Muhabbat Ek Sabaq - 16 Afariya Faruqui द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Muhabbat Ek Sabaq - 16

"अम्मी आप फ्री हैं" ??

 आज रूटीन के मुताबिक़ शहरयार वॉक करने के बजाए माँ के कमरे आया तो आमना बेगम दिल से निहाल हो गईं। 

"हां बेटे फ्री हूं आओ आओ"

वह बराबर में बेटे के लिये जगह बनाती हुई बोलीं

"क्या बात आज वॉक के लिये नही गये" ???

उनहोंने उसके बालों में हाथ फेरते हुए पूछा। 

"नहीं , आज दिल नही चाह रहा था बस"

"क्या हुआ चंदा , तबियत ठीक है तुम्हारी" ???

उन्हें फिक्र हुई । 
"जी अम्मी बिल्कुल ठीक है तबियत आप फिक्र ना करें"। 

उसने मां का हाथ अपने दोनों हाथों में लेते हुए कहा। 
"नाशता कर लो फिर पहले चलो" !!! 

वह खड़े होते हुए बोलीं । 

"अम्मी प्लीज़ बैठें , मुझे ऐक ज़रूरी बात करनी है आपसे"

उसने माँ को दोनो काँधों से पकड़ कर पास बैठा लिया। 

"कैसी ज़रूरी बात" ???

आमना बेगम आज उसके बिहेवियर पर बहुत हैरान थीं। 

"आप ने कुछ दिन पहले मुझसे एक सवाल किया था कि अगर मैं किसी को पसंद करता हूं तो बता दूं आपको कोई एतराज़ नही होगा" !!! 

शहरयार ने लाग लपेट किये बग़ैर बात शुरू की थी। 
"हां बेटे याद है मुझे , बताओ अगर कोई पसंद है तुम्हें मुझे और तुम्हारे पापा को बिलकुल कोई एतराज़ नही होगा" !!! 

आमना बेगम के चेहरे से बेइंतेहा खुशी झलक रही थी। 

"पापा की तो आप बात ना करें उनहें तो मुझसे कोई मतलब ही नही है व्हाट ऐवर आई डू। और मुझे भी कोई फर्क़ नही पड़ता कि वह क्या चाहते हैं" !!! 

उसका लहजा बाप को ले कर हमेशा यही रहता था। 

"शेरी बहुत बुरी बात है ऐसे कहोगे तुम बाप के बारे में" !!! 

उन्होंने नाराज़गी से बेटे को देखा। 

"सॉरी अम्मी लेकिन वह ऐसे ही हैं, खैर लीव इट आप यह बताएं आपको तो कोई मसला नही है , अगर आपकी बहु मैं खुद पसंद कर लूं "

वह शरारत से माँ को देखते हुए मुस्कुराया। 

"अब पूछ रहे हो जब पसंद कर भी लिया" 

उन्होंने भी झूट मूट नाराज़गी दिखाई थी। 
"अरे अम्मी!!मेरी पसंद से आप मिलेंगी तो आप भी खुश हो जाऐंगी आई प्रॉमिस यू" !!! 

शहरयार को पहली बार उन्होंने इतना एक्साइटेड देखा था इसलिये वह भी उस लड़की से मिलने को बेताब थीं। 

"अच्छा जी तो फिर जल्दी बताओ कौन है वह , क्या मैं जानती हूं उसे" ??? 

"जी बिलकुल जानती हैं"

वह माँ की बेताबी पर बेसाख्ता हँस दिया। 
"बोलो भी शेरी अब यह ससपेंस क्यों बढ़ा रहे हो"

  उनहोंने बेटे के कांधे पर चपत रसीद की थी। 

"आप आसिम मामू से बात करें , शिफ़ा के लिये"

उसने सर झुका कर कहा। 

"माँ सदक़े!!! सच कह रहे हो तुम "??? 

उनहोंने बेयक़ीनी से भरी खुशी के साथ उठकर बेटे का माथा चूम लिया। 

"जी अम्मी , बिलकुल सच" !! 

वह भी माँ की खुशी पर निहाल हो गया। 

अभी आमना बेगम कुछ कहतीं कि उनका फोन रिंग कर उठा। 
"रूको एक मिन्ट देखती हूं किसका फोन है"

वह कहती हुई उठ खड़ी हुई। 
"अरे वाह असद भाई का ही फोन है"!!! 

उनहोंने फोन की स्क्रीन देखते हुए बेटे को बताया 
"जी आप बात कर लें पता नही क्या ज़रूरी काम हो"

वह उनके बात करने का इंतेज़ार करने लगा। 
"असद भाई आ रहे हैं शाम को"

वह फोन से जल्दी फारिग़ हो कर बोलीं। 
"यह तो बहुत अच्छा हो गया , आप यहीं बात कर लीजियेगा उन से" 
"ठीक है चलो ऐसा ही करते हैं "

वह बेटे से ज़्यादा ऐक्साइटेड थीं। 

☆ ☆ ☆

"हैलो शिफ़ा" !!! 

वह ईशा की नमाज़ पढ़ने के बाद जाएनमाज़ पर ही बैठी सोचों में गुम छत को घूर रही थी कि रज़ा की आवाज़ पर चौंक कर दरवाज़े की तरफ देखा

"पढ़ ली नमाज़" ???

वह पूछ रहा था। 

"जी , आपको कोई काम है " ????

