सूर्यकुल का सूर्यास्त - 18 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 18

अध्याय 18 जिंदल परिवार की अंतिम आशा

अगले ही पल, विराज कमरे के अंदर आया।

उसने कमरे के अंदर एक नज़र डाली — एक ओर जगदीश मित्तल अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ था, और उसके साथ एक अपरिचित महिला थी, जो संभवतः कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति लग रही थी, क्योंकि जगदीश का व्यवहार उसके प्रति अत्यधिक आदरपूर्ण था।

वह महिला दिखने में निस्संदेह सुंदर थी। परंतु विराज ने अपनी पुरानी जिंदगी में इससे भी अधिक सुंदर महिलाओं को देखा था। ऐसी सुंदरियाँ जिनके सामने यह महिला फीकी पड़ जाती। लेकिन उनमें से कोई भी उसे कभी अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाई थी, क्योंकि विराज के लिए बाहरी सौंदर्य का कोई मूल्य नहीं था।

विराज अपने चेहरे पर चिरपरिचित उदासीन भाव लिए हुए, चलता हुआ सीधा जगदीश मित्तल के बगल वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गया और बोला "आज मेरी साली पल्लवी का जन्मदिन है। मुझे उसके लिए एक उपहार खरीदना है। तुम उसके लिए एक उचित उपहार चुनकर ले लो — ऐसा उपहार जो उसकी स्थिति और हमारे रिश्ते के अनुरूप हो।"

विराज किसी यांत्रिक पुतले की तरह बोल रहा था, जिसे अपने शब्दों से कोई लगाव न हो।

"और तुम्हें यह भी पता होगा कि कुछ दिनों बाद हमारे चौहान परिवार की कुलमाता शकुंतला देवी का जन्मदिन है। चौहान परिवार उस अवसर पर एक भव्य समारोह आयोजित करने वाला है — पूरे दक्षिणी प्रांत के कुलीन परिवार, साम्राज्य के गणमान्य लोग, और दूर-दूर से मेहमान आएंगे। चूँकि मैं उनकी सबसे लाड़ली पोती रवीना का पति हूँ — रवीना, जो उनकी आँखों का तारा है, जिस पर पूरे परिवार को अथाह गर्व है — और रवीना जिस तरह से तरक्की कर रही है, उसे देखते हुए, मैं रवीना की ओर से दादीजी को एक उपहार देना चाहता हूँ। एक ऐसा उपहार जो रवीना के प्रति उनके स्नेह और रवीना की कृतज्ञता दोनों को व्यक्त करे। तुम जो उचित समझो, उसके अनुसार तुम ये दोनों उपहार खरीदकर मेरे घर भिजवा देना। मुझे इनमें कोई राय देने की आवश्यकता नहीं है — तुम बेहतर जानते हो कि किसे क्या देना उचित रहेगा।"

इतना कहने के बाद विराज ने दो अंगूठियाँ निकालीं और मेज पर रख दीं।

तभी उसकी नज़र मेज पर रखे उस पन्ने पर पड़ी, जिसे कुछ समय पहले मीनाक्षी ने जगदीश को दिया था। विराज ने एक क्षण के लिए उस पन्ने को देखा, उसकी आँखें उस पर टिकीं। परंतु उसने तुरंत अपनी नज़र हटा ली। वह जो करने आया था, पहले उसे वह काम पूरा करना था।

विराज ने फिर से जगदीश की ओर देखा और आगे कहा "यह वह भंडारण अंगूठी है जो तुमने मुझे पहले दी थी, तुम इसे वापस ले सकते हो। और यह दूसरी भंडारण अंगूठी में अस्सी प्रथम चरण के आध्यात्मिक जानवरों की लाशें हैं, जिन्हें मैंने स्वयं शिकार करके मारा है। तुम इन्हें नीलामी के लिए भेज देना, और जो भी रकम इनसे प्राप्त हो, वह मेरे पिछले संचित धन में जोड़ देना।"

