[ नीलम कुलश्रेष्ठ ]
ये कार्यालय आम सरकारी कार्यालय जैसा है। कौन से प्रदेश का ? और कौन सा विभाग ?क्या फ़र्क पड़ता है ?हर सरकारी कार्यलाय की एक जैसी कार्य प्रणाली होती है। सुविधा केलिए इसे गुजरात का सूचना विभाग मान लेते हैं। इस पुरानी इमारत के चार कमरों के बीच के गलियारे के दूसरे छोर पर डाइरेक्टर का बड़ा कमरा है। हर कमरे में मेज़ पर पुराने घिसे कपडे का मेज़पोश है। पास की आलमारी में किताबें व फ़ाइलें हैं। यदि कोई खिड़की का कांच टूट गया है तो वह इंतज़ार करता रहेगा कि उसे बदलने का नोट फ़ाइल दर फ़ाइल घूमता कब सेंक्शन होता है। यह उनींदा सा कार्यलाय सूचना देने व लेने के तेज़ काम से जुड़ा है .ये बात और कि सुबह दस बजे कार्यालय के आरम्भ होने के समय से सूचना आती रहती है -साहब अब आ रहे हैं या अब। बारह बजे तक साहब की कृपा अपने चैम्बर्स की कुर्सी पर हो ही जाती है।
इस कार्यालय के कमरे व साहब के चैम्बर में संस्था चलाने वालों ,कलाकारों ,व्यवसाइयों व अलग अलग विभाग के अधिकारियों की भीड़ लगी रहती है या उनके सचिव आते जाते रहते हैं। ये सब अपनी नाक का` ईगो झटक` डाउन टु अर्थ `बने बात करते देखे जा सकते हैं। स्थानीय पत्रों में छा जाने का शौक किसे नहीं होता ?यहां शाम को पत्रकारों का जमघट लगा रहता है ,नई नई सूचनाएँ पाने के लिए। हां, अंग्रेज़ी के पत्रकार कम ही नज़र आतें हैं। वे क्यों सरकारी धौंस सहें ? सरकार से मिला समाचार छापेंगे ,नहीं तो नहीं। छोटे मोटे अख़बारों की तरह उनका कारोबार तो सरकारी विज्ञापन पर तो चलता नहीं है। वह जब भी इधर से गुज़रती है मीनल बेन का टू व्हीलर देखकर समझ जाती है वे ऑफ़िस में हैं तो अंदर चली जाती है। मीनल बेन स्वागत करतीं हैं ,``केम छो ?बहु दिन पछि आया। ``
``सारु। ``वह उनके सामने वाली कुर्सी खींचकर उस पर बैठ जाती है। चपरासी उसे देखकर ठन्डे पानी का गिलास मेज़ पर रख जाता है। वह पहली बार जब इस कार्यालय में आई थी तो उसने देखा था कि सारे कार्यालय में वे अकेली महिला हैं तो उन्हीं की तरफ़ बढ़ गई थी। उन्होंने स्वागत किया था। धीरे धीरे उसे पता लगा था कि कोई छात्र किसी कोर्स के बारे में ,सूरियोलॉजिस्ट [मौत पेंटिंग बनाने वाला ]या दाढ़ी बढ़ाये ,ढेर सी रंग बिरंगी मोतियों की मालाएं पहने कोई धार्मिक पेंटर आता है या कोई एन जी ओ का बन्दा ,वे इसी गर्मजोशी से उसका स्वागत करतीं हैं। इस विभाग में उसे दो ही लोग भरोसे के लगे थे एक ये व दूसरा गुप्ता।तब उसने इस शहर में स्वतंत्र पत्रकारिता आरम्भ ही की थी।वह गुजरात में स्त्रियों के सर्वाधिक आत्महत्या करने के विषय में इन दोनों के विचार जानना चाहती थी। मीनल तुरंत ही कह उठीं थीं ,``यहां हर क्षेत्र में स्त्रियां काम कर रहीं हैं इसलिए जल्दी ही विवाहित स्त्री पुरुषों के बीच सम्बन्ध बन ही जाते हैं। इस त्रिकोण में एक स्त्री आत्महत्या कर लेती है। ``
