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नारसिंघ


नारसिंघ

सुदर्शन वशिष्ठ

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नारसिंघ

आंगन में मेमना उछलने लगा।

पहाड़ के कंगूराें पर जन्म लेतीं धूप की नवजात शर्मीली किरणें बर्फ को सुनहरा करने लगीं। बीच बीच में चितकबरी बर्फ चमक रही थी।

रामसरन पहाड़ की ओर हाथ बान्धे खड़ा था। उधर चेला मेमने को पकड़ने के लिए भागने लगा। मूसल से टकराते हुए वह एक बार तो ओखली में गिरते गिरते बचा। मेमना इतना तो जान गया था कि मुझे दबोचने वाला मेरा हितैषी नहीं है। दूर खड़ा हो कर वह अपने हाथी से बड़े बड़े कान पटापट्‌ बजाते हुए छोटा सा मुंह टेढ़ा कर चार टांगों के बल चौकड़ी मारने लगा। आंगन की बर्फ में उसके नन्हे पैरों के निशान पड़ गए। जब चेला हांफने लगा तो रामसरन हाथ जोड़े ही बोल उठाः

‘‘रहणे दो म्हाराज! कहां जाएगा ये!....नजीभा माल है।''

‘‘अरे! नजीभा! जीभ तो बड़ी तेज है इसकी। देखो, कैसे पूरी जीभ बाहर निकाल मैं मैं करता चिल्ला रहा है।''

दूर खड़ा मेमना बड़ी बड़ी आंखें निकाल, जीभ बाहर करता हुआ और जोर से चिल्लाने लगा।

तड़के ही मच रहे इस शोर शराबे से ओबरी में सोयी बदामो जाग गई। आंखें मलती हुई दरवाजे पर खड़ी हुई तो चेले ने मेमने को दोनों हाथों से दबोच रखा था। लगा, वह उसकी गर्दन मरोड़ने वाला है।

‘‘छोड़ दो...छोड़ दो...।'' वह चिल्लाई, ‘‘यह क्या प्रपंच रचा रखा है तुम लोगों ने सबेरे ही!''

चेला उसे देख घबरा गया। फिर भी उसने सफेद मेमने के गले में काला धागा बान्ध ही दिया।

‘‘अरे! मारना थोड़े ही है इसे। बस गले में धागा बान्धना है नारसिंघ का। ये नारसिंघ के निमित्त है। अभी पलने दो, बढ़ने दो, आखिर इसे नारसिंघ को देना है।''

मेमना छिटक कर भीतर की ओर भागा। बदामो ने उसे गोद मे उठा लिया और पुचकारते हुए भीतर ले गई।

धागा बान्धने से मेमना अब नारिंसंघ के नाम से चेले की अमानत हो गया। वह विजयी भाव से बोलाः ‘‘इसकी खूब टहल सेवा करना। नारसिंघ के नाम है ये अब.....मन भर का हो जाएगा तो ले जाऊंगा। नारसिंघ का दूत बन कर अब ये तेरे घर की रच्छया करेगा.... इज्जत लाज बचाएगा.....फिर भी नजरसानी रखना इस छोकरी पर...इसके लच्छण ठीक नहीं लग रहे।'' वह फुसफुसाते हुए बोला।

‘‘ठीक है म्हाराज.....मेहर रखणा। आते रहणा कभी कभी।'' रामसरन ने हाथ जोड़े।

रामसरन ने पहाड़ की ओर मुंह कर दण्डवत्‌ प्रणाम किया। पहाड़ की ओर धूप घुमाया फिर ओखली के साथ चिपका दिया। पत्नी ने देहरे में तीन बार प्रणाम किया और दोनों भीतर आ गए।

‘‘यह किस फेर में पड़ गई अम्मा!....और बापू! तू भी!....पता नहीं स्वामीजी क्या कहते हैं, इस तरह नजीभे माल को देऊ देवताओं को देने के लिए कितना गुस्सा करते हैं।'' बदामो गुस्सा होते हुए बोली।

‘‘साधु संत तो आते हैं, चले जाते हैं बेटिए! हमने तो अपने देऊओं के साथ रहना है। अच्छे बुरे में यही काम आएंगे।''

मेमनों का कस कर पकड़ते हुए वह अचानक रोने लगी।

‘‘तड़के ही क्यों रो रही है...उठते ही रोना अपशकुन होता है।'' मां ने दिलासा दिया तो वह बिछौने पर गिर कर और जोर से रोने लगी।

