सूर्यकुल का सूर्यास्त - 2 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 2

अध्याय 2: नियति का नया खेल

महान अपराजित तलवार योद्धा, जिसकी तलवार की चमक से कभी नक्षत्र कांपते थे, उसकी मृत्यु के 5 लंबी शताब्दियों के बाद कालचक्र ने एक नया मोड़ लिया। एक सुदूर, अनजाने ग्रह की मिट्टी में उसका पुनर्जन्म हुआ। समय अपनी गति से बहता रहा और वह योद्धा 21 वर्षों तक एक साधारण युवक की चेतना में सोया रहा।

विराज एक रात अपने कक्ष की शांति में गहरी निद्रा में लीन था, तभी अचानक ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक तीव्र झोंका उसके मस्तिष्क से टकराया। बंद आंखों के पीछे स्मृतियों का एक प्रलयंकारी सैलाब उमड़ पड़ा। उसके पूर्व जन्म के रक्त रंजित युद्ध, उसकी अजेय तलवार की गूँज और वे दिव्य मंत्र—सब कुछ उसके मानस पटल पर बिजली की तरह कौंधने लगे। पसीने से लथपथ विराज जब उठकर बैठा, तो उसकी आँखों में अब एक 21 साल के युवक की मासूमियत नहीं, बल्कि सदियों पुराने योद्धा का गहरा अनुभव और तेज था। उसे अपने पुनर्जन्म का असली बोध हो चुका था।

अगले तीन दिन विराज ने किसी विक्षिप्त की भांति नहीं, बल्कि एक रणनीतिकार की तरह बिताए। उसने अपने परिवेश का सूक्ष्म अवलोकन किया। उसे यह समझने में समय लगा कि वह किस ग्रह पर है, यहाँ के नियम क्या हैं, यहाँ कौन-से जीव बसते हैं और वर्तमान में उसकी स्वयं की सामाजिक और भौतिक स्थिति क्या है। जब सत्य पूर्णतः उसके सामने प्रकट हुआ, तो वह एक अजीब असमंजस में था—उसे अपनी नियति पर अट्टहास करना चाहिए या नियति के इस क्रूर मजाक पर अश्रु बहाने चाहिए।

जिस ग्रह पर वह दोबारा जन्मा था, उसका नाम मंगल ग्रह था।

विराज ने अपनी आंतरिक शक्ति से महसूस किया कि मंगल ग्रह की आध्यात्मिक ऊर्जा (Spiritual Energy) अत्यंत क्षीण और दुर्बल थी। यहाँ का वातावरण इतना विरल था कि वह ऊँचे स्तर की साधना के अनुकूल ही नहीं था। यही कारण था कि यहाँ के योद्धा और जीव साधना के मार्ग पर चाहकर भी अनंत ऊंचाइयों को नहीं छू सकते थे।

यहाँ की सीमाएँ अत्यंत संकुचित थीं। एक सामान्य साधक केवल 'शक्तिमान' बनने का स्वप्न देख सकता था। वे लोग जिनमें जन्मजात विशेष गुण होते थे या जिन्हें अतुलनीय संसाधन प्राप्त होते थे, वे अपनी पूरी क्षमता झोंककर अधिक से अधिक 'महा शक्तिमान' की पदवी तक पहुँच सकते थे।

मंगल ग्रह का साधना का मार्ग उसके ग्रह के अनुसार ही था, अर्थात जिस तरह उसके ग्रह पर साधना शुरू की जाती थी, मंगल ग्रह पर ही उसके अनुसार ही साधना शुरू की जाती थी, जिसके छह मुख्य चरण थे:
 1. लघु लड़ाकू योद्धा
 2. उच्च लड़ाकू योद्धा
 3. शक्ति सम्राट
 4. महाशक्ति सम्राट
 5. शक्तिमान
 6. महाशक्तिमान

