगातार रक्त की धारा बह रही थी। उसके सीने, कंधों और बाँहों में दर्जनों तलवारें और तीर धँसे हुए थे, जो उसके शरीर को एक लोहे के पिंजर की तरह घेरे हुए थे।
परंतु सबसे विस्मयकारी था उसका चेहरा। इतनी अकल्पनीय पीड़ा के बावजूद, उसके मुख पर दर्द की एक भी लकीर नहीं थी। उसकी आँखों में अभी भी वही तेज था जो एक जलते हुए सूरज में होता है। वह शांत था, जैसे यह शरीर उसका हो ही नहीं। वह मौत को अपनी आँखों में आँखें डालकर चुनौती दे रहा था।
उस लाशों के पर्वत के नीचे वे योद्धा खड़े थे जिन्होंने इस महाविनाश को अंजाम दिया था। वे सभी विश्व के अलग-अलग कोनों से आए सबसे शक्तिशाली कुलों के नायक थे। उनके शरीरों पर लगे गहरे घाव और फटे हुए कवच इस बात का प्रमाण थे कि जिस विजय को वे मना रहे हैं, वह उन्हें कितनी महँगी पड़ी है। माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी, जीत की खुशी से ज़्यादा एक गहरा भय उनके चेहरों पर साफ़ झलक रहा था।
तभी, शत्रुओं के समूह से एक विशालकाय और पराक्रमी योद्धा आगे आया। उसका नाम महिषासुर था। उसके कवच पर खून की कई परतें जम चुकी थीं। उसने अपने खून से सनी तलवार को ज़मीन में गाड़ते हुए ऊपर बैठे विराज की ओर देखा। उसकी साँसें भारी थीं, आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी— शायद डर की, या शायद अविश्वास की।
"महान योद्धा विराज!" महिषासुर की गूँजती आवाज़ ने सन्नाटे को तोड़ा, "आज मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि तुम्हें मिली 'महान आपराजित तलवार योद्धा' की उपाधि पूर्णतः सत्य है। तुम वास्तव में उसके योग्य हो।"
विराज ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया, उसकी आँखें दहकते अंगारों की तरह चमक रही थीं। महिषासुर ने गहरी साँस ली और जारी रखा।
"हम जानते थे कि अकेले तुम पर विजय पाना असंभव है। इसीलिए, इस दुनिया के समस्त शक्तिशाली कुलों और संगठनों ने अपनी सदियों पुरानी दुश्मनी भुलाकर एक समूह बनाया। इस मैदान में तुम्हारे विरुद्ध खड़े योद्धा इस संसार के नब्बे प्रतिशत सबसे शक्तिशाली सेनानी थे।" वह एक पल रुका, मानो उसे अपनी ही कही बात पर यकीन न हो रहा हो। "हमने सोचा था कि इतनी बड़ी संख्या को देखकर तुम्हारा कुल समर्पण कर देगा और हम बिना किसी बड़ी हानि के तुम्हें मिटा देंगे, परंतु तुम्हारा सूर्यकुल... वह हमारी कल्पनाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली और अडिग निकला।"
विराज ने अपनी फटी हुई साँसों के बीच एक ऐसी हँसी हँसी जो पहाड़ की कंदराओं की तरह गूँज उठी। हँसी में दर्द नहीं था, सिर्फ़ एक गहरा व्यंग्य था। उसने महिषासुर की आँखों में देखते हुए पूछा, "महिषासुर... इतिहास गवाह है कि हमने तुम्हें और तुम्हारे जैसे कई कुलों को अपनी अधीनता से मुक्त कर दिया था। हमने तुम्हें तुम्हारी स्वतंत्रता लौटाई थी। फिर भी, इस विश्वासघात का कारण क्या है? तुमने हमारे परोपकार का बदला इस नरसंहार से क्यों दिया?"
