Shakti ke Shiv - 20 sheetal द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Shakti ke Shiv - 20



रात काफी बीत चुकी थी, लेकिन शक्ति की आँखों में नींद का नाम तक नहीं था।

वह अपने कमरे में अकेली बैठी थी। सामने केस की फाइल खुली थी और उसकी नज़र बार-बार उसी नंबर पर जाकर रुक रही थी।

वही नंबर...

जिससे उसे फोन आया था।

शक्ति ने फोन हाथ में उठाया और स्क्रीन को देखते हुए सोचने लगी—

"आख़िर उसने मुझे फोन किया ही क्यों?"

अगर वो सच में इतना चालाक था, तो खुद पुलिस को सुराग देने की जरूरत क्या थी?

वो चाहता तो उस फोन को हमेशा के लिए गायब कर सकता था।

चाहता तो warehouse से भी भाग सकता था।

फिर खुद अपनी मौजूदगी का इशारा क्यों दिया?

शक्ति की आँखें सिकुड़ गईं।

"कहीं वो जानबूझकर खुद को मेरे सामने तो नहीं ला रहा?"

उसने फोन मेज़ पर रख दिया।

लेकिन उसके मन में एक और सवाल उठ खड़ा हुआ।

"या फिर उसका इरादा कुछ और है?"

शक्ति कुर्सी से उठकर खिड़की के पास चली गई।

बाहर बनारस की सड़कें लगभग शांत हो चुकी थीं।

उसने धीमे से कहा—

"तुम मुझे अपने पीछे आने पर मजबूर कर रहे हो... तो आखिर चाहते क्या हो?"

कुछ पल तक वह बाहर देखती रही।

फिर उसके चेहरे पर वही दृढ़ता लौट आई।

"जो भी खेल है तुम्हारा... अब मैं इसे अपनी शर्तों पर खत्म करूँगी।"

लेकिन शक्ति को अभी ये नहीं पता था कि जिस रहस्यमयी शख़्स को वो पकड़ने की कोशिश कर रही थी...

वो पहले ही उसकी अगली चाल तय कर चुका था।


शक्ति ने कुछ देर सोचने के बाद अपना फोन उठाया।

उसने एक नंबर dial किया।

"हाँ, मुझे उस नंबर की पूरी जानकारी चाहिए। लेकिन ध्यान रहे... ये काम बिल्कुल confidential होगा।"

दूसरी तरफ से जवाब मिला।

शक्ति ने आगे कहा—

"किसी भी official record में अभी कुछ मत डालना। मुझे बस ये जानना है कि ये नंबर पिछले चौबीस घंटों में किन locations पर active रहा है।"

कॉल खत्म करके उसने फोन रख दिया।

कुछ ही देर में उसके फोन पर एक encrypted message आया।

एक location...

शक्ति की आँखें स्क्रीन पर टिक गईं।

वही इलाका जहाँ से कुछ घंटे पहले उस रहस्यमयी कॉल की activity मिली थी।

शक्ति ने तुरंत अपनी normal dress बदली और कमरे से बाहर निकलने लगी।

दरवाज़े पर अलिशा मिल गई।

"दीदी, इतनी रात को?"

शक्ति ने बस इतना कहा—

"एक जरूरी काम है। तुम यहीं रहो।"

अलिशा ने उसकी तरफ देखा।

"मैं भी चलूँ?"

"नहीं।"

शक्ति ने हल्की आवाज़ में कहा—

"इस बार मुझे अकेले जाना है।"

अलिशा कुछ पूछ पाती, उससे पहले शक्ति वहाँ से निकल चुकी थी।

कुछ ही देर बाद उसकी गाड़ी उस location से थोड़ी दूरी पर रुक गई।


उधर...

शिवाय अपने कमरे में बैठा कुछ पुराने कागज़ देख रहा था।

उसकी नज़र एक पुराने दस्तावेज़ पर टिक गई।

तेईस साल पुरानी वही तलाश...

जिसका जवाब आज तक उसे नहीं मिला था।

उसने कागज़ मोड़ा और उठ खड़ा हुआ।

तभी रुद्र दरवाज़े पर आकर बोला—

"भाई सा, फिर उसी case में लग गए?"

शिवाय ने शांत स्वर में कहा—

"जब तक जवाब नहीं मिलेगा, ये तलाश खत्म नहीं होगी।"

रुद्र कुछ कहता, उससे पहले शिवाय का फोन बज उठा।

उसने कॉल उठाई।

"हाँ?"

दूसरी तरफ से मिली जानकारी सुनते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।

"पक्का?"