इस ग्रह की ऊर्जा संरचना के कारण इससे आगे कदम रखना असंभव माना जाता था। प्रत्येक चरण के भीतर 10 स्तर थे, जिन्हें पार करना किसी दुर्गम पर्वत की चढ़ाई से कम न था। विराज के लिए, जो पूर्व जन्म में साधना की अधिकतम सीमाओं को लांघ चुका था, यह सीमाएं किसी पिंजरे की तरह थीं।

मंगल ग्रह पर विराज ने जिस मनुष्य की काया को धारण किया था, उस युवक का नाम भी नियतिवश विराज ही था। परंतु इस विराज के जीवन की पृष्ठभूमि किसी त्रासदी और रहस्यमयी पहेली से कम नहीं थी।

उसके जन्म की कहानी अंधकारों में लिपटी थी। उसके जन्म से पूर्व ही उसके पिता एक ऐसी अज्ञात यात्रा पर निकल गए थे, जहाँ से कभी कोई पदचिह्न वापस नहीं आया। उसकी माता, जिसने उसे इस संसार में लाने का कष्ट सहा, उसे जन्म देते ही काल के गाल में समा गई। अनाथ विराज को उसके अपने ही परिवार के सदस्यों ने कलंक मानकर त्याग दिया और बेसहारा छोड़कर घर से निष्कासित कर दिया। उस अंधकारमय समय में, उसके पिता के एक परम वफादार अनुयायी ने पितृवत स्नेह दिखाते हुए उसे अपने संरक्षण में ले लिया।

पिछले 16 वर्षों से विराज अपने मूल स्थान से कोसों दूर एक छोटे से शहर में गुमनामी का जीवन जी रहा था। वर्तमान में, वह गोमती नदी के शांत तट पर बसे ऐतिहासिक इंदौर शहर के चौहान परिवार के संरक्षण में था।

मंगल ग्रह की सामाजिक व्यवस्था भी उसके पुराने संसार से भिन्न थी। यहाँ कुल या स्वतंत्र संगठन नहीं होते थे; यहाँ शक्ति के केंद्र केवल दो थे—साम्राज्यों के महाराजा और ज्ञान के मंदिर गुरुकुल। हर व्यक्ति, चाहे वह योद्धा हो या साधारण नागरिक, इनकी निष्ठा की शपथ लेकर इनके अधीन कार्य करता था।

साम्राज्यों के शाही परिवारों और गुरुकुलों के बीच एक गहरा पारस्परिक संबंध था। जब कोई साधक अपनी तपस्या से महान बनता, तो उसका यश और उसकी शक्ति उसके संबद्ध परिवार या गुरुकुल को और अधिक शक्तिशाली बना देती थी।

विराज जिस मगध साम्राज्य का हिस्सा था, वहाँ चौहान परिवार की अनगिनत शाखाएं फैली थीं। इंदौर शहर में स्थित चौहान परिवार की शाखा पूरे साम्राज्य में सबसे निम्न और कमजोर मानी जाती थी। विडंबना देखिए कि वही शाखा जो साम्राज्य के स्तर पर न्यूनतम थी, इंदौर शहर के भीतर पाँच सबसे शक्तिशाली परिवारों में शुमार होती थी।

स्मृतियों की वापसी के चार दिन बीत चुके थे। एक शांत सुबह, अपने निवास स्थान पर भोजन करने के पश्चात विराज गहरे चिंतन में डूबा हुआ था। वह जिस घर में रह रहा था, उसके स्वामी सुरेश थे—इंदौर के चौहान परिवार के मुखिया के चौथे पुत्र।
सुरेश ही वह व्यक्ति थे जो 16 साल पहले 5 वर्ष के नन्हे और मासूम विराज को लेकर यहाँ आए थे। उस समय विराज की सुंदरता और उसकी रहस्यमयी उत्पत्ति ने शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया था।