महिषासुर के होंठों पर एक कुटिल लेकिन तनाव भरी मुस्कान खेली। कुछ कहने से पहले उसने एक बार पीछे मुड़कर अपने साथियों को देखा, मानो उनसे अनुमति ले रहा हो, फिर आगे बढ़ा।
"यही तो तुम्हारे कुल की सबसे बड़ी भूल थी, विराज!" उसकी आवाज़ में अब क्रूरता से ज़्यादा एक विक्षिप्त भय था। "दानशीलता युद्ध के मैदान में दुर्बलता मानी जाती है। एक युग था जब सूर्यकुल का इस संपूर्ण जगत पर एकछत्र राज था। हम तुम्हारे पूर्वजों के दास थे। लेकिन सौ वर्ष पूर्व जब तुम्हारा जन्म हुआ, तो तुम्हारे कुल ने उदारता दिखाते हुए सबको आज़ाद कर दिया। तुमने हमें अपने भाग्य का स्वामी खुद बनने दिया।"
महिषासुर ने एक कदम और आगे बढ़ाया, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने अपनी तलवार ज़मीन से निकाली और विराज की ओर इशारा करते हुए कहा, "शुरुआत में हम खुश थे, हमें लगा हमें जीवन मिल गया। पर यह खुशी जल्द ही एक गहरे डर में बदल गई। हमें हर रात यह दुःस्वप्न आता था कि किसी दिन तुम फिर से अपनी शक्ति बढ़ाओगे और हमें दोबारा अपना ग़ुलाम बना लोगे।"
"तुम पागल हो, महिषासुर," विराज ने शांत स्वर में कहा, "हमने तुम्हें कभी दोबारा ग़ुलाम बनाने की सोची भी नहीं। वह एक नई शुरुआत थी।"
"हो सकता है तुमने न सोची हो!" महिषासुर लगभग चीख पड़ा। "लेकिन तुम्हारी बढ़ती हुई शक्ति हमारे अस्तित्व के लिए ख़तरा बन गई थी। हम जानते थे कि तुम साधना के उस मार्ग पर हो जहाँ से लौटने के बाद तुम्हें हराना ईश्वर के लिए भी संभव नहीं होगा। इसलिए, हमने तय किया कि इस समस्या को जड़ से ही समाप्त कर दिया जाए।" उसने अपनी आवाज़ धीमी की, लेकिन उसमें गहराई और बढ़ गई, "अगर हमने तुम्हें आज नहीं रोका होता, तो भविष्य में कोई तुम्हें रोकने का साहस भी नहीं कर पाता। हमारी स्वतंत्रता हमारे अपने हाथों से छिन जाती।"
विराज अट्टहास कर उठा, उसकी हँसी में विक्षिप्तता नहीं बल्कि एक गहरा आत्मविश्वास था। वह हँसी मैदान में गूँजी और हर योद्धा के दिल में एक सिहरन पैदा कर गई।
"तुम्हें सच में लगता है महिषासुर कि इन तुच्छ चालों से तुम मुझे या मेरे कुल के अस्तित्व को रोक पाए हो?"
तभी महिषासुर के बगल से एक और भयानक योद्धा सामने आया, जिसका नाम कालकेतु था। उसका शरीर एक पहाड़ की तरह विशाल था और उसकी आँखों में क्रूरता की ठंडी चमक थी। वह विराज की हँसी से चिढ़ गया था। उसने उपहास करते हुए कहा, "विराज, अभी भी अहंकार? अपने चारों ओर देखो! तुम्हारा कुल राख हो चुका है। हमने तुम्हारी स्त्रियों, तुम्हारे बलवान पुरुषों और तुम्हारे हर एक रक्षक को मौत के घाट उतार दिया है।"
उसने अपना खून से सना हाथ उन सहमे हुए बच्चों की तरफ बढ़ाया, जो नीचे सिमटे बैठे थे। "अब इस पूरे ब्रह्मांड में तुम्हारे कुल का नाम लेने वाला कोई नहीं बचा, सिवाय इन चंद काँपते हुए बच्चों के। क्या तुम्हें लगता है कि हम इन्हें जीवित छोड़ेंगे?" कालकेतु ने एक क्रूर हँसी हँसी, "हम सूर्यकुल का बीज तक जलाकर भस्म कर देंगे।"
विराज ने अपनी गर्दन धीरे से घुमाई और कालकेतु की ओर देखा। उसकी दृष्टि इतनी ठंडी और तीक्ष्ण थी कि कालकेतु के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं। उस महान योद्धा ने, जिसने अभी-अभी एक संपूर्ण कुल का विनाश किया था, अपने कदम पीछे हटा लिए।
विराज ने शांत स्वर में कहा, "कालकेतु, तुम इन निर्दोष बच्चों को मार सकते हो, तुम मेरे इस नश्वर शरीर को नष्ट कर सकते हो।" उसकी आवाज़ अब पूरे मैदान में गूँज रही थी, मानो वह स्वयं आकाश बोल रहा हो। "पर याद रखना, अंत वह नहीं होता जो आँखों से दिखता है। मैं फिर लौटूँगा। मैं वापस आऊँगा यह बताने के लिए कि असली बदला क्या होता है। तुमने और तुम्हारे साथियों ने जिस अग्नि को आज छेड़ा है, वह युगों तक तुम्हारा पीछा करेगी।"
अचानक, विराज की आँखों का रंग बदलने लगा। वह गहरे भूरे से सुनहरे, और फिर एक चमकीले नीले रंग में परिवर्तित होने लगीं। उसने अपनी बची-खुची चेतना को समेटकर मन ही मन एक अति-प्राचीन और गोपनीय मंत्र का उच्चारण करना शुरू किया— "पुनर्जन्म मंत्र"।
यह मंत्र सूर्यकुल की सबसे गहरी और पवित्र विद्या थी। इसके बारे में विराज के अलावा पूरे कुल में कोई नहीं जानता था। यह साधारण मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मा का एक सचेत प्रवास था, जिसके माध्यम से एक योद्धा अपनी शर्तों और अपनी अधूरी इच्छाओं के साथ पुनः जन्म ले सकता था।
जैसे ही मंत्र की ध्वनियाँ उसके भीतर गूँजने लगीं, उसके शरीर से एक सुनहरी और नीली आध्यात्मिक ऊर्जा का रिसाव होने लगा। वातावरण का तापमान अचानक बढ़ने लगा। ज़मीन काँपने लगी।
शत्रु दल में खड़े मारीच नामक योद्धा, जो अपनी गुप्त विद्याओं के लिए जाना जाता था, ने यह हलचल भाँप ली। उसकी आँखें भय से फैल गईं। वह घबराकर चिल्लाया, "महिषासुर! कालकेतु! देखो यह क्या कर रहा है! क्या यह आत्मघाती विस्फोट करने वाला है? अगर इसने अपनी ऊर्जा को मुक्त किया, तो यह शरीर फटेगा और हम सब के साथ-साथ ये बच्चे भी मारे जाएँगे!"
