Muhabbat Ek Sabaq - 17 Afariya Faruqui द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Muhabbat Ek Sabaq - 17

"ठीक है प्रॉमिस नही बताउंगी किसी को भी ,आप बताएं तो बात क्या है"??

वह curious सी बोली। 

"वह नादिया है ना तुम्हारी फ्रैंड …. . ..

रज़ा ने कह कर उसकी तरफ देखा

"उससे क्या काम पड़ गया आपको" ???

वह हैरान हो कर भाई की शक्ल देखने लगी। 

"वह अस्ल में ….….

रज़ा ने हिचकिचाते हुए अपनी बात पूरी की थी। 

"वॉव अम्मेज़िंग" !!!!

वह उसकी पूरी बात सुन कर खुशी से निहाल हो गई। 

"आप बेफिक्र रहिये, मैं किसी को कुछ नही बताउंगी बल्कि दादू से भी खुद ही बात कर लूंगी और मुझे पूरी उम्मीद है वह मना नही करेंगी मेरी बात को" !!! 

वह बे इंतेहा खुश हो कर बोली 

"थैंक्यू !! मुझे तुम्से यही उम्मीद थी"

रज़ा ने भी मुस्करा कर उसका शुक्रिया अदा किया था। 

"क्या बातें हो रही हैं भई , कौन सी पट्टियां पढ़ाई जा रहीं हैं मेरे भाई को मेरे खिलाफ़" ???

अनस उन दोनों बैठा देख कर वहीं आ गया। 

"तुम्हारे खिलाफ किसी को करने के लिये मुझे पट्टियां पढ़ाने की ज़रूरत नही है , उसके लिये तो तुम्हारी हरकतें ही काफ़ी हैं " !!! 

वह रज़ा के आगे से चाय का खाली कप उठाती खुद भी खड़ी हो गई। 

"हाााा , देखा भाई मुझ मासूम के बारे में कैसी बातें करती है यह"??? 

वह चेहरे पर ज़माने भर की मासूमियत ले कर बोला। 

"ओह्हो मासूम, इबलीस खुद मशवरे लेता है आ कर तुम्से तो रोज़ , तुम कब से मासूम हो गए" !!! 

"हां , और तुम भी तो रोज़ाना क़ोरमे , बिरयानी बना कर उसकी खिदमतें करती हो जब वह मुझसे मशवरे लेने आता है"

अनस के फटाक से जवाब पर रज़ा का बेइख्तियार क़हक़हा हवा में गूंजा था। 

"शर्म कर लो अनस तुम कुछ , अब निकाह होने वाला है तुम लोगो का अब तो ऐसे लड़ना बंद कर दो इस से"

रज़ा ने भाई को घूर कर कहा। 

"तो यह बात आप अपनी बहन को भी समझाऐं ना कि मैं इसका होने वाला मजाज़ी खुदा हूं , तो थोड़ी तमीज़ से पेश आया करे" !!! 

"ओह्हो होने वाले मजाज़ी खुदा फॉर यौर काइंड इंफॉरमेशन मेरी बहन ऑलरेडी बहुत समझदार है समझने की ज़रूरत उसे नही तुम्हें है" !!! 

रज़ा खड़े होते हुए बोला तो शिफ़ा के लबों पर भी एक बेसाख्ता मुस्कुराहट आई थी

"बहुत बुरी बात है भाई वैसै , आपने अभी से पार्टी बदल ली"

अनस ने दुहाई दी। 

"हां तो अब ध्यान रखना मुझे परेशान करते हुए क्योंकि मेरी पोज़िशन मज़बूत है"

वह उसे अँगूठा दिखाती हुई भाग ली तो अनस भी हँस दिया। 

☆ ☆ ☆

"पापा वह यूनिवर्सिटी ट्यूज़ डे से ओपन हो रही है। रात नादिया का कॉल आया था, उसने बताया है"

नाशते की मेज़ पर सब इकट्ठे बैठे थे जब उसने बाप को इत्तेला दी थी। 

"हाँ तो कोई बात नही , वैसे भी निकाह तो जुमे को है तो तुम पीर तक चली जाना हैदराबाद" !!! 

जवाब पापा के बजाए दादू ने दिया। 

"जी ठीक है " !!! 

निकाह की बात पर वह झेंप कर नाशते की तरफ मुतवज्जह हो गई तो सब मुस्कुरा दिये। 
"ठीक है मैं मन्डे की टिक्टस देख लेती हूं फिर" !!! 

  वह टिशू पेपर से हाथ साफ करके उठते हुए बोली। 
"शिफ़ा बात सुनो"

"जी" .? ??

वह बाप की आवाज़ पर सवालिया नज़रों से उन्हें देखने लगी थी। 
"तुम्हें जो सामान भिजवाना है हैदराबाद वह पैक कर लेना। भाई साहब और अदील जा रहे हैं आज वहीं, वह लेते जाऐंगे" !! 

आसिम साहब ने उसे उठते देख कर कहा। 

"जी ठीक है" !!! 

वह हां में सर हिला कर दादू की तरफ मुतवज्जह हो गई जो उसे उठने के लिये इशारा कर रही थीं। 

"चलें" !!! 

उनको सहारा दे कर उठाते हुए वह उनके कमरे में ले आई। 

"जीती रहो खुश रहो" !!! 

बैड पर उन्हें तकियों के सहारे से बैठाने के बाद वह भी उन्ही के बराबर बैठ गई तो उन्होंने उसका माथा चूमते हुऐ उसे दुआऐं दी थी। 
"दादू एक बात करनी थी आप से" !! 

उसने कुछ सोचते हुए कहा। 
"हाँ हाँ बोलो बच्चे" ??

