Muhabbat Ek Sabaq - 5 Afariya Faruqui द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Muhabbat Ek Sabaq - 5

“क्या टाइम हो रहा है ???”,

उसने थके थके से अंदाज़ मे बैग टेबल पर रखते हुए पूछा|मैडम राबेआ के पीरिएड से फ़ारिग़ हो कर वह दोनो अभी अभी कैंटीन आईं थीं|

“बारह बज रहे हैं”,

नादिया ने रिस्ट वॉच देखे बगैर ही बताया|

“तुम्हारी आई साइट वीक हो गई हैं या तो फिर तुमहारी रिस्ट वॉच के सैल, क्योंकि एक बजे तो मैडम का पीरिएड होता है और आज तो उनहोंने एक्सट्रा टाइम लिया है”,

उसने याद दिलाया|

“मैं रिस्ट वॉच की नही तुम्हारी शक्ल की बात कर रही हूं”,

नादिया समोसे और कोक का ऑर्डर देने के बाद अब उसकी तरफ मुतवज्जह हुई थी।

“घर में शहरयार अहमद जैसी हस्ती मौजूद हो ना तो शक्ल पर बारह ही बजते हैं “,

उसने किल्स कर जवाब दिया।

“क्यों? अब क्या ड्रैक्यूला का मास्क पहन कर डरा दिया उन्होंने तुम्हे ???”,

नादिया ने शरारत से पूछा

“उस बन्दे को मास्क की क्या ज़रूरत है, वह तो खुद ही पूरा का पूरा जिन्नात है”

वह पहले ही जली भुनी बैठी थी नादिया के पूछने पर एक दम बरस पड़ी।

“बताओ तो सही फिर कि यह जली हुई फुप्पो क्यों बनी बैठी हो???”

नादिया ने उस को कूल करना चाहा।

“इस बन्दे ने मुझे शर्मिंदा करने का ठेका लिया हुआ है”,

उसका बस नही चल रहा था कि शहरयार अहमद को कच्चा चबा जाए।

“क्यों क्या हुआ है भी ???”,

नादिया ने समोसे के साथ पूरी इमानदारी से इंसाफ करते हुए पूछा तो वह उसे कल रात का वाक़ेआ बताने लगी।


डिनर के बाद सब अपने अपने कमरो में चले गए जबकि वह वॉक करने के इरादे से लॉन में आ गयी थी। ठंडी -ठंडी हवा इस वक़्त उसे किसी नेअमत से कम नही लग रही थी।

वॉक करते अभी कुछ ही देर हुई थी कि अचानक उसे वुडन वॉल की साइड कुछ हलचल महसूस हुई। वहां तक लाइट भी पूरी नही पहुंच रही थी क्योंकि ज़्यादातर लाइटस बंद हो चुकी थीं। सही से कुछ दिखाई भी नही दे रहा था उसका नन्हा सा दिल डर के मारे उछल कर हलक़ में आ गया। सोचा आवाज़ दे कर सबको उठा दे, लेकिन अगले ही पल उस के दिमाग़ में ख्याल आया,

" क्या पता यह सब सिर्फ मेरा वहम हो और ख्वामख्वाह ही सब परेशान हो जाएं"

मदद के लिये उसने चारो तरफ देखा सब सर्वेंटस भी जा चुके थे। उसने वहां रखा माली काका का डंडा उठा लिया। पास में कुछ मिट्टी भी पड़ी हुई थी जिसको शायद नये पौधे लगाने के लिये गीली किया गया था। वह बहुत आहिस्ता से सभंल कर पैर जमाते हुए वॉल की तरफ बढ़ी थी।


वह दोनो हाथो को आपस में मलता हुआ इधर से उधर राउंड कर रहा था। शायद थोड़ी और देर होने का इंतज़ार कर रहा है ताकि चोरी करने में आसानी रहे।

“बताती हूं अभी इसे!!!!”

उस चोर को वॉक करते हुए उसी तरफ आते देख कर उसने डंडे का एक ज़ोरदार निशाना उसकी टांगो की तरफ लगाया और खुद साइड हो कर खड़ी हो गई।

“उफ्फ खुदा!! कौन इडियट है यह ??”

, उसकी ज़ोरदार आवाज़ शिफ़ा की हालत खराब करने के लिये काफ़ी थी।

“ओफ्फोह!!! शहरयार अहमद है यह तो”,

उसने माथे पर हाथ मारते हुए दिल ही दिल में खुद को कोसा। ना जाने कौनसी घड़ी थी जब उसने यह होशियारी करने का सोचा।

“निकल लेती हूं इससे पहले कि वह मुझे देख ले!!!”,

इस ख्याल के आते ही वह जल्दी से मुड़ी थी और इस जल्दी के चक्कर में पास पड़ी गीली मिट्टी पर पांव पड़ा और सभंलते सभंलते भी वह बहुत ज़ोर से गिरी थी।

“उफ्फ अल्लाह!!!!!”,

वह दर्द से बिलबिलाते हुए अपना पांव पकड़ कर वही बैठ गई।

“कौन है ??”,

शहरयार आवाज़ सुन कर वही आ गया।

“आप यहां क्या कर रही हैं?”, ???

