अध्याय 10 दशानंद की कुटिल चाल
दशानंद से अब सब्र हो नहीं रहा था। वह तीनों भाइयों में सबसे बड़ा था, सबसे शक्तिशाली था, परंतु आज उसकी शक्ति उसके सामने फीकी पड़ रही थी। रहस्य के इस जाल में, सच्चाई के इस अंधेरे कुएँ में, वह खुद को असहाय महसूस कर रहा था। इसीलिए वह झुंझलाते हुए पूछता है, "कुंभकरण, तुम हमें पूरी सच्चाई बताओ। हम शुरू से जानना चाहते हैं कि तुम्हें क्या-क्या जानकारियाँ मिली हैं और कैसे-कैसे मिली हैं।"
कुंभकरण बताता है, "भ्राता, करीब दो महीने पहले मेरी मुलाकात नालंदा गुरुकुल के अधीन कार्य कर रही शकुंतला चौहान से हुई। शकुंतला चौहान इस समय नालंदा गुरुकुल द्वारा दिए गए कार्यों को संपूर्ण कर रही हैं, जो उन्हें समय-समय पर नालंदा गुरुकुल के कुलपति द्वारा दिए जाते हैं।"
"ऐसे ही एक कार्य के दरमियान उनसे मेरी बातचीत हुई। वैसे तो शकुंतला चौहान की हैसियत हमारे सामने कुछ भी नहीं है – वह एक धधकती हुई आग के सामने एक दीपक के समान है।" कुंभकरण शकुंतला को तुच्छ समझता था।
"परंतु इस समय वह नालंदा गुरुकुल के लिए कार्य कर रही हैं और महत्वपूर्ण मिशनों पर जा रही हैं, तो उनकी पृष्ठभूमि बदल जाती है।" यही कारण था कि वह उससे मिला, उससे बात की, उसे गंभीरता से लिया।
"उस दरमियान, बातों-बातों में शकुंतला चौहान के मुँह से कुछ शब्द निकले जिन्होंने मुझे बहुत विचलित कर दिया।" कुंभकरण के चेहरे का रंग बदल गया।
कुंभकरण एक गहरी साँस लेता है और आगे कहता है, "उन्होंने कहा था – 'अगर शंकर का वह मुफ्तखोर पुत्र राजा बन जाता, तो आपकी स्थिति और भी ज्यादा खराब हो जाती।'" यह शब्द कुंभकरण के मुँह से निकलते ही कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। दशानंद और मेघनाथ ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
उस समय उसके मुँह से यह शब्द सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया, परंतु मैंने कुछ भी नहीं कहा। क्योंकि मैं अपने चेहरे से यह बात नहीं जाहिर करना चाहता था कि मुझे उन पर शक हो गया है। अगर शकुंतला को पता चल जाता कि मैंने उन पर कुछ संदेह किया है, तो वह और सावधान हो जाती।
फिर मैंने यह जानने की कोशिश की कि आखिरकार जो राज केवल हम तीनों भाइयों और हमारे मृत भाई-भाभियों को पता था – और गलती से भाभी के अनुयायी जटायु को पता था – और हमने चोल साम्राज्य के साथ समझौता करके जटायु के पूरे परिवार को मार दिया था, जिससे हमारी आखिरी आशंका भी खत्म हो गई थी – वह बात हमारे मगध साम्राज्य के सबसे पिछड़े हुए दक्षिणी प्रांत की एक छोटे से इंदौर शहर के एक मामूली से चौहान परिवार की महिला को कैसे पता है?" कुंभकरण ने यह पूरा प्रश्न एक ही साँस में कहा, जैसे वह इतने दिनों से इसे कहना चाहता था।
मैंने अपने गुप्तचरों को लगाया तो मुझे एक जानकारी हासिल हुई। उस जानकारी के अनुसार शकुंतला की एक रवीना नाम की पोती है, जिसके पति को पूरा इंदौर शहर 'मुफ्तखोर घर जमाई' के नाम से जानता है। कुंभकरण के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उसने सोचा – यही वह व्यक्ति था, जिसके बारे में शकुंतला ने कहा था कि अगर यह राजा बन गया तो उनकी स्थिति और खराब हो जाएगी? एक मुफ्तखोर? एक जिसकी साधना शून्य है? एक जिसे पूरा शहर तिरस्कार की दृष्टि से देखता है? यह सब बहुत अजीब था।
कुंभकरण के मुँह से इस तरह की बातें सुनने के बाद दशानंद और मेघनाथ एक-दूसरे के चेहरे को देखते हैं, उन्हें अभी भी यकीन नहीं हो रहा होता है। इसीलिए दशानंद कुंभकरण से फिर से कहते हैं, "तुम्हें ये कैसे यकीन है कि वह लड़का ही भाभी दुर्गा का बेटा है?"