गुप्ता ने तिरछी शरारती नज़रों से उन्हें देखते हुए कहा था ,``पुरुष जब नौकरी करता है तो अपनी पत्नी के साथ कम और महिला सहकर्मी के साथ अधिक रहता है। स्त्री अपने सहकर्मी साथ अधिक रहती है तो सम्बन्ध बनने की संभावना तो रहती ही है। ``
वह कितनी बार उनके ऑफ़िस गई लेकिन उसने कभी मीनल बेन को इस` सम्भावना `पर मुहर लगाते नहीं देखा। मीनल बेन ने ही सुझाव दिया था जब तुमने महिला बहुभाषी साहित्यिक मंच बना लिया है तो उस गतिविधियों की प्रेस रिलीज़ अख़बारों में क्यों नहीं देतीं। उसने इनकी बात पर ध्यान नहीं दिया .कुछ दिन बाद जब वह उनके पास गई तो उन्होंने पूछा ,``प्रेस रिलीज़ लिख लाईं ?``
``किसकी ?``
``अपने मंच की। ``
``जी ,कहिये तो अभी लिखकर दे दूँ। ``
`वे हंस पड़ीं थीं ,`` एम नथी [ऐसा नहीं है ].प्रेस रिलीज़ `सादे काग़ज़ पर नहीं संस्था के लैटर हैड पर दी जाती है। अच्छा तुम सादे कागज़ पर ही दे दो। मैं फ़्रेंडली वे में पब्लिश होने के लिए दे दूंगी। ``
किसी संगठन की नींव डालो व समाचार पत्रों में उसके बारे में प्रकाशित हो [चाहे वह स्वयं ही प्रकाशन के लिए दिया हुआ हो ],तो उसकी खुशी ऐसी होती है की `हम भी कोई `सेलेब्रिटी ` हैं ,हम किसी से कम नहीं। `एक हल्का सा सुरूर रहता है कि हमने ऐसा काम किया है कि मीडिया महत्व दे रहा है। ये बात और है कि कुछ वर्षों बाद ये बेवकूफ़ी भी लगने लगती है कि स्वयं कोई सांस्कृतिक गतिविधि करो और स्वयं ही सूचना विभाग प्रेस रिलीज़ देने भागे जाओ। मीनल से अपने परिचय को वह ऐसे ही लेती थी जैसे किसी व्यवसाय में बहुत से लोग मिलते चले जाते हैं। वह कहाँ समझ पाई थी कि उसके हाथ में कारुं का खजाना लग गया है ? ये बात जब स्पष्ट हुई जब दस वर्ष पुरानी एन जी ओ के संस्थापक प्रोफ़ेसर ने उससे पूछा ,``आपके हाथ कौन सी जादू की छड़ी लग गई है जो आपकी अस्मिता की प्रेस रिलीज़ एक साथ छः साथ अख़बारों में पब्लिश होती है। हमारा आदमी छः सात अख़बारों में हाथ से प्रेस रिलीज़ दे आता है तब कहीं दो तीन अख़बार वाले समाचार पब्लिश करते हैं। ``
``मुझे तो ये नहीं पता कि अस्मिता की प्रेस रिलीज़ इतनी जगह पब्लिश होती है क्योंकि गुजराती न्यूज़ पेपर हमारे यहां नहीं आते। मैं तो उसे इनफ़ोरमेशन डिपार्टमेंट की मीनल बेन को दे आतीं हूँ ,बस। ``
```अच्छा ?हमें तो आज तक इस डिपार्टमेंट में कोई मेहरबान नहीं मिला।``
