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हदे निगाह तक

हदे निगाह तक

कहानियां

सुदर्शन वशिष्ठ

हदे निगाह तक अन्धेरे से गुजरते हुए

ट्रेन फुंकारती और धड़धड़ाती हुई आई। एक अजगर की तरह। धड़धड़ाहट जमीन के नीचे से जाती हुई। जैसे भूकम्प के समय धरती के नीचे हिलती हुई एक लहर सी दूर तक निकल जाती है। उसके पैरों तले सरसराहट सी हुई जो दिमाग से जा टकराई.....अभी कोई अपने में खोया भीतर चला जा रहा तो........। कंपकंपी के साथ रौंगटे खड़े हो गए।

सुरंग के करीब पहुंचने पर ट्रेन एकाएक फुंकारी और केंचुली चढ़े सांप की तरह घुस गई। सुरंग का मुहाना कांपा और कुछ देर तक धुआं छोड़ता रहा। धड़धड़ाहट धीरे धीरे दूर होती गई। पटरियों में सरसराहट अभी बाकी थी। बचपन में पटरी के ऊपर कान लगा कर सुनते थे कि ट्रेन कहीं दूर आ रही है या नहीं। कानों में सायं सायं होती और पटरी से कान लगाती बार एक अजीब सा भय शरीर में घुस जाता।

ट्रेन के भीतर विलीन होने पर सब शांत हो गया। सुरंग के ऊपर सड़क पर बसों, कारों की आवाजाही की आवाज सुनाई देने लगी। कुछ लोग बस के इंतजार में खड़े थे। उसके ऊपर पहाड़ी पर आकाशवाणी, राजभवन, संग्रहालय की ख़ामोश खड़ी बिल्डिंगें, जिन्हें पता नहीं चलता था कि नीचे लिजलिजे कीड़े की तरह रेंगता हुआ कोई जीव घुसता हुआ आरपार होता है।

इधर से पहली और उधर से आख़री सुरंग नम्बर एक सौ तीन इतनी लम्बी होगी, यह अंदाजा न था। धड़धड़ाहट और कम्पन बंद होने तक वहां रूका रहा विवेक। यहां दोनों ओर रेलवे क्वारटर्ज थे। ट्रेन के भीतर जाने के बाद कुछ देर मुहाने पर सन्नाटा छा गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। धीरे धीरे सब शांत हो गया। वह झट से भीतर घुस गया। भीतर ईंजन का धुआं अभी भी भरा हुआ था।

सुरंग इतनी लम्बी थी कि दूसरा द्वार यहां से नजर नहीं आ रहा था। हदे निगाह तक अन्धेरा ही अन्धेरा। निगाह भी वहीं तक जाती है जहां उजाला हो। अन्धेरों में निगाह वापिस लौट आती है।

घुसते ही उजाला था और कुछ दूरी तक नजर आ रहा था। दूर जाती हुई पटरियां। उनके बीच मजबूत लकड़ी के तख्ते, बीच में और दोनों ओर रास्ता भर जगह। पटरियों के बीच चलना आसान नहीं रहता। कुछ तख्ते सामान दूरी पर होते हैं, फिर दो बहुत करीब लगे होते हैं जहां पटरियों का ज्वाइंट होता है। हर ज्वाईंट बराबर दूरी पर होने के कारण ट्रेन के चलने पर पटरियों से एक ताल और लय में आवाज आती रहती है।

जितनी तेज उस पार पहुंचना चाहता था विवेक, उतनी ही टांगें पीछे जा रही थीं। आगे जाते जाते तख्ते ठीक से नजर आना बंद होने लगे। बीच तक आते आते घुप्प अंधेरा छाने लगा। एक बार सोचा, पीछे मुड़ जाए। पांव भी अंदाजे से ही रखने पड़ रहे थे। किनारों से टप्‌ टप्‌ और चप्‌ चप्‌ की आवाजें आ रही थीं जैसे कोई जानवर पानी पी रहा हो। लगता था किनारों में कीचड़ होगा। ऐसे अन्धेरे में बाघ जैसे जानवर भी छिपे रह सकते हैं। साथ में टॉर्च होती तो आसपास देख सकता था। ऐसे में कोई ट्रेन के चपेटे में आ जाए तो किसी को पता भी न चले। कभी कोई ट्रेन की पटरी ठीक करने आए तभी अवशेष मिल पाएंगे। जैसे तारा देवी के जंगल में साल में एक दो नर कंकाल जरूर मिलते हैं जब गर्मियों में सैलानी वहां मस्ती करने जाते हैं।

गिरते पड़ते चलते हुए दूसरे सिरे पर दूर, बहुत दूर रोशनी का एक छोटा सा गोला दिखा.....हां, यह दूसरा किनारा है। उसे देखते हुए चलने से दिमाग घूमने लगा, जैसे चक्कर आ रहा हो। आगे बढ़ते रहने पर गोले का आकार और तेज बढ़ता गया। अब और तेजी से चलने लगा विवेक। अंततः सुरंग में रोशनी आने लगी। गोलाई में दीवारें भी दिखने लगीं। उसकी चाल में तेजी आ गई और दूसरे सिरे तक पहुंचते पहुंचते लगभग भागने लगा।

यह बहुत ही अजीबोगरीब सफर था। पहली बार इतनी लम्बी सुरंग पैदल पार की। कुल्लू जाते हुए भी ऐसी लम्बी सुरंग आती है। सुरंग में रोशनी के बल्ब लगे होने के बाबजूद बस में बैठे होने पर बीच तक आते आते बड़ा भय सा लगता है। मन डूबने लगता है। यह तो अन्धेरे में पैदल सफर था।

दूसरी ओर देवदार का घना जंगल था। नीचे गहरी खाई। जंगल में जाने लगा, फिर सोचा, इस ओर जाना निरर्थक है। फिर से उसी सुरंग से वापिस लौटने की हिम्मत जुटाई। एक बार जिस रास्ते से गुजर जाओ, दूसरी बार कुछ आसान लगता है। टे्रन के आने की सम्भावना नहीं थी अतः हिम्मत कर घुस गया।

पत्नी ने कहा था, आजकल अक्षय सुरंग से हो कर जंगल में पढ़ने जाता है।....... वह भी कोई जगह है जाने की .....पहले क्यों नहीं बताया, मैं उसे मना करता। घर में क्या परेशानी है। इतनी शान्ति है, कोई शोर शराबा नहीं। जंगल में जाना और वह भी सुरंग से हो कर....यह तो कोई बात नहीं बनी।

वापसी पर सुरंग के मुहाने पर कुछ रूका कि कोई देख तो नहीं रहा होगा...फिर तेजी से बाहर आ कर रेलवे क्वारटर्ज के साथ चलता हुआ सड़क तक आ गया।.....अब! सड़क पर खड़े हो सोचा। तभी एक बस आ गई जो दूसरी सुरंग ‘विक्टरी टनल‘ से होती हुई अस्पताल के नीचे से गुजरती थी। एक विचार आते ही वह यन्त्रवत्‌ सा चढ़ गया।