उन्होंने हमेशा वाली मुहब्बत के साथ कहा। 
"दादू आपको मेरी फ्रैंड नादिया याद है वह जो उस दिन दावत पर आई थी फैमिली" ???  

उसने पूछा। 
"हां याद है वह बच्ची और उसकी अम्मी भी माशाअल्लाह अच्छे खानदानी घराने से लग रहे थे सब लोग , लेकिन तुम क्यों पूछ रही हो"??  

वह उसकी बात का मतलब नहीं समझी थीं। 
"उसकी कज़िन भी थी साथ में वह कैसी लगीं आपको " ???

उस ने पूछा। 

"वह्ह क्या भला सा नाम था उसका" ??? 
दादू ज़हन पर ज़ोर डाल कर याद करने लगीं। 
"ज़रनिश" !!! 

उसने याद दिलाया। 
"हाँ हाँ , बड़ी ही प्यारी बच्ची है ,देख कर ही अँदाज़ा हो जाता है कि किसी शर्म हया वाली माँ की औलाद है" !! 

दादू बहुत मुहब्बत से ज़रनिश का ज़िक्र करते हुए बोल रही थीं। 
"दादू अगर वह प्यारी सी बच्ची हमेशा के लिये आपके पास आ जाए तो कैसा रहेगा". ??? 
"ऐह्हे , कोई भला क्यों भेजेगा अपनी बच्ची को हमारे पास वह भी हमेशा के लिये । और फिर बच्चियां तो पराया धन होती हैं हमेशा के लिये तो वह उनके पास भी नही रहेगी" !!! 

  दादू उसकी बात का मतलब नही समझी थीं। 

"अरे मेरी भोली दादू, मेरे कहने का मतलब है कि हम रज़ा भाई के लिये ज़रनिश आपी के पेरेंट्स से बात कर के देखें क्या" ???

उस ने अब की बार सीधे सीधे पूछा। 
"अरे लेकिन बेटा ऐसे कैसे , पहले रज़ा से और उसके माँ बाप से तो पूछो" ??? 

दादू को लगा उसे खुद को ज़रनिश पसंद आई है इसलिये बोल रही है। 
"रज़ा भाई के कहने पर ही मैं आप के पास उनकी यह फरियाद ले कर आई हूं दादू। बाक़ी बड़े पापा और बड़ी अम्मी से बात आप करें "

उसने बात पूरी की। 
"ऐसी बात है , लेकिन वह बिलकुल अंजान लोग हैं तो यूं इस तरह अचानक" ???

दादू सोच में पड़ गईं। 
"अरे इतना क्या सोच रही हैं दादू , आपने ही तो कहा अभी कि वह लोग खानदानी लग रहे थे तो खानदानी लोगों की तो जान पहचान निकल ही जाती है आप मालूम तो कराएं" !! 

वह रज़ा से किया अपना वादा पूरा करने की कोशि़श कर रही थी। 
"ठीक है , मैं बात करती हूं तुम्हारे बाप और ताया से आज ही शाम को"

उन्होंने हामी भरते हुए कहा। 
"लेकिन दादू शाम में बड़े पापा तो हैदराबाद जा रहे हैं"

उसने याद दिलाया था। 
"हाँ यह भी है " !!!! 

दादू कुछ सोच में पड़ गयीं। 
"चलो मैं कौसर से बात करती हूं असद का नम्बर तो बहुत बाद में आएगा। वैसे भी यह मुआमलात औरतों के तय करने के होते हैं तो एक बार तुम्हारी माँ और ताई ऐसे ही हो आऐंगी वहाँ एक बार घर बार भी नज़र में निकल जाएगा फिर सब सही लगा तो असद से बात कर के रिशता दे देंगे"

दादू ने बहुत सोचने के बाद इसका हल निकाला था। 
"ठीक है दादू जैसे आप ठीक समझें …. . … 
वह सरशार सी हो कर उनके हाथ चूमने लगी थी। 

☆ ☆ ☆

असद साहब और अदील हैदराबाद पहुँच चुके थे। शहरयार ऐयरपोर्ट पर उन को रिसीव करने पहुँचा तो वह उसके इंतेज़ार में ही बैठे थे। 
"अस्सलामु अलेयककुम मामू जान" ….. .. .. 
वह बड़ी गर्म जोशी के साथ असद साहब से मिला था। 
"वालेयकुम अस्सलाम , और कैसे हो बरखुर्दार" ??? 
उनहोंने भी मुहब्बत से भांजे को गले लगाया। 
"बस आप लोगों की दुआंए है अल्हमदोलिल्लाह, 
आप बताऐं अदील भाई सब खैरियत"…… ..

 अब वह अदील की जानिब मुड़ कर पूछने लगा था। 
"हां भई सब खैरियत है , तुम बताओ बड़े डैशिंग लग रहे हो माशाअल्लाह" …….  

अदील ने छेड़ कर कहा तो वह झेंप कर मुस्कुरा दिया। 
"गाड़ी बाहर खड़ी है आ जाएं आप लोग"…… .. .

वह सामान उठाते हुए बोला। 
"हां हां चलो" ….

वह लोग भी उसके साथ चल दिये। 
"भाई आप लोग अकेले आए हैं , वह मेरा मतलब है शिफ़ा की यूनिवर्सिटी भी तो ओपन होने वाली हैं ना वह नही आईं"……. . ?? 

उसने अपना लहजा सरसरी सा बनाकर पूछा। 

"हां वह बाद में आएगी अनस के साथ। हम लोग तो फुप्पो से बात करने आए थे तो सामान ले आए हैं उसका" ….. .. ………..

अदील ने जवाब दिया तो उसने भी हां में सर हिला कर पूरा कॉनसेंट्रेशन ड्राइविंग की तरफ कर लिया। 


☆ ☆ ☆