आज कल ऐसे ही करती है बदामो। रोने लगती है तो रोते ही जाती है बिना बात। हंसने लगती है तो हंसती ही जाती है बिना बात। उसके रोने से भी डर लगता है। उसके हंसने से भी डर लगता है।

रात बरात बाहर निकल जाती है। कोई डर नहीं, भय नहीं।

रात को चितकबरा दिखता है पहाड़। बाघ जैसा। बर्फ से पूरा ढका न होने पर बीच बीच में काली चट्‌टानें नजर आती हैं। ऐसे में डरावना सा वातावरण हो जाता है। ऐसे तिलिस्मी माहौल में अकसर बिस्तर की गर्मी त्याग बाहर निकल जाती है बदामो। उसे ठण्ड नहीं लगती। आंगन से होती हुई खेतों से हो कर आश्रम की ओर चली जाती है।

....इसे डर नहीं लगता होगा!...जरूर यह ‘ओपरे' की कसर है, चेले ने चेताया था। चेले ने धूप किया और आंखें बंद कर बुदबुदायाः‘‘नारसिंघ की झपट लगी है। नारसिंघ और पहाड़िया एक ही होते हैं, बस नाम का ही फर्क है। शिखर दोपहर या रात में.....झुटपुटा होने पर इसे पहाड़, जंगल, नाले की ओर अकेले न जाने देना। नजरसानी रखना। आश्रम में चार काले अक्खर पढ़ लिख क्या गई, कपड़ों से बाहर होने लगी। अभी वक्त है, एक बार हाथों से निकल गई तो....मैं कुछ डोरी धागा कर दूंगा। दूधपीते मेमने का इंतजाम कर रखना।''

....इसे डर नहीं लगता होगा!....जब पहाड़िया या नारसिंघ साथ है तो डर काहे का! नारसिंघ का आधा शरीर घोड़े का होता है। वह तो निकलता ही रात को है जब बर्फ गिरी होती है पहाड़ों पर। घाटियों में ठण्डक बरसती है। तब वह उतरता है पहाड़ से धीरे...धीरे...धीरे....।

तड़के, मुंह अन्धेरे ही चेले ने पहाड़ों के वासी नारसिंघ कर पूजन करवाया और ‘सुक्खण' कर मेमना भेंट किया।

मेनने पर पानी के छींटे देते ही वह सिहर उठा। चेला खुश हुआः‘‘देखा! मंजूर कर लिया। पहाड़िया मेमना ही लेता है, बकरा नहीं। इसे ढंग से पालोगे, पोसोगे तो बकरा बनेगा।'' चेले ने कहा था, ‘‘हमारे अपने देवते हैं रामसरन। औखे वक्त में यही काम आएंगे। सदियों से ये देऊ हमारी रच्छया करते आए हैं।....ये साधु बाबे, स्वामी तो अभी आए। तुम लोग इन स्वामियों के चक्कर न में न आओ। अपना धर्म, अपना कर्म छोड़ तुम लोग विधर्मी बन रहे हो। मैदानों के मुस्टण्डे तुम्हारी छोकरियों को भगा ले जाएंगे। तुम इनकी टहल सेवा में ही लगे रहोगे।''

गहरे सोच में पड़ गया था रामसरन। स्वामीजी की गैरहाजरी में आसपास के ग्राम देवता और दानव घाटी में बेरोकटोक घूमने लगे हैं। आधी आधी रात को गहरे नाले में पूजा छोड़नी पड़ती है। जब तब मुर्गे, बकरे की बलि मांग लेते हैं।....हमारे देवता तो यहीं रहे हैं सदियों से, डर कर सोचता रामसरन...काली माता, मनसा देवी, ऊंचाई पर रहने वाली जोगनियां और डायनें, नारसिंघ, सिद्ध, भैंराें, गुग्गा छत्री, इन्द्रु नाग....बहुत लम्बी सूची है इनकी। किस किस को मनाए, किस को छोड़े। रात हुई नहीं कि सब के बस चारों ओर घूमना शुरू कर देते हैं। इन्हीं का राज हो जाता है। आदमी तो बेबस है। सर्दियों में तो रात भी दिन में ही आ जाती है। सूरज डूबने से पहले ही कमजोर पड़ जाता है। पहाड़ की चोटी से लाल धूप गई नहीं कि घाटी में अन्धेरा पसरा।

स्वामीजी के जाने से आश्रम सूना हो गया। वह रोज साफ सफाई करता है। दिन में बदामो वहां घण्टों बैठी रहती है। बड़ी लगन से दीपक जलाती है। आरती करती है। नन्हा सा दीपक गहन अन्धेरा कहां दूर कर पाता है! आश्रम की पहाड़ी जल्दी ही अन्धेरे में डूब जाती है।

