पगडंडी Mukteshwar Prasad Singh द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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पगडंडी

पगडंडी
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​​आज मंजू का सब कुछ उजड़ गया। इस कारण नहीं कि भूकंप आया था या सुनामी लहर आयी थी या फिर तूफानी वर्षा या बाढ़। आज सिर्फ उसकी ही दुनियां उजड़ी थी। आज उसके पति सुबोध ने जीवन का सफर पूरा कर लिया था। .......और आठ वर्षाें से कम उम्र के तीन छोटे बच्चों का बोझ, अपनी पत्नी पर छोड़ गया था।
​​कल शाम की ही तो बात है, सबसे छोटा तीन वर्षीय पुत्र गुड्डू सुबोध की गोद में सो गया था, पत्नी खाना बना रही थी। सुबोध सावधानी से बेटे को बिछावन पर सुला दिया और अपनी दुकान पर सौदा बेचने चला गया। सामान बेचने के क्रम में ही बोरे के नीचे दुबका किसी विषधर सांप ने डंस लिया और मात्र आधा घण्टा के भीतर ही उसके प्राण पखेड़ू उड़ गये। इतना क्रूर और भयानक प्रहार नियति ने मंजू और उसकी तीन अबोध संतानों पर एक साथ किया कि सम्पूर्ण गाँव स्तब्ध रह गया। शाम को बाप की गोद में सोया गुड्डू सुबह में सदा कि लिए बाप की गोद से महरूम हो गया था। वह हक्का-बक्का था भीड़ को देखकर।
​​सुबोध की लाश घर के आँगन में रखी थी। सैकड़ों स्त्री-पुरूष, बड़े- बूढ़े लाश को घेरे सुबक रहे थे ।साँप काटने के कारण चालीस वर्ष की उम्र में ही सुबोध की हुई असामयिक मौत पर विभिन्न तरह से चर्चे कर रहे थे। गांव का हर कोई गम में डूबा हुआ था, शोक संतप्त था।
​​कुछ ही दिनों पहले सुबोध लम्बी बीमारी से उबड़ा था। उस बीमारी में मौत के मुँह तक पहुंच कर लौटा था। फेफड़े की बीमारी के कारण वह इतना कमजोर हो गया था कि गृह रक्षा वाहिनी की सशस्त्र ड्यूटी निभाने में अक्षम हो गया सो गांव में ही सड़क किनारे झालमूढ़ी, पकौडे़ एवं लीट्ठी-चोखा आदि बेचने लगा। एक माह के अंदर नाश्ता - भूजा की दुकान चल पड़ी। अच्छी आय होने लगी। शरीर की कमजोरी भी खान-पान से ठीक हो गयी थी।
​​परन्तु यह कौन जानता था कि नियति को कुछ और मंज़ूर है और उसकी नजर सुबोध की उम्र पर पड़ चुकी है। आखिरकार मौत को भी आने का अच्छा बहाना मिला। साँप काटने के बाद तीस मिनट के अंदर ही वह चल बसा संसार से। ना किसी अस्पताल ,ना डाक्टर तक जाने का मौका मिला। आश्चर्य तो यह जानकर है कि उसने जब दुकान के आगे बैठे दो,चार यार दोस्तों को कहा कि मुझे सांप ने काट लिया है तो सभी हंसकर कहने लगे तुम्हारी नौटंकी करने की आदत नहीं जाएगी। तुमको साँप काटेगा ? तुम तो खुद धामन सांप हो। सांप को कहीं सांप काटा हैं।
​​सुबोध ने रूआंसा होकर कहा-‘मैं’ मजाक नहीं, सच कह रहा हूँ, मेरी इलाज कराओ, नहीं तो मैं मर जाऊँगा।‘‘