इधर संगठन की सदस्यायें ख़ुश थीं। थोड़ा इतराकर चलने लगीं थी कि अख़बारों में उनका नाम आने लगा है लेकिन थोड़ी `चख चख ` मीटिंग में शुरू हो गई। जिस भी सदस्य का नाम अख़बार में नहीं आये वह मुंह फुला लेती। कोई तैश में आकर पूछने लगती ,``मैं सरस्वती वंदना हर बार गातीं हूँ ,मेरा नाम पेपर में क्यों नहीं आया ?``
वह खीज जाती ,`` क्या हम लोगों को भी हर बार अखबार में ढोल पीटना होगा कि हम दो लोगों ने इसकी स्थापना की है?``
मीनल बेन के पास जाने का उसे एक और सुख मिलने लगा था। वह हर मुलाक़ात में उनका दबे छिपे निरीक्षण करती रहती की कहीं उनमें कोई बनावट तो नहीं है। उसे आश्चर्य होता कि दुनियां में कोई ऐसी स्त्री भी है जिसका रोम रोम पति की प्रशंसा में लहकता रहता हो ,``मैं शांति से इसलिए नौकरी कर पातीं हूँ क्योंकि मेरे पति बहुत कोऑपरेटिव हैं। ``
उसने ध्यान नहीं दिया क्योंकि अक्सर स्त्रियां पति केविषय में ऐसा चढ़ाये रहतीं हैं। उसने पूछ ही लिया ,``मेरी तरह आपके भी दो बेटे हैं .दो शेरों को सम्भालना कितना मुश्किल होता है। उनको लड़ते हुए अलग करो। उनके पीछे पीछे होमवर्क करवाने भागो। खाने के अलग नखरे --आज ये नहीं खाना --आज वो नहीं खाना। ``
वे मुस्करा दीं थीं ,``होमवर्क करवाना मेरा काम नहीं है। डॉक्टर साहब बेटों को शाम को अपने क्लीनिक में बुलाकर होमवर्क करवाते हैं। ही इज़ अ वेरी गुड हज़बेंड ,गुड फ़ादर एज़ वेल एज़ अ गुड सन। ``
``दुनिया में ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं। ``
``आप उनसे मिलकर तो देखिये। रोज़ क्लीनिक से वापिस आकर पहले माँ के पास बैठेंगे, तब हमारे पास आते हैं। ``
कभी मैं उनसे पूछती ,``आप एक डॉक्टर की बीवी हैं। बिलकुल कसी चोटी बनाकर सिम्पल रहतीं हैं। ``
``बद्धा ऑफ़िस मा हूँ इकली स्त्री छूँ ,एना माटे हूँ कायम सेन्टर ऑफ़ अट्रेक्शन छूँ । ``
``ओ ---.`कभी अंग्रेज़ी बोलती ,कभी गुजराती ,कभी हिंदी बोलती मीनल बेन से बात करने में उसे बहुत मज़ा आता था।
वे आगे बोलीं ,``अगर मैं सज धजकर ऑफ़िस आऊं तो ---.``कहकर हंस पड़ीं थीं।
कुछ दिनों के बाद उसे उनका फ़ोन मिला था ,``आप जल्दी ही हमारे ऑफ़िस आइये। ``
``क्यों ख़ैरियत तो है ?````सब ठीक है। हमारे डिपार्टमेंट में नए डाइरेक्टर की पोस्टिंग हुई है। वे सभी संस्थाओं के हैड से मिलना चाहतें हैं। ``
``ओ.के .``
तीसरे दिन अपना विज़िटिंग कार्ड उनके डायरेक्टर को भिजवाया। उन्होंने उनकी अस्मिता का परिचय बहुत ध्यान से सुना। फिर वे बोले ,``आपकी संस्था के लिए विभाग कुछ करता है तो आप सरकार के लिए कुछ करिये ,एज़ यू नो ,इट `स अ गवर्मेंट ऑफ़िस। अभी अभी पुलिस विभाग ने अस्सी लाख का सोना पकड़ा है । इनकम टेक्स विभाग ने जगह जगह रेड डाली आदि ज़ोरदार न्यूज़ हैं। आप इन पर लिखिये।
``जी ?``वह `हाँ `में उत्तर कैसे देती ?