जहां पहले ही सुनसान है, वहां बुरा नहीं लगता। जहां कभी चहल पहल हो, रात को भी जगमगहाट रहे, सूना होने पर और भी अकेला और डरावना लगता है। जैसे तेज रोशनी के बाद अन्धेरा और घना और डरावना हो जाता है। जैसे दीया तो है, लौ चली गई। जैसे घण्टी तो है, स्वर चला गया। साज तो है आवाज चली गई। शरीर तो है, प्राण चले गए।

जब बर्फ पिघल जाएगी, स्याह रातें छोटी होती जाएंगी, दिन उजले और बड़े; आश्रम के बागीचे में अंखूए फूटेंगे, कलियां निकलेंगी; भंवरे गाएंगे, पक्षी चहचहाएंगे; तब स्वामीजी लौटेंगे अपने शिष्यों और भगतों संग.....रामसरन समझाता बेटी को।

कितना भी धीरे धीरे सरके, दिन पहाड़ से हो जाएं, रातें आसमान सी; समय तो रूकता नहीं।

बर्फ पिघली। दिन लम्बे हुए। धूप में गर्मी आई। पेड़ पौधों में नए रक्त का संचार हुआ। कोंपलें निकलीं। बेलें झुकीं। डालें भरीं। फूल खिले।

शिष्यों सहित स्वामीजी मैदान के ठिकाने से लौटे। पहले तीन गाडियां आईं। फिर रोज एक दो आने लगीं।

सुबह शाम मधुर घण्टियां बज उठीं। भजन कीरतन होने लगा। लंगर भवन से हलवा और सुआदू व्यंजनों की सुगन्ध दूर दूर तक फैलने लगी।

आश्रम पुनः जी उठा। वही चहल पहल। वही रौनक। दिनोंदिन आश्रम फलने फूलने लगा, महकने लगा। बेलों में नयी पत्तियां आईं। क्यारियों में नये नये फूल खिले। चिड़िया, पहाडी मैना, तोते, बुलबुल। न जाने कितने ही पक्षी चहचहाने लगे। भंवरे फूलों पर डोलने लगे।

बदामो प्रफल्लित हुई। दौड़ते हुए आश्रम पहुंची और बड़े स्वामीजी के चरणों में जा गिरी। स्वामी जी बूढ़े हो गए थे। अब उन्हें दो शिष्यों का सहारा ले कर उठना और बैठना पड़ता। पकड़ कर चलाया जाता। हां, आवाज़ में वही प्रभाव, वही जोश, वही खनक थी।

आश्रम आने पर वह बदामो से पुनः सुकन्या हो गई।

आश्रम तो जी उठा। स्वामी मुक्तानंद का प्रमुख और प्रिय शिष्य स्वामी असीमानंद दिखाई नहीं दिया। वही तो स्वामीजी के साथ रात दिन साए की तरह रहता था। उसके बिना तो स्वामीजी अधूरे हैं....क्यों नहीं आया होगा! सुकन्या बार बार जा कर मुख्य द्वारा पर देखती। आश्रम में प्रतिदिन एक दो गाड़ियां तो जरूर आतीं। सुकन्या दौड़ती हुई गेट तक चल जाती। आने वाले कोई और ही होता।

लम्बे, देव से, ऊंचे व्यक्तित्व का नाम था स्वामी असीमानन्द। भगवां धोती के साथ कन्धों पर झूलता रेशमी उत्तरीय, माथे पर लाल पीले चंदन के लेप के साथ जुड़ी हुई घनी काली भौहों के बीच तेजस्वी आंखें। कभी लगता मन्दिर से देवता की सुडौल संतुलित प्रतिमा साक्षात्‌ बाहर निकल आई है।

सायंकालीन प्रचवन में स्वामीजी लरजती आवाज में बोलते :''......जीव और ब्रह्‌म का सम्बन्ध प्रेमी

प्रेमिका सा है। सूफी संतों ने इसका गायन किया है। जीव ब्रह्‌म की प्रतीक्षा में लगा रहता है, कब ब्रह्‌म का आगमन हो तो वह उस में विलीन हो जाए। प्रतीक्षा में राह देखते दखते उसकी आंखें पथरा जाती हैं।''

और गायक मधुर स्वर में गा उठतेः

‘‘जदों दा तू रुस गया साढ़े नाल़ ढोलणा

भुल गया कावां नू मुंडेरे उते बोलणा

आ जा तैंनू अखियां उड़िकदियां।

राह्‌वां तक तक थक गईयां मैं

कलेयां रह रह अक गईयां मैं

आ जा परदेसिया वास्ता ई पियार दा

तैंनू अखियां उड़िकदियां

अड़ेया न कर बेपरवाहियां

तू भी आ जा ढोलणा तैंनूं......