​​एक दोस्त ने कहा- ‘‘ठीक है, रामपुकार काका से तुम्हें सांप का विष झड़वा देता हूँ, चलो।‘‘ अन्य दोस्त भी साथ चले। उसकी दुकान के सामने ही रामपुकार काका की होम्योपैथिक की दुकान थी। जहाँ वे बैठते थे। रामपुकार काका ने विष झाड़ने हेतु सुबोध को सामने बिठा अपना हाथ जमीन पर रख मंत्रोच्चार करने लगे। पर हाथ एक रत्ति भी आगे नहीं बढ़ा। उन्होंने सुबोध से कहा-तुम्हें शंका हो गयी है, तुम्हें सांप-बांप कुछ नहीं काटा है।
​​‘‘परन्तु, सुबोध ने अपने शरीर में आ रहे आकस्मिक परिवर्तन व सिर चकराने के असर का साफ़ अनुभव कर पुनः कहा - मुझे अवश्य सांप ने काटा है, मैं मर जाऊँगा, मुझे दूसरी जगह ले चलो।‘‘
​​अन्यमनस्क एवं मजाकिया भाव में सभी हमउम्र युवक, गांव के निकट ही ‘मुसहर टोली लेकर चले गये। वहाँ भी रामचन्द्र सादा ने मंत्र से हाथ चलाया। उसका भी हाथ नहीं चला। उसने भी कहा -"सांप काटता तो हाथ जरूर चलता। सांप ने नहीं काटा है।‘‘
​​इस दौरान आधा घंटा बीत गया अब सुबोध बेहोशी की ओर जा रहा था। उसका कदम लड़खड़ाया। यह देख सभी युवक उसे लेकर साहेबपुर कमाल अस्पताल की और भागे। परन्तु, आधा किलोमीटर की दूरी तय नहीं की थी कि सुबोध दम तोड़ दिया। हंसी खेल में उसकी जान चली गई। अगर सांप काटे स्थान को चीरकर खून बहा दिया जाता और रस्सी से उसके आगे बाँह कसकर बांध दी जाती तो हो सकता था उसकी जीवन लीला खत्म होने में कुछ देर का समय लगता और चिकित्सा भी हो जाती पर किसी का ध्यान प्राथमिक उपचार की और गया ही नहीं। झाड़फूंक में समय बीत गया।
​​सांप काटने से हुई मौत पर लाश जलाने ना जलाने पर वाद विवाद हो रहा था। सुबह में गांव वाले ने दुकान के पिछवाड़े बिछे सड़क के बोल्डरों को उलटा-पलटा कर सांप ढूढ़ने लगे, ताकि सांप मिल जाये तो उससे सुबोध को पुनः कटवाकर जिलाया जा सके। पर यह अंधविश्वास है। बोल्डर के नीचे से एक बहरा सांप मिल गया। उसी सांप के मुंह में मृत सुबोध की अगुंली डाल दी गयी थी। मुंह में अंगुली पहुँचते ही आहार समझ वह बहरा सांप कसकर मुंह बंद कर लिया। लगभग आधे घण्टे तक सांप को उसी हालत में छोड़ दिया गया। प्रतिफल तो निकलना नहीं था। सुबोध की मृत्यु विषधर सांप काटने से हुई थी जबकि बहरा सांप विषहीन होता है। वहीं खड़ा दिनेश ने कहा हद हो गयी, क्यों अंधविश्वास में लाश को सड़ाने पर तुले हैं। लाश जलाने की व्यवस्था करनी चाहिये।
​​सुबोध पर उसकी नजर एकाग्र थी। अचानक किसी के द्वारा मरने से पूर्व कहा गया यह सम्बोधन कि तुम ख़ुद धामन सांप हो तुम्हें कैसे सांप काटेगा। इस कथन ने बीस वर्ष पूर्व की एक भूली बिसरी स्मृति को सजीव कर दिया।
...सुबोध बचपन में बहुत उच्छृंखल और खिलंदरा स्वभाव का था । उसका बहुत बड़ा संयुक्त परिवार था। उस वक्त गांव में सबसे अमीर और जमीन जायदाद वाले परिवारों में गिनती थी। सुबोध के पिता बनारसी सिंह बिहार पुलिस में हबलदार थे, उसके एक चाचा जयनारायण सिंह राजस्व कर्मचारी, तीसरे चाचा विष्णुदेव सिंह स्वास्थ्य विभाग में कम्पाउण्डर और सबसे बड़े चाचा तारिणी सिंह क्षेत्र के माने हुए नेता थे। दरवाजे पर गाय-बैलों व भैसियों की पूरी फौज रहती थी। शाम के पहर गाय-भैसियों