वह वहां से उठते हुए समझ गई थी समाचार पत्रों को भेजी जाती प्रेस रिलीज़ पर उनके ही हस्ताक्षर होते हैं। न तो वह सरकारी भोंपू बन पाएगी ,न अस्मिता के समाचार प्रकाशित होंगे। उसे उस विभाग में जाने से अरुचि होने लगी।
``अरे !दो महीन कहाँ गायब रहीं ?``मीनल बेन ने आश्चर्य से पूछा था।
उसने कारण बताया तो वे मुस्करा दीं थीं ,``मेरे बहुत से पत्रकारों से अच्छी सम्बन्ध हैं ,मैं सीधे ही उन्हें आपकी प्रेस रिलीज़ दे सकतीं हूँ। जब मैं न मिलूं तो गुप्ता को वह प्रेस रिलीज़ दे दीजिये। ``
``आप इस तरह हेल्प कर देंगी ?``
``क्यों नहीं ? यू आर माई `सहियर `[ सहेली ] .बस अब मुझसे थोड़े दिन काम ले लीजिये। मेरे नौकरी के कार्यकाल के बीस वर्ष पूरे होने में तीन वर्ष बाकी हैं। उसके बाद मैं वी आर एस [वॉलिन्टियर रिटायरमेंट स्कीम ]के अंतर्गत रिटायरमेंट ले लूंगी। ``
``कुछ न कुछ परेशानियां हर नौकरी में चलती रहतीं हैं। आप सारा दिन घर पर करेंगी क्या ?``
``मेरे पति की प्रेक्टिस अच्छी चल रही है। घर में कार है ,दो मंज़िला मकान है। अपने घर में नंगे पैर कभी सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाने का कभी नीचे आने का सुख भोगूंगी। ``
उसकी बहुत जोर से हंसी निकल गई ,बेसाख्ता हंसती चली गई। कोई चौंकता है तो चौंकता रहे,``बाप रे सुख की क्या परिभाषा है ?इस उम्र में बच्चे बड़े हो जाने पर स्त्रियांअकेलेपन से `सायकिक` हो जातीं हैं। मेरी अपनी हालत देखिये फ्री लांसिंग में कभी हाथ में काम है या कभी नहीं। आमदनी का कोई ठिकाना नहीं है और आप हैं कि सरकारी नौकरी छोडने चलीं हैं। ``
``मेरे पास काम की कमी नहीं है। स्त्रियों की एक संस्था बनाने की कब से योजना बना रहीं हूँ। अनुवाद का काम करूंगी ,साड़ियां काढ़ा करूंगी.``
``मैं विश्वास नहीं कर सकती की ,आप नौकरी छोड़ सकतीं हैं। ``
``आप देख लेना। ``उन्होंने उसे चनौती दी थी।
कुछ महीने बाद वे ऊपर पहुँचा दी गईं। ऊपर से मतलब आसमान के पार वाला ऊपर नहीं। इस मुख्य कार्यालय के सामने दूसरी बड़ी सरकारी इमारत थी। इस इमारत की तीसरी मंज़िल के एक कोने में सूचना विभाग का एक रिकॉर्ड रूम था जिसे सम्भालने के लिए एक लिपिक पर्याप्त था। बड़ी बड़ी आलमारियों में फ़ाइल्स, किताबों व पत्रिकाओं के अम्बार लगे हुए थे। .कोने की बड़ी मेज़ पर स्थानीय अख़बारों में छेद करके उन्हें बांधकर रिकॉर्ड के लिए रक्खा जाता था। वह दो तीन बार अस्मिता की प्रेस रिलीज़ की क्लिप लेने ऊपर गई थी। अब अख़बारों के पुलिंदों को छोटी मेज़ पर रखकर ,उसे कोने में रक्खा गया था बड़ी काली मेज़ अंदर के कमरे के केन्द्र में रखवाकर ,चार कुर्सियां लगाकर मीनल बेन के बैठने का इंतज़ाम कर दिया था। फ़ोन के नाम पर नीचे ऑफ़िस के फ़ोन का एक्सटेंशन था। अब उसे तीन मंज़िल चढ़कर ,लंबा बरामदा पार करके उनके पास जाना होता था। पहले समय कम होने पर भी वह उनके नीचे वाले ऑफिस में `हेलो` कहती निकल जाती थी लेकिन अब बार बार पर्वतारोही जैसी हिम्मत जुटाना संभव नहीं था।
अक्सर उनकी बोरियत मे डूबी रंगत दिखाई देती। वह तब चहकती मिलतीं जब वे स्कूल्स या महिलायों के लिए प्रतियोगिता आयोजित करतीं ,``पता है टाउन हॉल में चालीस स्कूल्स के बच्चों ने देशभक्ति गीत प्रतियोगिता में भाग लिया था। ``
``वाह !``.