आज एतवार की छुट्‌टी थी, इसलिए अस्पताल में भीड़ नहीं थी। सीधा केज्यूलिटी में गया जहां कुल सात मरीज थे। कुछ तो बीमार थे जो अस्पताल पहुंच जाने पर निश्चिंत भाव से बिस्तर पर लेटे थे। तीन मरीज किसी एक्सीडेंट से जख्मी थे जिनके हाथ पांव, सिर में पटि्‌टयां बन्धी थीं। इनमें एक बेहोश था। शायद हैड इंजरी थी। बेहोशी की हालत में वह बार बार हाथ पांव इधर उधर मार रहा था। हैड इंजरी का यहां ईलाज नहीं था फिर भी मरीज बिस्तर पर तड़पते रहते। ऐसे में अपने सगे सम्बन्धियों से विमुख वे दूसरी दुनिया में जीते हैं। शरीर तो यहां रहता है, दिमाग पता नहीं कहां चला जाता है। ऐसे में लगता, यदि जीव या आत्मा कहीं है तो वह दिमाग में ही है। दिमाग से संपर्क टूट गया तो शरीर तो मिट्‌टी है, उसी समय कटी डाल सा निर्जीव हो लुढ़क जाता है। जैसे पक्षाघात में होता है, दिमाग से संपर्क ही तो टूटता है। एक बार टीवी में बच्चों के जन्म के दृश्य दिखा रहे थे। एक बच्चा निकला एकदम लुजपुंज, बंदरिया के मरे बच्चे की तरह। डॉक्टर ने तुरंत फूंक सी मारी। वह एक झटके से चैतन्य हो गया। उसी क्षण उसका हर अंग तेजी से काम करता दिखने लगा जैसे किसी मशीन का स्विच ऑन कर दिया हो। दिमाग सुन्न है तो कुछ नहीं। आप लाख मोह ममता की दुहाई देते रहो, उनके सामने रोते चिल्लाते रहो, उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता। संज्ञाहीन हो वे संवेदनहीन और एक तरह से निर्मोही हो जाते हैं। इनका शरीर पड़ा रहता है कई दिन बिना जीव, बिना आत्मा के। जीवात्मा पता नहीं कहां चला जाता है! हां, किस्मत से दिमाग का क्लॉट खुल जाए तो एकदम सब को पहचानेंगे। सारी संवेदनाएं एकदम जाग उठेंगीं। यह मां, यह बाप, भाई बहन, सगे सम्बन्धी। क्या इसके साथ भी ऐसा होगा! जो लेटा है सब से विमुख। न जाने किस दुनिया में गुम! मां बैठी है सिरहाने इंतजार में, जाने कब जैसे आंखें खोल दे, उस पगलाई औरत को पहचाने और पुकारे :‘‘मां........!‘‘

इस बड़े से कमरे का चक्कर लगा कर वह नर्स रूम में गया : ‘‘कल कोई एक्सीडेंट केस तो नहीं आया था....।‘‘ नर्स रजिस्टर खोल व्यस्त दिख रही थी।

‘‘देखते नहीं, ये सब एक्सीडेंट केसिज ही हैं और कल ही आए हैं।‘‘ वह झेंप गया।

.....इन में तो कोई नहीं है.... का भाव चेहरे पर लाता हुआ तेजी से बाहर आ गया।

वापिस लौटते हुए मन बुरा सा हुआ। आज चौबीस घण्टे बीत गये। कल ही की तो बात है। कल शनिवार की छुट्‌टी थी, आज एतवार।

घड़ी, पल। मिनट, दो मिनट। ऐसे ही एक दिन, दो दिन। पांच, सात..... समय रूकता नहीं, और और लम्बा होता जाता है। इंतजार में पल पल खिंचता चला जाता है....अब आएगा...अब आएगा... सोचते सोचते आदमी बेहाल हो जाता है। पता न चले तो सालों का पता न चले, कब बीत गए हंसते खेलते। कभी एक एक पल भी भारी हो जाता है। समय और बहता पानी तो चलता ही रहता है। आज मरे कल दूजा दिन, सयाने सच ही कहते थे। यह भी तो है कि समय नहीं बीतता, बीतते तो हम हैं।

वैरागी साधुओं का जमावड़ा और धुएं की दीवार

वन विभाग का वह रेस्ट हाउस बड़ा अकेला था। ऊंचे ऊंचे देवदार के पेड़ों के बीच छिपे किसी परिंदे के घोंसले की तरह। दूर से देखने पर पता नहीं चलता कि यहां भी कोई बिल्डिंग हो सकती है। झाड़ झंखाड़ों से भरी बड़ी खुली सी जगह में लकड़ी की एकमंजिली इमारत। आसपास सीलन भरी जमीन जिसमें चौड़े पत्तों वाले पौधे और झाड़ियां उगी हुई थीं। अहाते में ऊंची ऊंची भांग उगी हुई थी। वन विभाग ने कुछ फूल उगाने का प्रयास किया था। रेस्ट हाउस के दोनों ओर बाड़ के भीतर फूलों के पौधे थे जो झाड़ियां अधिक लग रहे थे। शाम के धुंधलके में बड़ा डरावना और रहस्यमय माहौल था।

बरामदे में पहुंचते ही रेस्ट हाउस का चौकीदार खाल पहले वनमानुष की तरह प्रकट हुआ। सीढ़ियां चढ़ने के बाद बरामदे में किनारे का एक कमरा खुला ही था। उसने झट से सामान वहां रख दिया :‘‘जनाब! यहां खाना नहीं मिलेगा। बाजार जा कर खा आओ.... चाय मैं बना देता हूं।‘‘ भारी आवाज निकालते हुए वह बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए पीछे की ओर गायब हो गया।

वहां देर तक बैठने की स्थिति में नहीं था विवेक। खिड़की से पार्वती नदी की सायं सायं हवा की तरह भीतर आ रही थी। उसने जाली खोल खिड़की बंद की तो एकदम शान्ति छा गई।

खाल पहने आदमी तुरंत ही चाय ले आया। जब वह कप रख कर गया तो एक तेज बदबूदार झोंका आया। जल्दी से चाय अंदर कर गड़प कर वह बाहर आ गया। लकड़ी का लम्बा झूलता हुआ रस्सों का पुल पार कर मणिकर्ण मंदिर की ओर चला गया। कुछ कुछ अन्धेरा होने से पुल पार करते हुए अभी नीचे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, केवल दरिया की गहरी आवाज आ रही थी। मंदिर बंद हो चुका था। कुछ स्थानीय लोग बरामदे में डेरा जमाए बैठे थे। उसके साथ ही दूसरा मंदिर जमीन में धंसा हुआ था जिसके आगे जमीन में उबलते पानी के बुलबुले उठते दिखाई दे रहे थे। रास्ते के इस ओर लकड़ी की छोटी छोटी दुकानें थींं। इन में बाहर लकड़ी के बैंच पर हिप्पी ध्यान मुद्रा में बैठे थे। कुछ तिब्बतियों ने अपने ढाबों के बाहर मैले पर्दे लटका रखे थे। भीतर से मोमो, चाउमिन की गहरी गन्ध आ रही थी। गुरूद्वारे से ठीक पहले नीचे की ओर एक गुफा सी थी।

