प्रेम अपना अपना


​​​​              "‘प्रेम अपना अपना‘‘
अचानक महानगर से एक कस्बाई शहर में आ गयी थी। बदला-बदला वातावरण अनजाने लोग, अजनबी गलियाँ, जर्जर मकान में निवास, बिल्कुल अकेलापन था यहाँ। सामने लोगों की उकताई उग्र भीड़, घूरती आखें, बोलचाल की अलग भाषा, लगता कहीं दूर देश में रहने आयी हो। ऐसा नहीं था कि महानगर में लोगों की भीड़ नहीं होती, आखें नहीं घूरती है।पर वहाँ सब कुछ जलप्रवाह की तरह बहता रहता है। किसी के बारे में किसी को सोचने की फुरसत नहीं। परन्तु यहाँ तो बार-बार एक जैसे लोगों का झुंड और आखों की तिलस्मी वार देखने को मिल रहा था। रंजीता अपनी जिन्दगी के रूख बदलने पर गमजदा थी।
​सचमुच अटपटा लगता था सबकुछ। पर सत्य यही था कि उसे रहना था इसी करबाई शहर फारबिसगंज में। उसकी नियुक्ति चिल्ड्रेन आॅफिसर पद पर हुई है यहाँ। केवल महिलाओं के लिए निर्मित पद जिसपर राज्य लोक सेवा आयोग की प्रतियोगिता परीक्षा उत्तीर्ण कर आती हैं महिलाएं। एक चिल्ड्रेन आॅफिसर की देखरेख में एक प्रखंड की सभी आंगनवाड़ी केन्द्रों के सफल संचालन का दायित्व रहता है। उसकी सहायता के लिए प्रत्येक केन्द्र पर आंगनवाड़ी सेविका एवं सहायिका रहती हैं जिसे मासिक मानदेय मिलता है, बाल विकास विभाग द्वारा। बच्चों और गर्भवती महिलाओं से ज्यादा कठिन था सेविका और सहायिका को संभालना। आंगनवाड़ी सेविका और सहायिका सुनने में जितना सीधा सादा लगता है उतना ही जटिल व मारक छीनाझपटी होती है उसके चयन में। कुछ माह पूर्व आंगनवाड़ी सेविकाओं की चयन प्रक्रिया की जाँच जिलास्तर पर की गयी थी और अवैघ तथा शर्तों को पूरा नहीं करने वाली सेविकाओं को हटाने की अनुशंसा की गयी थी जिलास्तर के जांच अधिकारी द्वारा। इस घटना के बाद गांव-टोलों में उत्पन्न वर्चस्व की राजजीति के परिणामस्वरूप मामले बड़ी संख्या में न्यायालय तक पहुँच गये ।दूसरी यह कि आंगनवाड़ी केन्द्रों की सेविका-सहायिकाएं सिर्फ नाम की ही होती हैं मुख्य भूमिका तो निभाते हैं उनके पति। टेक होम अनाज, फुड पैकेटें कुपोषित तीन वर्षों तक के बच्चों और गर्भवती माताओं को देने के बजाय डकार लिये जाते हैं ।अगर चिल्ड्रेन आॅफिसर कड़ाई बरते तो धरना-प्रदर्शन कर परेशान किया जाने लगता है।
​सिर मुंडाते ही ओले पड़े। दो दिन पहले चिल्ड्रेन आॅफिसर के पद का प्रभार ही ग्रहण किया कि उच्च न्यायालय में काम से हटायी गयी एक सेविका द्वारा दायरवाद में शपथ जमा करने के लिए संचिका सामने आ गयी।
​अभी कुछ समझा जाना भी नहीं कि पहला कार्य हाईकोर्ट जाने का आ गया।झुंझला उठी रंजीता।
