मां और मोबाइल Sudarshan Vashishth द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मां और मोबाइल

मां और मोबाइल

कहानियां

सुदर्शन वशिष्ठ

कहानी बहुत ही टे्रडिशनल ढंग से शुरू हुई :

‘‘ आज विकल बहुत खुश था। चीड़ वन से धीमे धीमे हवा बह रही थी। चीड़ के पत्ते हौले हौले हिल रहे थे। हवा ठण्डी और ख़ुशनुमा थी। कहते हैं, चीड़ के पत्तों से छन कर आती हवा टीबी के मरीज़ों के लिए बहुत फायदेमंद होती है। पिता भी टीबी के पुराने और माने हुए मरीज़ रहे हैं। विकल ने एक नज़र पिता को देखा। उन का माथा काला पड़ चुका था। हाथों की नसें पुराने पड़े रबड़ पाईप की तरह लटकी हुईं थीं। शरीर छुहारे सा सूखने लगा था। उसके पुराने नाईट सूट में वे और भी दुबले लग रहे थे। लिफाफा से कपड़ों में वे ऐसे लग रहे थे जैसे खेत में बजूका। वे एकदम झण्डे से लहराए और गिरते गिरते बैठ गए। पल भर को लगा, आंगन के कोने में पड़े ऊंचे पत्थर पर वह खुद टांगों में सिर दिए पंजों के बल धूप के इंतजार में उकड़ूं बैठा है। काम निपटा मां भी ऐसे ही धूप में पुरानी गूदड़ी सी बन पड़ जाती थी। पिता ने कमजोर मुर्गे की तरह गर्दन उठा धीमी आवाज निकालते हुए जमुहाई ली..... आं........विकल का भी एकाएक मुंह खुल गया...... एकदम सजग हो गया विकल। पिता ने जमुहाई ली है,उसे नहीं लेनी चाहिए........।‘‘

कोई भी संपादक ऐसा घिसापिटा स्टार्ट देख बिना आगे पढ़े कहानी कूड़ेदान में फैंक देगा। बल्कि संपादक तक तो पहुंच ही नहीं पाएगी। नीचे कई उप,संयुक्त,कार्यकारी संपादक होते हैं जैसे सरकार में सचिव के नीचे अवर,उप,संयुक्त,विशेष सचिव रहते हैं। उसके कथानायक के पास न लैण्ड लाईन है, न मोबाइल, न ईमेल, न कम्प्यूटर, न टीवी। हां, टीबी का मरीज़ जरूर है। आज भी खबरें उस तक अफवाहों की तरह पहुंचती हैं। फोन करने और चिट्‌ठी डालने उसे पांच किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है और उधर भारत ने पहला चन्द्रयान भेज दिया है। चलो, एक पिछड़ी हुई कहानी ही सही, प्रेमचंदयुगीन यथार्थ ही सही, लिखनी तो जरूर है, उसने निश्चय किया। छप भी गई तो कौन सा धमाका होगा। एकदम आई गई हो जाएगी। कोई याद नहीं रखेगा कि ‘विकल‘ नाम से भी कोई कहानी लिखता रहा है। साथी भी हंसते थे, इस जमाने में कोई कथा कहानी पूछता सुनता है क्या! इस सारी उहापोह के बीच उसने लिखना शुरू किया :

पिता वैसे बेऐब थे। तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट न पीते हुए भी उन्हें टीबी हो गया। कोई कहते, मां से लगा। मां के खानदान में यह बीमारी थी। मां को उन्होंने अंत तक अपने से दूर नहीं किया। पिता में कुछ आदतें थीं जिन्हें बुरी कहा जा सकता है। मसलन वे दिन में भी सोए रहते। बहुत सुस्त और धीमी चाल से चलते। हौले हौले बोलते जिससे दूसरा सुन नहीं सकता। या सुन कर भी अनसुना करता। दुकान से सीधे घर और घर से सीधे दुकान। किसी बात पर किसी को कुछ नहीं कहते। बहुत सी बातें, बहुत से काम वे टालते चले जाते। बहुत बार कबूतर की तरह आंखें बंद कर लेते आदि आदि।

वह बिल्कुल अलग बनना चाहता था। तड़के उठ जाता। रोज़ कसरत करता। कभी कभी दो बार भी नहाता। दिन में कभी नहीं सोता। सदा साफ सुथरे और प्रैस किए कपड़े पहनता। जूते चमकाने के लिए जेब में रूमाल से अलग एक कपड़ा रखता। जरूरत न होने पर भी तेज चाल चलता जैसे नेता लोग टीवी में चलते हैं। जोर जोर से बोलता चाहे बोलना जरूरी न हो। पिता की आदतें उसने चुनौती की तरह लीं। सब से बड़ी चुनौती थी चुस्त,दरूस्त,तंदरूस्त रहे।