यह सब कहकर विराज चुप हो गया। 

इधर, जगदीश मित्तल ने चुपचाप उन दोनों भंडारण अंगूठियों को उठा लिया। उसने पहले उस अंगूठी को एक तरफ रखा जो खाली थी । फिर उसने दूसरी अंगूठी को अपनी हथेली में रखा, अपनी आँखें बंद कर लीं, और अपनी चेतना को उस अंगूठी के भीतर भेज दिया।

वहीं दूसरी ओर, मीनाक्षी जिंदल पूरी तरह से आश्चर्यचकित थी।

जब विराज पहली बार अंदर आया था, तो उसने उसकी एक सरसरी झलक देखी थी। उस समय उसने उसे केवल एक साधारण युवक समझा था। उसने देखा था कि विराज ने बहुत ही साधारण कपड़े पहने हुए थे — ऐसे कपड़े जो न तो किसी धनी व्यापारी के पहनावे से मेल खाते थे, न किसी कुलीन परिवार के वस्त्रों से। 

इसके अलावा मीनाक्षी ने उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा के स्तर को मापने का प्रयास किया था, और उसने पाया था कि विराज उच्च लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर पर था। बाईस वर्ष की आयु में यह साधारण था। 

परंतु जैसे ही विराज अंदर आया, उसके व्यवहार ने मीनाक्षी को झकझोर कर रख दिया। न तो जगदीश का अभिवादन किया, जो इस केंद्र का संचालक था और स्पष्टतः उससे बहुत वरिष्ठ था। यह कोई छोटी बात नहीं थी। सामाजिक रीति-रिवाजों में, इस प्रकार का व्यवहार बेहद अपमानजनक माना जाता था। एक साधारण युवक के लिए, ऐसा करना आत्महत्या के समान था।

और सबसे बड़ी हैरानी तो उसे तब हुई जब विराज बिना किसी की अनुमति लिए, बिना किसी संकोच के, सीधे जगदीश मित्तल के बगल वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

लेकिन इससे भी अधिक हैरान करने वाली बात यह थी कि जगदीश मित्तल ने भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

इस समय, मीनाक्षी के मन में एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी। वह सोच रही थी, यह लड़का, जो दिखने में जगदीश का नौकर बनने लायक भी नहीं लगता, जिसके कपड़े फटेहाल हैं, जिसका व्यवहार असभ्य और अशिक्षित प्रतीत होता है, वह इस कमरे में जगदीश का मालिक बनकर बैठा है। 

मीनाक्षी अभी इस पूरी स्थिति का आकलन कर ही रही थी, कि तभी जगदीश मित्तल ने विराज की ओर देखा और बड़े ही विनम्र स्वर में कहा "शाम तक मैं उचित उपहार आपके यहाँ भिजवा दूंगा। मैं आपको बिल्कुल भी निराश नहीं करूँगा। आप निश्चिंत होकर जा सकते हैं। मैं स्वयं इन उपहारों के चयन की देखरेख करूंगा, ताकि कोई कमी न रहे।"

विराज ने धीरे से अपना चेहरा जगदीश की ओर घुमाया और कहा "क्या तुम किसी के इलाज के लिए काला नाग फूल के बारे में सोच रहे हो, पर उसका कोई फायदा नहीं है। काले नाग फूल से बनाई गई औषधि गोली — चाहे वह कितनी भी शुद्धता से बनाई जाए, चाहे कितने भी कुशल हाथों से बनाई जाए — वह केवल उसे छह महीने तक ही जिंदा रख पाएगी। उसके बाद, मंगल ग्रह की कोई भी दवाई, कोई भी औषधि उस पर असर नहीं करेगी। और उसकी मृत्यु निश्चित हो जाएगी।"