​लगभग तीन माह से फारबिसगंज में रह रही थी प्रशिक्षु पदाधिकारी के रूप में। प्रशिक्षण के दौरान भी रंजीता को कटु अनुभव हुए थे। काई सीधी मुंह बातें नहीं करता। प्रशिक्षण देने से ज्यादा अपनी धौंस जमाता। थोड़ा सा बिलंब होने पर समय पर आने जाने की चेतावनी दी जाती। उसके साथ स्कूल छात्रा की तरह पेश आते प्रशिक्षण देने वाले खुर्राट पदाधिकारी और कर्मचारी। कोई चाय पानी के लिए भी पूछना मुनासिब नहीं समझाता। टाॅयलेट और यूरिनल के लिए लेभेटरी ढूंढती फिरती और बाध्य होकर बीच में ही छोड़कर जाना पड़ता प्रशिक्षण। इसके लिए अगले दिन पदाधिकारियों की फटकार सहनी पड़ती।
​अनजाना शहर अनजाने लोग। मन की शान्ति के लिए किसी से बातचीत और विचारों का आदान-प्रदान भी मुश्किल था। दिल का दर्द और मन का तनाव बांटा नहीं जाय तो हृदय में सुलगता रहता है। सामान्य जीवन को असंतुलित कर देता है। इसी स्थिति से रंजीता गुजर रही थी। चेहरे पर झुँझलाहट साफ झलकती। क्या आॅफिसर बनने का यही प्रतिफल है। दिनरात तनाव झेलो, न खाने का ठिकाना ना रहने का ठिकाना। रंजीता सोचती, कहां आकर फंस गयी वह। अच्छा होता वह आयोग परीक्षा में सफल ही नहीं होती।
​लगभग 24-25 वर्षों की कुंवारी रंजीता काॅलेज से निकली छात्रा जैसी लगती। जिस उम्र में युवतियां स्वपनिल सपने देखती है। भविष्य के ताने-बाने बुनती हैं, फैशन और मौज-मस्ती में डूबी रहती है। शरीर के साज-श्रृंगार में समय बिताती है ,सखी सहेलियों से हंसी-ठिठोली में मस्त रहती हैं। उसी उम्र में अपनी सहेलियों से बिछड़ी, घर-परिवार से दूर प्रौढ़ सहायिका-सेविकाओं की राजनीतिबाज मर्दों के बीच एक युवती से प्रौढ़ महिला बनने को विवश हो गयी है। यह तो गनीमत है कि पटना की ही चार अन्य लड़कियां ‘चिल्ड्रेन आॅफिसर‘ बनकर इसी फारबिसगंज के दूसरे प्रखंडों में पदस्थापित हुई हैं और साथ-साथ ‘‘प्रशिक्षु आॅफिसर‘‘ के रूप में प्रशिक्षण ले रही हैं।उनलोगों से दिनभर साथ रहकर, आपस में बोल बतियाकर, हंसी मजाक कर समय काट लेती। पर रात में अलग-अलग रहने के कारण काट खाने वाले अकेलापन का शिकार रहती। हालाँकि दो विवाहिता ‘चिल्ड्रेन आॅफिसर प्रीति और ज्योति‘ तो अपने पतियों से फोन पर बतिया कर रात को सुखद बना लेती पर रंजीता और वाणी का हाल बुरा था। दोनों कुंवारी थी। वे कुछ फ्रेंडस के अलावे घर के सदस्यों-मां-भाभी, भाई-बहन से बातें कर थोड़ी सी थकान कम कर पातीं। लेकिन रातें करवटें बदलते बीत जाती। कस्बाई शहर में चोर-उचक्के, बदमाश-गुंडे का भी भय समाया रहता।
तीन माहों के प्रशिक्षण का अंतिम सप्ताह उन चारों के लिए खुशियों और आनन्द भरे दिन लेकर आया। लेखा आॅफिस के प्रशिक्षण में प्रीति, ज्योति, रंजीता और वाणी की जिन्दगी में आया सुकान्त नामक एक पुरूष जो सेक्शन आॅफिसर था। परन्तु, था भावुक व्यक्तित्व का धनी। दर्जनों किताबों और सैकड़ों लेखों -समीक्षाओं का लेखक। कई साहित्यिक सम्मानों से विभूषित। जिलास्तरीय कार्यक्रमों का संचालक और प्रखर वक्ता भी। जिलापदाधिकारी और आयुक्त की आंखों का तारा और पब्लिक के बीच अति लोकप्रिय कथाकार। मंच की शोभा बढ़ाने के लिए आमंत्रित होना और किसी भी विषय पर व्याख्यान देने में समर्थ। नौकरी में आने से पहले कई वर्षों तक राष्ट्रीय दैनिकों में संवाददाता का कार्य और कई साप्ताहिकों के सम्पादन भी कर चुका था। ऐसे शख्सियत से प्रशिक्षण पाकर निहाल थी चारों प्रशिक्षु महिला पदाधिकारी।
