मुख़बिर - 15 राज बोहरे द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

मुख़बिर - 15

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(15)

ब्याह

कृपाराम की याददास्त बड़ी तेज है । जब उसका ब्याह हुआ तब वह दस बरस का रहा होगा, लेकिन उस दिन जब किस्सा सुनाने बैठा तो आंख मूंद कर इस तरह राई-रत्ती बात सुनाता चला गया जैसे अभी कल की कोई्र घटना बता रहा हो ।

पहले उसने अपने खानदान की कीर्ति उचारी -‘‘ हमारा कुल-खानदान घोसी के नाम से जग-जाहर है, पर हम असिल में गड़रिया हैं । हमारे बाप-दादा गाय-भैस चरात हते तो उन्हे सबि लोग ’गोरसी‘ ’गोरसी‘ कहत हते, बाद में गोरसी ते घोसी कहलान लगे। गड़रिया दो तरहा के होते हैं एक नीखर और दूजे ढेंगर । नीखर वे जो गड़रिया राजा की ब्याही-थ्याही गड़रिया रानी से पैदा भये, और दूजे ढेंगर वे जो उनकी बामन रानी से पैदा भये ।‘‘

लल्ला पंडित को अपनी ब्राहमण जैसी सर्वोच्च जाति की स्त्री के गड़रिया की रानी बन जानेे की बात सुनकर बड़ा झटका लगा, सा जलकर उसने पूछा-’’ दाऊ, जे कहां की कथा दे निकारी तिमने ! कहां के पुराण ले आये जे कथा? कौन सी बामनरानी गड़रिया राजाके संग ब्याही गयी ।‘‘

कृपाराम विहंसा-‘‘ पंडित सारे, तैं का जानत, तिहारी जाति की सिग औरते सती-सावित्तरी हत हैं, सारे उनको भी शरीर है, उन्हे भी भूख-प्यासु और दीगर इच्छायें व्यापतु हैं । वे भी मरद को संग चाहतु है, ............हां, हम जिन रानी की चरचा करि रहे, वे तो मजबूरी में गड़रिया राजा के संग रहन लगीं थीं । किस्सा कछु ऐसो भयो कि, एक बामन देवता की घरवाली पानी भरनि को पनघट गईं थी, लौटतु में बीच मारग में एक गड़रिया अपनी गाड़रनि को हांकत चलो आइ रहो हतो, । भेड़नि की गर्द से बचिवे के लाने बामननी एक तरफ को हट के खड़ी है गई । अब हजारनि गाड़रें निकरिवे में लगी अंधेर देर, सो जब बामननी घर पहुंची बामन देवता बड़े फिरंट हो गये-बता दारी कहां गई हती ? बेचारी बामननी समझातु रही, कै पीवे को जल अशुद्ध न हो जावे तासे मैं रास्ता में ही एक तरफ को हट के ठाड़ी है गई हती, पै बामन न मानो, और गुस्सा में अपनी घरवारी को घर ते निकरिवे को हुकम दे दयो। लाचार बामननी वा ही गड़रिया राजा के पास गई जा की गाड़रें निकर रई हती, और अपनो दुखड़ा कह सुनाओ । बामन के पास बामननी को संग लेके आये गड़रिया ने बामन को बहुत समझायो, पै पंडित महाराज कहां से मानिवे वारे हते । पत्नी तज दई सो तज दई । बोले- तैं बड़ो भलो चाहि रहो जाको, जा तू ही रखिले, जा खों !‘‘

‘‘ लाचारी में गड़रिया राजा ने अपने घर में पहली रानी के संग-संग बामननी को भी रख लियो । जो बच्चा बामननी से पैदा भये वे सब ढेंगर कहलाये और गड़रिया रानी से पैदा भई संतान कहलाई नीखर । हम लोगनु में आपस में शादी ब्याह नही होतु है । हमारे दर्जननि गोत्र हैं-सागर, पटोरिया, रठोरिया, हिन्नवार, कोको लोरिया, चंदेल, और भी जाने कहा कहा ।‘‘

