अध्याय 3: नियति का ज्वार
विराज अपने अंतर्मन की गहराइयों में उतरने ही वाला था, अपनी चेतना को साधना के प्रथम चरण की ओर मोड़ने ही वाला था कि तभी उसके एकांत को भंग करती हुई एक भारी दस्तक दरवाजे पर हुई। लकड़ी के किवाड़ों से टकराती उस आवाज ने शांत वातावरण में एक कंपन पैदा कर दिया।
विराज, जो अपनी पालथी जमाए बैठा था, धीरे से खड़ा हुआ। उसकी चाल में एक अजीब सा ठहराव और गरिमा थी। वह आंगन के बीचों-बीच से गुजरते हुए मुख्य द्वार की ओर बढ़ने लगा। यह घर, जो बाहर से जितना साधारण दिखता था, भीतर से उतना ही शांत था। यहाँ विराज पूर्णतः एकाकी जीवन व्यतीत करता था। उसका एकमात्र संपर्क उस बुजुर्ग नौकर से था, जो सूर्योदय के समय आकर गृहकार्य निपटाता, भोजन तैयार करता और फिर चला जाता। संध्याकाल में भी वही क्रम दोहराया जाता था। विराज की रहस्यमयी दुनिया में किसी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था, और चूंकि उससे मिलने कोई आता नहीं था, इसलिए उसे चौबीसों घंटे किसी सहायक की आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई।
जैसे ही विराज ने द्वार खोला, उसकी दृष्टि एक सत्तर वर्षीय वृद्ध पर पड़ी। हालांकि, इस आकाशगंगा की विशिष्टता और वहां की ऊर्जा के प्रभाव स्वरूप, वह वृद्ध अपनी आयु से कहीं कम, लगभग 35 से 40 वर्ष के प्रौढ़ पुरुष जैसा प्रतीत होता था।
वह नवागंतुक कोई और नहीं, बल्कि सुरेश चौहान थे। सुरेश का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली और सौम्य था। उनके चेहरे पर एक सात्विक चमक थी, परंतु यदि कोई सूक्ष्म दृष्टि से उनकी आध्यात्मिक आभा का निरीक्षण करता, तो वह जान जाता कि उनका साधना मार्ग अधिक सुदृढ़ नहीं था। सात दशकों का जीवन व्यतीत करने के पश्चात भी, वह अभी 'उच्च लड़ाकू योद्धा' के नौवें स्तर पर ही ठहरे हुए थे—एक ऐसा स्तर जो सामान्य जन के लिए ऊंचा था, परंतु वास्तविक दिग्गजों के सामने नगण्य।
दरवाजा खुलते ही विराज के चेहरे पर एक औपचारिक विनम्रता आ गई। उसने झुककर बड़े ही शालीन भाव से नमस्कार किया। बाहर से देखने वाले किसी भी व्यक्ति को यही प्रतीत होता कि एक आज्ञाकारी दामाद अपने पूज्य ससुर का स्वागत कर रहा है। सुरेश ने भी चेहरे पर एक कृत्रिम मुस्कान लाते हुए अभिवादन स्वीकार किया और भीतर कदम रखते ही तत्परता से दरवाजा बंद कर दिया।
जैसे ही किवाड़ बंद हुए और ताला अपनी जगह पर बैठा, कमरे के भीतर का वातावरण पूरी तरह बदल गया। हवा में मौजूद औपचारिकता का वह पर्दा हट गया जो दुनिया की नजरों के लिए टांगा गया था।
क्षण भर पहले जो सुरेश चौहान एक बुजुर्ग और सम्मानित रिश्तेदार की भांति तनकर खड़े थे, अब उनकी देह झुक गई थी।
उनकी आंखों में सम्मान और भय का एक विचित्र मिश्रण था; वह अब एक ससुर नहीं, बल्कि एक निष्ठावान दास की भांति प्रतीत हो रहे थे। वहीं विराज, जिसने बाहर के समाज और राहगीरों के डर से एक साधारण लड़के का स्वांग रचा था, अब अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आया था।
विराज बिना कुछ कहे आंगन में लगे एक विशाल लकड़ी के झूले की ओर बढ़ा और उस पर पूर्ण अधिकार के साथ बैठ गया। उसकी भाव-भंगिमा में अब वह कोमलता नहीं थी, बल्कि एक स्वामी की अडिग सत्ता थी। सुरेश चौहान, अपने हाथ बांधे और मस्तक झुकाए, चुपचाप उसके पीछे चले और झूले के समीप एक निश्चित दूरी पर खड़े हो गए।
उनकी आवाज में एक कांपती हुई विनम्रता थी जब उन्होंने चुप्पी तोड़ी, "स्वामी... क्षमा करें, मुझे आपको यह सूचना देने के लिए स्वयं आना पड़ा। आपकी एकांत साधना मेरे लिए सर्वोपरि है, परंतु यह समाचार इतना महत्वपूर्ण था कि यदि मैं इसमें विलंब करता, तो यह आपके विश्राम और भविष्य के प्रति मेरा अपराध होता।"
विराज ने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि सुरेश पर डाली। उसके स्वर में गहरा ठहराव था, "मैं भली-भांति परिचित हूं सुरेश, कि बिना किसी अनिवार्य कारण के तुम मेरे द्वार पर अपनी छाया भी नहीं पड़ने देते। अपनी बात निर्भय होकर कहो, मैं सुन रहा हूं।"