​व्यक्तित्व का प्रभाव व्यवहार पर पड़ता है। सुकान्त के समक्ष पहुँचते ही वे चारों पिछले सारे कटु अनुभवों, उँच-नीच व्यवहार भूल गयीं। अचानक शुष्क, बेरूखे माहौल में तरलता आ गयी। उन सबों को मानसिक तृप्ति, संतुष्टि और शान्ति मिली। लगा रेगिस्तान में भी जल मिलता है और ‘सबाना‘ पनपता है। बड़े खुशगवार माहौल में पहला दिन शुरू हुआ। कुछ विभागीय नियमावली का पाठ पढ़ाकर सुकान्त ने अपनी कहानियों और कविताओं की पुस्तकें भेंट की। दूसरे दिन तो चारों दिवानी बन गयी सुकान्त की। प्रशिक्षण में सुकान्त से बातें कर खुशनसीब हो रही थीं। आजतक जिन किताबों को पढ़ी उनके लेखकों का नाम ही पढ़ती रही थी, परन्तु कहानियों-कविताओं के रचनाकार को निकट पाने का एक विचित्र सुख था। सभी आत्मविभोर एवं मुत्रमुग्ध थीं। सुकान्त के समीप बैठकर बाते करती हुई अपनापन व स्नेहपूर्ण माहौल में कैसे एक सप्ताह बीत गया, पता ही नहीं चला। अब उन चारों ने एक ऐसे संवेदनशील पुरूष को अपनी जिन्दगी का अहम हिस्सा बना लिया जिनसे मिले और बातें किये बिना उन सबों का एक दिन भी बीतना दूभर हो रहा था। प्रशिक्षण तो समाप्त हो गया परन्तु, सुकान्त से स्नेह की डोर बंध गयी।
लेखा कार्यालय के प्रशिक्षण समाप्त कर वे मूल विभाग के ‘प्रोग्राम आॅफिस‘ में प्रशिक्षण ले रही थी, परन्तु प्रशिक्षण के लंच ब्रेक में सुकान्त के पास आ जातीं, चाय पीतीं, कुछ देर बातें करतीं उसके बाद ही वे दिन को सुखद मानतीं। यह दिनचर्या तब तक निर्बाध चलती रही जब तक की सबों ने अपने-अपने प्रखंड में पदभार ग्रहण नहीं कर लिया। सुकान्त भी उनसबों के प्रति इतना भावुक था कि प्रशिक्षण से शुरू हुई जान-पहचान एक स्थायी दोस्ती में तबदील हो गयी। चारों के दिलों में सुकान्त एक ऐसा व्यक्तित्व बनकर अस्तित्व जमा लिया था जिसकी कोई परिभाषा नहीं, कोई नाम नहीं था। चारों के दिल में अलग-अलग रूप में सुकान्त समाया हुआ था। लगता सबों की जिन्दगी का अकाट्य और स्थायी हिस्सा हो सुकान्त। कभी-कभी सुकान्त की बेकरारी भी सबों के प्रति साफ झलकती थी। वह हरेक से बातें करता, मुस्कुराता, कुरेदता, हंसाता और दिल में हलचल मचाता रहता था। सुकान्त को यह स्वंय पता नहीं था कि वह सबसे अधिक किसकी जिन्दगी और दिल की अतल गहराइयों में बैठा हुआ है। पता करने की कोशिश करता तो भटक जाता।