क्या पता यहां ही..... नीचे झांका विवेक। वहां धुएं की एक दीवार सी बनी हुई थी जिससे साफ साफ नजर नहीं आ रहा था। ठीक बीच में आग जली हुई थी जिसमें बड़े बड़े लकड़ी के ठेले लगाए हुए थे। वह नीचे उतर गया।

बड़ी बड़ी लम्बी जटाओं वाले साधु लाल लाल आंखें किए चिलम एक दूसरे की ओर बढ़ा रहे थे। एक साधु लम्बा कश खींच धुएं की गहरी लाट ऊपर को छोड़ता और चिलम दूसरे को थमा देता। उनके नंगे शरीर पर धूल मली थी। कई साधुओं ने पूरे माथे पर लेप लगाया हुआ था। पीले लेप और काले रंग के बीच उनकी लाल आंखें बाज सी चमक रही थीं। कानों में मुद्राएं, सिर पर मूंज की तरह जटाओं का घेरा। इनमें कुछ हिप्पी भी थे जो गोरी चमड़ी और विदेशी झोलियों के कारण अलग पहचाने जा रहे थे। पूरी गुफा में भांग की गन्ध और धुआं भरा था।

एक युवा साधु ने देखा विवेक को। जब काफी देर वहां खड़ा रहा तो कुछ हिप्पी भी उसे शक की निगाहों से देखने लगे। एक दो ने इशारा भी किया। अब खड़ा रहना ठीक नहीं लग रहा था। अतः एक एक को पुनः देख कर वह ऊपर आ गया।

गुरूद्वारे से लंगर की गन्ध आ रही थी। भूख तो नहीं थी सोचा, यहीं कुछ प्रसादा ले ले। लंगर का हॉल नीचे था जिसके सामने उबलते पानी में दाल, चावल के बड़े बड़े बरतन डाले हुए थे। खौलते पानी में रोटियां भी पक कर ऊपर तैर रहीं थीं।

हॉल के भीतर जाने से पहले उसने एक किनारे चट्‌टान पर किसी को लेटे हुए देखा। वह सिर से पैर तक मैला सा कम्बल लपेटे सोया था। लम्बाई ठीक ठाक थी, छः फुट को छूती हुई। सोया हुआ आदमी वैसे भी लम्बा लगता है। उसे देख उतावला हो गया विवेक। कुछ देर वहीं खड़े एकटक उसे देखता रहा। सोए हुए का कोई अंग बाहर नहीं था। उससे रहा नहीं गया। तेजी से करीब जा कर धड़कते दिल से धीरे धीरे उसका कम्बल सरका दिया। उस आदमी की दाढ़ी झाड़ी की तरह उगी हुई थी। रंग काला पड़ गया था। आंखों के नीचे गहरे गढ़े थे। दीन भाव से उसने आंखें खोलीं।

‘‘माफ करना भैया!....माफ करना। गलती हो गई.....।‘‘ कहते हुए उसने कम्बल ढक दिया।

लंगर में लगभग तीस लोग पंक्ति में बैठे थे। बाहर से आए श्रद्धालु, कुछ स्थानीय, कुछ भिखारी किस्म के, कुछ हिप्पी। उसने एक एक को ध्यान से देखा और किनारे थाली ले कर बैठ गया। उबलते पानी में पकाई रोटियां कुछ गीली सी थीं। एक रोटी निगल कर उसने बस कर दी और प्रसादा बांटने वाले सरदार जी का शुक्रिया अदा किया।

वापिसी पर अन्धेरा छा गया। रेस्ट हाउस के पास टिड्‌डे और झींगुरों की आवाजें तेज हो गईं थीं। रेस्ट हाउस के कमरे में बड़ा सूना सा लगा। पार्वती की सायं सायं अब बंद खिड़कियों के अंदर घुसती हुई कमरे में पांव पसार रही थी। रह रह कर लाल लाल आंखों वाले साधु और चट्‌टान पर कम्बल ओढ़े सोया वह परदेसी दिखता रहा।

क्या पता उन साधुओं में से एक, कहीं दरिया के ऊपर चट्‌टान पर बेसुध सोया हुआ, कहीं फुटपाथ पर लेटा हुआ, मंदिर के कोने में पड़ा हुआ, गुरूद्वारे में सेवा करता हुआ....कहीं भी हो सकता है.......सुबह जाने से पहले चप्पा चप्पा छान मारेगा।

सात बजे ही तैयार हो गया विवेक। बैग कन्धे पर डाल चौकन्ना हो सभी होटलों, सरायों में नजर दौड़ाता मंदिर से होता हुआ गुरूद्वारे जा पहुंचा। मंदिर में तो रहने की व्यवस्था थी नहीं, गुरूद्वारे में जा कर पहले रजिस्टर चैक किया। सब अजनबी नाम दर्ज थे। पिछले दिनों के भी नाम पते पढ़े और लिखावट देखी।

गुरूद्वारे में गुरू ग्रन्थ साहिब के सामने सबद कीर्तन आरम्भ हो गया था। भीतर जाते ही सिर पर रूमाल रख लिया और घुटनों के बल बैठ कर माथा टेका। एक बार एक मित्र ने पाठ रखा था तो बिना माथा ढके नंगे सिर वहां जा बैठा था। किसी ने बताया था कि सिर ढक कर घुटनों के बल बैठ कर या लमलेट हो कर माथा टेकना चाहिए।

कुछ आंखें बंद किए बैठने रहने पर उसे शान्ति मिली। धीरे धीरे मन उचाट होने लगा और आंखें खोल माथा टेक एमदम खड़ा हो गया.....यह समय आंखें बंद कर बैठने का नहीं है।

बाहर आ कर दुकान में चाय पी और बासी बंद चाय में डुबो डुबो कर खाया। इस समय रात के सभी साधु गायब थे। धूणा ठण्डा पड़ चुका था। बरसात के कारण आजकल लोग भी कम थे। रास्ता बंद हो जाने का खतरा बना रहता है। ऊपर से नीचे तक तीन चक्कर लगाए और पार जाने के लिए रस्सों के पुल पर आ गया। शाम को नीचे कुछ नहीं दिखा था। अब पुल के बीच तक आते आते पांव ऊपर उठने लगे जैसे अभी पुल से उछल कर नीचे जा गिरेगा। नीचे देखने पर दरिया बहुत गहरा और संकरा दिख रहा था। लग रहा था, दरिया नीचे जा रहा है तो हम ऊपर।

