Muhabbat Ek Sabaq - 3 Afariya Faruqui द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Muhabbat Ek Sabaq - 3

हैदराबाद पहुंचे तो एयरपोर्ट पर आमना बेगम का ड्राइवर पहले से मौजूद था, जो काफी पुराना और सब को जानता भी था। आज भी आसिम साहब को देखते ही खुश हो गया।
"कैसे हो शौक़त मियां ?", 
आसिम साहब ने लगेज बैग ड्राइवर को पकड़ाते हुए उससे हाल चाल पूछा।
"बस आप सब लोगो की दुआएं है साहब जी।"
ड्राइवर ने सामान गाड़ी में रखने के बाद अब उनके बैठने के लिए दरवाज़ा खोला।
कार में बैठने के बाद आसिम साहब तो ड्राइवर से बातों में बिज़ी हो गए जबकि वह खिड़की से बाहर देखते हुए अनस के बारे में सोच रही थी जो आज उसके आने वक़्त कुछ ज़्यादा ही उदास था।
“जल्दी आना मैं इंतेज़ार करूंगा तुम्हारा”,
सबसे मिलने के बाद जब वह रूम में अपना बैग लेने आई तो अनस भी उसके पीछे पीछे आ गया।
“क्या हो गया है अनस ,शहर से बाहर ही जा रही हूं मुल्क से नही। जो तुम यूं बिहेव कर रहे हो”,
वह उसके यूं एक ही बात को बार बार रिपीट करने से चिड़ गई।
“अच्छा ना सॉरी......नही कहता अब, लेकिन पहुंच कर टेक्सट ज़रूर कर देना”,
उसने आदत के खिलाफ़ बहस किए बिना ही सॉरी बोला तो शिफ़ा कुछ हैरान हुई थी।
“यह बात भी तुम सुबह से पचास बार रिमाइंड करा चुके हो”, 
वह एक बार फ़िर खफ़गी (नाराज़गी) से बोली।
“ठीक है अब पक्का कुछ नही बोलूंगा लेकिन मैने जो कहा था, उस पर ग़ौर ज़रूर करना”,
वह उसके हाथ से बैग लेकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ा था।
"क्या कहा था?",
वह कुछ बेध्यानी में पूछने लगी।
"कुछ नही.....जल्दी आओ वरना फ़्लाइट मिस हो जाएगी तुम्हारी।",
उसने जल्दी जल्दी सीढ़ियां उतरते हुए शिफ़ा को कहा था। 


☆ ☆ ☆


घर के पोर्च में हल्के से झटके के साथ कार रूकी तो उसकी सोचों को भी ब्रेक लगा था।
"चलो भई आ गया घर", आसिम साहब ने कहा तो वह अस्बात (हाँ) में सर हिला कर अपनी साइड का डोर खोलती उतर गई।
"अस्सलामु अलेयकुम फुप्पो", 
वह आमना बेगम को देखते ही बेइख्तियार उन के गले लग गई।
“वालेयकुम अस्सलाम फुप्पो की जान! कैसा है मेरा बच्चा???”,
फुप्पो ने उसका माथा चूमते हुए हमेशा की तरह बहुत मुहब्बत के साथ जवाब दिया।
“बिलकुल ठीक फ़िट फ़ाट आपकी दुआओं से”,
उसने एक जानदार मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया।
“आसिम कहां है?”
आमना बेगम भाई को ना पा कर पूछने लगीं।
“जी वह शायद ड्राइवर के साथ आ रहे हैं”,
वह जवाब देने के बाद अब दादू की तरफ मुड़ कर सलाम दुआ करने लगी।
“शिफ़ा, बेटा तुम लोग जाकर फ्रैश हो जाओ फिर मैं खाना लगवा देती हूं खाना खाकर थोड़ा आराम कर लेना थक गए होंगे”,
आसिम साहब से बाक़ी घरवालों का हाल चाल पूछने के बाद आमना बेगम अब उसकी तरफ़ मुड़ी थीं।
“जी फुप्पो!”, वह अपना हैंड बैग सम्हालती खड़ी हो गयी।
कमरे में आकर उसने सबसे पहले अम्मी को फोन करने के लिए बैग से मोबाइल निकाला तो अनस की चार मिस्ड कॉल्स देख कर माथा पीट लिया।
"एक तो यह पता नही क्यों मेरी अम्मी बना हुआ है।",
वह उसे कॉल बैक करते हुए मुंह ही मुंह में बड़बड़ाई थी।