जब भी कभी रात की तन्हाइयों में अकेला बैठता, प्रेम की गहराई में डुबकी लगाता तो सबसे पहले जो चेहरा उभरता वह रंजीता का होता। रंजीता के कहे गये वह शब्द बार-बार कानों में गूंजते ‘‘अब तो आपको जीवन पर्यंत भूलना मुश्किल है। एक मात्र आप ही अपना निकले जिनसे मिलकर सुकून मिलता है।’’ लेकिन उसी समय प्रीति का चेहरा उभरता उसका निश्छल अनुनय-‘‘हमचारों सहेलियां आज साथ-साथ खाना खायेंगी,, सुकान्त जी आप भी चलिये मेरे साथ खाना खाने। ‘‘इस आग्रह में बड़ा अपनत्व और मनुहार था। सुकान्त को लगता प्रीति असीम प्यार करती है उससे। पर एक रात वाणी का फोन पर किया गया काॅल उसकी सोच को पलट दी।"मैं आपकी बगल के कार्यालय में आयी थी। जल्दीबाजी में आपसे मिल नहीं सकी। मन कचोटता रहा है दिनभर। आपके निकट आकर निकल गयी। अपराध बोध से ग्रस्त हूँ, इसलिए आपसे फोन पर ही बातें करने को बाध्य हूँ।’’ तभी ज्योति की याद आ गयी उसने कहा था-
‘‘हर सुख-दुख में आपका साथ चाहिए। मै जब तक फारबिसगंज में हूँ आप ही मेरा सबकुछ हैं। मेरे घर किसी भी समय रात हो या दिन दरवाजा खुला है। किसी दिन मेरे साथ गुजारिये। मैं इंतजार करुँगी।
सुकान्त चारों के समर्पण और आत्मीयता पाकर निहाल था। वह तय नहीं कर पा रहा था कि कौन कम या कौन अधिक करीब है उससे। लेकिन उसका स्वंय का मन अगर किसी से बार-बार बातें करने को उत्सुक होता तो वह रंजीता थी। रंजीता सांवली, सलोनी, हंसमुख, निःसंकोची और स्पष्टवादी थी। परायापन का नामोनिशान नहीं था। सुबह-शाम बातें करने में कोई रोक-टोक, हिचक और सीमा रेखा नहीं थी। बिल्कुल दोस्ताना व्यवहार था। जो सुकान्त को हमेशा करीब खिंचता रहता। रंजीता के प्रति प्रेम बढ़ने का एक और बड़ा कारण था जिसके चलते सुकान्त का मोह रंजीता के लिए सबसे अधिक था।प्रखंड में प्रभार लेने से पूर्व रंजीता ने एक दिन अपनी पदस्थापना का ‘नौटिफिकेशन‘ दिखाया था। तब सुकान्त को ज्ञात हुआ कि रंजीता के पिता स्वर्गवासी हैं। गहरा सदमा हुआ। खिलखिलाती मासूम रंजीता के चेहरे पर नजर ठहर गयी और स्वाभाविक सहानुभूति उमड़ पड़ी। खिलंदड़ा-बिंदास स्वभाव के अन्दर कहीं ना कहीं सूनापन महसूस हुआ। बाप का साया सिर पर नहीं होना संघर्षपूर्ण जीवन की अनकही कथा बयां कर गयी।संघर्ष भरी राह पर आगे बढ़ते हुए पढ़ाई पूरी करना, फिर लोक सेवा आयोग परीक्षा उत्तीर्ण होना, बहुत बड़ी सफलता की कहानी व निशानी है।
वह अभी भी संतुष्ट नहीं है, उँचे मुकाम की तलाश में संघर्ष जारी है। उसने बताया था- ‘‘पिछले सप्ताह ‘डिप्टी कलक्टर‘ चयन की लोक सेवा आयोग परीक्षा देकर लौटी हूँ।
सुकान्त का मन अब यह ‘जानने को व्याकुल था‘ कि रंजीता की पारिवारिक स्थिति वर्तमान में कैसा है? उसकी सहेली चिल्ड्रेन आॅफिसर-वाणी से मौका मिलते ही पूछ लिया। रंजीता के पिता स्वर्गवासी हैं ,यह जानकर बड़ा दुखी हूँ। मुझे यह बताइये कि रंजीता की फैमिली में और कोैन-कौन हैं और वे लोग क्या करते हैं ?