बस में इस समय कम सवारियां थीं। संकरे मोड़ों से गुजरते हुए भी बस तेज चल रही थी। नीचे गहरी घाटी में पार्वती नदी साथ साथ चल रही थी उतनी ही तेजी से। रात ठीक से सोया नहीं, अतः गुनगुनी धूप में नींद आ गई।

नींद में दुःस्वप्न की तरह उसे मॉरचुरी दिखाई दी। एक दीवार में स्टील के लम्बे लम्बे दराज। एक भयंकर मूंछों वाला आदमी एक दराज खोलता है, बंद करता है। दूसरा दराज खोलता है, बंद करता है। फिर तीसरा..........ठक्‌ से दराज बंद होने से वह जाग गया। किसी सवारी ने चढ़ते हुए ठाक्‌ का दरवाजा बंद किया था। बस के चलने के साथ उसका माथा साइड के शीशे के हत्थे से जा टकराया। एकदम जागने से दिल जोरों से धड़क रहा था। माथे पर पसीने के बीच एकदम रोड़ा बन गया।

जिंदगी में पहली बार अस्पताल की मॉरचुरी में गया था विवेक। सिपाही उसे ले गया था। अस्पताल से दूर, नीचे एक अलग बिल्डिंग में बड़े से दरवाजे के अंदर दीवार के साथ बड़े बड़े रैक बने थे, आदमकद। सिपाही ने एक रैक को हैण्डल पकड़ बाहर खींचा तो सफेद चादर में लिपटी एक लाश बाहर आ गई। जोर से खींचनेे से उसका सिर देर तक हिलता रहा। बहुत बार किसी बीमार के साथ अस्पताल में रातें गुजारने पर उसने कई मरीजाें को मरते देखा था। मरते हुए मरीज को डॉक्टर घेर लेते। एक डॉक्टर दोनों हथेलियां इकट्‌ठी कर उसकी छाती पर जोर जोर से बार बार मारता। तीन चार बार ऐसा करने पर कोई हरकत नहीं होती तो उसका मुंह ढक कर चले जाते। बहुत बार उसके घर वाले वहां नहीं होते। उसी समय दो छोकरे आ कर उसे चादर में मुंह, पांव लपेट कर अच्छी तरह बान्ध देते और तुरंत स्ट्रेचर पर ले जाते। वह सोचता, इस समय कहां ले जा कर रखते होंगे! रिश्तेदार एक दम रात को तो ‘बॉडी‘ बने शरीर को ले नहीं जा सकते क्योंकि ज्यादातर मौतें रात को ही होतीं।

वह आधी निकली लाश को एकटक देखता रहा। लम्बाई का अंदाजा भी नहीं लग पा रहा था। तभी सिपाही ने हिलाया :''देख लो जनाब!.... देखने में क्या हर्ज है!‘‘ उसके साथ एक और बुजुर्ग को भी बुलाया गया था। बुजुर्ग नजदीक नहीं आया, दूर ही खड़ा रहा। उसने गले के पास से चादर कांपते हाथों से खोली। दिल की धड़कन एक दम तेज हो गई। फिर झटके से चादर हटा दी.....बहुत अजीब सा चेहरा था उसका एमदक पीला, जैसे जहर फैल गया हो.. कुम्हलाए हुए ताजे फूल सा....शाख से टूट लटकी हुई हरी डाल सा।......नहीं नहीं, यह नहीं है..... उसने कहा नहीं मगर आश्वस्त और पुलकित हो गया। उसने आसपास के रैकों की ओर अर्थपूर्ण नजरों से देखा।

''ये सब अस्पताल के मरीजों के है जो अपनी मौत मरे हैं....। हमारे पास एक ही केस आया था। ये गहरे नाले में पड़ा मिला था।'' सिपाही ने बताया।

‘‘आप भी नजर मार लेते....।‘‘ सिपाही ने बुजुर्ग से जैसे अनुरोध किया। उसने बस सिर हिलाया।

वापिसी पर सीढ़ियां चढ़ते हुए बुजुर्ग ने बताया, वह उसे देख चुका है : ''....एक दिन उसे मैंने देखा। घर नहीं बताया। उसकी दादी और मां को एक आसरा है कि वह वापिस लौटेगा। उनके लिए अभी वह जिंदा है, मरा नहीं। और तब तक नहीं मरेगा जब तक मैं बता न दूं। उसकी मौत जैसे अब मेरे हाथ में है। मैं ही उसका पालक हूं, संहारक भी मैं ही हूं। उसका बाप तो अब आस छोड़ चुका है। वह अब यहां भी नहीं आता। यहां आने के लिए पांच सेर का गुर्दा चाहिए बच्चा।''

बुजुर्ग पांच फुट से कुछ ही ज्यादा था, पाव भर हडि्‌डयां। और कुरेदने पर उसने बताया :‘‘... बड़ा होनहार था मेरा पोता.... एक बड़ी कम्पनी में काम भी मिल गया। नोएडा में रहा सालेक। दिन रात काम करता था। फिर पता नहीं क्या हुआ... एक कम्पनी छोड़ी या निकाल दिया, दूसरी छोड़ी, फिर तीसरी.....कभी वापिस नहीं लौटा। कोई कहता बहुत बड़ा आदमी बनने के ख्बाब देखता था कि नौकरी छोड़ दी, कोई कहता, ड्रग्ज लेने लगा था, कोई कहता डिप्रेशन में था।.... वापिस लौटा भी तो सुस्त और पस्त। जैसे वह नहीं कोई और ही था धीर, गम्भीर, गुमसुम। एक दिन घर से गया तो लौटा ही नहीं......।''

''आपने ढूंढने की कोशिश नहीं की .... कोशिश तो जारी रखिए।‘' उसने कहा। ''ढूंढने की कोशिश! कहां कहां नहीं ढूंढा! फिर एक दिन वह मिल गया।‘‘

‘‘अच्छा!...... कहां!....... आप बता रहे थे।''

‘‘यहीं... किसी एक रैक मैं....।'' कहते हुए बुजुर्ग का चेहरा सफेद पड़ गया।

''क्या बात करते हैं.... यहीं रैक में!'' रौंगटे खड़े हो गए विवेक के।

''हां, मैंने पहचान लिया...वही था। उसका अबोध चेहरा कितना उलझन भरा, हैरान परेशान और पस्त त्रस्त हो गया था। उसकी आंखें खुली थीं, मैंने हौले से बंद कर दीं और........।''

‘‘और.....!‘‘ व्यग्र हो उठा विवेक।

''और पहचानने से इन्कार कर दिया...... अब सोचता हूं, किसी को भी ले जाऊं किसी भी रैक से और हमेशा के लिए किस्सा खतम करूं।''

बुजुर्ग के चेहरे से पता नहीं चल रहा था कि वह सहज और संयत है या बहुत आहत। ढीले ढाले कपड़ों के ऊपर जैसे डम्मी सा भावहीन सिर रखा था। पिचके हुए छोटे से चेहरे पर अणगणित झुर्रियों के बीच सफेद मूंछें थीं। वह एकाएक सीढ़ियों पर फस्स की आवाज के साथ बैठ गया। उस का छोटा सा सिर हिलने लगा। कोट में सिर छिपाए वह जोर जोर से फफक्‌ फफक्‌ कर बच्चे की तरह रोने लगा।

किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा विवेक।

तभी दो छोकरे उनके सामने सीढ़ियों से एक स्ट्रेचर में सफेद कपड़े में ढकी लाश ले गए। बूढ़ा रोता हुआ उस लाश को हसरत भरी निगाहों से देखता रहा और दोनों हाथ जोड़ दिए।

अब कभी विवेक को पुलिस स्टेशन से फोन आता तो एड़ी से चोटी तक एक सिरहन दौड़ जाती जैसे सांप रेंग रहा हो। मुंह से आवाज नहीं निकल पाती। फोन में वह व्यवस्था करवा ली थी जिससे करने वाले का नम्बर उसमें सामने आ जाए। जब भी फोन की घण्टी बजती, सब एकसाथ दौड़ते......शायद कोई पहचानी आवाज सुनने को मिले।

बाढ़ में मिट्‌टी के घरौंदे

शाम को घर पहुंच गया। खाली हाथ। खाली मन। इतने दिन जैसे सभी पानी में मुटि्‌ठयां भींचते रहे। हवा को पकड़ने की कोशिश करते रहे। अम्बर में पैबंद लगाते रहे। मिट्‌टी और रेत के घरौंदे बनाते रहे।

कभी कभी सुबह ही एकाएक शाम में बदल जाती है। सुबह तो नए संचार, नई शुरूआत और नए जीवन की तरह उगती है। कभी बादलों में सूरज ढकने से सुबह की शुरूआत एक उदासी के साथ होती है।

ऐसी ही सुबह भी वह। उस दिन सभी ने मंदिर जाना था। एक दिन पहले ही तय कर लिया था। सुबह के लिए टेक्सी मंगवा ली थी। किसी ने बताया था सुंदरगगर के पास देवी का मंदिर है। मंगलवार को तो बहुत भीड़ रहती है, आप किसी और दिन चले जाओ। बड़ी प्रत्यक्ष देवी है। मन अशांत रहता है तो शान्ति मिलेगी। किसी कसर मसर से भी राहत मिलेगी। देवी का पुजारी मिट्‌टी और पानी अभिमन्त्रित कर देता है। उसे घर में छिड़को, भीतर कुछ नहीं आ पाएगा।

सुबह उठ कर देखा विवेक ने तो अक्षय बिस्तर में नहीं था। खाली बिस्तर देखते ही एक बार धक्का सा लगा। एकदम माथा ठनका। बाथ रूम से तो विवेक अभी बाहर आया है। फिर सोचा, शायद आज जाना था तो जल्दी उठ गया होगा। वैसे हमेशा देरी से उठता था। रात को देर तक जगा रहता। वैसे भी आजकल बच्चों का रूटीन बन गया है, रात सोने में नहीं आते और सुबह उठने में नहीं। सुबह की चाय भी ले ली विवेक ने। फिर आ कर देखा तो बिस्तर खाली। बाहर निकल नीचे ग्राउंड मेें झांका, शायद सैर को निकला हो। अंदर बाहर जाते आठ बजने को आए। पत्नी भी उठ कर बाहर आ गई। उसे बताया तो अब दोनों बरामदे में इधर से उधर घूमने लगे। अब तक बेटी भी उठ गई। पत्नी के कहने पर एक बार फिर ग्राउंड और इधर उधर चक्कर लगा आया विवेक। नौ बजे तक विश्वास होने लगा कि अक्षय अब यहां नहीं है।

इंतजार जैसी कड़ी सजा कोई नहीं। समय लम्बा और तगड़ा होता जाता है। आने वाला नहीं आता। पल पल खिचता जाता है। अब आएगा...अब आएगा.... सोचते सोचते आदमी बेहाल हो जाता है।

दस बजे तक मित्र दोस्तों, रिश्तेदारों को फोन लगाए। कुछ पता नहीं चला। कुछ दिनों से क्लब जाने लगा था। वहां भी पता किया। दोस्त तो उसका एकाध ही था। हमेशा अकेला ही रहता था, अपने मे मग्न। उतने में टेक्सी भी आ गई। विवेक ने पत्नी के साथ टेक्सी में बैठ ऐसे ही शहर के आसपास, कुछ दूरी तक चक्कर लगाया। पास के मंदिरों में गए। यदि सुबह ही निकला होगा तो ज्यादा दूर नहीं गया होगा और रात ही निकल गया हो तो पता नहीं। रात साढ़े दस तक तो सब जाग रहे थे। दरवाजा खुलने या बंद होने की आवाज भी नहीं सुनाई दी। कई आशंकाओं ने मन को घेर लिया। यूंही चक्कर लगाने के बाद टेक्सी वाले को भेज दिया कि आज जाना नहीं हो सकेगा।

दोपहर तक कुछ रिश्तेदार आ पहुंचे। सब अपने अपने अंदाजे लगाने लगे।

''अच्छा होते समय लगता है, बुरा अचानक और एकदम हो जाता है। जैसे पहुंचने में तो समय लगता है, एक्सीडेंट एकदम हो जाता है।‘‘ किसी ने कहा।

‘‘कोई नहीं, आ जाएगा। जवान लड़का है कोई छोटा बच्चा नहीं। क्या कोई झगड़ा हुआ था!''

‘‘आजकल के बच्चों को सब्र भी तो नहीं है। तुरंत हथेली पर सब कुछ चाहिए...।''

रिश्तेदारों के जोर देने पर अनमने से शाम होते होते कुछ खाया। पत्नी बातें करती जा रही थी और लगातार रोते जा रही थी। बेटी भी धीरे धीरे सुबक रही थी। घर में एक बोझिल और मातमी सा माहौल बन चुका था।

रात ही पत्नी ने बताया था कि आजकल पढ़ने के लिए सुंरग के पार जंगल में जाने लगा था, मैंने मना भी किया कि उस ओर न जाया कर। बेटी उससे आठ साल छोटी थी। उसने कहा, भैया कह रहे थे, वे इस घर में बैठ कर नहीं पढ़ेंगे। घर छोड़ कर दूर चले जाएंगे। यहां सब उनके दुश्मन हैं। हमेशा उनके खिलाफ कोई न कोई साजिश रचते रहते हैं।

जब से एमबीए की एफिलिएशन का झगड़ा पड़ा था, वह बहुत अनमने से इग्नो में दाखिला लेने को तैयार हुआ था। ऐन अंतिम वर्ष तक पहुंचने पर हल्ला मचा था कि भारती विश्वविद्‌यालय को मान्यता नहीं मिली है। उसके साथ के लगभग तीस बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया। सब ने मिल कर कोर्ट कचहरी जाने की भी सोची। वकील ने कहा, कुछ नहीं होगा। इससे तो बिना टाईम बर्बाद किए कहीं और एडमिशन ले लो। हट फिर कर इग्नो का फार्म भरवाया।