"कहां हो तुम यार इतने कॉल्स कर लिए एक भी रिसीव नही किया तुमने",
अनस कॉल रिसीव करते ही आदत के मुताबिक़ शुरू हो गया।
“वाइब्रेट रहता है मेरा फोन हमेशा, पता है तुम्हे, और जंग पर नही आई हूं मैं। जो तुम्हें मेरे शहीद होने का खतरा लाहक़ हो गया है। पापा के साथ आई हूं कोई अकेली नही कि कोई उठा कर ले जाएगा”,
उसे उसके इन सवालो से चिढ़ होती थी।
“किस टाईम पहुंची थी?”,  
वह उसकी नागवारी को खातिर में ना लाते हुए बोला।
"अभी कुछ ही देर हुई है",
उस का मूड लगातार बिगड़ा हुआ था।
“अच्छा यह मूड ठीक करो और रेस्ट करो मैं बाद में करता हूं बात। अभी एक अर्जेंट काम है”,
उसे वाक़ई कोई काम था शायद तब ही इतनी जल्दी बात खत्म कर दी, वरना वह इतनी जल्दी पीछा छोड़ने वालों में से नही था।
वह अल्लाह का शुक्र अदा करती उसका कॉल काट कर अब अम्मी को लगाने लगी थी।


☆ ☆ ☆

फज्र की नमाज़ अदा करने के बाद उसने कुछ देर तिलावत की। फिर क़ुरआन शरीफ़ मेज़ के साथ लगे शेल्फ में रखने के बाद और सोने का इरादा छोड़ कर लॉन में चली आई।

फुप्पो के पूरे घर में यह लॉन वाला पोर्शन उसे सबसे ज़्यादा पसंद आया था। जहां बैठ कर आँखो के साथ-साथ दिमाग़ को भी ताज़गी मिलती थी। दूर तक फैली हुई घास को बड़े ही खूबसूरत तरीक़े से स्कवायर शेप में कट करके डिज़ाइन बनाया गया था। घास के चारो साइड डबल बाउंड्री करके उसको क्यारी का स्टाइल दे कर बारीक पत्थरों से भर कर बीच बीच में छोटे -छोटे पौधे भी लगाए गए थे। जो लॉन की खूबसूरती को मज़ीद बढ़ा रहे थे। दाएं तरफ लगी वुडन वॉल पर चलने वाली क़िस्म- क़िस्म की बेलें ऐक अलग ही लुक दे रही थीं।

वॉल से कुछ फासले पर एक गार्डन स्विंग और दूसरी तरफ बैठने के लिये विकर सोफा रखा गया था। और सुबह की हल्की हल्की ठंडक ने माहौल को और ज़्यादा ख्वाबनाक सा बना दिया था। वह कुछ देर के लिए उस माहौल में खो सी गई।

“शिफ़ा बीबी......”,
वहां से गुज़रती मुलाज़िमा (नौकरानी) ने उसको यूं बेखुद सा खड़े देख कर आवाज़ दी।
“हां???”,
वह चौंक कर पलटी थी।
"कुछ चाहिये आपको?"
"हां चाय ला दो प्लीज़",
वह थोड़ा रूक कर बोली।
“ठीक है छोटे साहब को यह चाय दे आऊं। फिर आपको ला कर देती हूं”,
मुलाज़िमा ने हाथ में पकड़ी ट्रॉली की तरफ़ ईशारा किया।
"छोटे साहब कौन?",
उसने सवालिया नज़रों से उसे देखा।
“जी वह बेगम साहिबा के बेटे शहरयार साहब हैं ना”
“शहरयार घर पर है ???”,
उसने हैरानगी से मुलाज़िमा को देखा। क्योंकि तक़रीबन ऐक हफ्ता हो गया था। उसको यहां आए और शहरयार से उसका अब तक खाने की मेज़ पर भी कभी सामना नही हुआ था। वह तो यही समझी कि वह शायद मुल्क से बाहर गया हुआ है।
"जी कल रात ही आए हैं छोटे साहब। सब सो चुके थे जब वह आए",
मुलाज़िमा ने बताया।
वह आगे और कु़छ पूछती कि मोबाइल रिंग कर उठा।
"अच्छा ठीक है तुम जाओ और चाय ज़रा जल्दी भेज देना",
वह मुलाज़िमा को कहती फोन अटैंड करने लगी।

☆ ☆ ☆

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