विराज ने यह बात यूँ ही नहीं कही थी। जब विराज साधना या अभ्यास में व्यस्त नहीं होता था, तो वह उस समय किताबों को पढ़ने में लगाता था। परंतु मंगल ग्रह पर तो मंगल ग्रह से जुड़ी ही किताबें होती हैं। और वह अभी मगध साम्राज्य के दक्षिणी प्रांत में था, इसलिए यहाँ उपलब्ध अधिकांश किताबें मगध साम्राज्य और उसके दक्षिणी प्रांत से संबंधित थीं। उसने साम्राज्य के इतिहास का अध्ययन किया था, उसके भूगोल का अध्ययन किया था, उसकी राजनीति और संस्कृति का भी अध्ययन किया था। लेकिन विराज को सबसे अधिक आश्चर्य इस पन्ने की बीमारी ने किया था। 

क्योंकि उसके अनुसार, यह बीमारी मंगल ग्रह पर होना थोड़ा मुश्किल था, इसके लिए आवश्यक परिस्थितियाँ, आवश्यक वातावरण, और आवश्यक आध्यात्मिक दूषण मंगल ग्रह पर सामान्यतः नहीं पाए जाते थे। यह एक दुर्लभ रोग था, जो केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही उत्पन्न होता था। 

मीनाक्षी ने जैसे ही अपने दादा की मृत्यु की संभावना की बात सुनी, उसके शरीर में मानो आग लग गई हो और वह फट पड़ी "तुम होते कौन हो यह सब कहने वाले?, तुम्हारी उम्र देखकर पता चल रहा है कि तुम इक्कीस-बाईस साल से अधिक के नहीं हो। और तुम्हारे कपड़े इन्हें देखकर साफ पता चल रहा है कि न तो तुम कोई हकीम हो, न किसी बड़े परिवार के वंशज हो। तुम एक साधारण से दिखने वाले व्यक्ति हो।"

जगदीश मित्तल चुपचाप यह सब सुन रहा था। लेकिन उसका पूरा ध्यान विराज द्वारा कही गई बात पर था। जगदीश उस वाक्य के हर संभावित निहितार्थ को समझने का प्रयास कर रहा था।

सबसे पहली बात, विराज ने केवल उस पन्ने को पढ़ा था। बस इतना ही। उसने किसी से कुछ नहीं पूछा था, उसने कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं माँगी थी, उसने न तो मीनाक्षी से बात की थी और न ही किसी और से। और वह यह अनुमान लगा सका कि वे काले नाग फूल का उपयोग करने वाले हैं।

यह अनुमान लगाना — इतनी कम जानकारी से इतना सटीक अनुमान लगाना — सामान्य मानवीय क्षमता के परे था। यह असंभव था। फिर भी, विराज ने इसे कर दिखाया था, और ऐसे किया था मानो यह कोई बड़ी बात ही नहीं है।

दूसरी बात, और भी अधिक चौंकाने वाली थी, विराज ने यह भी बता दिया था कि काले नाग फूल से बनी औषधि गोली का क्या परिणाम होगा। उसने सटीक समय बताया ठीक छह महीने। 

और तीसरी बात, यदि इन दोनों तथ्यों को एक साथ रखा जाए, तो एकमात्र निष्कर्ष यही निकलता था कि विराज को पता है कि यह बीमारी क्या है। उसे इस बीमारी का नाम पता है, इसके कारण पता हैं, इसके लक्षण पता हैं, और सबसे महत्वपूर्ण इसका इलाज कैसे संभव है, यह भी पता है।

जगदीश मित्तल के मन में, विराज अब केवल एक व्यापारिक ग्राहक नहीं था, वह एक व्यापारिक लेन-देन से बहुत ऊपर उठ चुका था।

जगदीश ने तुरंत अपने हाथ जोड़ लिए। उसने अपनी पूरी विनम्रता के साथ मीनाक्षी की ओर देखा, अपनी आँखों में गंभीरता लाते हुए कहा "मोहतरमा, कृपया रुक जाइए, मुझे लगता है कि क्रोध में आकर आप अपने हाथ से वह सबसे बेहतरीन अवसर खो रही हैं जो आपको कभी मिल सकता है।"

मीनाक्षी गुस्से में तो थी ही, परंतु वह इतनी बुद्धिमान थी कि वह जानती थी, इस समय उसे जगदीश की आवश्यकता थी। उसने एक गहरी साँस ली, और अपनी आँखों को ठंडा करते हुए जगदीश की ओर देखा। "आप क्या कहना चाहते हैं, जगदीश जी?"

जगदीश ने कहा "मोहतरमा, इस पूरे महाद्वीप पर इस पूरे मगध साम्राज्य में ऐसा कोई हकीम नहीं है जो उस बीमारी के बारे में कुछ बता सका हो। विराज एक क्षण उस पन्ने को पढ़ता है, और उसी से यह अनुमान लगा लेता है कि आप काले नाग फूल के पीछे पड़ी हैं। यह जानकारी, केवल उसी व्यक्ति के पास हो सकती है जो इस बीमारी को जानता है।"

मीनाक्षी जिंदल जगदीश की बातें सुनकर बुरी तरह असमंजस में पड़ गई। 

उसने एक गहरी, लंबी सांस ली। फिर उसने जगदीश की ओर देखते हुए कहा "जगदीश जी, मैं आपकी बात पर विश्वास करती हूँ। लेकिन इस लड़के को मुझे विश्वास दिलाना होगा। अगर यह मुझे सही-सही बता सकता है कि मेरे दादाजी को क्या हुआ है, अगर यह मुझे ऐसा प्रमाण दे सकता है जिसे मैं अस्वीकार न कर सकूँ, तो मैं अपनी अभी की गई गलती के लिए, अपने क्रोध और अपने अपमानजनक शब्दों के लिए, इससे क्षमा माँगूंगी। और यह जो भी दंड देगा, मैं उसे स्वीकार करूंगी।"

जगदीश ने अपना चेहरा विराज की ओर घुमाया, और एक दयापूर्ण, लगभग विनती भरे भाव से उसकी ओर देखा। 

विराज ने यह सब देखा, यह सब सुना, और उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। फिर उसने मुँह खोला "इस पन्ने में यह बताया गया है कि आपके दादा के माथे पर और सीने पर एक काला निशान है, जो कई वृत्तों में बना हुआ है, जैसे कोई चक्र हो। परंतु यह बात अधूरी है, उनकी गर्दन के पीछे, ठीक उस स्थान पर जहाँ रीढ़ की हड्डी खोपड़ी से मिलती है, एक और ऐसा ही काला निशान होगा — बिल्कुल वैसा ही, उतने ही वृत्तों के साथ, उतनी ही गहराई के साथ।"

मीनाक्षी ने विराज के शब्दों को सुना — और उसके शरीर में मानो बिजली दौड़ गई।

वह सब कुछ भूल गई, अपना क्रोध भूल गई, अपना अहंकार भूल गई, अपनी प्रतिष्ठा भूल गई, यहाँ तक कि यह भी भूल गई कि वह कौन है और कहाँ है। केवल एक ही बात उसके मन में थी, विराज ने वह बात कह दी थी जो कोई और नहीं कह सका था। उसने वह विवरण बता दिया था जो पन्ने में नहीं लिखा था, जो केवल वही जान सकता था जो सच में इस बीमारी को समझता हो।

उसे अब कोई संदेह नहीं रह गया था।

वह तुरंत अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई। एक क्षण के लिए उसकी आँखों में संकोच झलका, लेकिन अगले ही क्षण वह विराज के पैरों में जाकर गिर पड़ी।