वाणी ने जबाब दिया- ‘‘माँ है, दो बहने हैं और एक भाई हैं।‘‘
‘‘अन्य भाई-बहनें पढ़ रहे हैं या किसी जाॅब में हैं‘‘-सुकान्त ने प्रश्न किया।
सबसे बड़ा भाई प्राइवेट कम्पनी में कार्यरत है, बड़ी बहन बैंक आॅफ महाराष्ट्र में क्लर्क है। स्वंय रंजीता तो आपके सामने हैं। मंझली भी नौकरी के लिए प्रयासरत हैं, यही फैमिली स्टेटस है-वाणी ने बताया।
यह तो सत्य है कि बिना बाप का परिवार चलाना कठिनाइयों से भरा होता है। उस कठिन दौर को अपने भाई-बहनों के साथ रंजीता पार कर चुकी है। अब दुखों से उबर चुकी है। भूल चुकी है बीते ‘‘काले दिनों को‘‘। ‘‘पर पिता तो पिता होता है जिनके प्यार और सुरक्षा की छांव में जीवन की ऊँचाइयां छूना ज्यादा सुगम होता है। रंजीता और उनके भाई-बहनों ने स्वंय संघर्ष कर अपनी राह बनायी हैं।यह अनुभव कर सुकान्त का मन संतोष से भर गया और एक असीम प्रेम छलक उठा। रंजीता का भोला-भाला चेहरा रह-रहकर सुकान्त को उद्वेलित करने लगा ,जैसे समुद्र के शान्त तल पर ज्वारभाटा आने से अत्यन्त शोर पैदा हो जाता है।एक रचनाधर्मी
भावुक इंसान ,सुकान्त रंजीता से मानसिक तौर पर जुड़ गया था। अब उसकी याद हर पल सताती रहती।
जुलाई का महीना था ।इधर दो-तीन दिनों से कभी तेज, कभी रूक रूक कर वर्षा हो रही थी। आकाश काले बादलों से घिरा था। दिन में भी अंधेरा छाया था। बर्षाती सर्द हवा भी चल रही थी। संयोग से दिन रविवार का था इसलिए अधिकांश नौकरी पेशा लोग घरों में ही बैठे थे। इक्का-दुक्का वही लोग घरों से बाहर थे जिन्हें किसी न किसी प्रकार का अनिवार्य कार्य था। वर्षात के छींटे और वौछार भरे मदहोश वातावरण में सुकान्त अपनी कलम काॅपी लेकर बैठ गया। तभी अचानक रंजीता का चेहरा कौंधा। फिर क्या था झमाझम वर्षा के मादक स्पन्दन से मस्त सुकान्त ने रंजीता का नम्बर अपने मोबाइल से डायल कर दिया। फोन कनेक्ट हो गया। पर पूरा रिंग बजने के बाद स्वंय डिस्कनेक्ट हो गया। कोई रिप्लाई नहीं पाकर सुकान्त का दिल बैठ गया। कई प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगे। रंजीता ने फोन क्यों नहीं रिसीव किया? क्या मेरी आत्मीयता एकतरफा है ? मेरा प्रेम सतही है ? अथवा अब तक दिखाया गया अपनापन सिर्फ दिखावा था ? लेकिन मन अविश्वास करने को तैयार नहीं था। दिल से आवाज उठी- ‘‘नहीं, ऐसा नही हो सकता कि रिंग टोन सुने और रिसीव ना करे। हो सकता है, बाथरूम में हो या वर्षात के कारण मोबाईल फोन ‘साइलेन्ट मोड‘ में रखकर सो रही हो, या कोई कहानी पढ़ रही हो।’’ सुकान्त को यह पूर्ण भरोसा था, चाहे जो कुछ हो रंजीता उसकी उपेक्षा कभी नहीं कर सकती। फिर यह ख्याल आया कि प्रीति से बात कर पता किया जाय। हो सकता है सभी सहेलियां वहीं एकत्रित होकर वर्षात और रविवारी छुट्टी में खाने-पीने का मजा ले रही हो, फोन ‘साइलेन्ट‘ कर।
सुकान्त ने प्रीति का नन्बर डायल किया, तुरंत फोन लग गया। पर सुधा का फोन भी पूरा बजकर बंद हो गया। अब सुकान्त को शंका होने लगी,कारण क्या है फोन रिसीव नहीं करने का।