नया नया खुला यह प्राईवेट भारती विश्वविदया्‌लय एक व्यापार केन्द्र था। शुरू में ही दो लाख दाखिला, साल में लाख से ऊपर फीस। एमबीए पूरा होने से पहले ही कम से कम पांच लाख के पैकेज पर नौकरी देने के वादे के साथ जगह जगह पोस्टर चस्पां कर रखे थे जिसमें छात्रों के आकर्षक रंगीन फोटो कई कम्पनियाें के साथ दिए गए थे। एक बार खर्चा कर दो, चाहे लोन लेना पड़े, घर के पास ऐसी सुविधा कहां मिलती है। किसी बड़ी कम्पनी में लगेगा तो जिंदगी संवर जाएगी।

फाईनल तक पहुंचते पहुंचते सपने देखने लग गया अक्षय... उसे तो यूनिवर्सिटी से ही कैंपस में ही चुन लिया जाएगा। कैंपस में कम्पनी वाले खुद आते हैं और सेलेक्ट कर जाते हैं। उससे भी पहले जहां ट्रेनिंग होती है, वही कम्पनियां रख लेती हैं।...... पापा ने बहुत खर्चा किया है, एक बार जॉब लगने दो....,अक्षय कहता।

इस हादसे के बाद वह एकदम अर्न्तमुखी हो गया। घर में सबने दिलासा भी दिया कि कोई बात नहीं। और बच्चे भी तो हैं...शायद कुछ बात बन जाए तो तुम्हारे दो साल तो बच ही जाएंगे। हालांकि ऐसा होता नजर नहीं आ रहा था। सरकार चुप थी। यूनिवर्सिटी खोलने के लिए मन्त्री, मुख्यमन्त्री तक मोटी रकम हजम की गई थी। शहर के बिलकुल पास मुख्य सड़क पर एक पूरी पहाड़ी दे दी गई थी जिसमें बिल्डिंगें ही बिल्डिंगें बना दी गईं थीं। इतने बड़े तामझाम में विद्यार्थी कहीं नजर नहीं आते थे। यूनिवर्सिटी का संस्थापक एक लाला था जिसे अपने दस्तखत करने नहीं आते थे।

रात को पड़ौसी ने सुझाया कि थाने में रपट लिखवा दो। हर्ज क्या है! मैं फोन कर दूंगा।

पहली बार थाने का पुराना सा भवन देखा विवेक ने। थाना शहर के बाजारों के नीचे एक छिपी सी जगह में था। पता करने पर वहां पहुंचा तो तीन वर्दीधारी बैठे थे। उसने रपट लिखवाने को कहा तो एक बड़ी लापरवाही से बोला :‘‘ऐसे ही होता है जनाब! आजकल बच्चों का कोई दीेनोईमान, ठौर ठिकाना नहीं रहा। बदहवासी में दौड़े जा रहे हैं। अभी कल ही एक आप की तरह पढ़े लिखे आए थे। उनका लड़का भी लड़ झगड़ कर घर से चला गया है।.... आप चिंता न करें। टक्करें मार और ठोकरें खा कर पांच सात दिन में खुद आ जाएगा।....कुछ पैसा तो ले ही गया होगा....!''

‘‘नहीं नहीं भैया, यही तो चिंता है। उसके पास मुश्किल से पन्द्रह बीस रूपये ही होंगें।''

‘‘अच्छा.....!'' वह चौंका, ‘‘ हां, मेहरा सा'ब का फोन आया था। यह वही तो नहीं एमबीए वाला..लिखाओ जनाब, लिखाओ।''

विवेक ने जेब से एक फोटो देते हुए भारी मन से लिखवाया :

‘‘कद छः फुट के लगभग। उम्र बाईस साल। छरहरा शरीर। रंग गोरा। लम्बूतरा चेहरा। घने घुंघराले बाल। माथे पर कट का निशान। शायद नीली जीन और लम्बा खद्‌दर का कुरता पहन कर घर से निकला है।..... कोई बैग साथ है या नहीं, यह पता नहीं।''

‘‘आप चिंता न करें'', उसने फिर कहा,‘‘ जो घर से जाता है, अपना इंतजाम कर ही लेता है। मां बाप तो दुखी होंगे ही। उसे आपकी ओर भी तो देखना चाहिए... यही तो आजकल के बच्चों में कमी है।..... हम ये हुलिया और फोटो सब थानों को भेज देंगे। कुछ पता चला तो आपको इतलाह करेंगे। मेहरा सा'ब ने कहा है तो कुछ न कुछ तो करेंगे ही।''

बहुत पहले रोज शाम को खबरों से पहले या शायद बाद में खोए हुओं के बारे में खबर दी जाती थी। खोजने वालों या पता देने वालों को ईनाम की घोषणा भी की जाती। टेलिवजन में डीडी वन पर भी गुमशुदा या लापता हुए लोगों के बारे में फोटो सहित बताया जाता था कि फलां आदमी फलां जगह से इतनी तारीख से लापता है। या सुबह ऑफिस गया तो शाम को घर नहीं लौटा। या शाम को घूमने निकला तो आज तक घर ही नहीं लौटा। अब अनेकों चैनल हैं, कोई खोए हुए लोगों के बारे में सूचना नहीं देता। क्या अब लोग लापता नहीं होते होंगे!

अखबारों में भी ‘‘गुमशुदा की तलाश‘‘ कॉलम में खबर दी जाती, जो अब आनी कम हो गई है। बहुत बार यह खबर विज्ञापन की तरह घर वाले ही देते हैं :

‘‘राहुल, उम्र पच्चीस साल। कद पांच फुट सात ईंच। रंग सांवला। बदन गठीला। काली पेंट और नीली कमीज पहने पन्द्रह दिसम्बर शाम सात बजे घर से निकला है। पता देने वाले को ईनाम भी दिया जाएगा। या ईनाम देने की जगह यह गुहार लगाई होती.....बेटा! राहुल! तुम्हारे माता पिता परेशान हैं। मां का रो रो कर बुरा हाल है। तुम जल्दी घर लौट आओ। तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा।''

ऐसी कई खबरें। बच्चे, जवान बूढ़ों के बारे में। कईयों को घर से गए एक दिन बीता, कईयों को एक महीना, कईयों को सालाेंसाल बीत गए।

क्या जाने वाले दोबारा लौटते होंगे......! यदि लौंटते होगे तो किस हाल में। कहते हैं साधु भी एक बार अपनी दहलीज पर भिक्षा मांगने जरूर लौटता है।

कहां चले जाते हैं ये जाने वाले! अपना भरा पूरा संसार छोड़ कर। अपने मां बाप, भाई बहन, यार दोस्त, रिश्ते नाते, घर बार, आंगन द्वार।