कुंभकरण ने एक गहरी साँस ली। वह जानता था कि यह प्रश्न आएगा। उसने दो महीने इसी एक प्रश्न के उत्तर में बिताए थे।
"भाई, आपकी बात बिल्कुल सही है। इसीलिए मैंने पूरे 2 महीने का समय लिया अपनी बात की पुष्टि करने के लिए। मैंने हर संभावना की तलाश की, हर जगह अपने गुप्तचर भेजे, और पुरानी से पुरानी जानकारी निकालने की कोशिश की। और जो जानकारी मेरे सामने आई, वह बहुत – बहुत ही भयानक थी।" कुंभकरण के स्वर में एक गहरी गंभीरता आ गई थी।
कुंभकरण बताता है, "भाभी दुर्गा के बेटे की उम्र और उस लड़के की उम्र लगभग-लगभग समान है। वह लड़का जब 5 साल का था, तब चौहान परिवार में आया था, तब से ही वे उसकी देखभाल कर रहे हैं। और शकुंतला देवी की पोती से उसकी शादी हो गई है। और उस लड़के ने उनका नाम अपना लिया है, तो उन्हें उसका उपनाम मिल गया है। अब उस लड़के का उपनाम विराज चौहान है। लेकिन उस लड़के के पास साधना का कोई मार्ग नहीं है – उसकी साधना शून्य है।" कुंभकरण ने यह कहते हुए अपनी उँगलियों से 'शून्य' का चिन्ह बनाया।
उसके चेहरे पर एक उलझन थी – कैसे एक ऐसी महान योद्धा का पुत्र, जिसने दो साम्राज्यों की सेनाओं को धूल चटा दी थी, साधना में शून्य हो सकता है? यह उसके लिए एक रहस्य था। शायद वह जानबूझकर अपनी शक्ति को छिपा रहा था? कुंभकरण ने सोचा था कि अगर वह इतने सालों तक अपनी पहचान छिपा सकता है, तो वह अपनी शक्ति भी छिपा सकता है।
"रही बात उसके अतीत की – तो इंदौर शहर के चौहान परिवार में विराज को लाने वाला व्यक्ति शकुंतला देवी का चौथा बेटा सुरेश है, और सुरेश ही रवीना के पिता हैं।"
"जब मैंने जाना कि सुरेश विराज को कहाँ से लेकर आया, तब मुझे पता चला कि हमारे दक्षिणी प्रांत का सबसे ताकतवर परिवार वर्मा परिवार है। वर्मा परिवार के जो मुखिया हैं, उनका पाँचवाँ पुत्र केशव विराज को वर्मा परिवार में लाया था और अपने परिवार को बताया था कि वह उसका पुत्र है।" कुंभकरण ने यहाँ थोड़ा रुककर अपने भाइयों के चेहरे देखे। वर्मा परिवार का नाम उन दोनों से अपरिचित नहीं था। यह परिवार दक्षिणी प्रांत का सबसे समृद्ध और सबसे पुराना परिवार था, जिसकी साम्राज्य में बहुत प्रतिष्ठा थी।