अभी सुकान्त उधेडबुन में पड़ा, सकारात्क-नकारात्मक पहलुओं पर सोच-विचार कर ही रहा था कि उसके मोबाईल की घंटी बजी। फोन उठाया तो रंजीता नाम स्क्रीन पर देखा। मन प्रफुल्लित हो उठा। तुरंत काॅल रिसीव किया। रंजीता की सुरीली और हंसी से भरी आवाज आयी- ‘‘माफ कीजिए सुकान्त मैंने आपका काॅल जानबूझ कर रिसीव नहीं किया। उस समय मैं एक पोलियो टीका केन्द्र पर थी। आपसे इत्मीनान से और उन्मुक्त बातचीत के लिए मैं उपयुक्त जगह पर नहीं थी। टीका केन्द्र पर बच्चों, महिलाओं व चिकित्सकों की भीड़ थी। मैं टीका केन्द्र पर सोच रही थी- आप अवश्य बुरा मान गये होंगे। फिर ‘क्या था झटपट टीका केन्द्र छोड़कर अपने निवास पर आयी और आपका नन्बर डायल किया। एक आप ही तो हैं इस शहर में जिससे दिल खोलकर बातें करती हूँ, सुख दुख बांटती हूँ, हंसती हूँ। कोई सीमा या बंधन नहीं आपके साथ। वैसे भी आपके साथ आज मुझे भाड़े का नया फ्लैट देखने जाना था। पर यह पोलियो का कार्यक्रम रविवार को ही सघन रूप में चलता है। वर्षात में भी जाना पड़ा। चिल्ड्रेन आॅफिसर और मेडिकल आॅफिसर को टैग कर दिया गया है। मुझे बाध्य होकर पोलियो अभियान पर निकलना पड़ा। मेरी आरै प्रीति का कार्यक्रम आपके साथ फ्लैट देखने का तय था। पर वह भी आज बीमार है। ‘‘
सुकान्त ने तुरंत बताया-"आपके द्वारा फोन रिसीव नहीं करने पर प्रीति को फोन लगाया, पर वह भी नहीं उठायी थी।। मैं तो सोच रहा था कि ‘सनडे‘ इन्टरटेन्मेंट में तल्लीन हैं आप सब। या सिनेमा हाॅल में पिक्चर देखने निकल गयी होंगी चारों जवान लड़कियां।सबों के पास विभागीय वाहन है ही।
रंजीता जोर से हंसी - नहीं-नहीं सुकान्त जी, सिनेमा नसीब में कहाँ। पटना में सप्ताह में एक बार देख भी लेती थी। यहाँ तीन महीने से हूँ। कहाँ देख पायी हूँ। वैसे सिनेमा देखूँगी तो आप भी रहेंगे साथ में ना।अकेली नहीं जाउंगी।
सुकान्त ने कहा- ‘‘विश्वास है, आपके दिल में हूँ, इसलिए भूलना नहीं चाहिए।
रंजीता ने बात का रूख पलटते हुए कहा-सुकान्त जी, अरे वो एक पत्रकार जिससे आपने प्रशिक्षण के दौरान हल्का परिचय कराया था। उसका चेहरा मैं भूल भी गयी थी। सुबह-सुबह आ धमका मेरे निवास पर। उसके साथ एक आंगनवाड़ी सेविका का पति भी था। मुझे बहुत बुरा लगा। बताइये उन्हें आना चाहिए मेरे आवास पर। मैं आॅफिसर हूँ, पर हूँ तो एक लड़की। अपना काम स्वंय करती हूँ। मैं घरेलू कार्यों को निबटाने में लगी थी और वे दरवाजा खटखटाने लगे। जाकर दरवाजा खोली तो सामने दो पुरूष को देखकर परेशान हो उठी थी। तब एक बोलने लगा -मैं पत्रकार हूँ, सुकान्त जी ने परिचय कराया था। फिर साथ के आदमी की ओर संकेत करते हुए, पैरवी की ।इनकी पत्नी सेविका है, जिन्हें आजकल कार्य से हटा दिया गया है। आप पुन: नियुक्त करने में मदद करिये।
मैने स्पष्ट कहा- ‘‘मैं कुछ नहीं कह सकती अभी। जो भी कार्य है कार्यालय में आइये। घर पर नहीं आइये। यहाँ मैं अकेली रहती हूँ। हर आने जाने वालों से बातें नहीं कर सकती। क्या मैंने ठीक कहा सुकान्त जी।
‘‘बिल्कुल ठीक कहा। आजकल पत्रकार कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। न्यूज लिखना पढ़ना तो आता नहीं बस एक डिजीटल कैमरा लेकर घूमते रहतें हैं। टोला-गांव से प्रखंड के कार्यालयों में अपना उल्लू सीधा करने के लिए। मत परकाइये इन लोगों को। वैसे भी प्रखंड स्तर के आॅफिसर को समाचार देने का अधिकार नहीं है। आप उनलोगों से दूरी बनाकर रखिये।