लोग घर आ कर अपने अपने अनुभव के अनुसार सलाह देते। फलां मंदिर में जाओ। प्रश्न डालो, पुच्छ लो। दरगाह में जाओ, इनके देवता बड़े प्रत्यक्ष हैं।

हर जगह जाने से एक नई उम्मीद बनती है। शायद वहां जा कर खोज का अंत हो। जब तक सब कुछ न देख लिया, उम्मीद तो बनी ही रहती है। तभी कहा है, उम्मीद पर ही दुनिया कायम है, जीवन टिका है। उम्मीद के खतम हो जाने पर एक गहरी निराशा छा जाती है, अवसाद घेर लेता है, जीवन नीरस बन जाता है। कोई अर्थ नहीं रह जाता।

कई कहते, ऐसे लोग बड़ा आदमी बन कर लौटते हैं। गांव से पुजारिन का लड़का घर से भाग कर मुम्बई जा पहुंचा और एक दिन फिल्म प्रोड्‌यूसर बन कर लौटा। कुछ ऐसे भी होते हैं जो घर से भाग कर होटलों में भांडे मांजते रहे और देखते देखते धन्ना सेठ हो कर लौटे। किस्मत का कोई पता थोड़े ही चलता है। दिन बदलते देर नहीं लगती।

इसके विपरीत कई नौजवान भिखारी सड़कों पर घूमते हैं, फुटपाथों पर पड़े रहते हैं, यह भी हकीकत है। इन बातों से प्रभावित बेटी को एक रात सपना आया कि एक भिखारी सड़क के किनारे पेड़ के नीचे अधनंगा लेटा है। दाढ़ी बढ़ी हुई, बाल लम्बे, कपड़े फटे पुराने.... कभी लगता वे भैया हैं, कभी नहीं।

एक बार सड़क में उसी जैसा लड़का जाता दिखा। उसकी पीठ हमारी ओर थी। पत्नी भागती हुई गई और उसे कालर से पकड़ लिया। वह हक्का बक्का रह गया :''माताजी! क्या हुआ!'' उसके मुंह से निकला। ‘‘माफ करना भैया! गलत पहचाना‘‘, विवेक को सफाई देनी पड़ी।

बहुत बार शाम को पत्नी विलाप सी करती बुदबुदाती..... कहां होगा इस वक्त। क्या खाया होगा, क्या पहना होगा, कहां सोया होगा... आजकल इतनी बारिशें हो रही हैं। ऐसे खराब मौसम में, जब जेब में एक पैसा न हो। कभी कहती, चलो मान लेंगे वह कभी था ही नहीं। मैंने उसे जन्म ही नहीं दिया, पाल पोस कर बड़ा भी नहीं किया। ऐसे में विवेक का मन करता अभी चीख मार कर कहीं दूर निकल जाए।

इतना विमुख भी हो जाता है आदमी। अरे! अभी तो पूरा जीवन पड़ा है जीने को। सब खतम तो नहीं हो जाता यकदम। जीवन है तो सब कुछ है। एमबीए न हुआ तो क्या दुनिया में लोग जीते ही नहीं।..... इतना निर्मोही भी हो सकता है कोई। विवेक को हैड इंजरी वाला वह मरीज बार बार दिखता जिसके लिए सारे रिश्ते नातों का कोई अर्थ नहीं रह गया था। मोह ममता छूट चुकी है। लोग तो उसे चाहेंगे। पिता चिंता करेंगे, मां दुलार करेगी, भाई बान्धव चंगा होने की प्रार्थना करेंगे। उसे कुछ फर्क नहीं। जब तक उसकी चेतना लौट कर नहीं आती, उसके लिए कुछ नहीं है।

‘‘यह कैसे हो सकता है डॉक्टर कि आदमी के दिमाग से सारी मोह ममता ही निकल जाए। वह एकदम किसी दूसरी पराई दुनिया में ही जीने लग पड़े। सारी संवेदनाएं शून्य हो जाए, उसे अपने पराए का भेद ही न रहे।'' एक डॉक्टर से पूछा था विवेक ने।

‘‘जब तक पूरी चेतना है, पूरी संवेदना है, मस्तिष्क चैतन्य है, तभी तक मोह माया है, ममता है। अन्यथा कुछ भी नहीं।'' डॉक्टर ने आध्यात्मिक वक्ता की तरह कहा था।

लोग पूछते ;क्या उम्र थी, क्या एक ही बेटा था....वह तल्खी से कहता,‘‘ था का क्या मतलब, बाईस साल का है।''

‘‘अरे! फिर काहे चिंता करते हैं। जवान है, पढ़ा लिखा है, कुछ न कुछ कर ही लेगा।''

‘‘ नहीं भाई! उम्र से बड़ा है, तन से बड़ा है, मन से नहीं। अब आपको क्या बताऊं!'' भावुक को जाता विवेक।

अक्षय का खाली कमरा जैसे भायं भायं करता। यहां सोता था, यहां इस कुर्सी पर बैठ कर पढ़ता था। ये रैक में उसकी नई किताबें। अलमारी में कपड़े। बाहर रैक में बूट, चप्पल; सब यही पड़े हैं.... पहन क्या रहा होगा... बूट तो सब यहीं हैं तो क्या चप्पल में या नंगे पैर ही.....। सीने में दर्द होने लगता विवेक को।.......कहते हैं मर्द नहीं रोता, उसकी छाती रोती है।

हो के मायूस तेरे दर से सवाली न गया

शहर के पास एक आश्रम था जहां शाम को भजन कीर्तन होता था। एक शाम वहां गया विवेक तो एक गायिका कोई भजन गा रही थी। भक्त उसे दोहरा रहे थे। भजन में ‘हे राम! हे राम!' बहुत कारूणिक था। महिला गाते गाते रोने लगी। देखते देखते सब की आंखों से आंसू बहने लगे। उसे वहां बैठने से ही उदासी आने लगी।

बचपन से ही जो शख्श कभी बहुत दबंग और एक हद तक नास्तिक रहा। लोग उसे कम्यूनिस्ट कहते। साधु महात्माओं का तो एकदम विरोधी। भाग्य और सितारों को न मानने वाला। मंदिर भी जाता तो मन से माथा नहीं नवाता। आज कहीं भी माथा नवाने को तैयार था।

कभी वह दरगाह में जा कर झाड़ू लगाता। चादर चढ़ा कर दरगाह के पास लम्बा हो जाता :

‘‘ऐ मेरे पीर पैगम्बर! ऐ मेरे मोला अली। ऐ खुदा!..... मेरे गुनाह मुआफ कर। बख्श दे अपने बंदे को बख्श दे। करम कर मेरे मोला करम कर। रहम कर......।''

सण्डे को कभी चर्च में जा खड़ा होता :‘‘हे मेरे ईश्वर! तू जो स्वर्ग में है, तेरा कहना जैसे स्वर्ग में माना जाता है, पृथ्वी पर भी माना जाए। तू अपने पुत्रों पर रहम कर। मुझे माफ कर। मैं अपने सारे गुनाह कन्फेस्स करता हूं। वह सब कुछ जो मैंने किया है। जो नहीं किया है, वह भी। मुझे माफ कर दे। आमिन्‌!''

