अध्याय 9 राजगद्दी का विश्वासघात
आचार्य विदुर द्वारा कही गई बात अब सत्य होने लगी थी। वह ज्वालामुखी जिसके फूटने की बात उन्होंने किशन से कही थी, अब धरती के गर्भ में सुलगने लगा था। उसकी गरमाहट अब ऊपरी सतह तक आने लगी थी। और उस ज्वालामुखी की आहट मगध साम्राज्य के शाही महल तक पहुँच चुकी थी।
मगध साम्राज्य के राजा अपने कार्यालय में बैठे हुए थे, उनके साथ उनके चौथे भाई सेनापति मेघनाथ बैठे हुए थे। कार्यालय का वातावरण भारी था, मानो कोई अदृश्य बोझ कमरे में रख दिया गया हो।
मेघनाथ मगध साम्राज्य के राजा की ओर देखते हुए कहते हैं, "बड़े भाई दशानंद, तीसरे भाई कुंभकरण ने हमें इस समय क्यों बुलाया है? ऐसी कौन सी विपत्ति आ पड़ी है जिसके लिए उसने इतनी जल्दबाजी में हमें बुलाया है?"
दरअसल मगध साम्राज्य के शाही परिवार में राजा का पद दूसरे भाई दशानंद के पास था, और मंत्री आमात्य का पद तीसरे भाई कुंभकरण को दे दिया था, और मुख्य सेनापति का पद चौथे भाई मेघनाथ को दे दिया गया था। यह विभाजन बहुत सोच-समझकर किया गया था।
राजा दशानंद मेघनाथ की तरफ देखते हुए उससे कहते हैं, "पिछले दो महीने से कुंभकरण किसी रहस्य की गुत्थी सुलझाने में लगा हुआ है। जब मैंने उससे पूछा था तो उसने मुझसे कहा था कि उचित समय आने पर वह सब कुछ बता देगा, और वह इस दरमियान साम्राज्य से बाहर भी गया था।" दशानंद ने अपनी आवाज को यथासंभव स्थिर रखने की कोशिश की थी।
अभी वह यह सब बातें ही कर रहे थे तभी दरवाजा खुलता है और कुंभकरण आता है। उसने आते ही दरवाजा बंद कर दिया। उसके चेहरे पर सामान्य से अधिक गंभीरता थी। उसने दरवाजे के भीतर से कुंडी भी लगा ली, जो कि उसकी आदतों के विपरीत था।
वो अपने बड़े भाई को प्रणाम करके वह अपनी जगह पर बैठ जाता है। उसने प्रणाम तो कर लिया, परंतु उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो किसी भाई के बड़े भाई से मिलने पर होती है। बल्कि उसकी दृष्टि में एक गहरी व्यथा और भय था, जैसे कोई व्यक्ति किसी बहुत बुरी खबर को अपने मुँह से कहने से पहले हजार बार सोच रहा हो। वह अपनी सीट पर बैठ गया, परंतु उसका शरीर पूरी तरह से स्थिर नहीं था।
राजा दशानंद पूछते हैं, "अनुज, क्या हुआ? तुम्हारी जानकारी का क्या परिणाम रहा? क्या तुमने वह हासिल कर लिया जो तुम जानना चाहते थे?"
यह सुनते ही कुंभकरण घबराने लगता है। फिर उसने गहरी साँस ली, परंतु उसकी साँसें थमी हुई थीं। उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं। उसके हाथों का काँपना अब साफ दिखाई देने लगा था।
यह देखकर उनके दोनों भाई आश्चर्यचकित रह जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन में बहुत समय बाद कुंभकरण को इतना डरा हुआ देखा था।
मेघनाथ कहता है, "बड़े भाई, ऐसा क्या हुआ है कि तुम इतने डरे हुए हो?"
कुंभकरण उन दोनों की तरफ देखते हुए कहता है, "मैं आपको कैसे बताऊं कि मुझे भाभी दुर्गा के पुत्र के बारे में एक बात पता चली है?"
