मुख़बिर - 4 राज बोहरे द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

मुख़बिर - 4

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(4)

गुस्सा और भूख

अनेक सिपाही तो लेटते ही सो गये पर मैं जाग रहा था।

रात का सन्नाटा गहरा रहा था, लेकिन मैं रोज की तरह मन ही मन एक हजार आठ बार राम का नाम गिन रहा था । दादा कहते हैं कि यह एक टोटका है, जिसे अपनाने से नींद जल्दी भी आती है और नींद गहरी भी होती है।

दिन में समूह के बीच सुरक्षित चलते वक्त तक जरा-जरा सी आवाज पर हमारे बदन में फुरफुरी आ जाती थी, फिर तो इस वक्त रात के अंधेरे में असुरक्षित लेटे हम सब थे। मुझे ऐसे कई हादसे याद आ रहे थे जिनमें बागियों या नक्सलियों ने इस तरह किसी इमारत में मकाम किये लेटी पुलिस टीम को डायनामाइट लगा के उड़ा दिया था। इसलिए जहां भी जरा सा खटका होता मैं ही नहीं जाग रहा हर सिपाही एक पल को चौंक उठता।

मुझे याद आ रहा था छह महीने पहले का वह दिन जिस दिन मैं अपनी गर्भवती पत्नी विशाखा का चैकअप कराने शहर ले गया था।

दादा आगबबूला हो उठे थे, जब उन्हे पता लगा कि बेटा आज बहू को साथ लेकर यह चैक कराके आ रहा है कि पेट में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की! दरअसल सोनाग्राफी सैण्टर पर गांव का परसदिया मिल गया था, वह अपनी पत्नी के गर्भ में मौजूद बच्चे के लिंग के परीक्षण के लिए आया था और उसने हमको भी लगे हाथ यह सलाह दे डाली थी कि हम भी चैक करालें ।

मैं लौटा तब दादा घर के बाहर चबूतरे पर बैठे थे, चेहरे पर रोष की परत साफ पढ़ी जा सकती थी। मैंने उन पर एक निगाह डाली तो मेरी हवा निकल गई । नीचा सिर किए मै देहरी उलांघता भीतर घुसा । पगे के बीच से होता जब आंगन मे पहुंचा तो अम्मां चुपचाप बैठी हमारी ही बाट जोह रही थी।

मैंने डरते डरते पूछा, ‘‘का बात है गई अम्मा? दादा रिसाये से काहे बैठे!’’

अम्मां भी नाराज थी, जलती सी आंखों से मुझे घूरती हुई, अनख से उठ खड़ी हुई ओर पैर ठनकाती हुई मढ़ा में चली गई । मैं बेबसी से पत्नी को देखता रहा गया था।

वो रात अबोले की रात थी । पत्नी डरी हुई थी ओर मैं सहमा हुआ ।

अम्मां का धीरज सुबह जवाब दे गया । मुझे चाय का कप पकड़ाती वे बोली थी, ‘‘ बहू को पेट पराये मर्द के सामने उघरवाते तुम्हे लाज नही आई रे निपूते!’’

‘‘अम्मो, डॉक्टर तो माई-बाप है, उससे क्या छिपाना ।?’’

‘‘पूरे गांव में तो ऐसी हवा है कि तुम पेट की औलाद की जांच करावे गये हते।’’

‘‘ काहे वामें का गलती है? पहली बेटी जनम से लंगड़ी पैदा भई है, तासे दूसरी संतान की हालत पहले से दिखवा लेवे में कछु गलती नाने अम्मां। ...का तुम और दादा जे चाहतु कै आंगन में दो-दो लंगड़ी मोड़ियें घिसटती फिरें!’’ अपने मन का संपूर्ण दर्द मैने अम्मां से कह डाला तो मुझे चैन मिला, लगा कि उनकी कल की व्यर्थ की नाराजी का मैंने सही जवाब दे दिया है।

अम्मां मेरे जवाब से सन्नाटे में थीं, और एक पल रूक कर बाहर चबूतरे पर कुल्ला दातुन कर रहे दादा को शायद कल की घटना को इस नजरिये से बताने के लिए चली गई थीं।

आंगन में घिसट रही कृष्णा को देखकर मुझे अम्मां और दादा पर बेहद गुस्सा आया। इस निरीह बच्ची के दोनों पांव टखनों से अंदर से मुड़े हुऐ थे, इस वजह से वह न खड़ी हो पाती थी न चल पाती थी, यहां तक कि उसकी टट्टी-पेशाब भी विशाखा को कराना पड़ती थी।

कुछ देर बाद अम्मां लौटी तो दादा का पैगाम उनके साथ था, मेरी पेशी दादा के इजलास में लग चुकी थी।

मैं आत्मविष्वास में भरा हुआ बाहर पहुंचा तो दादा का बदला स्वरूप् मेरे सामने था, अब उनकी नजरों में मेरे प्रति स्नेह था, ‘‘का बताओ डॉक्टर ने ? जो मोड़ा-मोड़ी स्वस्थ है, कै जो भी.....’’