ओ छेती आ जा ढोलणा तैंनू......।''

सुकन्या जब यह गायन सुनती तो सब की नजर बचा हर बार बार मुख्य द्वार की ओर भागती।

प्रतिदिन की पूजा अर्चना एक मरियल सा स्वामी करने लगा। शंख में फूंक मारते वक्त उसका सारा शरीर कांप उठता। बहुत जोर लगाने पर भी शंख नहीं बजता। वह मद्धम सी आवाज में प्रवचन देता।

जब स्वामी असीमानंद पूजा करने खड़े होते तो सब देखते ही रह जाते। लगता, असीमानंद का सीधा सम्पर्क है भगवान से। जब वे धूप का पात्र घुमाते तो लगता भगवान के विग्रह में जीव पड़ गया है।

आखिर सुकन्या से रहा न गया। उसने बड़े स्वामीजी से पूछ ही लिया :

‘‘स्वामीजी नहीं आए.....अब रोज की पूजा कौन करेगा! प्रवचन कौन देगा।'' पूछते हुए अांंखें डबडबा गईं सुकन्या की।

‘‘वह तो कहीं चला गया है बेटी!.....शायद लौट आए।'' स्वामीजी ने सुकन्या के सिर पर हाथ रखा।

झर झर आंसू बहने लगे सुकन्या की आंखों से। वह फफक्‌ कर रो पड़ी।

‘‘ऋषि और नदी का मूल नहीं जाना जा सकता। अरे! जिस ने घर बार छोड़ दिए, माता पिता, परिवार और रिश्ते नाते छोड़ दिए, सब नाते तोड दिए, उसका क्या ठिकाना! जोगी बहता पानी है। कहां से कहां निकल जाए, क्या पता। कौन बान्ध सकता है उसे!'' स्वामीजी ने रामसरन की ओर देखते हुए कहाः

‘‘इस कन्या का विवाह भले घर में करना। पूरा खर्चा आश्रम करेगा। बहुत निश्छल और भोली है तुम्हारी यह कन्या....तभी मैंने सुकन्या नाम रखा है।''

गर्मियों में भेड़ बकरियों के साथ साल भर बाहर रहे पुहाल घर गांव लौटे। इन में रूपणू पुहाल भी लौटा। गभरू, भरा पूरा गठीला सजीला जवान जिससे रामसरन ने बदामो की बात पक्की की थी। पांच सौ भेड़ बकरियों का माल था इसके पास। घर में जमीन जायदाद। वह पूरा साल भेड़ बकरियों के साथ चला रहता था, इसलिए उसे पुहाल कहते वरना घर में भी सब कुछ था।

बात पक्की क्या करनी, रस्म के अनुसार आठ बरस की वय में बदामों के साथ उसक ब्याह कर दिया था। सयाणी हो जाने पर उसे विदा ही करना था। बीच बीच में रूपणू कभी कभी आता रहता। हर वक्त उससे भेड़ बकरियों की मींगणों की गन्ध आती रहती। जैसे बकरी का छौना देखने में तो बहुत सुंदर सलौना लगता है, उसे गोद में उठाओ तो बुरी बास आती है।

बरसात आंखों से हो चाहे आसमान से; शरीर और मन का मैल धो डालती है। सब धुले हुए नजर आते हैं बरसात में, एकदम उजले। पहाड़ पेड़, ढोर डंगर, भेड़ बकरियां और मानुष भी। बदामो का रंग भी एकदम खिल उठा। कुम्हलाई सी दिखने पर भी तेजस्वी लगने लगी।

बरसात थमने के साथ ही उसका हंसना, रोना भी थमा। जैसे खड्‌ड नाले शांत हुए, वैसे वह भी शांत होने लगी। अम्मा ने समझायाः साधु बाबों से मोह ममता भी रखता है कोई भला। इनका न ठौर, न ठिकाना। इन्हें किसी से बेदण नहीं होती। निर्मोही होते हैं ये, एकदम रूखे। न कोई आगे, न पीछे। कब कहां निकल जाएं, कुछ पता नहीं।