का दूध मेटियों में रखकर ‘‘सिकों‘‘ पर टांग कर रखे जाते ताकि बिल्ली दूध ना पी ना पी सके। उसी सिके वाली कोठरी की बगल में उसके बूढ़े दादा सोया करते थे। परन्तु, प्रतिदिन सुबह में किसी एक मेटिया (दूध रखने वाली मिट्टी का कलश जैसा वर्तन) से एक-आध लीटर दूध खाली हो जाता। घर के लोग कहते, आखिर मेटिया का दूध घट कैसे जाता है जबकि सिका की उँचाई तक बिल्ली की पहुँच मुश्किल है। कई को शक हो रहा था कि कहीं रात्रि में सांप सिका की रस्सी के सहारे दूध तो नहीं पी लेता है। धामन सांप की यह विशेष आदत होती है।यह सांप गाय के पैरों को छानकर (लपेटकर) गाय के स्तन से दूध पी लेता है। घर के बड़े अब दूध घटने का राज जानने के लिए जगने लगे। आखिर एक दिन राज खुल ही गया।
​​ असल में प्रतिदिन सुबह चार-साढ़े चार बजे के बीच जब सभी सदस्य गहरी नींद में होते सुबोध उठता और एक कुर्सी को सिका के निकट रखता, उसपर खड़ा होता फिर धीरे से मेटिया उतारता और मुंह लगाकर चार-पांच मिनट में जितना दूध पी सकता था गटागट पी जाता। तत्पश्चात् यथास्थान मेटिया रखकर, कुर्सी हटाता और अपने बिस्तर पर आकर सो जाता । यह चोरी उसके बूढ़े दादा ने एक रात पकड़ ली।
​​उन्होंने दूध पीते समय एक छड़ी घुमाकर मारी और कहा ‘‘धमना सांप पकड़ा गया। दूध पीने का राज ,खुल जाने के बाद उसके छोटे-छोटे अन्य भाई- बहन ,सहपाठी धमना सांप कहकर चिढ़ाने लगे। आज दिनेश की आँखों के सामने ‘‘धमना सांप’’ की मृत्यु सांप काटने से ही हुई सोचकर रोमांचित होना स्वभाविक था। शुरू से अंत तक सांप की अहम भूमिका बनी रही सुबोध की जिन्दगी में।
​​अंधविश्वासों के खेल में कई घंटे उलझे रहने के बाद सुबोध की लाश पर कफन लपेटा जाने लगा। उसे बांस की चचरी पर लिटाया गया। आज का दृश्य बिल्कुल उसी दृश्य की पुनरावृत्ति थी जब कुछ वर्ष पहले सुबोध के बड़े भाई की मौत मस्तिष्क ज्वर के कारण पटना पी०एम०सी०एच में हुई थी। मघ्य रात्रि में लाश पटना से जीप द्वारा घर आयी । संम्पूर्ण रात कोहराम मचा रहा। आज वैसा ही कोहराम उसी घर में उसी स्थान पर मचा है। भाई रंजन की मृत्यु की उम्र में ही सुबोध की भी आज मृत्यु हुई थी। दो भाई थे दोनों दिवंगत हो गये।
​​संयुक्त परिवार विभाजित होने के कुछ ही दिनों बाद बाप-माँ की मृत्यु हो गयी थी।बचे दो भाइयों वाला यह टूटा-बिखरा परिवार अब बिना मर्द वाला हो गया। आश्रयहीन बन गया। अब कोई देखने सुनने वाला नहीं, कमाने वाला नहीं बचा घर में। बड़े भाई के दो छोटे छोटे पुत्र एवं एक पुत्री है । सबसे बड़ी पुत्री जिसकी उम्र अठ्ठारह पार कर गयी है,अविवाहित है। सुबोध ने दो माह पहले दिनेश से कहा था-मैं अपनी भतीजी ‘‘डैजी’’ की शादी कर देना चाहता हूँ। एक सुयोग्य लड़का का पता चला है। परन्तु सुबोध की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