दुर्गा' – यह नाम उसके होंठों से इस तरह निकला जैसे कोई जलता हुआ कोयला मुँह में हो। उसने इस नाम को इतनी डरी हुई, इतनी काँपती हुई आवाज में कहा कि उसे सुनकर दशानंद और मेघनाथ की रीढ़ में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई।
भाभी दुर्गा का नाम सुनते ही वहां मौजूद सभा में सन्नाटा सा छा जाता है। वह सन्नाटा कोई साधारण सन्नाटा नहीं था। वह उस प्रकार का सन्नाटा था जो किसी बड़े धमाके से पहले होता है। कमरे में मौजूद तीनों भाइयों के बीच हवा भारी हो गई। ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य भूत उस कमरे में प्रवेश कर गया हो, और उन सबकी साँसें रोक ली हों।
राजा दशानंद के हाथ डर की वजह से काँपने लगते हैं, यह नाम उनके लिए किसी रहस्य से कम नहीं था, वह अपनी जिंदगी में कभी भी दोबारा यह नाम नहीं सुनना चाहते थे।
यही हाल मेघनाथ का भी था, परंतु उसकी हालत दशानंद से बेहतर थी। हालाँकि उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था और उसकी साँसें अभी भी भारी थीं, पर उसने अपनी आवाज में दृढ़ता लाने की कोशिश की। वह कुंभकरण की ओर देखते हुए कहता है, "आप क्या कह रहे हो भाई? हमने उस बच्चे को बचपन में ही मार दिया था। हमने हर उस चीज़ को मिटा दिया था जो भाभी दुर्गा से संबंधित थी।" मेघनाथ की आवाज में एक कड़वापन था।
"21 साल से ज्यादा साल बीत चुके हैं इस बात को हुए। हमने हर उस चीज़ को बदल दिया, जिस पर हमारे सबसे बड़े भाई शंकर का नाम लिखा हुआ था, और हमारी रहस्यमयी भाभी दुर्गा के बारे में लिखा हुआ था। हर वह चीज़ हमने मिटा दी या छुपा दी जो भाभी दुर्गा से संबंधित थी।" मेघनाथ ने यह कहते हुए अपनी बाँहों को कस लिया।
दरअसल दुर्गा से उनके डरने की वजह उनके इतिहास में छिपी हुई थी। राजा दशानंद के पिता राजा विश्रवा से इसकी शुरुआत होती है। राजा विश्रवा ने मगध साम्राज्य को बहुत समृद्धि दी थी। परंतु उनके व्यक्तिगत जीवन में बहुत त्रासदियाँ थीं।
राजा विश्रवा की पहली पत्नी से उन्हें एक पुत्र हुआ जिसका नाम शंकर था। वह बच्चा बहुत सुंदर और तेजस्वी था। परंतु दुर्भाग्य से उसकी माँ शंकर को जन्म देते ही मर गई।
इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी की और उनसे उन्हें तीन पुत्र हुए – दशानंद, कुंभकरण और मेघनाथ।
राजा विश्रवा की दूसरी पत्नी अपने पुत्रों से कहीं ज्यादा स्नेह शंकर से करती थी, जिसके कारण उनके तीनों पुत्र शंकर से नफरत करने लगे थे। परंतु दुनिया के सामने वह अच्छे भाई बनते थे। वे शंकर को 'बड़े भाई' कहकर बुलाते थे, उसके आगमन पर उठकर खड़े होते थे, और समारोहों में उसके साथ खड़े होते थे।
जैसे-जैसे ये बड़े हुए, शंकर की साधना प्रतिभा उनसे कहीं ज्यादा बेहतर थी जिससे उनके बीच की खाई और ज्यादा बढ़ने लगी।
इन सब में घी का काम राजा विश्रवा के एक फैसले ने किया था। वह शंकर को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, परंतु शंकर साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता था इसीलिए उसका राजपाठ में कोई मोह नहीं था, और विश्रवा अपने दूसरे पुत्रों को मौका नहीं देना चाहते थे।
जब शंकर की साधना बढ़ी तो वह ऊंची बुलंदियों की खोज में मगध साम्राज्य से बाहर चले गए। उसने अपने पिता से आशीर्वाद लिया और साम्राज्य छोड़ दिया। उसके जाने से दशानंद, कुंभकरण और मेघनाथ को सुकून की सांस मिली।
आज से ठीक 50 साल पहले मगध साम्राज्य के पड़ोसी साम्राज्य पल्लव साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य ने एक साथ मिलकर मगध साम्राज्य पर हमला कर दिया, जिसमें उन दोनों साम्राज्यों की मदद कई बाहरी साम्राज्यों की ताकतें कर रही थीं।