मैने इशारे से लल्ला को रोका और कृपाराम से बोला-‘‘दाऊ, आप तो अपने ब्याह का किस्सा सुनाओ ।‘‘

कृपाराम ने मुझे डांटा-‘‘ हमारे बाप को किस्सा तो सुनि लो पहिले !‘‘

मैं सहम गया-‘‘ सुनाओ दाऊ, हमिने समझी कै जे लल्ला पडित कथा में बिघन डारि रहे।‘‘

श्यामबाबू अकड़ उठा था-‘‘ केसे बिघन डारेगो, जो पंडित वारो सारो, पीछे से धुंआ निकाद्दगों सारे के ।‘‘

मैं और लल्ला दोनों सिहर उठे ।

कृपाराम फिर शुरू हो गया । हम सब उसके संग-संग कथा में बहने लगे ।

गंगा घोसी ग्राम जनकौरा के रहने वाले थे । बचपन में ही उनका ब्याह फूलपुरा की शिवदेई के साथ हो गया था । सन छप्पन की बात है, सारी दुनिया में भयानक अकाल पड़ा । गंगा के घर की सारी भेड़-बकरियां चारे-पानी के अभाव में फैली महामारी में एक-एक कर के खतम हो गईं । गंगा थे अपने बाप के इकलौते लड़के, उस बखत तक बाप भी सुरग सिधार गये थे और मताई भी । चाचा भी नहीं थे, उनके दो लड़का थे-जमुनाप्रसाद और रेवती प्रसाद, और उनकी भी हालत ठीक नही थी । गंगा के घर में कोई दूसरा था नहीं, उनका बचपन में ही ब्याह हो गया था, हां दूसरी विदा नही हो पाई थी । गांव में तो पेट भरना भी कठिन था न मजूरी मिलती थी न कहीं से कुछ उधार, सो अकाल के मारे गंगा सोच विचार के अंततः अपनी ससुराल जा पहुंचे । ससुर का घर खूब खुषहाल था । कछु दिन मेहमानी करी फिर मन मारि के गंगा अपने ससुर के घर में ही रहने लगे ।

बाद में वहीं उनके एक लड़की और एक लड़का हुआ-नाम रखे, चम्पा और कृपाराम ।

बुरा समय जैसे तैसे निकल गया । जब दिन फिरे तो वे अपने गाव लौटे । अपने गांव में रहके उनकी हालत संवरी तो उनने अपना पुराना खण्डहर मकान नया पक्का बना लिया और अपनी भेड़-बकरियां भी पाल लीं ।

तब कृपाराम और श्यामबाबू छोटे थे, कालीचरण और अजय राम का जनम तक नहीं हुआ था, कि एक दिन दस बरस के कृपाराम को देखने करया ( ब्याह तय कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले खास पेषेवर लोग) आ पहुंचे ।

गंगा को अपना घर करया के आने लायक लगा तो उन्हे अपार खुशी हुई । ‘समाज के लोगों में उनके घर लौट आने और फिर से आसूदा होने की चर्चा होने लगी है षायद, ‘ उनने सोचा । करया लोगों की आवभगत में गंगा घोेसी ने कोई कसर नही रख छोड़ी । एक बकरा कटा । रात को देर तक वे लोग शादी ब्याह की बातें तय करते रहे । कृपाराम को सिर्फ इतना याद है कि रात को ब्यारू करके वह सोने जा रहा था कि दादा ने हेला मार के उसे बुलाया था और अपनी बगल की खाट पर बैठे चार-पांच लोगों से ‘जय राम जी की‘ करने को कहा था। कृपाराम ने जय राम जी की करी और अवाक सा खड़ा उन पीले साफे वाले मुच्छड़ लोगों की तरफ टुकर-टुकर ताकता रहा था ।

दूसरे दिन वह जब अपनी गाड़र चराने हार में गया, तो सारे साथी उसे चिढ़ा रहे थे-इक मोड़ा की भई सगाई, दुलहन बन के छेरी आई ।