​​गरीबी और आर्थिक तंगी से परेशान सुबोध अपने बड़े भाई की मृत्यु के सदमा से उबड़ चुका था। सुबोध और उसकी भाभी ने सबकुछ संभाल लिया था। भाभी बची खुची जमीन की खेती गृहस्थी अपनी बुद्धि विवेक से संभाले थी। सुबोध गृह रक्षा वाहिनी में गृहरक्षक हो गया था। उसका अपने भतीजे-भतीजी पर नजर और नियंत्रण था। पर अब सुबोध के बच्चों का क्या होगा? सबके सब अभी एकदम बच्चे हैं। पत्नी भी अनपढ़ मिली थी । उसके लालन-पालन का भार ढ़ोना उसकी पत्नी के बूते से बाहर थी। खाने के लिए अनाज और वस्त्र के लिए रूपये पैसे कौन देगा ? आने वाले दिनों में आगे पीछे दूर तक सहारे की कोई रोशनी नहीं दिख रही थी । दिनेश गुम सुम गहरे विषाद में डूबा था।सुबोध उसका गौवां साथी था।सुबोध की पत्नी मंजू और उसके दो बेटों की परवरिश बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।बच्चों को अगर उसके मैके से मदद और संरक्षण मिल जाय तो सबकुछ ठीकठाक हो जाएगा। दिनेश की छटपटाती आत्मा निदान तलाश रही थी।अगर मैके में मंजू अपने माँ बाप के संग रहे तो काफ़ी हिम्मत आएगी।दिनेश ने मैके के परिवार की जानकारी प्राप्त की तो पता चला कि वह हतभागी औरत है । बचपन में ही उसके मां बाप भी मर चुके थे । उसका भी लालन पालन चाचा-चाची के द्वारा ही हुआ है। चाचा-चाची भी वृद्ध हो चले हैं ।इस अवस्था में तीन सदस्यों के आर्थिक बोझ ढ़ोने की कतई क्षमता उनलोगों में नहीं है। फिर क्या होगा ?यह प्रश्न दिनेश को निस्तेज कर गया। सोचने विचारने की शक्ति ही नहीं बची ।एक बार फिर आंगन में विलाप कर रही मंजू सुबोध की लाश पकड़े लोट रही थी। उसके दोनों बच्चे मंजू की बग़ल में सुबह रहे थे। दिनेश यह दृश्य देखकर स्तंभित था और स्वतः उसकी भी आंखों से आंसू की तेज धार बहने लगी । जब धैर्य टूट गया ,तब वहाँ से हटकर अपने दरवाजे पर आकर चुपचाप बैठ गया। अचानक एक रोशनी उसके मन में कौंधी और समाधान की पगडंडी सामने प्रकट हो गयी। बचपन के सखा सुबोध की विधवा बनी मंजू और उसके बेटों की ज़िन्दगी सुरक्षित करने की अपनी योजना को समाज के सामने रखने के लिए श्राद्ध कर्म के बाद का समय चुना। इसी बीच श्मसान की यात्रा पर सुबोध का शव ले जाया गया। रात हो गयी थी। दाह संस्कार के बाद पूरे टोला में मायूसी और खामोशी थी । सभी अपने-अपने घरों में दबे स्वर में सुबोध की ही चर्चा कर रहे थे। बस रात की निस्तब्धता को चीरकर बाहर आती थी तो टीसभरी, आर्द्र करूण रूलाई जो सुबोध की पच्चीस वर्षीया पत्नी के गले से रहरह कर निकलती थी। बिस्तर पर लेटा कोई भी व्यक्ति नींद तक पुहँचने से पहले ही चीत्कार सुन उठ बैठता और सुबोध की इहलीला समाप्ति के बाद उसके छोटे -छोटे बच्चों एवं विधवा पत्नी के भविष्य पर जाकर अटक जाता। तीन ज़िन्दगियों की लम्बी राहें किसी अंधेरे कुएं की ओर जाने का ही इशारा करती थी। जीवन संघर्ष में, पोषण के अभाव में,रोग-बीमारी से ग्रस्त होकर कहीं इन तीनों मां बेटों की जीवन डोर टूट ना जाय। दिनेश का संवेदनशील मष्तिस्क भविष्य के कुपरिणाम पर केन्द्रित हो जाता। गाँव समाज में दाह संस्कार से श्राद्ध क्रिया तक जितनी भी सांत्वना के शब्द लोग दे दें।आह और अफसोस व्यक्त कर दें पर उसके बाद किसे कौन पूछता है मरे या जीये।