किसी भी आयोजन का नशा ही कुछ और होता है कितने ही लोगों के मन में स्फ़ूर्ति पैदा कर देता है। बाद में वही उदासी ,अलग थलग कर देने की। वह सूंघती ,घुमा फिराकर सूंघती कि कहीं उनकी अपने पति से अनबन तो नहीं चल रही ?कभी तो वे आपस की लड़ाई का पुलिंदा खोलें लेकिन वे तो कुछ और बतातीं ,``ये गुप्ता भी बदल गया है। पूरे ऑफ़िस में एक वही सिंसियर था। गंभीरता से रिपोर्टिंग करता था। वह सारी क्रिएविटी छोड़कर `लॉबी `में घुस गया है।
``कैसी लॉबी। ``
``अब आपको क्या बताऊँ ?``वे असमंजस में इधर उधर देखतीं । वह भी चुप रहती कि जब उन्हें बताना नहीं है ,तो क्यों जानने की कोशीश करे ?थोड़ी देर बाद वे ख़ुद ही बताने लगतीं ,``आप पूछ रहीं थीं लॉबी क्या ?बड़े बड़े व्यवसायी घरानों के सचिव व बड़े बड़े कलाकार अपने बारे में बड़ा चढ़ा कर लिखवाना चाहते हैं। विभाग में उनकी सौदेबाज़ी चलती रहती है। गुप्ता पहले ऐसा न था। मैंने उसे टोका तो कहने लगा तुम डॉक्टर की बीवी हो ,ईमानदारी का जामा पहने रहो.मेरे बच्चे बड़े हो रहे हैं। एक तनख़्वाह से घर कैसे चलाऊँ ?``
``ऐसा ?``
``हाँ,विभाग का चैरिटी फ़ंड भी जाने कहाँ चला जाता है ?मैं ही जो सिटी में थोड़ी बहूत हरिफ़ाई [प्रतियोगिताएं ] करवा लेतीं हूँ। ``
``आप सारा फ़ंड क्यों नहीं यूज़ कर लेतीं ?``
``हर योजना के लिए रूपये सेंकशन करवाने के लिए डाइरेक्टर के साइन ज़रूरी हैं। थोड़ा सा फ़ंड सेंक्शन करने के लिए दस चक्कर कटवाएंगे ,दस बातें पूछेंगे इससे तो मैं अकेली यहाँ अकेले में अच्छी हूँ। ``
``आपको लोग प्रेस रिलीज़ देने केलिए ढूँढ़ते होंगे ?``
``आप जैसे ही दो चार लोग मेरे पास आतें हैं वर्ना हर काम से मुझे काटा जा रहा है। ऑफ़िस के हर प्रोजेक्ट से मुझे अलग किया जा रहा है। ``
``इसी लिए आप ऊपर पहुँचा दी गईं हैं? ``
``हाँ ,जिससे जान न सकूँ कि नीचे की लॉबी क्या योजना बना रही है ?``वे तमतामये चेहरे से अपमानित सी कहतीं हैं।
मीनल की सादगी व सज्जनता ही अब तक शहर भर में इस ऑफ़िस की पहचान का पर्याय रही है। अब जब भी उनके कार्यालय फ़ोन करती है ,उत्तर यही मिलता है ,``मीनल बेन ऑफ़िस नहीं हैं। ``या ``मीनल बेन टूर पर गईं हैं। ``
घर पर फ़ोन करो तो सास बतातीं हैं ,``मीनल ऑफ़िस में हैं।
वह एक बार बिना फोन किये ही ऊपर चढ़ गई थी। मीनल बेन ने सजल होती आँखों को रोका था ``बिना काम के ऑफ़िस में बैठना एक यातना है। यहाँ खाली सारे दिन बैठकर मैं क्या करूँ ?क्या करुं ?``
``अगर जगह कोई ईमानदार पुरुष होता तो ?वह भी इस लॉबी से निष्कासित रहता ?``