तब जाकर उसे अहसास हुआ था कि जैसे गांव के किसन, मरजाद, झनकू वगैरह की सगाई हो गई है, कल रात वैसी ही उसकी भी सगाई हो गई है ।

अम्मां ने कृपाराम के ब्याह की तैयारी शुरू कर दी थीं ।

फिर महीना भर बीता होगा कि एक दिन फिर से मोहल्ले के मरद-औरतें जुटीं । एक पीले पग्गड़ वाले ने उसके हाथ में कलावा से लपेट कर रखा गया कागज का एक लिफापा और पांच रूपया-नारियल दियेे ।

कृपाराम ने वह लिफापा अपने पिता को सोंप दिया। बुआ की बातों से कृपाराम को पता लगा कि इस लिफापे में आज लगुन आई है, बुआ और अम्मां गुनगुना उठीं थी-

राजा दसरथ फूले न समायें, लगुन आई मोरे अंगना

आजे फूले, आजी फूलीं फूले सब परिवार

रामचंदरजी ऐसे फूले जैसी फूले है फुलवार

लगुन आई हरे हरे, लगुन आई मेरे अंगना....

अगले कई दिन तक यही क्रम बना रहा, सांझ ढले ही घर के लोगों की रोटी-पानी से निपट कर मोहल्ले की गोते-नाते की महिलायें कृपाराम के घर पर इकट्ठी हो जातीं और अपनी मनपसंद सखी के साथ आंगन में रखी चकिया मिटटी की चक्की पर बैठ कर छबलियांे (छोटी डलियों) में गेंहूं या चने की दाल लेकर पीसने लगती थीं ।

वह दिन माता पूजन का दिन था । सुबह से ही नाई दादा हर घंटे दो घंटे बाद कृपाराम के शरीर में उबटन (बेसन को तेल में मल कर बनाया गया घरेलू बॉडी क्लीनर) का लेपन कर रहे थे, जिससे उसके बदन का मैल निकल आये और वह गोरा होकर सुंदर बन्ना (दूल्हा )के रूप में बरात के लिये अभी से तैयार हो जायें ।

सांझ तक उसके बदन पर पांच बार उबटन लगा या और दो बार उसे नहलाया गया । सांझ के पहले वह फिर नहाया । नये कपड़े पहन कर वह तैयार हो गया और पौर में जा बैठा । मौका देख कर उसके कुछ दोस्त उसके पास आकर बैठ गये । इस बखत वे आपस में क्या बाते करें यह नही समझ पा रहे थे, उधर बाहर गांव का ढपला बजाने वाला आ गया, और सामने के चबूतरे के सहारे खड़ा होकर दरवाजे पर डम डाम डिमा-डम डाम डिमा का मस्ती भरा संगीत गुजाने लगा । अब लगने लगा था कि इस घर में ब्याह कारज होने वाला है ।

तब अंधेरा घिर रहा था जबकि कृपाराम को पौर में से भीतर बुला कर अम्मां ने उसके हाथ में लाल कपड़े की दो छोटी-छोटी झंडिया दे दीं, और उससे अपने दोस्तों के साथ मंदिर की तरफ चलने को कहा । नाई ने उजाले के लिए गैस बत्ती ( पैट्रोमैक्स) उठा कर अपने कंधे पर रख ली थी और वह सबसे आगे चल पड़ा था ।

गांव के बाहर जहां हनुमान जी की मढ़िया थी वहीं कुछ दूसरी मूर्तियां रखीं थीं। चबूतरे पर पहुंच कर काकी ने कृपाराम के हाथ की झंडियां अपने हाथ में लेकर मूर्ति के पीछे बनी जगह पर खोंस दी और पानी ढार कर पूजन आरंभ करदी ।

कुछ देर बार वे लोग घर लौट आये, तो कृपाराम को थकान अनुभव होने लगी, वह अपने पिता के बिस्तर पर जा लेटा था और उसे झपकी सी आ गई थी।