पण्डितजी ने बेटे का नाम अक्षय रखा था। अक्षय यानि जिसका कभी क्षय न हो। जो मिटाया न जा सके। पण्डितजी ने ग्रह देख कर कहा :‘‘ ग्रह बहुत खराब चले हैं इसके। इसे राहु की दशा चली हुई है। अभी दो साल और है। आपको पता है राहु तो बिना सिर के होता है। महामृत्युंजय का पाठ करवाओ घर में और उसके लिए खुद भी मन्त्र जपते रहो।''

मंदिर साथ ही था। अगले ही दिन पाठ रखवा दिया। सुबह ही सब मंदिर में बैठ जाते। वह स्वयं भी हर वक्त जाप करने लगा :

‘‘ऊं त्र्‌यम्बकम्‌ यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्‌।

उर्वारूकमिव बन्धनात्‌ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्‌ ।।

एक प्रश्न लगाने वाले ने बताया, ‘‘वह दक्षिण दिशा में गया है। ज्यादा दूर नहीं हैं और अभी एक ही जगह रूका हुआ है। पन्द्रह दिन के अंदर अंदर लौट आएगा।'' दक्षिण दिशा तो कालका की ओर हुई। कहीं आगे न निकल जाए भीड़ भरे शहरों में।

एक बार एक व्यक्ति के घर गया जो गुमशुदा लोगों और चीजों के बारे में बताता था। उसने घर के एक स्टोरनुमा कोने में मंदिर बना रखा था। मंदिर के भीतर जाने से पहले ही उसने पूछताछ कर ली :‘‘क्या अड़ौस पड़ौस से कोई लड़की भी भागी है।‘‘

‘‘लड़की!.... नहीं तो। पर लड़की से उसका क्या सम्बन्ध।'' विवेक ने हैरानी से पूछा।

‘‘ज्यादातर लड़की के साथ भागने के केसिज आते हैं। जवान लड़कों में प्यार व्यार के मामले ज्यादा होते हैं।''

‘‘वह ऐसी स्थिति में नहीं है कि लड़की भगा कर ले जाए... और बिना जेब में पैसे के...।''

उस व्यक्ति ने अक्षय की कमीज, जो साथ ले गए थे, मंदिर के पास रख दी और भीतर बैठ कर अपने ईष्टदेव का ध्यान किया, कुछ मन्त्रों का जाप किया और बोलाः

‘‘वह दूर नहीं है। पन्द्रह दिनों के भीतर भीतर लौट आएगा, चिंता न करें।''

ऐसा ही एक औरत ने अपने बाल खोल सिर घुमाते हुए बताया था। उनकी इन बातों से तसल्ली भी होती कि जहां भी है, ठीक है। किसी ने उल्टा नहीं बताया।

एक तान्त्रिक ने बताया कि एक हफ्‌ते तक रोज तिल ले जा कर शमशान में तीन बार फैंको और नमस्कार कर बिना पीछे देखे उल्टे पांव लौट आओ। सात दिन बाद वह शर्तिया वापिस लौट आएगा। यहां से शहर का शमशान तो बहुत दूर था। सड़क के नीचे नाले में पेड़ों और झाड़ियों के बीच गांव वालों का शमशान था। गांव का शमशान शहर वाले तो अच्छा ही होगा। गांव वाले पुराने रीति रिवाजों से संस्कार तो करते होंगे। यहां मृत्यु के देवता, यदि कोई हैं, तो अवश्य आते होंगे। अतः रोज सुबह उठते ही वह लगभग दौड़ते हुए नीचे उतर जाता। सुबह सुबह वहां दूर दूर तक कोई होता भी नहीं था। नाले के दोनों ओर देवदार का घना जंगल था। इधर उधर देखते हुए तिल फैंकता और श्रद्धा से नमस्कार कर लौट आता। कभी अधजले लक्कड़ों के पास कपड़े की रंग बिरंगी कतरनें बिखरी होतीं तो कभी शाम की ताज़ा चिता सुबह तक धधक रही होती। आसपास सुर्ख़ लाल चमकीले कपड़े, धूप, मिट्‌टी की टूटी हण्डिया, खीलें बिखरे पड़े होते।

अकेले रास्ते में कई बार जोर जोर से रोते हुए पुकारता....अक्शू....अक्शू..... तुम कहां हो....कहां चले गए..... ऐसा क्या हो गया बच्चू!

वापसी की चढ़ाई उसका दम फूल जाता और सीने में दर्द उठता।

आजकल उसे लगता, कोई उठा उठा कर पटक रहा हे। एक बार उठाया, पटका। फिर उठाया और जोर से पटका, दीवार पर दे मारा। जैसे एक एक हड्‌डी चर्रमर्रा गई। या जैसे मार मार कर बान्ध कर दूर जंगल में फैंक दिया हो।

और मृगतृष्णा

बरसात बीती। सर्दियां उतरने लगीं। अन्धेरा जल्दी घिरने लगा।

एक शाम बेटी खेलते हुए दौड़ती हुई आई और चिल्ला कर कहा :

‘‘पापा! वह देखो, जैसे भैयाजी...।''

विवेक ने नीचे देखा ग्राउंड में कोई बैग उठाए चला आ रहा था। कद काठी वैसी ही। चाल ढाल भी वही।

बेटी ने मां को भीतर से बुला लिया :‘‘देखो तो सही.....।‘‘

‘‘कहां!....'' मां की आंखों में विस्मय मिश्रित खुशी टिमटिमायी।

‘‘वह जो है.....वही है। देखो, कितना गोल मटोल हो गया है। उछलता हुआ चल रहा है, जैसे बचपन में चलता था थप्‌ थप्‌ थप्‌।'' पिता ने कहा।

‘‘कहां.... मुझे तो कोई नहीं दिख रहा। झूठ तो नहीं बोल रहेे....।'' मां ने माथे पर हाथ रखे हदे निगाह तक देखने की कोशिश की।

‘‘अरे! ऐसा झूठ कोई क्योंकर बोलेगा... देखो, वही है........।'' गला रूंध गया विवेक का।

मां की आंखों के आगे जुगनू चमके फिर अन्धेरा सा छाने लगा। तीनों ग्राउंड की ओर देखते हुए खरगोश की तरह कान खड़े कर सीढ़ियों में आहट सुनने लगे। वह ग्राउंड पार कर सीढियां ही तो चढ़ेगा...थप्‌ थप्‌ थप्‌!

तभी मंदिर की घण्टियां बज उठीं। तीनों हाथ जोड़े खड़े रहे। उनके कानों में मंदिर की घण्टियों के साथ बजते ढोल की तरह मधुर ध्वनि आने लगी : थप्‌!थप्‌!थप्‌!

94180—85595 ‘‘अभिनंदन'' कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला—171009

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