सुरेश ने गहरी सांस ली और कहना प्रारंभ किया, "स्वामी, मगध साम्राज्य की राजधानी से एक अत्यंत हर्षोल्लास का समाचार प्राप्त हुआ है। नालंदा गुरुकुल, जो पूरे साम्राज्य का ज्ञान और शक्ति का केंद्र है, वहां के सबसे वरिष्ठ और शक्तिशाली महागुरु ने रवीना की प्रतिभा को पहचान लिया है। उन्होंने आधिकारिक रूप से रवीना को अपना 'मुख्य शिष्य' स्वीकार कर लिया है।"
यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। मगध साम्राज्य में शक्ति के कई शिखर थे, जिनमें नालंदा गुरुकुल का स्थान सर्वोच्च था। रवीना का मुख्य शिष्य बनना इस बात का प्रमाण था कि उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा और साधना की क्षमता असाधारण कोटि की थी। वह गुरु की पारखी नजरों में अपनी योग्यता सिद्ध करने में सफल रही थी।
सुरेश आगे विस्तार देते हुए बोले, "अब जबकि वह इस प्रतिष्ठित पद पर आसीन हो चुकी है, नालंदा गुरुकुल अपनी समस्त गुप्त आध्यात्मिक विधियां, दुर्लभ औषधि स्रोत और शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र उसके लिए खोल देगा। उसकी साधना का मार्ग अब किसी धूमकेतु की भांति तीव्र और निर्बाध होगा।"
परंतु इस सफलता के पीछे एक सांसारिक सत्य भी छिपा था। रवीना की इस उन्नति से इंदौर जैसे छोटे शहर में रहने वाले उसके परिवार की किस्मत पलटने वाली थी। उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अब मगध के राजनैतिक और आर्थिक गलियारों में सम्मान के साथ देखी जाएगी। यह केवल एक बेटी की सफलता नहीं, बल्कि पूरे कुल के उत्थान और सत्ता के साथ जुड़ने का एक स्वर्ण अवसर था।
यह सुनते ही विराज के होंठों पर एक अत्यंत सूक्ष्म और रहस्यमयी मुस्कान उभर आई। इस निष्ठुर संसार में यदि कोई एक प्राण था जिसकी विराज को चिंता थी, तो वह रवीना ही थी। यद्यपि संसार को उनका गठबंधन एक पारिवारिक विवशता या सामाजिक समझौता लगता हो, परंतु उन दोनों के हृदयों में प्रेम की वह अग्नि प्रज्वलित थी जिसे केवल वे ही महसूस कर सकते थे।
विराज को अपने पूर्व जन्मों की स्मृतियां लौट आई थीं। उस अतीत के जीवन में उसने कभी किसी स्त्री के प्रति मोह या शारीरिक आकर्षण का अनुभव नहीं किया था, परंतु इस जीवन की जड़ें रवीना के साथ बचपन की धूल में पली-बढ़ी थीं। वे एक साथ खेले, एक साथ संघर्ष किया और मौन रहकर एक-दूसरे को अपना सर्वस्व मान लिया। उनकी आत्माएं बिना किसी शब्द के एक-दूसरे के प्रति समर्पित थीं।
सुरेश ने अपनी बात पूर्ण की, "स्वामी, रवीना ने हमें संदेश भेजकर राजधानी आमंत्रित किया है। उसकी हार्दिक इच्छा है कि हम कुछ समय वहां रहकर उसके इस गौरवपूर्ण क्षण के साक्षी बनें और उसके साथ समय व्यतीत करें।"
रवीना का संदेश सुनकर विराज कुछ क्षणों के लिए मौन हो गया। वह झूले से उठा और अपनी विचारमग्न अवस्था में कमरे के भीतर चला गया। कुछ ही देर में वह वापस लौटा, उसके हाथ में एक सीलबंद लिफाफा था।
उसने वह पत्र सुरेश की ओर बढ़ाया और अत्यंत गंभीर स्वर में आदेश दिया, "यह पत्र ले जाकर रवीना को सौंप देना। इसे पढ़ने के बाद वह मेरी स्थिति और आगामी परिस्थितियों को स्वतः समझ जाएगी।"
विराज की आंखें अब पहले से अधिक गहरी और डरावनी लग रही थीं। उसने आगे कहा, "और सुनो... आज के पश्चात, तुम और तुम्हारी पत्नी अपना सर्वस्व समेटकर नालंदा गुरुकुल की सुरक्षात्मक सीमा के भीतर ही रहोगे। मेरी आज्ञा के बिना तुम उस सीमा की एक लांघ भी बाहर नहीं रखोगे। यह तुम्हारी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।"
यह सुनते ही सुरेश के चेहरे का रंग उड़ गया। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। उन्होंने कंपकपाते स्वर में पूछा, "स्वामी! आप... आप ऐसा क्या करने वाले हैं? मेरा हृदय किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा है। कृपया ऐसा कोई कदम न उठाएं जिससे आपके प्राणों पर संकट आए!"