"इसके बाद उस वर्मा परिवार में विराज के प्रति बहुत घृणा का भाव आ गया और उनके परिवार में बहुत हद तक उथल-पुथल मच गई।" कुंभकरण की जानकारी के अनुसार, केशव जब उस बच्चे को लेकर घर पहुँचा, तो उसके परिवार ने उसका बहुत विरोध किया। उसकी पत्नी ने उससे कहा कि वह किसी और की नाजायज़ संतान को घर नहीं ला सकता। उसके भाइयों ने उस पर हँसी उड़ाई कि वह एक अनाथ को वारिस बना रहा है। केशव ने किसी को कुछ नहीं बताया – वह बच्चे के साथ आया था, और उसने कहा था, 'यह मेरा पुत्र है।' परिवार के भीतर बहुत तनाव हुआ। उस बच्चे को स्वीकार करने वाले कोई नहीं थे, सब विरोधी थे। अंततः, केशव को अपने परिवार का एक हिस्सा छोड़कर अलग रहना पड़ा। उसने अपना धन और अपना सम्मान दांव पर लगा दिया था, सिर्फ उस बच्चे की रक्षा के लिए।
"केशव विराज को जिस समय अपने घर लाया था, उस समय हम चोल साम्राज्य में जटायु के घर पर नरसंहार कर रहे थे।" यह बात कुंभकरण ने बहुत धीरे से कही, जैसे वह इस तथ्य के महत्व को कम करना चाहता हो।
"पर इससे अभी भी कुछ साबित नहीं होता है," दशानंद ने कहा।
कुंभकरण उनकी तरफ देखते हुए कहता है, "मैंने वर्मा परिवार के मुखिया के दूसरे बेटे को अपनी तरफ कर लिया है। उसने मुझे बताया था कि केशव और जटायु बहुत अच्छे मित्र हैं – पर यह बात दुनिया को तो छोड़ ही दो, उनके परिवार के चुनिंदा लोगों को पता है। और उसने बताया कि केशव उससे कहकर गया था कि वह जटायु से मिलने जा रहा है। उसी के बाद जब वह लौटता है तो विराज उसके पास होता है।" कुंभकरण के चेहरे पर अब विजय की मुस्कान थी।
यह सुनकर मेघनाथ कहता है, "तो यह बात साबित हो चुकी है कि वह हमारी भाभी दुर्गा का पुत्र है। वैसे उसके अंदर कोई साधना नहीं है और इंदौर शहर का चौहान परिवार इतना ताकतवर नहीं है जो हमारा सामना कर सके।" मेघनाथ ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं, उसके पोर सफेद हो गए थे।
दशानंद ने तुरंत अपने हाथ से मेघनाथ को रोकते हुए कहा, "अगर यह काम इतना ही आसान होता, तो अनुज कुंभकरण अब तक यह कर चुके होते। उन्हें हमारी आज्ञा लेने की भी जरूरत नहीं होती। अगर वह इस काम को नहीं कर पा रहे हैं, तो जरूर इसके पीछे बहुत बड़ा कारण होगा।" दशानंद की आवाज में एक अनुभवी शासक की समझ थी। उसने अपने जीवन में बहुत से जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों के परिणाम देखे थे। वह जानता था कि कभी-कभी सबसे सीधा रास्ता सबसे खतरनाक होता है।
कुंभकरण दशानंद की तरफ देखते हुए कहता है, "आप सही कह रहे हैं, बड़े भाई। अब यह काम इतना आसान नहीं रहा है।" उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई थीं।
मेघनाथ फिर से बीच में बोलते हुए कहता है, "ऐसा क्या बदल गया है जिससे हम उस मामूली से परिवार और बिना साधना वाले बच्चे को नहीं मार पा रहे हैं?"
