मुख़बिर - 1 राज बोहरे द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

मुख़बिर - 1

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(1)

शक़

मैंने इस बार शायद गलत जगह पांव रख दिया था। पांव तले से थोड़ी सी मिट्टी नीचे को रिसकी थी, जिससे हल्की सी आवाज हुई। मुझे लगा, मेरी गलती से शोर पैदा हो रहा है। अभी हाल गालियां सुनने को मिलेंगी.....हो सकता है कि एकाध धप्पा भी खा जाऊं । सो मैं डर गया । मेरी झिझकती निगाह रघुवंशी पर गई । वह शांत दिख रहा था। मैं निश्चिंत हुआ, यानी कि हम सब सुरक्षित थे ।

पहाड़ पर चढ़ने का कोई अभ्यास नहीं था हम सबको, लेकिन चारों ओर मड़राते खतरे की वजह से हम सब लोग इस वक्त ऐसी सतर्कता के साथ पहाड़ी पर चढ़ रहे थे, मानो अभ्यस्त पर्वतारोही हों । वैसे इसे पर्वतारोहण नहीं कहा जा सकता था, बस, पहाड़ी के ऊपर जाने वाले कच्चे रास्ते पर झाड़ियों की ओट लेकर किसी तरह धीमे-धीमे रूकते-ठिठकते से आगे बढ़ रहे थे हम सब । हमारे बीच चुप्पी व्याप्त थी। हम आपस में जो भी संदेश देते हाथों या आंखों से इशारा करके काम चलाते । झाड़ियों में उलझने से बड़े जतनपूर्वक खुद को बचाते हम लोग घिसटते से आगे बढ़ रहे थे । ऊपर से थोड़ा बहुत वजन भी था सब पर । हालांकि हम दोनों के पास तो फिर भी अपने थैले के सिवाय कोई सामान न था, लेकिन पुलिस सिपाहियों के पास तो पीठ पर बंधे पिट्ठू और हाथ में लटकी रायफल को मिलाकर तीस-पैंतीस किलो से ज्यादा वजन रहा होगा । इतने वज़न की वजह से सचमुच एक-एक कदम चलना बड़ा कठिन था उन सबको । उसके भी ऊपर खतरा ये कि पता नहीं कब बागियों की नजर पड़ जाये और ऊपर से गोलियां अर्रा उठें यकायक । हम दोनों का तो मुंह सूख रहा था बार-बार । कहां आ फंसे इस मौत के जंजाल में !

आखिरकार जैसे-तैसे करके पूरी तरह सुरक्षित रहते हुए पहाड़ी के ऊपर पहुंच ही गये सब लोग । एक बार फिर हम लोगों का कलेजा मुंह को आ गया यह सोचकर कि अगर वे लोग वहां मौजूद हुए तो क्या प्रतिक्रिया होगी उनकी ! निश्चित है कि गोलियां चलेंगी । मैं कल्पना करता हूँ कि गोली चलाने की शुरूआत कौन करेगा.... ! और इस गोलीबारी में हम दोनों का क्या हाल होगा... ?

लेकिन सारी आशंकायें निराधार रहीं मेरी । ऊपर कोई नहीं था । सूनी पड़ी थी पूरी की पूरी नंगी और वूक्षहीन पहाड़ी ।

एक छोटे से छत जितना चौड़ा खाली मैदान था हमारे सम्मुख ।

दूर से ही सामने पड़े एक पुराने से थैले में कोई सामान ठूंस-ठूंस कर भरा दिख रहा था, हमको लग रहा था कि कोई हड़बड़ी में वह झोला वहां छोड़ कर भाग निकला होगा।

रघुवंशी यकायक चीखा-‘‘ मार लिया मैदान ! खबर सच्ची थी, कल रात वे बदमाश बागी इसी जगह रूके थे। वो देखो कित्ते सारे निशान हैं- ये अधजली लकड़ियें, ये बीड़ी के ठूंठ और वे आम के अथाने की कलियें ! जरूर कल की रात इस जगह खाना पकाया-खाया है उन हरामियों ने ! डरपोक भाग गये यहां से !....तो भी अभी ज्यादा दूर नहीं भाग पाये होंगे साले । कम ऑन ! चलो सही दिशा में बढ़ रहे हैं हम !‘‘