महिषासुर ने ध्यान से विराज को देखा, उसकी आँखों में संशय और गहरी चिंता थी। उसने अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से विराज के भीतर झाँकने का प्रयास किया। "नहीं मारीच," उसने धीमे और अनिश्चित स्वर में कहा, "यह आत्महत्या नहीं है। इसके शरीर से निकलने वाली ऊर्जा विनाशकारी नहीं, बल्कि सृजनात्मक है। यह कुछ ऐसा कर रहा है जो हमारे शास्त्रों और ज्ञान की सीमा से परे है। इसके भीतर की आध्यात्मिक शक्ति एक केंद्र की ओर सिमट रही है।"
"सिमट रही है? इसका मतलब क्या है?" कालकेतु ने दाँत पीसते हुए पूछा, उसकी आवाज़ में हताशा साफ़ झलक रही थी। "धिक्कार है! इस सूर्यकुल ने न जाने कितने रहस्य अपने सीने में दफ़न कर रखे हैं। मारीच, क्या तुम इसे रोक सकते हो?"
"मैं... मैं नहीं जानता," मारीच ने घबराई आवाज़ में स्वीकार किया, "यह ऊर्जा इतनी शुद्ध और प्राचीन है कि मेरी सारी विद्याएँ इसके सामने विफल हो जाएँगी। यह मृत्यु से परे की प्रक्रिया है।"
तभी उन्हें कुछ अलग सा महसूस हुआ।
विराज के शरीर से अब चिंगारियाँ निकलने लगी थीं। दृश्य ऐसा था मानो कोई तारा धरती पर फूटने वाला हो। सुनहरी रोशनी की किरणें उसके शरीर से बाहर आ रही थीं और ऊपर आकाश की ओर जा रही थीं। मारीच ने डर के मारे चीखकर आदेश दिया, "सभी योद्धा अपनी-अपनी आध्यात्मिक शक्ति को जाग्रत करो! इसके चारों ओर एक अभेद्य कवच बनाओ! यदि इसकी ऊर्जा बाहर फैली तो कोई जीवित नहीं बचेगा!"
महिषासुर ने गुस्से और भय में चिल्लाते हुए कहा, "विराज! तुम पागल हो चुके हो? अपने ही कुल के बच्चों को मौत के मुँह में धकेल रहे हो?" उसने तुरंत अपनी पूरी शक्ति झोंक दी ताकि विराज के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाया जा सके। बाकी योद्धाओं ने भी डर और विवशता में यही किया। एक पारदर्शी, चमकता हुआ गुंबद विराज और उस लाशों के पर्वत के चारों ओर बन गया।
परंतु विराज के चेहरे पर अब एक अलौकिक मुस्कान थी। जिस शरीर में क्षण भर पहले असहनीय पीड़ा थी, वह अब पूर्ण शांति से भर गया था। उसका शरीर अचानक दहकने लगा, जैसे वह भीतर से जल रहा हो। कोई आग की लपटें नहीं थीं, बस एक तीव्र प्रकाश था जो उसे भस्म कर रहा था। धीरे-धीरे उसका मांस और हड्डियाँ कोयले की तरह काली पड़ने लगीं और फिर चमकीली राख में बदल गईं। वह जलकर राख हो रहा था, लेकिन कोई चीख नहीं थी। देखते ही देखते, वह विशाल योद्धा एक मुट्ठी राख में बदल गया और एक मंद हवा के झोंके के साथ वातावरण में विलीन हो गया।
वहाँ उपस्थित सभी शत्रु योद्धा स्तब्ध रह गए। उन्होंने अपने-अपने अस्त्र शिथिल कर दिए। उनके सामने न कोई लाश थी, न कोई शरीर। केवल एक रहस्यमयी शून्यता थी।
कालकेतु ने अविश्वास से पूछा, "क्या... क्या वह मर गया?"
"हाँ," महिषासुर ने भारी स्वर में कहा, लेकिन उसकी आँखों में कोई खुशी नहीं थी। "लेकिन साथ ही, नहीं भी। उसने अपनी आत्मा को बचा लिया। वह हमारी पहुँच से बाहर चला गया।"
उन्हें जीत तो मिल गई थी, लेकिन एक अनजाना डर उनके दिलों में घर कर गया था। यह डर कि वह अग्नि समाप्त नहीं हुई, बस कहीं और जाकर छिप गई है। कि वह फिर से लौटेगी।
इस घटना के ठीक पाँच सौ साल बाद... विराज का पुनर्जन्म हुआ।