रात दस बजे के करीब सरमन भैया की घरवाली बजार वाली भाभी ऊंघते से कृपाराम के पास आई और उसकी बांह में च्योंटी भर के उस जगाती हुई बोली-‘‘ चलो देवर लाला, तुम्हारे हरदी लगा दें ।‘‘

हल्दी

कृपाराम उठा तो वे उसे लेकर बीच आंगन में ले आई । आंगन में गोबर से उरेन डाल कर ( लीप कर ) बीच में आटे और हल्दीसे चौक पूरा जा चुका था, बढ़ई के यहां से छेंवले की लकड़ी की बनी चार-चार अंगुल चौड़ी और हाथ-हाथ भर लम्बी दो पटली दो दिन पहले ही आई थी। बुआ ने कृपाराम के हाथ में एक कटार देकर उसे पटली पर उकडूं बैठने का इषारा किया ।

कृपाराम इस वखत उन सबके हाथ का खिलौना बन गया था । वह वैसी ही हरकतें कर रहा था जैसा उसे इषारा किया जा रहा था ।

भौजी ने उसकी कमीज उतरवाई और पिसी गीली हल्दी की भरी थाली लेकर सामने लकर रख दी । सबसे पहले अपनी दांयी हथेली में गीली हल्दी का लोंदा लेकर भौजी ने कृपाराम के चेहरे पर मल दिया । फिर अम्मां ने नाम ले लेकर छह औरतों से और कहा जो आगे आकर कृपाराम की छाती-पीठ और हाथों पर हल्दी मलने लगी। औरते गा रही थीं -

हल्दी हल्दी हरदोली हारो उपजी जे सिंघल दीप

हल्दी कहे मैं पियरी हारो मो बिन कारज न होय हो...

ऐसी हरद मेंहगी भई हारेां बिकये रूपया सेर हो

पैसा की पैसा भरी हारों बिकये रूप्या सेर हो

ऐसी दूला की मैया आजी बुआ बिकये रूप्या सेर हो

लाड़ली हारेां वे बनिया के जाये हो

बनिया हे लड़वाओं के हारो रखों रात बसाये हो

रात बसाई न बसी वे तो समझ गई दिल मांझ हो

हल्दी हल्दी हरदोली उपजी .........

अम्मां ने बजार वाली भौजी से कहा- जा दारी अपने देउर खों तनिक ठीक ठीक हरदी और लगा दे ।

मुसकराती भौजी ने आंख मार के कहा -अबहीं हाल लगाउत चाची ।

एक हाथ में हल्दीकी थाली दूसरे में कृपाराम का हाथ पकड़ केेवे भीतर वारे कमरे में जा पहंुची फिर हुकुम के स्वर में कुपाराम से बोली- अपनो सूथना उतारि देा लालाजी, हल्दी लगवालो तनिक !

कृपाराम भौचक्का से उन्हे देख रहा था, तो देर होती देख भाक्ी ने उसकेे पजामा का नाड़ा खच लिया था, और जब तक कृपाराम पजामा संभालता, तब तक तो पजामा नीचे जा चुका था । कमर में अंटी पट्टे की पुरानी सी तुड़ी मुड़ी सी चड्डी उसके बदन पर लटकी हुई थी, इस दशा मंें अचानक आ जाने पर कृपाराम सकुचा गया था ।

वह अपनी चडडी संभालता खड़ा था कि टेसन वाली भौजी ने हल्दी की अंजली भर के कृपाराम के पांवों में जांघो से लेकर पंजों तक रगड़ना शुरू कर दिया था । कुछ ही देर में उसके देानेां पांव भी उसके चेहरे, पीठ सीने की तरह पीले पीले मोटे सूखे लेप से लिथड़़ गये थे ।

आधा घंटे बाद कमरे में से मुस्कराती भौजी उसे अब तक छोटे से लला बने रहने के लिये उलाहना देती हुयी वहां से चली गई थीं, जब कि उसके बदन का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहां भौजी ने बेदर्दी से हल्दी न रगड़ डाली हो।