वह उठ कर जाएनमाज़ तह करती पूछने लगी। 

"हां काम तो है अगर तुम फ्री हो गई हो तो लॉन में आ जाओ मैं वहीं वेट कर रहा हूं तुम्हारा।,और प्लीज़ चाय भी बना कर ले आना एक कप बहुत तेज़ दर्द हो रहा है सर में" 
वह कहता चला गया तो वह भी दोपट्टा तह करती बेड पर पड़ा स्टॉल उठा कर गले में डालती बाहर निकल गई। 

थोड़ी देर बाद चाय ले कर लॉन में पहुँची तो रज़ा वहां टहल रहा था। 

"यह ले" !!! 

उसने हाथ में पकड़ा चाय का कप उसे थमा दिया। 

" ज्ज़ाकअल्लाह, बैठो" !!! 

उसने खुद भी बैठते हुए वहां रखी दूसरी कुर्सी का तरफ इशारा किया तो शिफ़ा खामोशी के साथ बैठ गई। 

"परेशान हो कुछ "????

उसे यूं खामोश बैठे देख कर रज़ा ने खुद ही अंदाज़ा लगाया था। 

"नही" !! 

उसने सर नीचे झुकाए झुकाए जवाब दिया। 

"देखो बहना, जो हमारे नसीब में होता है वह हमें मिल कर रहता है हम चाहें या ना चाहें तो बेहतर है ना हम जबरदस्ती समझौता करने से बेहतर है हम खुशी खुशी कि़समत का लिखा क़ुबूल कर लें" !! 

रज़ा ने समझाया। 

"लेकिन रज़ा भाई आप जानते हैं ना अनस को" ???

वह कुछ नाराज़ सी हो कर बोली। 

"अच्छा सब छोड़ो, तुम यह बताओ अनस से मसला क्या है तुम्हे " ????

रज़ा ने पूछा। 

"मुझे" ?? 

वह कुछ देर सोचने लगी। 

"बज़ाहिर तो कोई मसला नही है वह गुड लुकिंग भी है ऐजुकेटेड भी और नमाज़ी भी और ज़्यादातर लड़कियां इसी की ख्वाहिश करती हैं" !!! 

"हैलो , क्या सोचने लगीं हो" ???

रज़ा ने उसकी आँखो के आगे हाथ हिलाकर पूछा। 

"मसला क्या होना है , आप जानते हैं हमारी कभी नही बनती है । उसे हर वही काम करना होता है जो मुझे ज़हर लगता हो , मेरे ड्रैसिंग से उसको मसला है हमेशा इंस्लट करने को तैयार रहता है मेरी। उस दिन भी आप ने देखा था नादिया और ज़रनिश आपी के सामने कैसे बात कर रहा था"

उसने रूक रूक कर अपनी बात मुकम्मल की। 

"क्या तुम्हें यह मालूम है कि यह रिशता अनस की मर्ज़ी से ही दादू ने दिया है" ??? 

रज़ा ने पूछा। 

"जी" !!! 

वह कुछ झेंप कर बोली। 

"तो बहना वह दिल का बुरा नही है , वह सिर्फ तुम्हें परेशान करने के लिए यह सब करता है। यह लड़ाई झगड़े हसीँ मज़ाक़ सब , वह तुम दोनो की कम्यूनिकेशन बंद नही करना चाहता बस इसीलिये यह करता रहता है। और इन ही सब से तो घर में रौनक़ रहती है वरना तो सब की अपनी अपनी रूटीन है किसको किसी से मतलब ही नही है " !!! 

उसने बहुत सही अल्फा़ज़ में शिफ़ा को समझाया था। 

और उसने भी सोच कर देखा तो रज़ा की बात सही ही लगी थी। 

अगर वह ऐसे बात ना करता तो उसने खुद फुरसत में बैठ कर तो उससे कभी बात करनी नही थी। और बाक़ी उसकी शरारतें कभी कभी तो वह खुद भी इंज्वाय करती थी। उसने अपने रवैये पर नज़र डाली तो अब अपनी ही गलती नज़र आ रही थी , क्योंकि उसने कभी ढंग से सीधे मुँह अनस से बात की ही नही थी जबकि उसने उसके इतने खराब रवैये के बाद भी अपना लहजा हमेशा पोलाइट ही रखा था। 

"जी , ठीक कहा आपने " !!! 

उस से और कोई जवाब ना पड़ा। 

रज़ा से बात करने के बाद उसका दिल काफ़ी हल्का फुल्का हो गया था। 

"तो बस अब तुम अपने दिल और दिमाग़ से सारे वहम और वसवसे निकाल दो और जो हो रहा है होने दो। बल्कि उसे इंज्वाय करो क्योंकि यह निकाह का पल ज़िंदगी में ऐक ही बार आता है इसके हर मोमेंट को इंज्वाय करो" !!! 

रज़ा ने बड़े भाईयों की तरह उसके सर पर हाथ रख कर कहा तो वह भी मुस्कुरा दी वह वाक़ई अब खुद को काफी़ हल्का महसूस कर रही थी। 

"आपने क्या बात करनी थी" ???

उसने ध्यान आने पर पूछा। 

"बात तो करनी थी लेकिन प्रॉमिस करो अभी किसी को नही बताओगी" !!! 

वह सर खुजाते हुए बोला था।