‘‘ये देखो, कोई चटनी-अटनी पीसी थी उनने, इस पत्थर पर हरी-हरी कोई वनस्पति सी चिपकी है, मिस्टर सिन्हा लुक हियर।‘‘ छोटे दरोगा शर्मा ने अपने बॉस के प्रति चापलूसी दरशाते हुए उत्साह से अपनी खोज प्रदर्शित की ।

-‘‘ या ! हेतम जरा तुम देखो उस झोले को।‘‘ एसएएफ के डिप्टी कमांण्डेंट सिन्हा ने दोनों दरोगाओं के अनुमान का समर्थन करते हुए हैड कानिस्टबल हेतमसिंह को थैले की पड़ताल करने का संकेत किया ।

-‘‘ तनिक संभाल के देखिये लला, बागिन्न ने कोउ बम-फम न धद्दओ होय।‘‘ यकायक बुजुर्ग सिपाही इमरतलाल ने थैले की तरफ बढ़ते हेतम को पीछे से टोका ।

हेतम चिहुंक कर पीछे हटा-‘‘ मैं न देख रहो दरोगा जी ! इन सारों ते दिखाओ।‘‘

-‘‘ चल रे मोटा लाला, तू देख ! देख तो कहा रख गये हैं तुम्हारे बागी दोस्त !‘‘ रघुवंशी ने मुझे हुकुम झाड़ा ।

‘‘ निस्फिकर रहो दरोगा जी, इसमें बम-फम कछु नहीं है । उनपे बम कहां ते आये ?‘‘ कहते हुए मैंने आगे बढ़ कर पुराने कपड़े के बने उस घिसे-से झोले की तनी को दांये हाथ से इत्मीनान से पकड़ कर झोला उठाया, बांये हाथ से नीचे से पकड़ा और उसे उल्टा करके अपने चेहरे के सामने ऊंचा टांग लिया।

....और, सचमुच उस झोले में से बम-पिस्तौलें नहीं बल्कि ढेर-सारे फटे-पुराने कपड़े टपकने लगे । आखिरी में धप्प से एक जोड़ी जूते नीचे आ गिरे थे उसमें से । पुलिस दल के सारे लोग आंखें फैलाये उस सामान को ताक रहे थे, इस भाव से कि यह साला लाला कित्ती जानकारियां रखता है बागियों के बारे में!

-‘‘धत्तेरे की ! इतनी परेड के बाद, ये फालतू सामान मिलना था, हिष्ट साले।‘‘ कहता रघुवंशी झुंझला रहा था जबकि मैं और लल्ला उसकी बेबशी का मजा लेते आंखों ही आंखों में मुस्करा रहे थे ।

झोले में से निकला सामान पुलिस डॉग्स को सुंघाया गया, तो दोनों कुत्ते जंजीर खींचते हुए नीचे जाने को उतावले हो उठे ।

कुछ देर बाद दोनों पुलिस डॉग पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे, और पीछे हमारी पूरी टीम भाग रही थी । खाकी वरदियों के बीच हम दोनों अन्यमनस्क से दौड़ रहे थे ।

दोपहर के दो बजने को थे लेकिन ऐसा नहीं लग रहा था कि पुलिस वाले जल्दी ही भोजन पानी का कोई इंतजाम करेंगे । मैं लल्ला के कान में फुसफुसाया-‘‘ लल्ला पंडित, जे लोग सांचउ जालिम दीस रये हैं, दौ बजि गये और अब तक न खायवो, न पियबो, हम जों ई बेगार से इनके पीछे भूखे-प्यासे भाजते फिर रहे हैं।‘‘

-‘‘ हां गिरराज ! इनते तो वे बागिऊं ठीक हते, खुदऊ खाइ लेत हते और हमाये काजे भी भुनसारे से ख्वाय देत हते । जे तो उनतेऊं कर्रे दीसत हैं ।‘‘

सहसा मेरे कांधे पर पुलिसिया दबाब महसूस हुआ ‘‘ ये क्या खुसर-पुसर कर रहे हो तुम लोग ! वे जगह क्यों नही बता रहे, जहां डाकू छिपे रहते हैं ।‘‘ रघुवंशी मुझे हड़का रहा था ।