कुंभकरण एक गहरी साँस लेते हुए कहता है, "समस्या है आचार्य विदुर।"
यह नाम सुनते ही दशानंद बड़े आश्चर्यचकित रह जाते हैं, उनके समझ में नहीं आ रहा होता है कि इन सब घटनाओं के बीच आचार्य विदुर कहाँ से आ गए। उसकी भौहें ऊपर चढ़ गईं और उसका मुँह खुला रह गया।
कुंभकरण आगे बताता है, "आचार्य विदुर ने एक महीने पहले ही नालंदा गुरुकुल की एक शिष्या को अपनी मुख्य शिष्या के रूप में चुना है। वह मुख्य शिष्या कोई और नहीं, विराज की पत्नी रवीना है।" कुंभकरण ने मामले की जटिलता को बताया। "अगर हम किसी तरीके से धोखे से या किसी तरह के जाल में फंसाकर विराज को मार देते हैं, तो रवीना हमसे बदला लेने जरूर आएगी। और अगर रवीना आती है, तो उसके पीछे उसके गुरु आचार्य विदुर भी आएंगे।"
कुंभकरण ने यह कहते हुए अपनी दोनों उँगलियाँ उठाईं – पहली उँगली पर रवीना, दूसरी पर आचार्य विदुर। उनके बीच एक अटूट संबंध था, एक गुरु-शिष्य की वह डोर जिसे कोई भी ताकत नहीं तोड़ सकती थी। और सबसे बुरी बात – आचार्य विदुर शायद पहले से ही सब कुछ जानते थे। उसने रवीना को अपनी शिष्या बनाया था क्योंकि वह जानता था कि वह कौन है? क्योंकि वह जानता था कि उसका पति कौन है?
तभी मेघनाथ अपनी तलवार के हत्थे पर हाथ रखते हुए कहता है, "तो इसमें डर की क्या बात है? बेशक आचार्य विदुर मगध साम्राज्य के 10 शक्तिशाली लोगों में आते हैं, परंतु मगध साम्राज्य के शाही परिवार की ताकत के सामने आचार्य विदुर की ताकत को तो छोड़िए, पूरा नालंदा गुरुकुल भी कुछ नहीं है। हम उनका नामों निशान मिटा देंगे।"
यह बात सुनते ही दशानंद मेघनाथ पर चिल्लाते हुए कहते हैं, "मेघनाथ, मेरे समझ में नहीं आता है कि तुम इतने अधीर क्यों हो जाते हो। जो सामने दिखता है, कभी-कभी वह पूरा सच नहीं होता है।" दशानंद का चेहरा क्रोध से लाल हो गया था। उसकी आवाज गरज रही थी – एक शासक की गरज, एक बड़े भाई की गरज। वह मेघनाथ की इस जल्दबाजी से बहुत परेशान था। उसने अपने छोटे भाई की इस अंधी वीरता को बहुत बार देखा था, और हर बार उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ी थी। लेकिन इस बार, कीमत बहुत अधिक थी – पूरे मगध साम्राज्य की कीमत।
कुंभकरण भी उनकी बातों में अपना सिर हिलाकर हामी भरता है।
दशानंद अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहता है, "तुम्हें क्या लगता है, आचार्य विदुर बहुत ताकतवर हैं या उनका नालंदा गुरुकुल बहुत ताकतवर है? समस्या वह नहीं है। समस्या है उनके पूर्व चार शिष्य। वही उनकी ताकत का असली स्रोत है।"
दशानंद आगे कहता है। "हम नहीं जानते कि उनके शिष्य, जब से मगध साम्राज्य छोड़कर गए हैं, वह कहाँ हैं – जिंदा भी हैं या साधना के मार्ग पर मर गए। पर हर कोई जानता है कि आचार्य विदुर के शिष्य उनसे भी कहीं ज्यादा शक्तिशाली हैं। आज अगर हम आचार्य विदुर को मार देते हैं और नालंदा गुरुकुल को खत्म कर देते हैं, तो भविष्य में जब उनका कोई भी एक शिष्य अगर वापस लौटता है, तो हम नहीं जानते कि वह कितना ज्यादा ताकतवर होगा। और अपने गुरु के अपमान के लिए वह हमारे दरवाजे पर खड़ा होगा। उस समय हमारे शाही परिवार को बचाने वाला कोई नहीं होगा। इसीलिए जो भी करना है, वह हमें सोच-समझकर करना होगा।" दशानंद ने अपनी बात समाप्त की तो कमरे में पूर्ण सन्नाटा छा गया।