तेरहवें दिन श्राद्धकर्म समाप्त हो गया। सुबोध अब धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रेतयोनी से बंधन मुक्त हो गया। परन्तु दिनेश क्रियाकर्म के अन्तिम दिन अत्यधिक परेशान था । बार-बार उसके बच्चों को कोई कष्ट न हो इसका हल समाज के सामने रखने को व्यग्र हो उठा था।सगे संबंधी भी अभी मौजूद थे।आज ही समाधान ढूँढने का उपयुक्त दिन था। सभी बड़ों एवं हम उम्र युवकों को इकट्ठा किया और कहा- अब हम सबों का दायित्व बनता है कि बिना बाप के बेसहारा बच्चों और विधवा के भरण पोषण के बारे में सोचें। मेरे पास दो योजनाएं हैं। मै उसे आपलोगों के समक्ष रखता हूँ उपयुक्त समझें तो उस पर विचार करें।
दिनेश ने कहा ,मेरी पहली योजना यह है कि अपने टोला के सारे लोग प्रति परिवार एक हजार रूपये सहयोग करें तो लगभग तीस-पैंतीस हजार जमा हो जाएंगे।इस राशि से एक अच्छी परचून व श्रृंगार सामग्री की दुकान खुलवा दी जाये। आपसबों की क्या राय है ? । सुबोध की याद में दुकान का नाम ‘‘सुबोध किराना स्टोर’’ देकर उसे सदा स्मरण में भी जीवित रख सकेंगे।
​टोले के सभी लोगों की एक स्वर में सहमति मिल गयी।दिनेश अपनी छुट्टी को एक सप्ताह के लिए बढ़ा लिया।राशि एकत्रित कर टोला के मध्य ही सुबोध के दरवाज़े पर ही दुकान खुल गयी।सिर का बोझ हल्का हुआ ,फिर मंजू को समझा बुझाकर उसकी ज़िन्दगी का सहारा बनने वाली दुकान की चाभी सौंप दी।अगले दिन दिनेश खुशी खुशी पटना अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने चला गया।
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•मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह

प्रतिज्ञा
अंग प्रदेश का राजा कृतिसागर बड़ा प्रतापी और बहादुर था। उसने अपने पड़ोस के राजाओं को पराजित कर अपने साम्राज्य का काफी विस्तार कर लिया था। इस कारण गंगा नदी के आर-पार तथा पहाड़ियों के बीच उनका शासन बेखौफ चलता था। इस कार्य में छोटे-छोटे सामंतों, सेनापति एवं दोनों राजकुमारों पर शासन के संचालन का भार डालकर वर्ष के कई माह शिकार करने में बिताते थे। आखेट उनका खास शगल था।
​एक बार राजा कृतिसागर ने घुड़सवारों की एक शिकारी सैन्य टुकड़ी के साथ राजमहल से करीब 25 योजन दूर गहन घने जंगल की ओर कूच किया। उन्हें शिकारी दस्ता के निशानेबाज सोमपाल ने सूचना दी थी कि ’’झाड़प्रदेश’’ के जंगल में बाघ, सिंह, हिरण, बारहसिंगा, बनैले सुअर और भेड़ियों की बड़ी संख्या पायी जाती है। वहाँ पशुओं के शिकार करने में काफी आनन्द आएगा।
राजा के साथ-साथ खाने-पीने के सामानों के साथ खानसामों की टोली, सेवक, गुमास्ते, ठहरने के लिए तंबू इत्यादि साजो-सामान भी ले जाये जा रहे थे।