-‘‘वे ही जगह तो ढूढ़़ रहे हैं दरोगाजी‘‘ कहते हुए लल्ला पंडित ने दांत चियार दिये थे ।

-‘‘ कहां ढूढ़ रहे हो ? बस हमारे पीछे-पीछे फिरते रहते हो !आगे बढ़के कभी नहीं बताते कि साहब इस रास्ते पर बागी मिल सकते है। कभी अपने दिल पर हाथ रख कर सोचना कि जिस काम के लिए तुम आये हो, जिनका नमक खा रहे हो, उनके लिए आज तक तुमने कितना काम किया ! ‘‘ हमे उलाहना देकर आगे बढ़ते रघुवंशी के चेहरे पर उलाहने के भाव थे ।

पल-पल में मिजाज बदल लेने वाले इस दरोगा का स्वभाव मै आज तक नहीं जान पाया था । हर पल अकड़ता ही रहता था यह । इसकी ठसक देख कर सहसा मुझे चम्बल घाटी के सच्चे व्याख्याकार सीताकिशोर खरे के कुछ दोहे याद आ गये, और मैंने लल्ला के कान में मुंह लगा कर एक दोहा सुना दिया-ठसक कसक दो में बची, रची असीम अपार ।

कै बागी की प्रेमिका, कै फिर थानेदार ।

यकायक दरोगा फिर पलटा और उसने हमारी ओर अंगारों की तरह सहसा एक वाक्य उछाला- ‘‘ सच्ची बात यह है कि तुम लोग आज तक अपने आपको इस टीम का मैम्बर नहीं मान सके, हमेशा बेगानों की तरह दूर-दूर बने रहते हो ।‘‘

मैं चौंका ! अचरज की बात है उस दिन डाकू श्यामबाबू बोला था -‘‘ तुम साले सब के सब दूर-दूर काहे बने रहते हो । जब हम अपने बराबर को मानि के तुम्हे अपयें संग खवाय रहे, पिवाय रहे और पारि भी संगे रहे ; तोउ जे बेगानों से बने रहते हो !‘‘

मेरा मन हुआ था कि कह डालूं -‘ बेगाने न रहेगे तो का तुमिमें मिलि जायेंगे । तुम कहि भले लो, पर हमे मिला न सकते अपने में । तुम खुद हमे बेगानों की तरह रखते हो, बेगाने ही नहीं जंजीर में बंधे जानवर की नांई ! ......बात-बात पर हमे घुड़क देते हो, हूदा मार देते हो और किसी-किसी की तो बात बेबात पिटाई का नियम सा बना लिया है तुम सबने । ......हम सबके उपनाम रख लिए हैं तुमने-अपमानित करते से बेहूदगी भरे उपनाम !..... हममें से कोई मोटा है, तो कोई भिखमंगा, कोई मुच्छड़ है तो कोई टिड्डी, कोई हंगा है तो कोई मुत्ती।‘ लेकिन उनसे ऐसा कह पाना इतना आसान थोड़ी था, पता नहीं इसी बात पर मुझे गोली मार देता श्यामबाबू ! वैसे कहना तो इनसे भी उतना ही कठिन जान पड़ता है मुझे।

हालांकि उपनामों का क्या है, ये ही तो आदमी की निजी पहचान बन जाती है । हम दोनों को उन्ही उपनामों से ये पुलिस वाले बुलाते है। हम तब बागी के यहां भी चुप रहते थे, अब भी चुप रहते है। ये लोग जो चाहते हैं हमे मजबूरी में वही करना पड़ता है, इन्हे जो अच्छा लगता है वही कहते हैं हम । अपनी मरजी से न कुछ कह पाते न कर पाते ।

लल्ला तो रघुवंशी साहब से कहना चाहता था ‘ काहे को ये बेकार की कवायद कर रहे हो रघुवंशी साहब ! वारदात करने के बाद अब बागी कहां धरे होंगे इधर ! वे इस डांग से बहुत दूर किसी कस्बे में पहुंचके किसी शुभचिंतक की कोठी पर जा छुपे होंगे........... या घोसियों के किसी गांव में पहुंच के अपने किसी नेता बाप की कोठी पर गुलछर्रे उड़ा रहे होंगे । ‘ लेकिन उसकी बात सुनता कौन ? सो हमेशा की तरह चुप बने चलते रहे, हम दोनों ।

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