बरसात थमी तो खड्‌ड नाले भी धीरे धीरे शांत हो गए। जहां बरसात में गंदला पानी ठाठें मारता हुआ तटबन्धों को तोड़ता था, वहां शांत और निर्मल पानी चुपचाप बहने लगा। रामसरन ने मुहूर्त तो निकलवा रखा था। निश्चित दिन ब्याह तय कर दिया....सब ठीकठाक हो जाएगा तो शिव विवाह का उत्सव ‘नुआल़ा' करेगा....मन ही मन सुक्खण भी कर दी।

विवाह में परंपरा के अनुसार वर शिव बनता है तो वधु गौरजां। बदामो को उबटन मल मल कर नख न्हाणी, चन्दन बूर और मुश्की कपूर से नहलाया गया। उसे नई नकोर लुआंचड़ी, गले में चांदी का बड़ा सा चन्द्रहार, नाक में नथ पहना कर गौरजां के रूप में सजाया गया। उधर रूपणू पुहाल मृगछाला पहन, डमरू और त्रिशूल हाथ में लिए शिव बना। डमरू बजा कर वह गौरजां को मोहित करेगा। शिव भेड़ बकरियों के संग ऊंचे शिखरों में घूमेगा, गौरजां उसे नालों घाटियों में ढूंढेगी।

स्वामीजी ने विवाह का पूरा खर्चा देना चाहा। रामसरन ने मना किया। ना ना करते भी स्वामीजी ने रामसरन को पचास हजार पकड़ दिए.....अरे! रख लो। समझो तुम्हारा ही कमाया है। हमारे जाने के बाद तुम आश्रम की देखभाल करते हो....तुम्हारी बेटी सुखी रहे, प्रसन्न रहे।

रामसरन ने विवाह गांव की परंपरा के अनुसार किया। बकरे काटे गए। सुर लगाई गई। पांच छः दिन तक सभी गद्‌दी लोग मस्त हो डंडारस नाचते रहे। धाम के दिन नारसिंघ के लिए रखा मेमना काटा गया जिसका प्रसाद सब से पहले चेले को दिया गया।

रामसरन आशीर्वाद लेने के लिए वर वधु को प्रातःकालीन पूजा के समय आश्रम ले गया। आश्रम में आज विशेष चहल पहल थी।

स्वामी असीमानंद आश्रम लौट आए थे। आज उन का उत्तराधिकारी के रूप में अभिषेक था।

असीमानंद को दूध, दधि, मधु से नहलाया गया। उनके शरीर पर चंदन का लेप किया गया। माथे पर चंदन की लाल सफेद रेखाएं बड़े जतन से उकेरी गईं। कानों से सोने के कुण्डल, गले में एकमुखी रूद्राक्ष, कलाईयों में सोने कंगन, हाथों में कमण्डल।

असीमानंद ने पूजा के समय अपने चिरपरिचित ढंग से चंवर डुलाया, पुष्प चढाए, धूप दिया। ठीक सामने बदामो पति के साथ सिर झुकाए, घूंघट काढ़े पालथी मार बैठी थी।

जब असीमानंद ने शंख बजाया तो रोंगटे खड़े हो गए बदामो को। घूंघट हटा कर देखा....एक तेजस्वी साधक जिसके माथे पर लाल सफेद चंदन चमक रहा था। जिसके विशाल कन्धे चंदन की खुश्बू से महक रहे थे। जिसका सिर मुंडा हुआ था मगर कानों के पास छोटे छोटे बाल अलग ही दिख रहे थे। पूजा गृह से आती महक जैसे स्वामीजी में सिमट गई थी। वह स्वामी नहीं, मन्दिर के द्वार पर चित्रित साक्षात्‌ देवता था जो चित्र से बाहर आ कर खड़ा हो गया था।

सन्न रह गई बदामो। आंखें जैसे पथरा गईं।

असीमानंद ने शंख में चरनामृत डाल घुमा कर भक्तों की ओर छिड़काव किया। चरनामृत के छींटों से बदामो का पूरा शरीर सिहर उठा, रौंगटे खड़े हो गए। कंपकपी फैल गई। असीमानंद ने टोकरी से पूजा के फूल लम्बी बांहें पसार फैंके तो एक बड़ा सा फूल उसके सिर से टकराता हुआ गोद में आ गिरा।

कांपती हुई गश खा कर गिर गई बदामो। रूपणू पुहाल ने उसे फुर्ती से दोनों बाहों में बच्चे की तरह उठाया और दौड़ता हुआ आश्रम के मुख्य द्वार से बाहर निकल गया।

‘‘अभिनंदन''

94180—85595 011—2620858

कृष्ण निवास

लोअर पंथा घाटी शिमला — 171009

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