​जंगल के काफ़ी अन्दर समतल जगह पर जहाँ जंगल कम घना था तंबू लग गया। राजा की सुख सुविधा व आराम के सभी अस्थायी इंतजाम हो गये। राजा प्रतिदिन जंगल के अंदर हर दिशाओं में अंदर जाते और कई प्रकार के पशुओं का शिकार कर लौटते। करीब दो सप्ताह बीत गया था पर ,बाघ और सिंह का शिकार नहीं कर पाने के कारण वे निराश थे। अचानक उन्होंने फैसला लिया कि आज बाघ का शिकार किये बगैर नहीं लौटूँगा चाहे मुझे घने जंगल के अंदर बाघ या सिंह की खोज में जितना समय बीत जाये। एक निश्चय के साथ अगली सुबह राजा ने अन्य शिकारी सैनिकों के साथ घने जंगल की ओर बढ़ने लगे।
​रास्ते में मिलने वाले छोटे-छोटे जंगली पशुओं का उन्होंने शिकार नही किया। हाँ, एक दो बड़े जानवरों जिसमें जंगली भैंसे और बारह सिंघे मिले शिकार अवश्यय किया। शिकार करते हुए वे आगे बढ़ते जा रहे थे। और अन्य शिकारी सहायक मारे गये जानवरों को उठाकर घोड़ों पर लाद कर वापस भी जा रहे थे। सिंह और बाघ का शिकार नही कर पाने की निराशा से मन ही मन उत्तेजित राजा अपने घोड़े को तेज गति से आगे बढ़ाते जा रहे थे। इसी दौरान उनके संग के शिकारी दस्ते उनसे बिछुड़ गये। परन्तु ,राजा बिना पीछे मुड़े अपने धुन में आगे बढ़ते रहे।मार्ग में बाघ, सिंह से कहीं सामना नहीं हुआ। धीरे-धीरे शाम भी होने लगी, कुछ देर में सूर्य के डूबने के साथ ही जंगल में घुप अंधेरा छा गया। जब जंगल का मार्ग दिखना मुश्किल हो गया तो उन्होंने घोड़ा रोककर आवाज दी, अब हमें लौट जाना चाहिए। किसी तरह का प्रत्युत्तर नहीं मिलने पर वे चौंक पड़े। राजा कृतिसागर ने पुकारा-’’सोमपाल...।...सोमपाल।
​आवाज बीहड़ जंगल में गूंजने के साथ चिड़ियों की चहचहाहट में गुम हो गयी। राजा को यह समझते देर नहीं लगी कि उनके साथ के शिकारी सैनिक उनसे पीछे छूट गये हैं और वह अब अकेला है ।कृतिसागर को अब अपने पड़ाव तक अकेला ही लौटना था। उन्होंने घोड़ा को मोड़ा और धीरे-धीरे लौटने लगे। पर उन्हें यह दिशा ज्ञान नही रहा कि वह किधर जा रहे हैं।एक अनुमान के मुताबिक आधी रात तक वे भटकते रहे, पर पड़ाव तक नहीं पहुँच पाये। घोड़ा पर बैठे-बैठे उनका शरीर भी थक गया था। घोड़ा भी लगातार चल पाने में असमर्थ था। आखिरकार वे घोड़ा से उतर कर नीचे जमीन पर ही बैठ गये। राजा का पालतू घोड़ा उन्हीं के निकट ही अगल-बगल घूमकर घास चरने लगा।
​कुछ देर सुस्ताने के बाद जब राजा ने आँखें खोली तो उस घने जंगल में एक टिमटिमाती रोशनी दिखायी पड़ी। वे रोशनी को देखते ही खुश हो गये। उन्हें रोशनी के निकट इंसानों के रहने का भरोसा हुआ। घोड़ा का लगाम पकड़े हुए वे पैदल ही रोशनी की ओर चल पड़े। रात में जंगली पेड़ों-झाड़ियों के बीच से घोड़ा पर चढ़कर आगे बढ़ना मुस्किल था। कुछ देर जंगली पौधों, लत्तड़ों व झाड़ियों के बीच से गुजरने के बाद रोशनी के निकट पहुँचने में राजा कृतिसागर सफल हुए। रोशनी लकड़ी के जलने से निकल रही थी। उसके निकट एक झोपड़ी थी। राजा ने घोड़े को झोपड़ी के सामने छोड़ अन्दर प्रवेश किया। अन्दर एक विशालकाय दानव जैसा बड़ी-बड़ी दांतों और नुकीली नखों