रंजीता ने खुशी व्यक्त करते हुए आगे बताया - कल मैंने कई आंगनवाड़ी केन्द्रों का दौरा किया। बड़ा घपला है। मेरे औचक निरीक्षण से क्षेत्र में हड़कम्प मंच गया है। कई सेविकाएँ टेकहोम कार्यक्रम का अनाज गायब कर चुकी हैं। मैने चेतावनी दी - ‘‘भ्रष्टाचार बर्दास्त नहीं कर सकती। कुपोषित बच्चों और महिलाओं का हक कोई मार ले यह मेरे रहते संभव नहीं। ‘‘इसलिए डरी हुई हैं सब। आपको कैसा लगा मेरा पहला प्रयास ?
‘‘यू विल वी सक्सेसफुल आॅफिसर, नियमानुसार कार्य कीजिए। यही उम्र है कुछ कर दिखाने और अपनी पहचान स्थापित करने की। ‘‘सुकान्त ने सराहना की।दोनों के बीच करीब-20-25 मिनट तक फोन पर लम्बी बातचीन होती रही, न रंजीता रूक रही थी ना सुकान्त।
रंजीता व सुकान्त की उम्र में लगभग 15 वर्षों का अन्तर था। पर बातचीत के दरम्यान दोनों हम उम्र लगते। एक तरफ रंजीता का भरापूरा मांसल जिस्म तो दूसरी तरफ सुकान्त का ‘‘मेन्टेन्ड‘‘ देहयष्टि और बिल्कुल आधुनिक रहन-सहन। सलीका का पहनावा अभी भी 30 वर्षीय युवक दीखता।
सुकान्त हमेशा मस्त रहने वाला, अपने धुन का पक्का इंसान था। उसके हम उम्र उससे 10 वर्ष बड़ी उम्र के लगते। वैसे प्रेम में उम्र मायने नहीं रखता ,अन्यथा जुली और मटुकनाथ खुले तौर पर ना प्रेम का इज़हार करते ना फिर शादी करते।उसी राह पर चलकर नाम चीन नेता दिग्विजय सिंह अपनी पुत्रबधू की उम्र की टीवी एंकर से शादी कर ली।चार्ल्स शोभराज जैसे जेल में कैद अन्तर्राष्ट्रीय तस्कर से 44 वर्ष छोटी 20 वर्ष की निहिता विश्वास प्रेम नहीं करती और शादी के लिए तैयार नहीं हो जाती। निहिता शोभराज के प्यार में पागल होकर टीवी पर भी खुले आम अपने प्यार का इजहार कर चुकी है। 27 वर्षीया फिल्म अभिनेत्री रिया सेन 61 वर्षीय सलमान रूश्दी से प्रेम करने लगी है। रूश्दी ने उसे न्यूयार्क आने का आमंत्रण दिया है।
मिलती जुलती प्रेम कथा धीरे-धीरे सुकान्त और रंजीता के मध्य रचने लगी।दोनों के दिलों पर जादू सा छाता जा रहा था, प्रेम का भूत, प्रेम-प्यार की बातें। हालांकि दोनों ने अभी तक आपस में प्रेम का इजहार नहीं किया था। परन्तु दोनों के व्यवहार में एक मूक आकर्षण व संवेदना एक-दूसरे की निकटता को प्रगाढ़ बना दिया था। यह शायद ना तो रंजीता को पता था ना ही सुकान्त को मालूम। परन्तु प्रकृति गवाह था कि दोनों के बीच कुछ पक रहा है जो समय के साथ प्रस्फुटित होगा।कलि से फूल बनेगा।पर, सुकान्त को अपनी नयी कहानी का एक रुपसी नारी पात्र मिल गया।
प्रखंड में कार्यभार के बाद व्यस्तताओं का सिलसिला चल निकला, पर ‘डेली रूटिन‘ की तरह दिनभर के कार्यों ,निरीक्षणों, विविध लोगों से हुए वार्तालापों का ब्यौरा रोज रात में सुकान्त को दिये बिना रंजीता सोती नहीं। कोई तो दर्द बांटने वाला, तनावमुक्त करने वाला और जटिल कार्यों में सलाह मशविरा देने वाला सच्चा साथी होना चाहिए। सुकान्त इस मानदंड पर खरा पुरूष था। बिना लाग लपेट, निश्छलता और निष्पक्षता, स्वार्थ विहीन मानसिकता से सुकान्त और रंजीता आपस में लम्बी बातें करतें। कभी रंजीता फोन पर हालचाल पूछकर अपना वृतांत सुनाती तो कभी देर हो जाने पर सुकान्त ही काॅल कर याद करता-डियर रंजीता परेशान है क्या? बातें करना भूल गयी। आज का दिन कैसा बीता?