सुरेश ने आगे बढ़कर समझाने का प्रयास किया, "स्वामी, आपकी वास्तविक पहचान और आपकी पृष्ठभूमि के विषय में केवल मगध के सम्राट और कुछ अति-गोपनीय लोग ही जानते हैं। यदि शेष जगत को, विशेषकर आपके शत्रुओं को यह ज्ञात हुआ कि आप जीवित हैं, तो पूरा साम्राज्य आपके रक्त का प्यासा हो जाएगा। उन अनगिनत दुश्मनों को रोकना किसी के वश में नहीं होगा!"
विराज के चेहरे पर एक शीतल मुस्कान फैल गई, जो किसी विनाशकारी तूफान से पहले की शांति जैसी थी। उसने सुरेश की आंखों में देखते हुए कहा, "सुरेश, तुमने बहती हुई नदी के मार्ग में बांध बनाकर उसके वेग को रोकने का भरसक प्रयास किया। वर्षों तक तुम उस पानी को बांधे रखने में सफल भी रहे। परंतु स्मरण रहे, नदी का स्वभाव ही बहना है। कोई भी कृत्रिम अवरोध उसके मूल अस्तित्व को सदा के लिए बंदी नहीं बना सकता।"
विराज का स्वर अब और भी भारी हो गया, "अब वह समय आ पहुंचा है जब नदी को उस जीर्ण-शीर्ण बांध को तोड़कर अपनी धारा को पुनः प्राप्त करना होगा। और जब यह बांध टूटेगा, तो वह कोई सामान्य प्रवाह नहीं, बल्कि एक प्रलयकारी सैलाब होगा। उस सैलाब के मार्ग में जो भी बाधा, शत्रु या अहंकार आएगा, वह तिनके की भांति बह जाएगा और सर्वनाश निश्चित होगा।"
सुरेश के हाथ-पांव सुन्न पड़ गए। वह भली-भांति जानता था कि विराज की साधना वर्तमान में भले ही गुप्त हो, परंतु वह जिसका रक्त था, उनकी शक्ति मगध साम्राज्य के इतिहास में अमिट थी। विराज को रोकना अब असंभव था।
सुरेश ने अंतिम बार प्रयास किया, "स्वामी, मेरी प्रार्थना सुनिए... आप अपनी पहचान उजागर किए बिना भी एक शांत और वैभवशाली जीवन व्यतीत कर सकते हैं। क्यों नियति को चुनौती दे रहे हैं?"
विराज ने अपना हाथ हवा में उठाया और उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, "नियति के लिखे को कोई नहीं मिटा सका है, सुरेश। जो प्रारब्ध में अंकित है, वह घटित होकर ही रहेगा। अब जाओ।"
विराज के शब्दों के अंत में ऐसी दृढ़ता थी कि सुरेश के पास कहने को कुछ शेष न रहा। उसकी जुबान जैसे तालू से चिपक गई। उसने भारी मन से एक अंतिम प्रणाम किया और वहां से प्रस्थान कर गया।
अब आंगन में केवल विराज अकेला खड़ा था, जिसकी नजरें क्षितिज पर टिकी थीं, जहां आने वाले महासंग्राम के बादल घिरने लगे थे।