उसे पावँ सहलाते देख कर उसने सवाल किया।

“जी वह वॉक करने आई थी!!!”

“मिट्टी में बैठ कर कौनसी वॉक होती है ???”

, उसने कुछ हैरानी से पूछा।

“मैं वॉक करने आई थी और यहां मिट्टी में फिसल गई”,

वह अब तक अपनी नर्वस नेस पर काफी हद तक काबू पा चुकी थी।

“तो फिर यह कारनामा भी आप ही ने अंजाम दिया होगा, है ना ??”,

शहरयार ने हाथ में पकड़े डंडे की तरफ इशारा किया।

“कौन सा कारनामा ??”,

वह अपने सूजे हुए पावं पर ज़ोर देकर खड़े होने की नाकाम कोशिश के साथ ही साफ मुकर गई।

“यही मुझे यह डंडा मारने वाला कारनामा, एण्ड फॉर यौर काइंड इन्फॉर्मेशन आप के अलावा और कोई है भी नही यहाँ। जो इस क़िस्म की फिज़ूल हरकत करे!!!” 

वह अभी तक अपनी टाँग को सहला रहा था।

“तो आप को किसने कहा था कि चोरो की तरह अंधेरे में जा कर वॉक करें”,

शिफ़ा ने अपनी गलती माने बग़ैर सारा इलज़ाम उस पर डाला, तो उस के सर से लगी और तलवों में बुझी थी।

“क्या मुसीबत है सर का दर्द सही नही हो रहा था अब टाँग के दर्द से निपटो, पता नही किस क़िस्म के लोग हैं घर में”,

वह गुस्से में तन फन करता हाथ में पकड़े डंडे को वही फेंक कर चला गया।

“बिल्कुल ठीक नाम रखा है मैने हिटलर की ज़ीरॉक्स! पता नही समझते क्या हैं खुद को! खडूस! हिट्लर! जल्लाद!”,

उसने बमुश्किल खड़े होते हुए उसे और नये नामो से नवाज़ा और सूजे हुए पांव के साथ लगंड़ाती हुई अपने कमरे की तरफ चल दी।

पूरी बात बताने के बाद उसने नादिया की तरफ देखा जो नॉन स्टाप हसें जा रही थी।

“हसंना बंद कर दो तुम और यह बताओ मेरी गलती कहां है इसमें ? मेरी जगह कोई और होता तो वह भी तो यही करता”,

वह चिढ़ कर बोली।

“अच्छा सॉरी ………..मुझे तो यह समझ नही आ रहा है कि शहरयार भाई के उस बिहेव पर अफसोस ज़ाहिर करूं या तुम्हारी बेवक़ूफी पर?????”,

नादिया बहुत मुश्किल से अपनी हँसी कंट्रोल करते हुए बोली थी।

“दफा हो तुम!!!!”,

वह गुस्से से अपना बैग उठा कर खड़ी हो गई।

“अच्छा ना सॉरी , नही कहती कुछ बस बैठो तुम!!!!”,

नादिया ने उसका हाथ खींच कर ज़बरदस्ती बैठा लिया तो वह मुंह बना कर बैठ गई।

“मुंह का ऐंगल तो सही कर लो अब यह, ऐसा लग रहा है जैसे किसी मार कूट कर बैठाया है तुम्हें!!!”,

उसने शिफ़ा का मूड सही करने की कोशिश की।

“और जैसे भूके नदीदो की तरह तुम पहले समोसे और अब यह बिरयानी खा रही हो ना ऐसा लग रहा है कि महीनो के फाक़े से हो”,

उस ने भी तपाक से जवाब दिया।

“महीनो के तो नही हां दो टाइम के तो फाक़े से हूं”,

नादिया आखिरी निवाला खाते हुए बोली।

“क्यों ???”,

वह हैरान हुई।

“रात करेले बने थे तब नही खाया। मैंने फिर आज सुबह भी अम्मी ने वही दिये मैंने मना किया तो सुनने को मिला कि लड़कियों को तो सब खाने की आदत होनी चाहिये ,क्या पता ससुराल जाकर क्या क्या खाना पड़े!!!!”

बिरयानी खत्म करने के बाद उस ने अब कॉफी का ग्लास हाथ में उठा लिया।

“क्यों भई , अफ्रीका के जगंलो में करेंगी क्या वह तुम्हारी शादी ???”

“शादी का तो पता नही फिलहाल क्लास में चलो, क्योंकि सर अशफाक़ आ गये तो वह वाक़ई भेज देगे अफ्रीका। अगर हम क्लास में लेट पहुचे तो”,

नादिया बिल पे करने बाद अब बैग उठा कर खड़ी हो गई तो वह भी साथ हो ली।

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