दशानंद कुछ देर तक अपनी आँखें बंद करके गहन विचारों में खोए रहते हैं।
वह फिर कुछ सोचकर बोलते हैं, "कुंभकरण, तुमने कहा था कि उस लड़के विराज की साधना शून्य है। तो मैं चाहता हूं कि तुम उस लड़के पर नजर रखो। अगर वह लड़का कभी भी हमारे रास्ते में नहीं आता है, तो उसे उसकी जिंदगी जीने दो।" दशानंद की आवाज में एक निर्लिप्तता थी – जैसे वह किसी अपरिचित के बारे में बात कर रहा हो, न कि अपने भतीजे के बारे में। उसने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि वह जानता था कि अनावश्यक हिंसा अक्सर अनावश्यक समस्याएँ पैदा करती है। अगर विराज शांत रहता है, अगर वह अपनी पहचान कभी प्रकट नहीं करता है, अगर वह चुपचाप इंदौर शहर में रहता है, तो उसे जीने देना ही बेहतर था।
"अगर वह मगध साम्राज्य की राजधानी की ओर बढ़ता है, तो उसके सामने कई सारी चुनौतियाँ खड़ी करो और उसे इतना उकसाओ कि वह स्वयं हमें चुनौती दे दे। फिर हम उस लड़के को मार सकते हैं, जिससे कोई भी हमें गलत नहीं ठहरा पाएगा – यहाँ तक कि आचार्य विदुर के भी हाथ बँध जाएंगे।" दशानंद ने यह कहते हुए अपने हाथों को इस प्रकार जोड़ा जैसे वह कोई जाल बना रहा हो। उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी – वह मुस्कान जो उसके पिता ने उसे कभी नहीं सिखाई थी। वह एक ऐसी योजना बना रहा था जो कानूनी लगे, जिसमें वह निर्दोष बने, और जहाँ विराज खुद अपने विनाश की जिम्मेदारी ले। उनके लिए, यह सबसे अच्छा तरीका था। वे विराज को सीधे नहीं मारेंगे – वे उसे उकसाएँगे, वे उसे चुनौती देंगे, वे उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ बनाएँगे कि उसके पास लड़ने के अलावा कोई विकल्प न बचे। और जब वह लड़ेगा, तो वे उसे 'आत्मरक्षा में' मार देंगे। यह एक पूर्ण षड्यंत्र था – चालाक, गुप्त, और प्रभावी।
दशानंद की बात सुनने के बाद कुंभकरण और मेघनाथ के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। आखिरकार उन्हें वह मौका मिल ही गया। वे अपने तरीके से काम कर सकते हैं और विराज के लिए रास्ता बना सकते हैं कि वह उस रास्ते पर चलते हुए यहाँ तक पहुँच सकता है या नहीं। अगर पहुँचता है, तो वे उसे हराकर अपनी विजय घोषित करेंगे।
मगध साम्राज्य के शाही महल के उस बंद कमरे में, तीन भाइयों ने एक निर्णय लिया था – एक ऐसा निर्णय जो पूरे साम्राज्य का भविष्य बदलने वाला था। उन्होंने सोचा था कि वे शिकारी हैं, परंतु वे यह भूल गए थे कि कभी-कभी सबसे धैर्यवान शिकार ही सबसे घातक होता है। और विराज, वह 'मुफ्तखोर घर जमाई', वह 'साधना-शून्य' व्यक्ति, उसने अब तक जो सबसे बड़ा कौशल सीखा था, वह था – प्रतीक्षा करना। और अब, उसकी प्रतीक्षा समाप्त होने वाली थी।