उसके साथ मामा का हमउम्र लड़का षंकर सहबाला के रूप में पहरेदार के रूप में लगा दिया था, और उसे अकेले-दुकेले घर से निकलने की मनाही कर दी गई थी । खेत मे दिषा मैदान को जाते वक्त भी उसके साथ उसका सहबाला रहता था ।

कृपाराम ने अनुभव किया कि मामा का लड़का षंकर हालांकि अभी कंुंवारा था लेकिन उसे दुनियादारी की बातों का बड़ा अच्छा ज्ञान था । वह दो दिन से कृपाराम को ब्याह-षादी के बारे में तमाम ऐसी नई बातें बतला रहा था, जो कृपाराम को कभी रस विभोर करती थीं तो कभी सुखद बिस्मय में डाल देती थीं ।

सुबह आंगन के बीचों बीच जहां बैठा के कृपाराम को हरदी-तेल चढ़ाया गया था, वहीं ठीक उसके बगल में उरेन डालकर एक और चौक पूरा जा चुका था । फूफा ने पूजा की थाली मे से हरदी चावल लेकर जमीन की पूजन की, फिर लोहे के सब्बल को भी पूज दिया। हल्दी-चावल, फूल-बताषा और आंटी बांध कर जमीन पर रखा सजा हुआ वह सब्बल उस वक्त ऐसा उम्दा लग रहा था मानो ब्याह के रीति रिवाजों में इस तरह श्रम और श्रम से जुड़ी चीजों को उचित सम्मान दिया जाना किसी समय पर आरंभ की गई कोई श्रमवादी परंपरा हो ।

चौक के बीचोंबीच सब्बल से खोदके आठ अंगंुल गहरा गड्डा बना कर फूफा ने सबसे पहले लोहे की कील, कोयले की डगरिया, तांबे का छेददार सिक्का, हलदी की गांठ, साजी सुपारी, हल्दी-चावल और फूल डाला फिर उस गडडे में खंभ रख कर मिट्टी से पूरने लगे । उधर बुआ और फूफा मिल कर खंभ गाड़ रहे थे, उधर पछार वाली मामी ने गीत टिटकार दिया था-

राम लछमन जे दर खोदियो, सवा साय रोपे है खम्भ !

मण्डप रमानों सियाराम ने....!

ग्ंगा राम जे दर खोदियो, सवा साय रोपे हें खम्भ !

मण्डप रमायो कृपाराम ने !

चार पांच तगड़े से लड़के आनन-फानन में उनके आंगन में जमा हो गये थे, जिन्हे देखकर प्रसन्न मन अम्मां ने उनसे कहा -भइया हो, तुम सब मिलिके मड़वा पूरि देउ !

अम्मां ने पहले उन सबको हल्दी का तिलक लगा कर चावल चिपकाए, फिर सबको एक-एक बताषा खाने के लिए दे दिया, आंगन के एक कोने में रखी आठ-दस बल्लियों और उन हरे पत्तों की पूजा करने लगीं जो दो तीन पहले गांव के हल्ला कक्का जंगल से काट लाये थे ।

कुछ देर बाद आंगन के चार कोनों में चार थुमियां (लकड़ी की आदमकद बल्लियां) गाड़ कर ऊपर आड़ी लकड़ियां बांध दी गई थीं फिर बीच के खाली हिस्स्े पर आम और जामुन की हरी डालियों व पत्तों को पूरा जाने लगा था

मण्डप छाया नहीं कि औरतों में भात पहनने की रस्म निभाने हेतु हलचल होने लगी ।

ढपला वाले बुलावाये गये और मोहल्ले में भात का बुलौआ फिरवा दिया गया । अम्मां ने गुलाबी रंग की हरी किनार की कटवर की साड़ी पहनी और बहुत दिनो ंबाद अपने बालों में कंघी की ।

इषारा मिला तो आगे-आगे ढपला वाला और पीछे-पीछे सारी औरतें गाती हुई चल पड़ी थीं । गांव की गलियों में अपने गीत गुंजाती वे सब भतैयों के निहोरे करती हुई गीत गा रही थीं -

भैया भात सबेरे लेके जल्दी आना रे...