``मेरे व्यवहार के कारण लोग मेरे पास ही सीधे चले आते थे। मुझसे जलकर मुझे हर काम से निरस्त किया जा रहा है। उस पुरुष को मेरी तरह यातना तो नहीं सहनी पड़ती। ऊपर बैठे बैठे इतनी बोर हो जातीं हूँ कि शाम को दिमाग़ काम करना ही बंद कर देता है।``
उस छटपटाहट को देखकर उसके मस्तिष्क में अकस्मात एक बिजली सी कौंध गई थी -तभी महत्वपूर्ण देवियाँ ऊपर पहाड़ों पर बसा दी जातीं हैं। नीचे की दुनियाँ ,नीचे के शासन ,प्रशासन ,नीचे के लेन देन से दूर ,निष्कासित। नीचे कुछ भी चल रहा हो ,इस व्यवस्था में तुम्हारा क्या काम है ?तुम किसी निर्जन पहाड़ के नीचे शिखर पर बैठी रहो। अपनी मुस्कराहट बिखेरती रहो। तुम्हारा नीचे आना मना है। जो तुम्हारे असली भक्तगण होंगे ,वही हाँफते ,पसीने बहाते तुम तक पहुंचेंगे वर्ना दुनियाँ सम्भालने के लिए , आम जनता के लिए हम हैं ही। तब शायद वह चेन्नई जा रही थी। ट्रेन में एक बंगाली यूनियन लीडर ने पूछा था ,``मैंने सुना है चेन्नई के पास पहाड़ी पर एक मंदिर है। वह किसका है ?``
सामने बैठी एक तमिल महिला ने कहा था ,`` अन्ना ! वह देवी का मंदिर है जी .``
वह बंगाली तैश में आकर ताली बजाकर बोला था ,``वह देवी का मंदिर नहीं हो सकता। ``
``क्यों नहीं हो सकता जी ?``
``मैं कह रहा हूँ न ! ये हो ही नहीं सकता ?``
``अन्ना !एक बार अम उदर जाकर आया। वहां देवी ही है। ``
``मैं बिलकुल नहीं मानता। औरत जात कोई ऊपर चढ़ाने की चीज़ है ? ``वह दोबारा ताली मारकर बोला ,``औरत को तो कोई ऊपर नहीं रख सकता। हमारे कोलकत्ता में तो देवी का मंदिर होता है ज़मीन पर। ``
वह औरत के लिए इस परिभाषा को समझ आवाक बैठी रह गई थी। वैसे तो शहर में छोटी मोटी देवी के मंदिर यहां वहां मिल जाएंगे लेकिन जो महत्वपूर्ण होंगी ,वो ऊपर चढ़ा दी जातीं हैं। जो विकराल होंगी ,लाल जीभ लपलपाते हुए मज़बूत टांगों से दानव मर्दन का दम खम रखतीं हों वही जनता के बीच शान से रह सकतीं हैं -काली कलकत्ते वाली महाकाली की तरह. से आत्मविश्वास से सिर उठाये की उनका भयानक रूप देखकर उनके सामने सिर झुकाने वाले की रूह कांपती रहे,उसकी नज़र झुक जाए।
यदि कोई मीनल बेन की तरह लोकप्रिय , सीधी सरल हुईं तो उनकी प्रशंसा से जलकर ऊपर पहुँचा दी जातीं हैं। उसे अब विश्वास होने लगता है कि वे अब ज़रूर वी आर एस ले लेंगी।