कुछ पल बाद उसने फोन रख दिया।

रुद्र ने पूछा—

"क्या हुआ?"

शिवाय ने अपनी जैकेट उठाई।

"जिस सुराग का इंतज़ार था... शायद वो मिल गया है।"

वह कमरे से बाहर निकल गया।

दो अलग-अलग तलाशें...

दो अलग-अलग रास्ते...

और दोनों को अभी ये अंदाज़ा भी नहीं था कि उनकी ज़िंदगी में एक-दूसरे की मौजूदगी धीरे-धीरे कितनी अहम होने वाली है।

अगली सुबह शक्ति अपने कमरे से निकलने की तैयारी कर रही थी।

अलिशा ने पूछा—

"दीदी, आज office चलना है?"

शक्ति ने सिर हिलाया।

"हाँ, लेकिन पहले एक जगह जाना है।"

"कहाँ?"

"एक witness से मिलना है।"

दोनों बाहर निकलने लगीं।

उधर दूसरी तरफ शिवाय भी अपने पुराने case से जुड़े एक व्यक्ति से मिलने के लिए घर से निकल चुका था।

उसे भी उसी इलाके में जाना था।

दोनों की मंज़िल अलग थी...

लेकिन रास्ता एक ही।

शक्ति अपनी कार में बैठी तो फोन फिर बज उठा।

Unknown number नहीं था।

इस बार वही अधिकारी था जिसे उसने गुप्त रूप से नंबर trace करने का काम दिया था।

"मैडम, एक नई जानकारी मिली है।"

शक्ति गंभीर हो गई।

"बोलो।"

"जिस नंबर से आपको call आया था, उसकी activity फिर से शुरू हुई है।"

शक्ति ने तुरंत पूछा—

"Location?"

अधिकारी ने location बताई।

शक्ति कुछ पल चुप रही।

"मैं वहीं जा रही हूँ।"

उसने फोन काट दिया।

शक्ति अब भी उसी कमरे में खड़ी थी।

खिड़की से आती हवा के कारण पर्दा लगातार हिल रहा था।

उसने एक बार फिर कमरे में नज़र दौड़ाई।

"कोई यहाँ था..."

उसका ध्यान अचानक मेज़ के नीचे पड़े एक छोटे से लिफाफे पर गया।

शक्ति ने लिफाफा उठाया।

उस पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—

"शक्ति"

वह कुछ पल उसे देखती रही।

फिर सावधानी से लिफाफा खोला।

अंदर एक छोटी-सी पर्ची थी।

उस पर लिखा था—

"तुम्हें लगता है तुम मुझे ढूँढ़ रही हो... लेकिन सच ये है कि मैं तुम्हें वहाँ ले जा रहा हूँ, जहाँ मैं चाहता हूँ।"

शक्ति की आँखें सिकुड़ गईं।



तभी बाहर से किसी गाड़ी के स्टार्ट होने की आवाज़ आई।

शक्ति तुरंत खिड़की की तरफ बढ़ी।

लेकिन जब तक उसने बाहर देखा...

गाड़ी वहाँ से निकल चुकी थी।

सड़क फिर से बिल्कुल शांत थी।

शक्ति कुछ पल उसी दिशा में देखती रही।

अब उसे एक बात साफ़ समझ आ चुकी थी—

ये सिर्फ़ एक केस नहीं था... कोई उसे जानबूझकर अपनी तरफ खींच रहा था।

शक्ति ने लिफाफा अपनी जेब में रखा और कमरे से बाहर निकलने लगी।

तभी उसका फोन बजा।

Unknown Number.

उसने तुरंत कॉल उठाई।

"कौन हो तुम?"

दूसरी तरफ़ वही धीमी आवाज़ आई—

"आप बहुत जल्दी जवाब चाहती हैं, शक्ति जी।"

शक्ति की आँखें सख्त हो गईं।

"“बस, तुमसे मिलने की तमन्ना है… बहुत हो गया तुम्हारा सामने आकर बात करो।"

कुछ पल खामोशी रही।

फिर जवाब आया—

"जल्द ही..."

कॉल कट गई।

शक्ति कुछ पल फोन को देखती रही।

उसे यकीन था—

अब अगली चाल उसकी नहीं, उस रहस्यमयी शख़्स की थी।
शक्ति के हाथ में अब वो नंबर था...

और दूसरी तरफ़ कोई ऐसा शख़्स था, जो हर कदम पर उससे एक कदम आगे चल रहा था।

लेकिन आखिर वो रहस्यमयी शख़्स चाहता क्या था?
और अगली चाल उसकी होगी... या शक्ति की?

जानने के लिए पढ़ते रहिए Shakti Ke Shiv...