भैया भाभी जेसी बेंदी झूमर हमको लाना रे...

बहन क्या पागल हो गई है, बहर का सिर्रन हो गई है

बहन क्यालड़का बेचूंगा, बहन का लड़की बअेचूंगा

बहन क्या खुद बिक जाऊगां...

तुम्हे मैं क्या क्या लाऊंगा

भैया तुम भाभी बिचवा दो

तुम मुझको जेवर मंगवा दो

दूसरी भाभी ले आना, भैया तुम भात ले आना......

बजार वाली भाभी के गीत सबको खूब मस्त कर देते है, वे हमेषा नई फैसन के खूब जोरदार गीत गाती थी, कृपाराम को आज इतने बरस बाद अधबुढ़ापे में भी टेसन वाली भाभी का मण्डप की तारीफ में गाया वह गीत याद है जो उनने घर से चलते वक्त उठाया था और घर लौटते तक वे बीच में बीच में नये नयंे दोहों को अंतरा के रूप में जोड़ कर अकली गाती रहीं थीं -

बन्ना जी तुमरो मण्डप बड़ो भारी...

हीरा मोती लटक रहे, सोने की छबि न्यारी, बन्ना जी तुमरो.....

काली चोटी ऊन की जी वह गांठ गंठीली होय

बालापन की दोस्ती जी बड़ी रसीली होय बन्ना जी ...

सीसी भरी गंुलाब की जी वर भेजू किसके हाथ

देखनिहारे घरे नहीं और देवरिया नादान......बन्ना जी

कोठा ऊपर कोठरी जीवर गड़े सुनार

पायल गडियो बाजनी जी झनक सुने लगवार......बन्ना जी तुमरो मण्डप.....

बेला भरी खीचड़ी जी वर घी बिना खाई न जाये

बहुत पियारो मायको जी वर बिन रहो न जाये...बन्नाजी तुमरो.....

क्या साइकिल का बैठना जी वर साड़ी सत्यानास

साइकिल पर से गिर पड़ी जी वर टूटे बत्तीसी दांत....बन्नाजी

छो गोरी दो सांवरी जी कहीं चारई हाटनि जांय

गोरी के लग गओ काटना जी चारों झोंका खाय...बन्ना जी

तुरसाने को मोंगरा जी जे मे करिया नाग

काटत काटत मैं बची जी पिया तुम्हारे भाग....बन्ना जी

घड़ी भर आराम करके महिलाओं ने भात पहनने की तैयारी षुरू कर दी, अम्मां ने भीतर के कमरे से नारियलों से भरी डलिया लाकर अपने पास रख ली थी और एक नये लोटा में जल भर के कलष के रूप में अपने भैया भाभी से ष्सगुन का रूप्या डलाने के लिऐ मण्डप के बीच में रख दिया था । कुटुम के बड़े-बूड़े बुलाये जाने लगे थे जिससे कृपाराम के मामा उनको भात की पहिरावन पहना कर सम्मान कर सकें ।

बारी-बारी से खानदान के बड़े बुजुर्ग मण्डप के नीचे आते गये और कृपाराम के मामा उन सबको अपनी श्रद्धा और हैसियत से जो भी कपड़े यानी कि कमीज, तौलिया वगैरह बन सकी, भेंट करके तिलक लगाते रहे । अंत में कृपाराम के दादा, अम्मां कृपाराम उसकी बहन और भाई को वस्त्र देकर मामा ने सबके पांव छुये ।

कृपाराम को बरात में जाना बड़ा अच्छा लगता है, क्योंकि वहां सारी सेवायें अथफर हाती है । हजामत के लिए नाई बैठा होगा, कपड़ों के लिए धोबी तो जूतों पर पॉलिष का भी इंतजाम होगा, और फिर खाने का तो पूछो ही मत, पल पल पर तरहा-तरहा के पकवान के भरे दोने मिलेंगे । कृपाराम बेकरारी से उस क्षण का इंतजार कर रहा था जब बरात की बैलगाड़ी में बैठने के लिए उसके दादा उसे इषारा करेंगे ।

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