लोग अक्सर ऐसा क्यों चाहते हैं कि हम उनके मन के मुताबिक ही चलें । जो उन्हें अच्छा लगे वही करें, वही पहनें, वही कहें । कभी ये रंग तुम पर जांचता नहीं है, मत पहना करो । कभी तुम्हारे माथे पर छोटी बिंदी अच्छी लगती है, बड़ी मत लगाया करो । क्यों ....?
मैं जो करूँगी वो आपसे पूछकर कटों करूँगी ? या आपके अनुसार क्यों रहूँगी ? मेरा जीवन है , मेरे सपने हैं, मेरा आसमान है । मैं अपने आत्मबल से उड़ान भरना चाहती हूँ तो किसी की क्यों सुनूँ ? मैं जैसी हूँ वैसी ही रहूँगी । यदि आपको मेरा इस तरह रहना पसंद नहीं है तो ये आपका नज़रिया है । मुझमें बदलाव चाहने की अपेक्षा ख़ुद के नज़रिए को बदलिए ।
अगर मैं ख़ुद पर कुछ लिखती,तो लिखती—लाजवाब हूँ मैं…ना किसी से कम, ना किसी से ज़्यादा,
बस अपनी ही एक किताब हूँ मैं।
कभी हल्की-सी मुस्कान हूँ,कभी ख़ुद से ही सवाल हूँ मैं,कभी ख़ामोशियों में सिमटी,कभी शब्दों का बवाल हूँ मैं।
जो समझ पाए मुझे पूरी तरह,शायद इतनी भी आसान नहीं हूँ मैं,कुछ पन्ने खुले हुए हैं मेरे,कुछ में ख़ुद से भी अनजान हूँ मैं।
अपनी ही धुन में चलती हूँ,ना रुकी हूँ, ना थमी हूँ मैं,
गिरकर भी फिर सँभल जाती हूँ,क्योंकि ख़ुद की ही कमी नहीं हूँ मैं।
दुनिया चाहे कहती रहे, राह चुनती हूँ मैं,
शोर से दूर रहकर, काम में रत रहती हूँ मैं।
मुझे काम से प्रेम है, उसी में ख़ुशियाँ पाती हूँ मैं,
दुनिया के हिसाब से चलूँ तो कहाँ ख़ुश रह पाती हूँ मैं।
हर बात को नज़रअंदाज़ कर, कर्म में रमती हूँ मैं,
जैसी हूँ, वैसी ही रहना चाहती हूँ, कभी नहीं बदलती हूँ मैं।किसी की ख़ातिर स्वभाव बदलना मेरी फ़ितरत नहीं,
जिसे बदलना है, नज़रिया बदले—मैं किसी की आदत नहीं।
अगर ख़ुद को लिख पाती,तो लिखती—एक ख़ूबसूरत एहसास हूँ मैं,
जो समझे, उसके लिए अपनापन,जो न समझे,
उसके लिए बस एक राज़ हूँ मैं।
जो मुझे समझना चाहे,उसके लिए खुली किताब हूँ मैं,
हर पन्ने में एक सच्चाई है मेरी,हर शब्द में एक एहसास हूँ मैं।
जो मेरी ख़ामोशी पढ़ सके,जो मेरी मुस्कान के पीछे का दर्द समझ सके,
जो बिना कहे मेरे मन की बात जान सके—उन चुनिंदा लोगों के लिए दिल के सबसे ख़ास अंदाज़ हूँ मैं।
और जो न समझ पाए मुझे,जो अपनी सोच से मुझे आँकते रहें,
जो मेरे बारे में कुछ भी कहते रहें—अब उनकी बातों से कहाँ उलझती हूँ मैं,
हर आवाज़ का जवाब देनाअपनी फ़ितरत नहीं समझती हूँ मैं।
क्योंकि अब अपनी ज़िंदगीलोगों की राय से नहीं,
अपने मन की आवाज़ से जीती हूँ मैं।जो सही लगे,
वही करती हूँ,जो दिल कहे, उसी राह पर चलती हूँ मैं।
किसी को पसंद आऊँ या नहीं,अब इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता,
हर किसी की उम्मीदों पर खरा उतरनामेरा कोई फ़र्ज़ नहीं बनता।
जो मेरे साथ सच्चे मन से चले,उसके लिए दिल से ख़ास हूँ मैं,
जो मेरे मौन को भी समझ ले,उसके लिए एक ख़ूबसूरत एहसास हूँ मैं।
और जो मुझे समझना ही न चाहे,उसके लिए न कोई शिकायत है,
न सवाल—बस ख़ामोशी से उसकी दुनिया सेनज़रअंदाज़ होकर निकल जाती हूँ मैं।
ना सफ़ाई देने का शौक़ है,ना ख़ुद को साबित करने की चाह
,मैं जैसी हूँ, वैसी ही मुकम्मल हूँ—यही है मेरी सबसे बड़ी पहचान।
अगर मैं ख़ुद पर कुछ लिखती,तो बस इतना लिखती—
जो मुझे समझे, उसके लिए खुली किताब हूँ मैं,जो दिल से पढ़े,
उसके लिए ख़ास हूँ मैं,जो न पढ़ पाए, उसके लिए नज़रअंदाज़ हूँ मैं…
और सबसे बढ़कर—किसी के हिसाब से नहीं,अपने मन की दुनिया में जीतीअपनी ही एक ख़ूबसूरत किताब हूँ मैं।