भाग दौड़ से एक रात का समय निकाल एकदम घर गया तो पिता सामान्य लगे। बुखार नहीं था,खांसी भी कम थी। कमजोर तो पहले से ही थे। चाची कभी कभी उन की थाली में खाना डाल पकड़ा देती। चाचा का भरा पूरा परिवार था, बेटा बहू, पोते पोतियां। घर में बच्चों की किलकारियां गूंजतीं हालांकि पीछे कोई नहीं आता। पिता का कमरा पिछ़वाड़े की ओर घर से जुड़ा हुआ होते हुए भी बिल्कुल अलग था। पिता ने यही कमरा लिया जिसमें वे पहले से रहा करते थे। मुख्य घर का आंगन आगे की ओर था जहां सूरज उगता था। पीछे की ओर नाला था और पार चीड़ वन। कमरा अलग होते हुए भी घर में बोलने,बच्चों के हंसने रोने की आवाजें सुनाई पड़तीं जिससे लगता पूरे परिवार के बीच रह रहे हैं।

कम्पनी वाले एक पल भी टिकने नहीं देते थेे। सरकारी दफतरों की तरह सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तके की ड्‌यूटी नहीं थी। वहां तो सुबह हाजरी लगाना जरूरी होता है बस, दिन भर इधर उधर घूमते रहो। यहां न हाजरी लगाने का नियम था, न छुट्‌टी का। बाबजूद इसके ऐसा अदृश्य शिकंजा था कि वह किसी भी समय अपने को ड्‌यूटी से अलग नहीं कर सकता था। कम्पनी, मोबाइल का एक हजार रूपया महीना देती थी जिसके एवज़ में सुबह छः बजे से रात ग्यारह बजे तक मोबाइल से हाजरी लगती। एकदम फोन आताः‘‘कहां हो इस समय....‘‘,‘‘.... कितने ऑर्डर मिले‘‘,‘‘.....तुरंत सेक्टर सेंतालीस पहुंच शो रूम में बात करो‘‘ आदि आदि। यदि मिस कॉल आने पर फोन नहीं किया तो तुरंत एक्सप्लेनेशन... कॉल बैक क्यों नहीं किया। जैसे मोबाइल नहीं, ‘पेस मेकर‘ लगा दिया हो।

मोबाइल उसे मां जैसा लगता। एकदम अपना और करीब, जिसके सिरहाने सिर रख कर सोया जाता, जिसे हर पल अपने दिल के करीब रखा जाता। जिसकी हर बात सुनी और मानी जाती। मां के समय मोबाइल नहीं थे।

मोबाइल की अपनी अलग भाषा है। टे्रनिंग में मोबाइल भाषा सिखाई गई थी। बिल्कुल शॉर्ट में लिखो। ‘‘सीयू‘‘ को एबीसी वाला ‘सी‘ और वाएओयू की जगह केवल‘यू‘ लगाओ। तुरंत मैसेज करो। तुरंत फोन उठाओ। मिस कॉल का अर्थ समझो। वह खुद भी मोबाइल हो गया था। यहां अब हर कोई मोबाइल था। आज बच्चे से बूढ़े तक, आतंकवाद से बिजनेस तक मोबाइल जरूरी है। उसे स्कूटर चलाना नहीं आता था। कोई भी वाहन चलाना यहां पहली शर्त थी। कन्वेएंस के बिना गुजारा नहीं,जल्दी सीखो। उसे लोकल से आने जाने में बड़ा समय लग जाता। एक साथी ने यहीं स्कूटर सीखा। एक बार वह भीड़ में बस के पिछले भाग से टकरा गया और छः हफ्‌ते अस्पताल प्लास्टर लगा पड़ा रहा।

टीवी कम्प्यूटर से ले कर वाशिंग मशीन, एक्वा गार्ड, वैक्यूम क्लीनर तक का सामान था इस कम्पनी के पास। वैसे था कुछ भी नहीं,ऑर्डर मिलने पर अरेंज कर दिया जाता। वह तीन साल से मैनेजर बनने का सपना संजोए लगातार भाग रहा था। पैदल चलने का अभ्यास था। अभी पकर्‌स के नाम पर लगभग छः हजार महीना और कहने को एक लाख का पैकेज।

बड़ी ज़द्‌दोज़हद के बाद तीन लड़कों ने शहर के अंतिम छोर पर एक बरसाती ली। इस शहर में बेचुलर को कमरा मिलना बहुत कठिन था। मिल भी जाए तो इतना किराया कौन निकाले। मुख्य सेक्टरों से दूर पचासवें सेक्टर में किराए कम थे। कम यानि पांच हजार में एक बरसाती,बिजली पानी अलग। तीसरी मंजिल में छत पर एक कमरा और दूसरी ओर बाथ रूम। पानी कभी चढ़ता, कभी ग्राउंड फ्‌लोर से मकान मालिक से बरामदे में लगे नल से ढोना पड़ता। बरसाती गर्मियों में भट्‌ठी की तरह तप जाती। पंखा, जैसे गर्म हवा छोड़ने के लिए लटका था। बरसात में बड़े बड़े मच्छर धावा बोलते। जरा सी सिर दर्द बुखार हो जाए तो डर लग जाता, कहीं डेंगू तो नहीं।

एक रूम मेट कॉल सेंटर में था, जो रात साढ़े दस बजे जाता और सुबह छः बजे लौटता, जब वे उठ रहे होते। जब यहां रात होती है तो विदेशों में दिन होता है, इसलिए कारोबार करने यहां भी दिन करना पड़ता है। सारी डील्‌ज रात को होती हैं। वह आते ही कान में रूई की बड्‌ज घुसा फर्श पर दरी बिछा निढाल पड़ जाता और ऐसे खुर्राटें मारता कि बेहोश पड़ा हो। ग्यारह बजे तक वह बेसुध पड़ा रहता। वे दरवाजा बंद कर दो बाल्टी पानी और नाश्ता रख जाते। उस का जीवन उल्टा घूम रहा था। दूसरा लड़का शॉपिंग माल में था। उसे आठ बजे निकलना होता था। यह एक बहुत बड़ा शॉपिंग माल था जिसमें रेडीमेड,शूज,राशन, फल सब्जियां सब कुछ एक साथ उपलब्घ था। लोग बड़े चाव से ट्‌्राली उठाते और मनपंसद चीजें डालते जाते। बहुत साफ सुथरा, ट्रांस्पेरेंट पैकेटों में रंगीन सामान। चिड़िया का दूध भी वहां तुम पैकेट में ले सकते हो, वह हंसता। विकल कभी उसके साथ, कभी छः बजे ही निकल जाता।

विकल ने जब तक गांव के पास के स्कूल से प्लस टू पास किया, सरकारी नौकरियां बंद हो चुकी थीं। प्लस टू वैसे भी अब कोई क्वालिफिकेशन नहीं रही थी,अतः बेकार रहने की जगह बी.ए. करने तक तो सरकार के द्वार बिल्कुल बंद हो गए। अव्वल तो कोई नौकरी निकलती ही नहीं,यदि निकले भी तो एक पोस्ट के लिए हजारों केंडीडेट। अपने लोगों को रखने के लिए रिटन टेस्ट और फिर इंटरव्यू जैसे साधन निकाले गए थे जिनमें फालतू के लोग कभी पास ही नहीं होते। जो रिटायर हो रहे थे, सरकार उन पोस्टों को खतम कर रही थी। यह तो शुक्र हुआ कुछ कम्पनियों ने देश के कोने कोने में डेरे डाल लिए। काम तो दिन रात लेते हैं, कम से कम जॉब तो है। हां, नौकरी को अब जॉब कहते हैं। लोगोें को बताने के लिए अच्छा है... एक रेप्यूटड कम्पनी में जॉब करता है। दो लाख रूपये का पैकेज है। पहले बैंगलोर में था, अब गुड़गांव में है या अब नोएडा में है। हालांकि इस जॉब की कोई गारंटी नहीं है। जब मर्जी आई रात को ही फोन कर दिया जाता है,सुबह आ कर अपनी पे ले जाओ। कोई शिकायत नहीं, शिकवा नहीं, फरियाद नहीं। कम्पनी के छोटे से छोटे बॉस से भीे आपको बाहर बैठे गार्ड मिलने नहीं देंगे। आप की पहुंच बस अगले सीनियर से होती है, जो आप की तरह जॉब पर है।

दादा छोटे कद के थे। घर में छोटी सी चारपाई पर आराम से जिंदगी गुजारी। जमीन से दाने आ जाते थे। पिता थोड़े लम्बे हुए। जमीनें मुजारों को चली गईं। पास के बाजार में मुनीमी की और धीरे धीरे बाजार आते जाते जिंदगी बसर की। वह और भी लम्बा हुआ। कम्पनी का बैग उठाए चलता तो लगता खम्बे पर चमगादड़ लटका रखा है।

कभी कोई ग्राहक आराम से बात कर ले तो उससे बार बार फोन पर बात की जाती है। कई तो फोन उठाते ही नहीं। कुछ उठाते तो पहले बड़ी नर्मी से हैलो करते। जब पता चलता, यह प्रोडक्ट बेचने के लिए कॉल कर रहा है तो हर कुछ बोलते हुए तुरंत काट देते। आजकल इतनी कम्पनियां है, इतने प्रोडक्ट हैं। अच्छा होने पर भी अपना प्रोडक्ट बेचना आसान नहीं रहा।

पहले उसे फोन पर बात करने की ट्रेनिंग दी गई थी। बस फोन मिलाओ और हैलो,गुड मॉनिंग के बाद शुरू हो जाओ। जितनी जल्दी हो सके अपनी बात पूरी करो। जैसे टीवी में रिपोर्टर तेजी से बोलते हैं या ऐसे लगना चाहिए कि कम्प्यूटर में भरी आवाज बोल रही है या जैसे मोबाइल कम्पनियां,लोन देने वाली कम्पनियां एक रिकॉर्डिड आवाज रिंग टोन के बाद सुना डालती हैं। आप हैरान परेशान रह जाते हैं। आप को अकसर लाखों लोगों में लोन देने के लिए चुन लिया जाता है। आप को लाखों रीडरों में ईनाम के लिए चुन लिया जाता है। आप को लाखोंलाख में पुरस्कार के लिए चुन लिया जाता है। उसने भी ऐसी टे्‌्रनिंग ली थी शहर में। तीन महीने के तीस हजार लिए थे और वादा था कि जॉब पक्की। गांव से तीस किलोमीटर रोज आया जाया करता था। ट्रेनिंग कॉल सेंटर की थी। अंग्रेजी अच्छी नहीं थी अतः कॉल सेंटर में तो नहीं लगा, इस कम्पनी में फंस गया। उसे कम्पनी में ‘एग्जीक्यूटिव‘ कहते हैं। बहुत ही सुंदर सा कार्ड छपवा कर दिया है कम्पनी ने। कपड़े तो जैसे तैसे थे ही, दो टाईयां फुटपाथ से बीस बीस रूपये में खरीद लीं।

वे तीनों हर समय हड़बड़ी की हालत में लगभग दौड़ते हुए जाते और दौड़ते हुए ही वापिस आते। उन की आंखें लाल रहतीं। बाल अस्त व्यस्त। कपड़े भी सलीके के नहीं। हां, उन्हें टाई जरूर पहननी पड़ती जिसे किसी तरह फंदे की तरह गले में फंसा लेते जो वापसी पर ढीली हो नीचे लटक जाती।

उन के पास किसी सुन्दर लड़की की ओर देखने का वक्त नहीं था। उन्हें किसी के सपने नहीं आते। आसपास के लोग, बिल्डिंग वाले सभ्य परिवार उन्हें शक की निगाह से देखतेे..... ये छोकरे क्या करते हैं। कहां जाते हैैं। दिन भर कहां रहते हैं, रातों का क्यों लेट आते हैं या कभी आते ही नहीं। कहीं ड्रग्ज तो नहीं लेते या कोई ऐसा वैसा काम तो नहीं करते। या कॉल बॉय तो नहीं। कोई उनसे बात नहीं करता हालांकि वे, जो भी सीढ़ियों में मिले, उसे चलते चलते विश करते हैं। बरसाती गर्मियों में अत्यधिक गर्म और सर्दियों में बेहद ठण्डी रहती, उनके शरीर का तापमान हमेशा एक सा रहता।

शुरू में उसे फोन पर ग्राहक पटाने का काम दिया गया। वह दिन भर बैठा हुआ डायरेक्टरी ले कर फोन घुमाता रहता। लोग उससे अजीब अजीब बातें करते। कभी गलती से वही नम्बर दोबारा लग जाए तो वह खाने को पड़ जाता। कानों से बुरा सुनने पर भी हंसते रहने का अभ्यास था सब को। एसी में बैठे फोन घुमाते रहो, पॉजिटिव जबाब आने पर नोट करो जहां फील्ड के लोग फट पहुंच जाते। महीने बाद उसे फील्ड में भेज दिया गया।

बड़े बड़े सेक्टरों में कोठियों के द्वार कोई नहीं खोलता। ज्यादातर में गेट की पट्‌टी पर ‘कुत्तों से सावधान‘ लिखा रहता। कई शौकीनों ने इतनी गर्मी में भी बाहर चीड़ के बौने पेड़ उगा रखे थे। उन जैेसे लोगों को चोर,बदमाश या आतंकवादी भी समझा जाता। गेट के अंदर से बात करने के बाद झाड़ और डांट फटकार के बाद उन्हें वापिस कर दिया जाता। हां, लो इनकम के तिमंजिले फ्‌लेटों में जाने पर कोई न कोई द्वार खोल देता। खासकर जब मर्द दिन में घर से बाहर होते, कोई मेहरबान महिला बात सुनती, सामान देखती और ठण्डा पानी पिलाती। या कोई पति से चोरी से कुछ ले भी लेती। हमेशा लगातार बोलते हुए अंत में डिस्काउंट पर बात खतम होती...... बस इस महीने के अंत तक है डिकाउंट, तीन साल की वारंटी, जब मर्जी फोन से बुला लो,हमारी कम्पनी जैसी सर्विस किसी और के पास नहीं।

पिछले दिन वह अपने एक जूनियर को साथ ले एक फ्‌लेट में गया था। जूनियर को साथ ले उसे डीलिंग का तरीका सिखाया जाता है। जूनियर से ज्यादा बोलना और दूसरे को इम्प्रेस करना जरूरी है।

सुगन्धा अपार्टमेंट्‌स में तीसरी मंजिल में पार्टी थी। नये नये अपर्टमेंट्‌स बने थे,इसलिए नया सामान तो चाहिए ही होता है। पिछले दिन वह यहां आया था। सीढ़ियां चढ़ कर सांस सयंत करते हुए उसने बड़े आत्मविश्वास से बैेल बजाई। कोई नहीं आया। अब कुछ डरते हुए दूसरी बार बेैल बजाई। जब कोई नहींं अया तो तीसरी बार बैेल पर उंगली रखी जैसे करंट लग जाएगा। तीसरी बार बैेल बजने पर कुछ आहट हुई और एक सज्जन दरवाजे से झांके।.... आज तो साहब घर पर ही हैं... वह एकाएक झिझक गया। दरवाजे से झांकते के चेहरे पर उत्साह और उत्सुकता थी। जैसे ही उसने परिचय दिया उनके माथे की त्यौरियां चढ़ गईं। लगा, यदि पास में पत्थर होता तो उस पर दे मारते : ‘‘ नहीं लेना है भई।‘‘ उन्होंने सिर झटका। ‘‘ सर आजकल स्पेशियल ऑफर है। डिस्काउंट इसी महीने है। वारंटी भी है। आजकल यही एक्वा गार्ड बिक रहे हैं। मैडम को भी दिखाया है।‘‘ ‘‘ नहीं भई नहीं,आज नहीं।‘‘ उन्होंने धड़ाम्‌ से दरवाजा बंद दिया। यदि वह जल्दी से हाथ न हटाता तो दरवाजे में उंगली आ जाती।

वह रोने को हो आया। अपने जूनियर को इम्प्रेस करना चाहता था, यह तो उलटा हो गया...... बहुत बद्‌दिमाग आदमी होते हैं ये साले.... मन भर की गाली देने को हुआ विकल। फिर एकाएक सयंत हो कर बोलाः‘‘ देखो, कह रहे हैं न आज नहीं... शायद बिजी होंगे। कल फिर आना चाहिए।‘‘

वे नीचे उतर आए। सड़क में रेहड़ी वाला मौस्समी का जूस बेच रहा था। उसने बीस के दो गिलास बनाने को कहा।...... इससे तो रेहड़ी में जूस, फल या सब्जियां बेचना ही अच्छा है... उसने मन नही मन सोचा और टाई की गांठ गले में जोर से कसी।.... मैं भी तो रेहड़ी वाला ही हूं ,बस एक टाई लगा रखी है बीस रूपये की। जूस पी कर वह एकदम हल्का हो गया।

तीन साल में ही वह शहर के लम्बे चौड़े भूगोल से, अधिकांश अपार्टमेंट्‌स से वाकिफ हो गया था। बहुत सी कोठियों, फ्‌लेटों के साहब, मेम साहब को वह पहचानता था। बहुत से ऑर्डर देने वालों को जानता था। सैंकड़ों फोन नंबर उसके मोबाइल और डायरी में थे। उसे कोई नहीं जानता।

कई बार हैरानी होती विकल को। कितने ही जरूरतमंद शो रूमों में आने पर लाखों का सामान ले जाते। दुकान दर दुकान घूमते। कई फोन से ही ऑर्डर दे डालते। कई बार लाख टक्करें मारने पर भी एक खरीददार नहीं मिलता।

पहले दुकानदार ग्राहक को आवाज लगा कर बुलाते थे। पुराने बाजारों में से गुजरने पर दुकानदार आवाजें लगाते। दुकानों में चूहे इधर उधर उछलते रहते। चूहों के पेशाब से धुली,मींगणों भरी दालें मिलतीं जिन्हें छांट छांट कर आंखें दुखने लगतीं। पिता बाजार से चुपचाप बिना कुछ लिए खाली हाथ लटकाए आ जाते। मां के नाराज होने पर वे सहगल की गाई ग़ज़ल की दो पंक्तियां गुनगुना देते :

‘‘ दुनिया में हूं दुनिया का तलबग़ार नहीं हूं।

बाज़ार से गुजरा हूं खरीददार नहीं हूं।‘‘

पिता आंगन से उठे तो पाजामे में लिफाफे सी हवा भर गई। वे एकाएक डोले जैसे चक्कर आ गया हो। फिर सम्भल कर पीछे मुड़े और उसे अपलक देखने लगे। वह सहम सा गया। इधर उधर नज़रें टालता हुआ खंखार कर बोला : ‘‘ मुझे जाना होगा.....।‘‘

पिता ने न हां की, न न की। न ही कोई प्रतिक्रिया की। पुनः वहीं बैठ गए : ‘‘ चाय पी कर जाओ‘‘,उन्होंने परे देखते हुए ही कहा। वह समझ गया कि वे खुद चाय पीना चाहते हैं।

भीतर जा कर चाय का हैंडल वाला बरतन उठाया जिस का हैंडल बुरी तरह हिल गया था और जैसे अलग होने को था। बरतन में चाय के अर्क की परतें जमी हुईं थीं। रसोई में सभी बरतन पीले पड़ चुके थे। मरद कितनी सफाई रख सकता है, पिता कहते। मां के समय बरतन चमचम करते। मां राख से मांज मांज कर सफाई करती थी। बीमार रहने पर भी अंत तक रसोई में सफाई रखी। बिस्तर पकड़ने पर बैठे बैठे बरतन मांजती,खाना पकाती। पिता बाजार में मुनीमगिरी करते और देर से घर लौटते। मां से बात करने वाला कोई नहीं होता। आसपास के लोगों,सगे सम्बन्धियों ने आना कम कर दिया था।

यह वही कमरा है जहां मां रहती थी। अभी तक ताक में मां के देवताओं के फोटो रखे हैं। उन पर धूल जम गई है। एक छोटी गुटका रामायण में रंगीन चित्र थे जिसे वह साथियों को बताया करता। तब सारा घर अपना था। सूरज भी उगते ही घर में झांकता। जब वह दस बारह बरस का रहा होगा, मां को एक बहुत ही सुंदर गोल मटोल बच्चा हुआ था, जो कुछ ही महीनों के बाद गुजर गया। प्रसव के बाद मां को ताप टिक गया जो अंत तक नहीं गया।

मां ने ताप धूप की तरह सेंका। घर में ताप अदृश्य भूत की तरह घुसा जिससे मां धुआं धुआं हो गई।

यह वही कमरा है जहां मां का दर्द परिंदे सुनते थे। मां खांसी रोक कराहती हुई चिड़िया,कौओं से बात करती। गांव के लोग भीतर नहीं आते। बाहर बरामदे में बैठ कर या खड़े हो कर बात करते। कुछ तो मां के हाथ का हुक्का,पानी तक नहीं पीते। पहले वह भेड़ों,गायों से बात करती थी। जब कमजोर पड़ी तो ढोर डंगर बिक गए। तब से छत के टूटे सलेटों पर,आम अमरूद पर,पास के बांस के झुरमुट पर बैठे परिंदे उससे बात करते।

सच, मां काग भाषा जानती थी। जब गोल मटोल बच्चा बीमार हुआ तो मां को कौए ने बता दिया था कि वह बचेगा नहीं। कौआ बुरा बोल बोल रहा था। मां बार बार उड़ाती, वह फिर छत पर बैठ गले के बहुत भीतर से जैेसे बहुत जोर लगा कर आवाजें निकालता। इन आवाजों को सुन कर एक हफ्‌ता पहले ही मां ने कहना शुरू कर दिया था। ठीक सात दिन बाद बच्चा चल बसा।

मां के मरने से पहले कोई काग भाषा नहीं समझ पाया। कौआ तब भी गले के भीतर से आवाज निकाल बुरा बोलता रहा। तब उसे उड़ाने वाला कोई न था। मां के मरने पर गांव वाले आंगन में दूर दूर काले पट्‌टू ओढ़े पंजों के बल बैठ गए थे। किसी ने आंगन के बीचोंबीच तुलसी के साथ आग जला दी जहां मां रोज रात दीपक जलाया करती थी। जिसकी लौ उसे बरसात के बाद की अंधेरी रातों में बाहर निकलने पर सहारा देती और वह निडर हो पिछवाड़े तक चला जाता। मां का बिस्तर उसके साथ ही जला दिया गया। जिस तसले में मां राख डाल थूकती थी, वह दूर जंगल में फैंका गया। भीतर आने से औरतें कतरा रहीं थीं। एक बुढ़िया ने मां को जैसे तैसे ढका लपेटा और विदा किया। गांव वाले आग दिखा तुरंत ही लौट आए। ऐसे मरीजों का धुआं नहीं लिया जाता। बाद में घर की दीवारों पर कभी मां के हाथों पोती मिट्‌टी उखाड़ दी गई। पूरे घर में गूंतर,गंगाजल छिड़क नई मिट्‌टी पुतवाई गई। मां के कपड़े भी कहीं दूर फिंकवा दिए। पुराने ट्रंक, बक्से धो डाले। जैसे मां की हर याद मिटा देने की कोशिश की गई फिर भी मां घर में कई दिन तक कराहती रही। वह रात रात को जाग कर सुनता, मां खांस रही है... रसोई में बरतन इधर उधर रख रही है...पिता को चाय दे रही है... बच्चे को लोरी सुना सुला रही है...फिर खांस रही है....।

उसे सलाह दी गई कि घर छोड़ कर कहीं दूर निकल जाए। ऐसे रोग ढूंढ ढूंढ कर पकड़ते हैं।

धीरे धीरे सब सामान्य होता गया। अब तक अंग्रेजी दवाईयां भी आ गईं थीं। पिता कुछ महीने सेनोटोरियम में रहे। सेनोटोरियम में सेवा और उपचार से वे बच गये।

विकल ने पिता को चाय पकड़ाई तो कौआ छत पर बैठ उसी तरह गले के गहरे के आवाजें निकालने लगा। उसने पत्थर उठा कर छत पर दे मारा जो आवाज करता हुआ दूसरी ओर आंगन में जा गिरा।

पिता से कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं हुई उसे। सब ठीक ठाक है.... मानता और सोचता वापिस आ गया विकल। आज उसमें सुगन्धा अपार्टमेट जाने की हिम्मत नहीं थी। जूनियर को फोन कर दिया कि एक बार ट्राई कर ले।

शाम को वह रूम मेट से कुछ नहीं बोला। उसने पूछा भी :‘‘क्या पैकेट मिला!‘‘ ‘‘पता नहीं,पूछा नहींं‘‘ उसने टाल दिया।

दरअसल पिता की चिट्‌ठी आई थी। पिता ने डाक विभाग का पुराना रजिस्टर्ड पत्र भेजा था जिसमें केवल एक ही कागज था। रजिस्टर्ड पत्र में पता किसी और के हाथ का लिखा हुआ था। भीतर के कागज में पिता की लिखावट थी। लिखा था :

प्रिय विकल,

तुम्हारा पत्र मिला।

यथापूर्व मैं जब सारा कार्य समाप्त करके जा रहा था तो वनखण्डी पहुंचने पर उस जंगल में जा रहा था तो पीछे से एक बस आ रही थी। उसी क्षण अचानक आंधी और ओलों के कारण भयंकर तूफान आ गया। मैं बस में नहीं चढ़ पाया।

दूसरे दिन मैं बड़े सवेरे बिस्तर से उठ कर जंगल में गया और उस स्थान पर पहुंचा तो वहां कुछ न मिला।

तीसरे दिन फिर उसी स्थान पर देखने गया तो वहां कुछ न मिला। अब मैं थके हुए सिपाही की तरह बैठा हूं और तुम्हें सूचित कर रहा हूं।

तुम्हारा शुभचिंतक,

बद्रीप्रसाद

अब पत्र कौन लिखता है! वह भी रजिस्टर्ड। पिता को मोबाइल नम्बर भी लिखवाया था। एक दो बार उन्होंने फोन किया भी। एक बार तो किसी और ने फोन मिलाया : ‘‘विकल बोल रहे हो... लो अपने पिता से बात करो। इन्हें अकेले कहां भेज देते हो इन से तो चला भी नहीं जा रहा..।‘‘ जब उसने बात की तो जैसे पिता को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। वह जोर जोर से पूछ रहा था क्या पैसे मिल गए हैं तो पिता कुछ और ही जबाब दे रहे थे। आखिर उसने फोन करने वाले को कहा था कि वह पूछ क्या पैसे मिल गए हैं... उसने कुछ बात की और पुनः झला कर उसे डांट दिया : ऐसे बुजुर्गों को कहां भेज देते हो भाई, ख्याल रखो।

एक पत्र पहले आया था। वह भी रजिस्टर्ड था। लिखा था :

‘‘ कौआ रोज बोल रहा था, तुम आ रहे हो। तीन दिन लगातार बोलता रहा। तुम नहीं आए तो मैं तुम्हें मिलने गया। तुम्हें बहुत ढूंढा, तुम नहीं मिले। एक रात बस स्टैण्ड पर ही काटी। रिक्शे वाला न जाने मुझे कहां कहां घुमाता रहा। कई कम्पनियों के बोर्ड देखे ——रिलायंस, टाटा, बजाज, एयरटेल, बोडाफोन, स्पाइस, एल.जी.। तुम कहीं भी अंदर जाते या बाहर निकलते नहीं दिखे। तुम्हारा पता मुझसे कहीं खो गया था....पैसे ख़तम हो रहे थे, हार कर मैं रात की बस से वापिस आ गया।‘‘

.........पिता आए होंगे, वह सोचता रहा। दूसरे पत्र ने तो उसे विचलित कर दिया। पिता यह क्या लिख रहे हैं। वह घबरा गया। एकाध कस्टम निपटा, अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर घर की बस पकड़ ली।

पिता जंगल में क्या ढूंढने गए होंगे, वह सोचता रहा। रात ठीक से नींद नहीं आई। पैकेट तो उसने कोई नहीं भेजा। और यदि भेजा भी होता तो डाक से भेजता,किसी के हाथ भेजता। उसे जंगल में ढूंढने की क्या जरूरत.... रात पिता उसे सपने में दिखे। जैसे वह एक मित्र के घर के बाहर खड़ा उससे बात कर रहा था, पिता उसके घर से बाहर निकले। कमजोर, मगर तेजस्वी दिख रहे थे। उन्होंने भगवां वस्त्र पहन रखे थे, माथे पर तिलक। हंसते हुए पिता ने कुछ बातें कीं जो याद नहीं रहीं.... शायद कहा, यह मेरा बेटा है, नहीं जानते! अंत में कहा, मैं तुम्हारे पैर छूना चाहता हूं..... पिता भी कभी पुत्र के पैर छूते हैं...यह क्या कह रहें हैं आप.......। चलने पर लगा, पिता उसके पैर छू रहे हैं।.... जब जागा तो पसीने से लतपथ था। किसी को सपने में हंसते हुए देखना बुरा होता है, मां कहती थी।

आधा जागता, आधा नींद में वह सोचता रहा। कभी लगता कॉल सेंटर वाला लड़का दरवाजा खटखटा रहा है। वह लौट आया है। उसे कम्पनी ने निकाल दिया है। कभी लगता, जंगल में घूम रहा है। चीड़ के पत्ते गर्मियों में नीचे गिर जाते हैं तो एक चादर सी बिछ जाती है जिस पर चल नहीं सकते। एकदम पांव फिसलते हैं। ऐसे में जब बारिश हो तो एक खुश्बू उड़ती है जो पूरे जंगल में फैल कर घर तक पहुंचती है। परीक्षा के दिनों वह किताब ले जंगल में पढ़ने जाया करता था और चीड़ के टेढ़े पेड़ पर बैठ घण्टों पढ़ता रहता। रात को जब चांदनी हो, जंगल में साफ साफ दिखलाई पड़ता। कई बार दिखता, कई बार नहीं दिखता।

सुबह ब्रेड बटर खाते हुए रूममेट ने फिर पूछा :‘‘ वह पैकेट मिल गया!‘‘

‘‘ नहीं यार । मैं भूल गया....अब क्या पूछना‘‘ उसने टालते हुए कहा।

‘‘ तुम ने ही मुझे बताया था कि तुम पुराने जूते, पुराने पेंट कमीज, चांदनी चौक से खरीदे रैग्ज़ और बहुत सारा सामान पिता को घर में न दे कर जंगल में बड़े पत्थर के नीचे छोड़ आए हो।‘‘

‘‘ मैंने कहा था......!‘‘

‘‘ हां, हां। वही बड़ा पत्थर जिसके नीचे सर्दियों में गद्‌दी लोग अपनी भेड़ बकरियों के साथ पनाह लेते। जिस की गुफा की छत में अभी भी धूएं के काले निशान हैं। नीचे चूल्हे के तीन पत्थर काले हुए पड़े हैैं। और जिसके के ऊपर बैठ पिता तुम्हें मेले में ले जाते हुए सुस्ताते थे....।''

‘‘ यह सब तुम्हें कैसे पता....।‘‘

‘‘ तुम्हीं ने बताया था यह सब... तुम्हें कथा और किस्से सुनाने की आदत है।‘‘

‘‘ मैंने सुनाया था.... किस्सा तो सही है.... मैंने कब सुनाया!‘‘

एकदम घबरा सा गया विकल....क्या मैंने सुनाया होगा...दिमाग पर जोर देने पर भी याद नहीं आया। तभी मोबाइल चिंघाड़नेे लगा। उसने मुंह दबा दिया। दूसरी बार चिंघाड़ा। फिर मुंह मरोड़ा। तीसरी बार जब चिंघाड़ा तो हड़बडी़ में फर्श पर गिर गया और दो टुकड़े हो गया।

‘‘ जस्ट कूल डाउन... डोंट वरी...।‘‘ साथी ने मोबाइल उठा कर एकदम जोड़ दिया। जोड़ते ही वह जीवित हो उठा और इस बार थर्राते हुए जोर जोर से कांपा।

उन के वार्तालाप से तीसरा लड़का, जो कानों में रूई डाल नाईट ड्‌यूटी के बाद खर्राटें भर रहा था, एकदम जाग गया और जैसे एक बच्चे की तरह कुनमुनाया :

‘‘ क्या शोर मचा रहो हो..... सालो! मुझे सोने दो।‘‘

94180—85595 ‘‘अभिनंदन'' कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला—171009