अहमद मन्ज़िल शफीक़ अहमद की मल्कियत थी। पुरानी लेकिन बेहद आलीशान हवेली, जिसके बड़े-बड़े सहन, ऊँची छतें और लकड़ी की नक्काशी वाले दरवाज़े दूर से ही उसकी शान बयान कर देते थे। घर के बाहर लगे चमेली और मोगरे के पौधे हर शाम अपनी खुशबू से पूरा माहौल महका देते। यह घर सिर्फ ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि रिश्तों, मोहब्बतों और हँसी से आबाद एक दुनिया था। इस घर में शफीक़ साहब अपनी बेगम ज़ोहरा और दो बेटों असद अहमद और आसिम अहमद के साथ रहते थे।
शफीक़ साहब और ज़ोहरा बेगम को हमेशा से एक बेटी की बहुत ख्वाहिश थी। हर ईद, हर दुआ और हर नमाज़ में वह अल्लाह से एक बेटी माँगते थे, लेकिन उनकी गोद दो बेटों के बाद भी खाली रही। वक्त ने उनकी यह ख्वाहिश आमना की शक्ल में पूरी कर दी।
आमना शफीक़ साहब के मरहूम (मरे हुए) दोस्त अदीब साहब की बेटी थी। जिसकी माँ उसकी पैदाईश के वक़्त चल बसीं थीं। अदीब साहब अपनी एकलौती बेटी को नौकरों के हवाले नही करना चाहते थे इसलिये ऑफिस जाने से पहले उसे ज़ोहरा बेगम के पास छोड़ जाते और ऑफिस से आकर घर ले जाते थे और आमना सात साल की थी कि अदीब साहब की भी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई और यूं आमना मुस्तक़िल तौर पर अहमद विला में आ गई। आमना को भी ज़ोहरा बेगम से मां की ही तरह मुहब्बत थी और असद और आसिम दोनो भी उसे सगी बहन की तरह चाहते थे। उसकी एक आवाज़ पर दोनो हाज़िर हो जाते।
वक़्त गुज़रता गया बच्चे बड़े हुए असद की शादी उसकी मामूज़ाद कौसर से और आसिम की शादी ज़ोहरा बेगम की ख्वाहिश पर उनकी दोस्त की बेटी नादिरा से हो गई। आमना के लिए शफी़क़ साहब की फुप्पो ने अपने बेटे के लिए ख्वाहिश की और वह इंकार नही कर सके और यूं आमना ब्याह कर हैदराबाद चली गईं।
आमना के जाने के बाद घर एक बार फिर बेटी जैसी नेअमत से खाली हो गया।असद के एक के बाद दीगरे तीन बेटे अदील रज़ा और अनस हुए। ऐसे में आसिम के यहां लड़की की पैदाईश उनके लिए किसी रहमत से कम ना थी। सुतवां नाक और फूले फूले गालों वाली यह बच्ची घर भर की लाडली थी। जिसका नाम ज़ोहरा बेगम ने बड़े प्यार से शिफ़ा रखा था। हालांकि शिफ़ा के बाद आज़मीन और हसन ने भी बारी बारी उस घर को रौनक़ बख्शी लेकिन उस की जगह कोई ना ले पाया था।
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“सुना है तुम फुप्पो के यहां जा रही हो वह भी दो साल के लिए???”,
वह कबर्ड सैट कर रही थी कि अनस की आवाज़ पर पलट कर देखा
“फुप्पो के यहां नही जा रही हूं मैं, पढ़ने जा रही हूं वहां पर!!!”,
वह कह कर अपने काम में बिज़ी हो गई।
“हाँ तो एक ही बात है ना, यहां तो नही रहोगी तुम”,
उसके लहजे से अफसोस साफ़ ज़ाहिर था।
“हां तो तुम्हे क्या मसला है ???”,
उसने सर उठा कर अनस को देखा जहां हमेशा वाली मज़ाक़ की बजाए आज संजीदगी छायी हुई थी।
“तुम यहां से भी तो कर सकती हो एम० सी० ए!!”,
वह किसी भी तरह उसको रोकने पर तैयार था।
“यहां मेरे सब्जेक्टस अवेलेबल नही है तुम जानते तो हो!!!”,
उसे उस की बातों से उलझन हो रही थीं।
“तो सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग ज़रूरी है???”