उस लड़ाई में राजा विश्रवा बुरी तरह से घायल हो गए थे यहां तक की मरणासन्न स्थिति में आ गए थे, और उनके तीनों पुत्र दशानंद, कुंभकरण और मेघनाथ की भी हालत खराब हो चुकी थी, यहां तक कि उनके बहुत सारे योद्धा भी मारे गए थे। आकाश में गिद्धों के झुंड मंडरा रहे थे, जो इस विनाश के पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मगध साम्राज्य लगभग घुटनों पर आ गया था, जबकि पल्लव साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य को कोई भी क्षति नहीं पहुंची थी।
उनका साम्राज्य बिल्कुल हार की कगार पर था, तभी उनका पुत्र शंकर अपनी पत्नी दुर्गा के साथ वहां आता है। वह अचानक प्रकट हुआ, जैसे कोई देवता आकाश से उतरा हो। कहा जाता है कि जब वह युद्ध के मैदान में पहुंचा, तो आकाश में बादल जमा हो गए, मानो प्रकृति स्वयं उसका स्वागत कर रही थी। उसने अपने पिता को घायल देखा, अपने भाइयों को पराजित देखा, और अपने साम्राज्य के योद्धाओं की लाशें देखीं। फिर उसने अपनी पत्नी दुर्गा की ओर देखा, और दोनों के बीच शब्दों की आवश्यकता नहीं थी। दुर्गा ने अपने पति का संकेत समझ लिया था।
उस समय केवल अकेली दुर्गा ने ही पल्लव साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य के योद्धाओं को मारना शुरू कर दिया, उसने चारों तरफ लाशों के ढेर बिछा दिये। यह कोई लड़ाई नहीं थी, यह एक नरसंहार था। दुर्गा अपने हाथ में एक तलवार लिए हुए थी, और वह उस मैदान में ऐसे घूम रही थी जैसे मौत स्वयं घूम रही हो। वह जहाँ से गुजरती थी, वहाँ शत्रुओं की लाशें बिछ जाती थीं।
वह इतनी भयानक तरीके से लड़ी थी कि सभी को पता चल गया था कि आसपास के सभी साम्राज्यों में दुर्गा से ज्यादा बड़ा ताकतवर योद्धा कोई नहीं होगा। एक अकेली स्त्री, जिसने दो पूरे साम्राज्यों की सेनाओं को नेस्तनाबूद कर दिया था। खबर आग की तरह फैल गई। पल्लव साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य के राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दे दिया।
उस दिन दुर्गा ने जो लाशें बिछाई थीं, वह एक पहाड़ के रूप में जानी जाती थी। उस युद्ध के बाद, युद्ध के मैदान में इतनी लाशें थीं कि उन्हें जलाने में तीन दिन लग गए थे। और उन लाशों के बीच से, एक अकेली योद्धा – दुर्गा – बिना एक भी खरोंच के खड़ी थी। कहा जाता है कि उस दिन दुर्गा ने इतना अधिक रक्तपात किया था कि उसके वस्त्र पूरी तरह से लाल हो गए थे।
मगध साम्राज्य, पल्लव साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य और अन्य साम्राज्यों को पता चल गया था कि दुर्गा से लड़ना मतलब अपनी मौत से लड़ना है। उसके बाद पल्लव साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य ने मगध साम्राज्य से समझौता कर लिया।
परंतु इस लड़ाई के कारण राजा विश्रवा की मृत्यु हो गई। वह अपने घावों को ठीक नहीं कर पाए। अपनी मृत्यु शैया पर लेटे हुए, उन्होंने अपने चारों पुत्रों को बुलाया। उन्होंने कहा, "शंकर, तुम ही इस साम्राज्य के सच्चे उत्तराधिकारी हो। मैं तुम्हें राजा बनाता हूं।"
परंतु शंकर को अभी भी साम्राज्य को संभालने में कोई रुचि नहीं थी, वह साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता था इसीलिए वह अपने दूसरे भाई दशानंद को राजा बना देता है, तीसरे भाई को मंत्री आमात्य और चौथे भाई को सेनापति बना देता है, और फिर से साम्राज्य से बाहर साधना की खोज में निकल जाता है।
वर्तमान स्थिति से 23 साल पहले शंकर फिर से अपनी पत्नी दुर्गा के साथ वापस लौटता है। परंतु इस बार उसकी स्थिति पहले से बिल्कुल अलग थी। वह वापस तो लौटा था, परंतु उस समय शंकर की स्थिति काफी खराब थी, और दुर्गा उस समय गर्भवती थी।
शंकर अपने भाइयों को दुर्गा की देखभाल के लिए कहता है, और उन्हें बताता है कि बड़ा होकर जो भी पुत्र या पुत्री पैदा होगा, उसे ही मगध साम्राज्य का सिंहासन दे देना। यह कहकर वह चला जाता है और अपने भाइयों से कहता है, "अगर मैं एक साल के भीतर नहीं लौटा, तो तुम यह समझ लेना कि मेरी मृत्यु हो चुकी है।"
उसके एक साल बाद उनका भाई नहीं लौटता है और वह समझ जाते हैं कि उसकी मृत्यु हो चुकी है।