हाँ, वह गिर पड़ी। मगध साम्राज्य की भावी सलाहकार मंत्री, जिंदल परिवार की सबसे प्रतिभाशाली संतान, वह महिला जिसके एक इशारे पर हजारों लोग झुकते थे, वह आज एक साधारण-से दिखने वाले युवक के पैरों पर गिरी हुई थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और वह बोली "जो मैंने अभी किया है, उसके लिए — मेरे क्रोध के लिए, मेरे अहंकार के लिए, मेरे अपशब्दों के लिए कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए। और कृपया मेरे दादाजी का इलाज कर दीजिए। या कम से कम हमें बता दीजिए कि हम उनका इलाज कैसे कर सकते हैं। बस इतना ही... मैं आपसे और कुछ नहीं माँगती। मेरे दादाजी मेरे लिए सब कुछ हैं।"

उधर जगदीश मित्तल मीनाक्षी की ऐसी प्रतिक्रिया देखकर बहुत विचलित हो गया था। उसने सोचा भी नहीं था कि मीनाक्षी इस हद तक चली जाएगी। बेशक विराज के पास उसके दादा का इलाज था, बेशक वह उनकी एकमात्र आशा था, लेकिन मीनाक्षी कोई साधारण लड़की नहीं थी। 

पर इस घटना से जगदीश को एक और बात भी पता चल रही थी। मीनाक्षी अपने दादा से बहुत अधिक प्रेम करती थी, इतना अधिक प्रेम कि उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। 

वहीं विराज ने एक गहरी साँस ली। उसकी आँखों में मीनाक्षी के प्रति कोई दया नहीं थी, कोई सहानुभूति नहीं थी, कोई प्रसन्नता नहीं थी।

उसने अपना चेहरा जगदीश की ओर घुमाया, मानो मीनाक्षी उसके सामने है ही नहीं, और कहा "मैं जिसकी मदद करूँगा, मुझे यह भी तो पता होना चाहिए कि वह मेरी मदद के योग्य है या नहीं।"

जगदीश को तुरंत अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने विराज को मीनाक्षी के बारे में कुछ भी नहीं बताया था, न उसका नाम, न उसका परिवार, न उसकी स्थिति, न ही उसके दादा का परिचय। वह विराज के सामने एक पूर्ण अपरिचित थी, और वह उसकी मदद करने से पहले यह जानना चाहता था कि वह कौन है।

जगदीश ने तुरंत विराज को सब कुछ बता दिया। 

विराज ने मीनाक्षी की ओर देखा, ठीक उसकी आँखों में देखा, जहाँ से अभी-अभी आँसू बहकर रुके थे और अपनी उसी उदासीन, निर्लिप्त आवाज़ में कहा "जाकर अपनी जगह बैठ जाओ।"

मीनाक्षी जल्दी से अपनी जगह से उठी, उसने अपने आँसू पोंछे, और तुरंत अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। 

विराज ने फिर से उसकी ओर देखा, और कहा "पहले तुम मुझे अपने दादाजी को दिखाओ। उन्हें स्वयं देखकर ही मैं उनकी बीमारी का सही-सही आकलन कर पाऊँगा, यह बीमारी किस अवस्था में है, उनके शरीर पर कितना असर हो चुका है, और सबसे महत्वपूर्ण उन्हें ठीक करने में मुझे कितना समय लगेगा। बिना उन्हें देखे, केवल लक्षणों के आधार पर कोई भी निदान अधूरा होता है।"

उसने थोड़ा रुककर, अपनी आँखें मीनाक्षी से हटाकर खिड़की के बाहर देखा, जहाँ सूरज धीरे-धीरे आसमान में चढ़ रहा था, और फिर कहा "रही बात उसके बदले में कुछ देने की... मैं तुम्हें समय आने पर स्वयं बता दूँगा कि मुझे क्या चाहिए।"

यह सुनते ही मीनाक्षी थोड़ा हिचकिचाई। उसके मन में एक बात घूम रही थी, विराज बदले में क्या माँगेगा? वह क्या चाहता होगा? लेकिन उसने अपने संकोच को तुरंत दूर कर दिया। क्योंकि इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात अपने दादाजी को बचाना था। उसने अपना सिर ऊपर उठाया, विराज की आँखों में सीधे देखा, और दृढ़ स्वर में कहा "मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ।"