“हां ख्वाब है मेरा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना। now please leave this topic Because I don’t want to talk about this anymore”,
उसने फाइनल अंदाज़ में कह कर बात खतम कर दी।
“और बाई द वे तुम्हे तो खुश होना चाहिये कि मुझसे जान छूट रही है अब तुमसे कोई लड़ेगा भी नही ना तन्ज़ करेगा!!!”,
उसने अनस का मूड सही करने की कोशिश की थी
“यही लड़ाईयां और शरारतें तो याद आंएगी”,
वह और ज़्यादा सीरियस हुआ।
“परेशानी क्यों है तुम्हे मेरे जाने से इतनी???”,
उसने कबर्ड सैट करने के बाद अब उसका दरवाज़ा बन्द किया था।
“बस मैं नही चाहता कि तुम मुझसे इतनी दूर जाओ”,
इस बार अनस ने सीधा उसकी आँखो में झांका।
“लेकिन मैं चाहती हूं वहां जाना और इतना काफी है मेरे लिए”,
उसने अपनी बात पर ज़ोर दिया।
“मुझे मुहब्बत हो गई है तुमसे”,
उस के बड़े इतमीनान से किये गये इज़हार पर शिफ़ा का मुंह खुला रह गया था
“इस में इतना बड़ा मुंह खोलने की भी कोई ऐसी ज़रूरत नही थी”
अनस ने उसका रिएक्शन Enjoy किया था।
“उठना ज़रा खड़े होना तो”
वह अपनी हैरत पर क़ाबू पाकर उसकी तरफ आई थी।
“क्या हुआ ????”,
वह उसके अचानक यूं कहने पर कुछ ना समझते हुए खड़ा हो गया।
“वह रहा दरवाज़ा, अब दफ़ा हो जाओ यहां से और आइंदा यह सड़क छाप आशिक़ो वाली हरकत की होगी। मेरे सामने तो यह तुम्हारे सर में दे कर मारूंगी!”,
उसने हाथ में पकड़ी आज़मीन के कोर्स की एक बहुत मोटी किताब की तरफ इशारा किया।
उसका कुछ पता भी नही सच में ही मार देती
अनस मौक़ा ग़नीमत जानकर चुपचाप बाहर निकल गया।
“बड़े बे आबरू हो कर तेरे कूचे से निकले हम”,
उसने बाहर निकलने से पहले उसकी तरफ देखते हुए मिस्कीन सी शक्ल बना कर शेर पढ़ा था।
“तुम्हारे क़ुल पक्के हैं आज ,रूको तुम”,
वह दाँत पीस्ते हुए बड़े ही खूंखार अंदाज़ में उसकी तरफ बढ़ी थी।
“जा रहा हूं पर मेरी बात पर ग़ौर करना ज़रूर एक बार।“ वह जाते जाते कह कर गया था।
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अदील ने अपने दोस्त के साथ मिलकर पार्टनरशिप में बिज़निस शुरू किया था। जो अल्लाह के फ़ज़ल से बहुत अच्छा जा रहा था। रज़ा ने भी बी० एड० करने के बाद गवर्नमेंट टीचिंग के लिए अप्लाई कर दिया था और जिस ऐरिया में उसकी पोस्टिंग हुई वह अहमद विला से काफी दूर पड़ता था तो मजबूर होकर असद साहब और कौसर बेगम को घर अलग शिफ्ट करना पड़ा। अनस बैंकिंग एण्ड फाइनेंस से एम० कॉम कर रहा था। इधर शिफ़ा ने बी० सी० ए० के बाद अब हैदराबाद से एम० सी० ए० करने की बात कही तो साफ इंकार हो गया क्योंकि दादू समेत कोई भी अपनी लाडली को दो साल के लिए इतनी दूर भेजने को तैयार नही था। बड़ी मुशकिलो से मिन्नतो खुशामदों और इमोशनल बलैकमेलिंग के बाद जाकर उसको जाने की इजाज़त मिली थी। आज़मीन ट्रेवल एण्ड टूरिज़म से बी० ए० ऑनर्स कर रही थी और हसन अभी मैट्रिक में था।
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