नगर के चौराहों पर दबी जुबान में अफवाहें उड़ने लगीं कि विराज वास्तव में सुरेश का ही 'नाजायज पुत्र' है। इन जहरीली अफवाहों को शांत करने और विराज को समाज में सम्मान दिलाने के लिए सुरेश ने एक साहसी घोषणा की:

"विराज मेरा पुत्र नहीं, बल्कि मेरा होने वाला दामाद है। मैं अपनी इकलौती पुत्री रवीना का विवाह इसी बालक से संपन्न कराऊंगा।"

इस घोषणा ने शहर का मुँह तो बंद कर दिया, क्योंकि कोई भी पिता अपनी सगी बेटी का विवाह अपने ही नाजायज बेटे से नहीं करता, लेकिन चौहान परिवार के भीतर एक विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। उस समय विराज केवल 5 वर्ष का था और रवीना मात्र 2 वर्ष की।

"क्या पागलपन है सुरेश! दो दूध पीते बच्चों की सगाई कौन करता है?" परिवार के बड़ों ने विरोध किया।

परंतु सुरेश अपने वचन के पक्के थे। उन्होंने किसी की आलोचना की परवाह नहीं की। समय बीतता गया और जब रवीना 18 वर्ष की हुई, तो समाज की मान्यताओं के अनुसार विराज और रवीना का विवाह संपन्न करा दिया गया।

किंतु नियति का खेल अभी समाप्त नहीं हुआ था। विवाह की अगली सुबह ही रवीना के पास नालंदा गुरुकुल—जो मगध साम्राज्य की राजधानी में स्थित था—वहाँ की शिष्या बनने का प्रतिष्ठित निमंत्रण आया। वह अपनी शिक्षा के लिए चली गई और इस घटना को अब छह माह बीत चुके थे। विराज यहाँ अकेला, तिरस्कृत और उपेक्षित रह गया था।

अपनी वर्तमान स्थिति का पूर्ण विश्लेषण करने के बाद, विराज ने एकांत में बैठकर अपने इस नए शरीर का सूक्ष्म अवलोकन (Assessment) किया। उसे आभास हुआ कि यह शरीर साधारण नहीं है। यह अत्यंत अनोखा और विचित्र था, मानो उसने अपने पिछले जन्म में जिस 'पुनर्जन्म मंत्र' का प्रयोग किया था, उसकी समस्त गुप्त शर्तें इस काया में समाहित हो गई हों।
मंगल ग्रह पर प्रचलित जितनी भी साधना विधियाँ थीं, वे इस शरीर के लिए पूरी तरह निष्प्रभावी और व्यर्थ थीं। वह यहाँ की किसी भी तकनीक से अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा (Spiritual Energy) का संचार नहीं कर पा रहा था। यही कारण था कि पिछले वर्षों में वह एक 'कमजोर' और 'व्यर्थ' व्यक्ति बनकर रह गया था।

परंतु अब, पूर्व जन्म की यादें लौट आने के बाद, उसके पास ज्ञान का वह महासागर था जो इस ग्रह पर किसी के पास नहीं था।

विराज के पास उसके मूल कुल, सूर्यकुल संग्रहालय से प्राप्त वह सर्वश्रेष्ठ और गुप्त साधना विधि थी, जो किसी भी प्रकार की ऊर्जाहीनता को चुनौती दे सकती थी।

विराज ने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं। उसके पिछले कुछ वर्ष अपमान और कष्टों से भरे थे। चूंकि वह साधना करने में अक्षम था, इसलिए समाज, परिवार और यहाँ तक कि राह चलते लोग भी उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। उसके कान अभी भी उन अभद्र और आपत्तिजनक शब्दों से गूँज रहे थे जो उसे 'कायर' और 'बोझ' बुलाने के लिए इस्तेमाल किए गए थे।

उसकी आँखों में एक ठंडी चमक उभरी। अब जबकि महान अपराजित योद्धा जाग चुका था, मंगल ग्रह के इन तुच्छ नियमों और अपमानों का अंत निश्चित था।