इसके बाद उनकी भाभी दुर्गा ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह बच्चा बहुत तेजस्वी था, उसके जन्म के समय पूरे महल में एक अजीब सी चमक फैल गई थी। दुर्गा ने उस बच्चे को अपनी बाँहों में भर लिया, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे – पहली बार, वह महान योद्धा रो रही थी।
और उस पुत्र को जन्म देने के बाद दुर्गा की प्रसव पीड़ा के दौरान मौत हो गई। यह अजीब था – एक योद्धा जो युद्ध के मैदान में अजेय थी, उसकी मृत्यु एक साधारण प्रसव में हो गई।
जब महान योद्धा दुर्गा मरी, तो पूरे मगध साम्राज्य में उनका शोक मनाया गया। अन्य साम्राज्यों से भी कई योद्धा आए और उसके शोक में शामिल हुए। एक महीने तक मगध साम्राज्य में कोई उत्सव नहीं मनाया गया।
लेकिन उसी दौरान शाही महल में एक अलग ही योजना चल रही थी। जब पूरा साम्राज्य दुर्गा के निधन पर रो रहा था, उसी समय महल के एक बंद कमरे में दशानंद, कुंभकरण और मेघनाथ बैठे थे, उनके चेहरे पर कोई शोक नहीं था – केवल गणना थी। वे एक ऐसी योजना पर चर्चा कर रहे थे जो उनके भविष्य और साम्राज्य के भविष्य को निर्धारित करेगी। वे जानते थे कि अब कोई उन्हें रोकने वाला नहीं है – न शंकर, न दुर्गा। अब केवल वह बच्चा था – दुर्गा का जीवित पुत्र।
दरअसल जब राजा विश्रवा ने अंतिम सांस लेते समय अपने पहले पुत्र शंकर को राजा बनाया था, तो उस समय उनके कमरे के अंदर राजा विश्रवा और उनके चारों पुत्र ही मौजूद थे। यह पूरी प्रक्रिया बंद कमरे में हुई।
बाहर की दुनिया को क्या पता था कि सिंहासन पर कौन बैठेगा और क्यों? उन्होंने केवल यह देखा कि दशानंद सिंहासन पर बैठा है, कुंभकरण मंत्री है, मेघनाथ सेनापति है, और शंकर नई साधना की खोज में चला गया है।
इसी वजह से सभी जनता को लगता था कि राजा विश्रवा ने अपने दूसरे, तीसरे और चौथे पुत्र को यह पद दिए हैं और पहले पुत्र को साधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए छोड़ दिया है जिससे वह असीम ऊंचाइयां हासिल कर सके। इन तीनों भाइयों ने भी इस गलतफहमी को दूर करने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत, उन्होंने इस भ्रम को सावधानीपूर्वक मजबूत किया।
वहीं दूसरी तरफ जब शंकर वापस लौटकर आए थे और उन्होंने घोषणा की थी कि उनका जो भी पुत्र या पुत्री होगा वही मगध साम्राज्य का राजा बनेगा, उस समय भी कमरे में केवल पाँच लोग मौजूद थे – शंकर, दुर्गा, दशानंद, कुंभकरण और मेघनाथ। एक बार फिर, यह बात बाहर नहीं आई।
जब शंकर लौटा नहीं था, तो उसे मृत मान लिया गया था। दुर्गा की मौत हो चुकी थी। अब केवल तीन भाई थे – और एक बच्चा, दुर्गा का नवजात पुत्र। इसी कारण से उन्होंने सोचा, 'क्यों ना जैसा है वैसा ही चलने दिया जाए, और हम तीनों भाई पूरे साम्राज्य को मिलकर संभालेंगे?' यह तर्कसंगत लग रहा था।
और रही बात दुर्गा के पुत्र की, तो वह अभी बच्चा है। उसे मार देते हैं। जिससे भविष्य में वह हमारे लिए कोई मुसीबत न बने। यह निर्णय दशानंद ने लिया, कुंभकरण ने समर्थन किया, और मेघनाथ ने भी साथ दिया था।
परंतु इसकी खबर दुर्गा के एक अनुयायी को लग जाती है। वह उसे बचाकर अपने साम्राज्य में ले जाता है। यह अनुयायी दुर्गा का सबसे विश्वासपात्र साथी था, जिसने अपना पूरा जीवन उसकी सेवा में बिता दिया था।
परंतु यह तीनों भाई मिलकर उस अनुयाई के साम्राज्य के साथ समझौता करते हैं, उस अनुयाई के पूरे परिवार को मार डालते हैं। इन तीनों भाइयों को लगता है कि उस लड़ाई में दुर्गा का पुत्र भी मर गया था। उन्हें इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला, लेकिन उन्होंने उस रात को अपनी विजय समझा। उन्होंने यह नहीं सोचा कि हो सकता है कि अनुयायी ने पहले ही बच्चे को कहीं और छुपा दिया हो। उन्होंने अपनी खोज बंद कर दी, क्योंकि वे एक बार फिर निडर होना चाहते थे। और 21 वर्षों तक, उन्होंने विश्वास किया कि वह बच्चा मर चुका है, और उसके साथ ही शंकर और दुर्गा की विरासत भी समाप्त हो गई है।