उनके जाने के दिन करीब आ रहे हैं और वे बहुत व्यस्त हो उठीं हैं।वह भी बिना अपने निजी काम के उनसे मिलने जाती रहती है .उनके पास कोई अध्यापक ,कोई प्रधानाध्यापक या किसी गाँव सरपंच बैठा मिलता है। उस कमरे में ढेरों पत्रिकाएं ,पुस्तकें भरी हुईं हैं .आलमारियां धीरे धीरे खाली होती चली जा रहीं हैं। वे हमेशा पटावाला [चपरासी ] को सुतली से बांधकर इनका बंडल बनाने का आदेश देती रहतीं हैं,``इस बंडल को इन साहब को दे दो। ``
``आप तो विभाग छोड़ने वालीं हैं फिर क्यों इतने काम में लगी रहतीं हैं?```
``तुम जानती हो हमारा नया ऑफ़िस बन रहा है। सब सामान यहां से नए ऑफ़िस में शिफ़्ट होगा तो ये बेशकीमती किताबें रद्दी में बेच दी जाएंगी। पैसा आपस में बाँट लिया लिया जाएगा। ``
``आप इनका क्या कर रहीं हैं ? ``
``मैं स्कूल्स के अध्यापकों या सरपँच को बुलावा कर इन्हें सौंप रहीं हूँ जिससे कुछ लोग तो इन्हें पढ़ें। जैसे ही कोई सरपंच किताबों बंडल लेकर चलने लगता तो वे उनसे कहतीं ,``भाई !आस पास के गाम मा पुस्तक लेवा माटे खबर मोकलजो।``
``सारु। ``
वह पूछती `` आपकी संस्था ?`
``उसका पूरा प्रोजेक्ट तैयार है। मैं यहां से जाउंगी तब तक उसका रजिस्ट्रेशन जाएगा। ``
``आपकी साड़ी काढ़ने की योजना और वह दोमंज़िले मकान की सीढ़ियों से नंगे पैर ऊपर नीचे चढ़ना ?``
उसकी बात से वह मुस्करा दीं ,``संस्था के व्यवस्थित होते ही आप देख लीजिये लीजिये कि मैं अपना हर सपना पूरा करुँगी। ``
कुछ दिनों बाद वह प्रेस विज्ञप्ति लेकर गुप्ता के कमरे की तरफ़ जाती है ,पता नहीं मीनल बेन ऊपर मिलेंगी या नहीं।गुप्ता की कुर्सी ख़ाली है। चपरासी बताता है ,``सब लोग साब के ऑफ़िस में मीटिंग में हैं।वह नज़र घुमाती है। साहब के चैम्बर का मोटा पर्दा हवा से हटता है। वह देखती है सब लोग बड़ी नज़र के इर्द गिर्द बैठे फुसफुसाती आवाज़ में बात कर रहे हैं।
वह उससे पूछती है ,`` मीनल बेन आईं हैं ?``
``उनका आज आख़िरी दिन है।वे ऊपर ही हैं। ``
ऊपर मीनल बेन आलमारियों से किताबें निकालकर आख़िरी बंडल बँधवा रहीं हैं। हर बंडल पर चिट लगाती जा रही है कि शहर या गाँव के किस स्कूल को उन्हें देना है। वे मुस्करा कर बैठने का इशारा करतीं हैं। कुर्सी पर बैठे हुए उसका ध्यान नीचे मीटिंग में उलझा हुआ है। नीचे सबकी बहुत तन्मयता योजनायें बन रहीं होंगी। किसका कितना हिस्सा होगा ,यह यह तय हो रहा होगा। मीनल बेन बेन आख़िरी बंडल पर स्लिप लगाकर ,पर्स निकालकर पसीना पोंछतीं हैं।
उससे बातचीत करते हुए कहतीं हैं ,``आज का मेरा यहाँ का काम ख़त्म हो गया। चलो नीचे चलें। ``इस निर्जन शिखर से से वह बहुत आत्मविश्वास भरे कदमों से नीचे उतरने लगतीं हैं।
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