वाला इंसान एक भेड़िये को नोंच-नोंच कर खा रहा था। अंधकार में उसका विशाल शरीर पर्वत जैसा दिख रहा था। आहट पाकर वह फुर्ती से पलटा और राजा पर छलांग लगाया। राजा कृतिसागर अप्रत्याशित हमले से संभल नहीं पाये। जोरदार झटका लगने से एक बारगी चकरा गये। राजा को अपनी बाजुओं में कैद कर विशालकाय मानव ने अट्टहास किया। कई दिनों से तुम मेरे जंगल के जानवरों को मार-मार कर बहादुरी दिखला रहे थे ना,आज सब का बदला लूंगा। तुम्हें मारकर तुम्हारी बोटी को काट-काट कर बाघ, सिंह, तेंदुए, भेड़िये के बीच बांट कर भक्षण कराउंगा।
​राजा काफी डर गया। पहले तो कृतिसागर ने विशालकाय मानव की गिरफ्त से निकलने हेतु जोर की ताकत लगाया पर सफल नहीं हो सके। अब उन्होंने बचाव हेतु दया की भीख मांगना ही बुद्धिमत्ता समझी। राजा ने कहा- ’’मुझे मत मारो ,मैं अंग प्रदेश का राजा हूँ। मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूंगा और अपना सेनापति बनाउंगा।
​इतना सुनते ही विशालकाय मानव ने जोरदार घूंसा मारा।
राजा की सांसें कुछ देर तक रूकी रह गयी। घूंसा की मार से वे बेहोश हो गये। जब होश आया तो राजा बोला ’’तुम क्या चाहते हो ? या तो तुम मुझे जान से मार दो या फिर मुक्त करो, तुम्हारे शरीर की बदबूदार गंध से यों ही मेरी जान निकल रहीं है।’’
​विशालकाय मानव ने कहा-मैं तुम्हें मुक्त कर दूंगा। इसके लिए तुम्हे एक प्रतिज्ञा करनी होगी कि तुम आज के बाद किसी निर्दोष ,निरीह पशु का शिकार नहीं करोगे। जंगल के जीवन को अस्त-व्यस्त नहीं करोगे। सबों पर दया दिखाओगे तथा जनता की सेवा में समय बीताआगे।
​राजा कृतिसागर ने कहा -"मै प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज के बाद जीवों की कभी हत्या नहीं करूँगा। सदा प्रजा की सेवा में अपना वक्त लगाउँगा।’’
​विशालकाय मानव ने पुनः जोदार अट्टहास लगाया। उसका शरीर एक सौम्य साधु के रूप में परिवर्तित हो गया। साधु ने अपने साथ राजा को उसके पड़ाव तक छोड़ आया और अपनी प्रतिज्ञा सदा याद रखने की चेतावनी दी। साधु ने कहा- राजन, तुम्हारा जीवन मेरी अमानत है। जब भी वचन तोड़ेगा मैं तुम्हारे सामने आ जाउँगा।
​राजा ने प्रतिज्ञा को सदा निभाने का वचन देते हुए सिर हिलाया।
उनके सेवकों और सैनिकों को बीती रात की घटना का कुछ भी पता नहीं था।
​राजा के आदेश पर शिकारी टुकड़ी राजधानी लौट आयी। राजा ने ऐलान किया अब वे कभी निर्दो़ष जानवरों ,निरीह पशुओं का शिकार नहीं करेंगे न युद्ध करेंगे ना ही उनके राज्य में जीवों की हत्या होगी।प्रजा की सेवा और समृद्धि के लिए सदा प्रयत्न करेंगें।
​राजा कृतिसागर ने अपने विचार परिवर्तन के बाद अहिंसा का धर्म अपना लिया और उस समय अपने राज्य में बौद्ध धर्म को राज्य धर्म बना लिया।
(कथा काल्पनिक है और किसी राजा का वास्तविक चित्रण नहीं बल्कि बालकों /बालिकाओं के नैतिक उत्थान के लिए सीख देती है)
•मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह