चार शिक्षाएं Sudarshan Vashishth द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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चार शिक्षाएं

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बाल कथाएं

सुदर्शन वशिष्ठ

पक्षी अपनी मस्ती में उड़ते रहते हैं। न तो इनका घर होता है और न ही इन्हें अन्न धन इकट्‌ठा करने की चिंता होती है। हां, पेट लगा है तो पेट की खातिर इधर उधर भटकना पड़ता है।

एक बार पक्षियों का एक झुण्ड मजे से आकाश में उड़ रहा था। अगला पक्षी जिस ओर रुख करता, झुण्ड उधर ही हो लेता।

बुरा समय आते देर नहीं लगती। पक्षियों की नज़र जमीन पर बिखरे दानों पर पड़ी और नीचे उतर आए। जमीन पर आते ही वे दाना चुगने लगे। यहां एक शिकारी ने अपना जाल बिछाया हुआ था। वे पहला दाना चुगते ही जाल में फंस गए। इन मे एक पक्षी कमजोर था जो जमीन पर नहीं पहुंच पाया था। अपने साथियों को जाल में फंसा देख वह भी जमीन पर जाना चाहता था कि अकेला जी कर क्या करेगा किंतु तब तक शिकारी ने अपना जाल समेट लिया।

पक्षी ने अपने पैर समेट लिए और एक ओर उड़ गया। अपने साथियों को फंसा देख उसकी भी मरने की इच्छा हुई किंतु धीरे धीरे ये भावना जाती रही।

कुछ दूर जा क रवह एक डाल पर बैठ गया। तभी एक कौए की नजर उस पर पड़ी। कौआ तो चालाक होता है। उसने भांप लिया कि यह पक्षी कमजोर है। कौए ने झपट्‌टा मारा तो उड़ न पाने पर वह एक झाड़ी में घुस गया। कौए ने कांए कांए कर और कौए भी बुला लिए किंतु झाड़ी के अंदर घुस न पाए और हार कर चले गए।

पक्षी को अब झाड़ियों में सुरक्षित जगह मिल गई। वह थोड़ा सा बाहर निकल कर चोग खाता और झाड़ी में घुस जाता।

इन झाड़ियों के बीच एक पीपल का पेड़ था। एक दिन एक साधु अपने शिष्यों सहित इस पेड़ के नीचे आ कर रहने लगा। दिन में शिष्य भिक्षा मांग कर लाते और रात को खाने से पहले ईश्वर के नाम अन्न रखते जिसे पक्षी आ कर खा जाता।

भोजन के बाद साधु अपने शिष्यों को ज्ञान का उपदेश देता। साधुओं की संगत में पक्षी को भी ज्ञान हो गया और वह मनुष्यों की भान्ति बोलने लगा।

कुछ दिनों आद साधु वहां से चलते बने। पक्षी भी उदास हो गया। अब उसमें शक्ति आ गई थी, अतः वहां से उड़ कर इधर उधर घूमता रहा। आखिर एक दिन वह शिकारी के जाल में फंस गया। शिकारी ने घर पहुंचते ही पत्नी को कहा कि आज इस पक्षी को पकाओ।

वह मृत्यु के भय से कांप उठा। फिर भी धैर्य रख कर उसने शिकारी से कहा कि मेरे इतने से मांस से तेरा क्या बनेगा, मैं तूझे चार अमूल्य शिक्षाए दूंगा जो उम्र भर तेरे काम आएंगी।

शिकारी यह सुन हैरान हुआ और पक्षी को एक पिंजरे में डाल दिया।

पक्षी ने कहा : ‘‘बीती बात पर क्या पछताना। जो बीत गई, सो बात गई। उससे सबक लेना चाहिए। पछताना नहीं चाहिए।'' यह कह कर पक्षी चुप हो गया। शिकारी की उत्सुकता बढ़ी और पक्षी से शेष तीन शिक्षाएं भी जानी चाहीं।

पक्षी ने कहा : ''वह बात जो समझ न आए, उस पर विश्वास क्या करना! भैया! जो बात समझ में ही न बैठे, उस पर कभी विश्वास न करो! नहीं तो नुकसान उठाओगे।.......तीसरी बात....हाथ आई वस्तु कभी नहीं छोड़नी चाहिए। हे मनुष्य! जे वस्तु परमात्मा ने दी है, उस पर संतोष करो। ऐसा कभी न करनाकि हाथ आई वस्तु को छोड़ दो।''

पक्षी फिर चुप हो गया। शिकारी प्रार्थना करने लगा कि चौथी बात भी तुरंत बताओ।

पक्षी ने कहाः ‘‘मैंने वचनानुसार तीन अमूल्य बातें बता दीं। चौथी बात तो बहुत ही मूल्यवान है और बहुत ही पवित्र है। यह लोहे के पिंजरे में या किसी बन्धन में नहीं सुनाई जा सकती। अतः पहले मुझे बाहर निकालो, तभी बताऊंगा। सुनने की इच्छा हो तो पिंजरे का दरवाजा खोल दो।''

पक्षी की बात सुन शिकारी ने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। पक्षी पिंजरे से निकला और एक डाली पर जा बैठा। शिकारी ने विनती की कि चौथी बात भी बताओ।

पक्षी ने कहा : ‘‘हे शिकारी! तू महामूर्ख है। ऐसे मूर्ख व्यक्ति को ज्ञान देने का मुझे कोई अधिकार नहीं। और न ही इसे सुन कर तुम्हें कोई फल मिलेगा। अतः मैं तो अब चला।''

शिकारी ने पुनः प्रार्थना किः ''ज्ञानी पक्षी! ठतना तो बता दो कि मैं मूर्ख क्यों हूं और मुझे यह ज्ञान सुनने को अधिकार क्यों नहीं है।''

पक्षी बोलाः ‘‘मैंने तुम्हें तीसरी शिक्षा दी थी कि हाथ आई वस्तु कभी नहीं छोड़नी चाहिए। तुमने उस पर विचार न कर के हाथ आउ मुझ पक्षी को छोड़ दिया। इसका अर्थ यह हुआ कि तुम ज्ञान की बातें केवल सुनना चाहते हो, उन पर अमल नहीं करना चाहते। मैं जानता था यदि तुम्हें ज्ञान प्राप्त हो गया तो मुझे नहीं छोड़ोगे। मुझे मेरे गुरू साधु ने बताया था कि असली साधु वह होता है जो अपने प्राणों की बाजी लगा कर दूसरे का भला करे। मैंने अपने प्राणों की बाजी लगा कर तुम्हें ज्ञान की बाते बततानी आरम्भ कीं। यदि तुम्हें अकज होती तो मुझे पिंजरे में ही रख कर अमूल्य शिक्षाएं सुनता। अतः तुम्हें ज्ञाान का अधिकार नहीं है। अब मुझे ईश्वर ने जीने का अवसर दिया है, मैं उसका धन्यवाद करता हूं।''

यह कह कर पक्षी उड़ गया और शिकारी अपनी मूर्खता पर सोचता रह गया।

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