आत्मीयता की डोर मजबूत होती चली जा रही थी। पराये शहर में एक अपना हमराज मिल गया था रंजीता को। एक कविता की ये पंक्तियां कि ‘‘प्रेम ना उपजे आंगना, प्रेम ना हाट बिकाए‘‘...... सत्य हो रही थी।
सुकान्त और रंजीता की नजदीकियां किस अंजाम तक पहुँचेगा यह सिर्फ रंजीता को ही मालूम है, वह कुँवारी है,महानगरीय जिन्दगी का छात्रजीवन बीता कर नये दायित्वों के बीच पहुँची है। छात्र जीवन के कई ‘‘गर्ल और ब्वाय फ्रेंड‘‘ होंगे उसके ग्रुप में। उनके साथ बिताये स्फूर्तिदायक लमहों को अभी भूल नहीं पायी होगी। रोम-रोम में समाये उनके रोमांचक सैर सपाटे, हंसी ठहाके, कोमल प्यार भरे वादे, जीवन भर साथ निभाने की कस्में। शायद उसे भूलना नामुमकिन हो क्योंकि उसी में होगा कोई सपनों का राजकुमार जिसके साथ जीवन बिताने के लिए वह होगी बेकरार। इस मोड़ पर सुकान्त कहाँ है, यह सुकान्त को नहीं मालूम पर रंजीता को अवश्य मालूम है। पर सुकान्त को इतना मालूम है कि रंजीता के दिल के किसी कोने में उसकी भी जगह है। हजारों-लाखों के बीच कोई किसी को अपना बनाता है तभी तो संकोच मिटता है और छोटी-बड़ी घटनाओं का असर एक दूसरे पर पड़ता है।
एक दिन रंजीता उसके आवास पर आयी और कहने लगी,आपकी पुस्तक ’’कटीली राहें’’ सम्पूर्ण पढ गयी।उसमें संकलित कहानियों की "कंटीली राहें ’’शीर्षक कहानी में मैं अपने आप को पाती हूँ ।वह अपनी जैसी लगती है।उसके पुरूष पात्र और स्त्री पात्र में स्वंय को पाती है। यह कहानी सम्पूर्ण नारी संघर्ष की कहानी है। प्यार का नया रूप देखने को मिला दुनियावालों को। मैं भी सुकान्त और रंजीता के प्यार को इसी रूप में दिखाना चाहती हूँ ।क्या आप साथ देंगे सुकान्त।गाढ़े रंग में रंगे प्रेम के आलिंगन में समा गये दोनों।और साक्षी बन गयी बाकि तीनों सहेलियाँ। जीवन की नैया को एक सच्चा दोस्त जैसा पतवार मिल गया। दोनों निकल पड़े हनीमून पर।

•मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह

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veersingh jatav 8 महीना पहले

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yash chauhan 8 महीना पहले

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Monika Jangid 9 महीना पहले

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Vishwakarma Kashinath 9 महीना पहले

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Nilam Narola Galani 9 महीना पहले