‘‘ नई, लड़का है, और खूब स्वस्थ है।’’ नीचा सिर किये मैंने जवाब दिया था, जिसको सुनकर उनकी बांछें खिल गईं थी।

‘वे परहेज ओर दवाइयन को ध्यान राखियो जो डॉक्टर ने लिख भेजी हैं’ प्यार भरी हिदायत के साथ दादा उठ गए थे और् घर से बांये तरफ जा रही गली में बढ़ लिए थे अब वे अपने जादू-टोने से जुड़े दोस्त जालम को सारी बातें बताकर बच्चे की सलामती के लिए गंण्डा-ताबीज बनबा कर लौटेंगे।

दादा का गुस्सा ऐसा ही है। बड़े भैया शिवराज ने जब इनकी बात न मानी और पटवार्यान की टेनिंग नहीं ली तो उन्हे नजर से ही उतार दिया, लेकिन मैंने इनका पूरा कहना माना और आज इन्ही की बदौलत पटवारी हूं, खूब मजे से नौकरी कर रहा हूं, अपने गांव में रहता हूं और खेती पाती देख लेता हूं।

दादा रिटायर्ड हो गये हैं लेकिन आसपास के इलाके में आज भी रिटायर्ड पटवारी नाथ्ूराम खरे का नाम एक जीते जागते कानून के रूप् में लिया जाता है, दादा को लेण्ड रेवेन्यू कोड ही नहीं सीपीसी और और सीआरपीसी की भी अनगिन धाराऐं कंठस्थ हैं, अच्छे खासे वकील को वे परास्त कर डालते हैं। इलाके में वारदात होते ही लोग दादा के पास उसकी खुददा-बखेरी के लिए आन खड़े होते है। दादा कभी फेल भी नहीं हुए मामलों के समझने में । रात दिन की चलाफिरी का परिणाम है कि पैंसठ के होने को आये लेकिन बदन में जरा सी थकान नही है, अभी कहो तो चटट से ग्वालियर को चलती धर दें।

मैं तब तक नहा धोकर निपटा ही था कि दादा ने घर में खंसते हुऐ प्रवेश किया।

हम सबका ध्यान उनकी ओर गया। वे चिंतित दीख रहे थे । मुझे पास बुलाया।

‘रात-बिरात निकरिवों बंद कर देउ अब, पतो लगो है कै कृपाराम घोसी को गैंग आजकल इते ही फिर रहो है।’

‘वो तो उत ग्वालियर वा पार को रहवे वारो है, उतई वाके मददगार है, हिन का मरिवे के काजे आओ है?’

‘ जो बात कही बात सोलह आने सही है, सो समझ लो ’ कहके दादा अम्मां को ताबीज और काले रंग का धागा विशाखा को बांधने का तरीका समझाने लगे।

मैं परेशान था, चुनाव होने वाले थे, मुझे रिटर्निंग कार्यालय से बस में मतदान दल लेकर अपने इलाके में जाना था, ...अब दादा से कैसे कहूं कै आप लाख कहें लेकिन मुझे चाह कर भी रात बिरात निकलने की जोखिम से बचना संभव नही है।

खैर अभी तो महीना भर रखा था ।

गांव भर महीना भर तक पूरी तरह सतर्क रहा।

चुनाव का खर्रा आया तो दादा चिंतित हुए, ‘ मैं तहसीलदार से मिल आउं । कह देंगों कै दुलहन उम्मीद से है और पूरे दिन चल रहे है, पता नही कौन घड़ी गिरिराज की जरूरत पर जावे, तासे चुनाव-फुनाव से मुकति देओ साहब!’

लेकिन मैं जानता था कि कुछ नही होना है, फिर भी दादा तो गये ही और निराश लौट भी आए, सबने टका सा जवाब दे दिया था।

मेरी रवानगी का दिन तय था, उसके पहले घर मे एक बिन कहे शोक का आलम व्याप्त था।

अम्मां ओर विशाखा ने मिलकर तीन-चार दिन के लिए खान के वास्ते नमकीन खस्ता और मीठे खुरमा बना डाले थे और वो भी दूध में आटा उसन के विशुद्ध घी मे तल कर ।

अलबत्ता मैं निष्चिंत सा था क्यों कि चुनाव कार्य में पुलिस की इतनी अवाजाही के बीच किसी बागी की हिम्मत नहीं दीखती थी कि वह जहां छुपा बेठा होगा वहां से सींग भी हिलाएगा।

करवट बदली तो मेरा ध्यान बगल में गुड़मुड़ी होकर लेटे लल्ला पंडित की तरफ गया, ‘जे भिखमंगा बेचारा बेकार में मर गया।’

ये तो बागियो की हलचल जानते बूझते घर से निकला है, लेकिन करता भी क्या, कहावत है न कि भूखे से ज्यादा निडर कौन होगा?

लल्ला महाराज मेरे बाल सखा इन दिनों भारी परेशान थे, उनकी जिजमानी ग्वालियर के वा पार के हरसी डेम और आसपास के इलाके में थी । हर साल वे उधर जिजमानी मांगवे जाते थे और दस-पांच कुंटल सस्सों ले पड़ते थे, लेकिन इस बार उस इलाके में डाकु के भारी मूवमेंट के कारण उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही कि उधर जाकर जिजमानों से अपनी सालाना दक्षिणा मांग लाऐं।

उधर उनकी पत्नी उन्हे दम नही लेने दे रही, ‘ अरे तुम जैसे कंगला को बागी नहीं खाय जा रहे । भिखमंगा बामन होके बड़ी बड़ी बातें सोचत हो। जाउ और अपना साल भर को इंतजाम करि लाओ हिम्मत करके, नाहीं तो मोड़ी-मोड़ा भूखन मरेंगे ।’

लल्ला ने मुझे आ कर सुनाया तो मैंने उसे चुनाव के एक दो दिन पहले जाने का सुझाव दिया ताकि उन दिनों पुलिस के भारी मूवमेंट के कारण छोटी’मोटी गेंग और गिरोह छिप के बैठक जायें।

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Bhuvnesh Goyal 2 साल पहले

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