Money Vs Me - Part 12 fiza saifi द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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Money Vs Me - Part 12

अध्याय 1: अधूरा सपना

एक आलीशान बंगला था, जिसके बाहर महंगे संगमरमर की नेम प्लेट लगी हुई थी। उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—

"क्षितिज के. चौधरी"

बंगले के अंदर हर तरफ शानो-शौकत बिखरी हुई थी। आधा दर्जन नौकर मेरे आगे-पीछे घूम रहे थे। कोई पानी का गिलास लिए खड़ा था, कोई ताज़ा जूस लेकर इंतजार कर रहा था। एक नौकर तो मेरे पैरों के पास चप्पल लिए खड़ा था, मानो उसे इस बात की चिंता हो कि कहीं मेरे पैर जमीन को न छू लें।

मैं पूरे रौब और ठाठ के साथ बिस्तर से उठा। चप्पलों में पैर डाले और जूस का गिलास उठाकर होंठों से लगाया।

लेकिन अगले ही पल मेरा चेहरा बिगड़ गया।

"ये जूस इतना कड़वा क्यों है?" मैं गुस्से में नौकर पर चिल्ला पड़ा।

"साहब... साहब... क्या हुआ?"

किसी की घबराई हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी। कोई जोर-जोर से मेरा कंधा हिला रहा था।

मैंने आँखें खोलीं।

एक पल के लिए मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ।

मेरे सामने एक मजबूत शरीर वाला आदमी झुका हुआ था। वह मुझे हिलाते हुए बार-बार पूछ रहा था, "आप ठीक हैं ना, साहब?"

तभी मेरी समझ में आया।

न वो आलीशान बंगला था।

न वो नेम प्लेट।

न वो नौकर-चाकर।

सब कुछ बस एक सपना था।

हाँ, बंगला जरूर था, लेकिन वह मेरा नहीं बल्कि ठाकुर साहब का था। मैं उसी के ड्रॉइंग रूम के मुलायम सोफे पर लेटा हुआ था।

मैंने सिर झटका और उठकर बैठ गया।

"नहीं... कुछ नहीं। शायद आँख लग गई थी। ठाकुर साहब कैसे हैं अब?" मैंने जल्दी से पूछा।

रात को डॉक्टर के जाने के बाद मैं यहीं उनके कमरे के बाहर बैठ गया था ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद कर सकूँ। पता ही नहीं चला कि कब नींद आ गई।

घड़ी पर नजर गई।

सुबह के सात बज रहे थे।

"नहीं साहब, अभी तक नहीं उठे हैं। डॉक्टर ने रात को इंजेक्शन दिया था," गार्ड ने जवाब दिया।

फिर वह आदर से बोला, "आपके लिए चाय या कॉफी लाऊँ, साहब?"

उसके व्यवहार में मेरे लिए सम्मान साफ झलक रहा था। शायद इसलिए क्योंकि मैं पूरी रात एक अनजान इंसान के लिए यहाँ रुका था और अपनी नौकरी तक दांव पर लगाकर उसकी मदद करने चला आया था।

"तुम बनाओगे?" मैंने हैरानी से पूछा।

गार्ड हँस पड़ा।

"नहीं साहब, कमला बनाएगी। वो सुबह से रात तक यहाँ का सारा काम संभालती है।"

"अच्छा... एक कॉफी ले आना," मैंने मुस्कुराकर कहा।

इसके बाद मैं ठाकुर साहब के कमरे में पहुँच गया।

वे शायद जाग चुके थे। उन्होंने हल्का-सा करवट बदला और उठने की कोशिश की।

मैं तुरंत उन्हें सहारा देने आगे बढ़ा।

लेकिन जैसे ही मैं पास पहुँचा, वे चौंक गए।

"कौन हो तुम?"

फिर उन्होंने ऊँची आवाज में पुकारा—

"बृजेश! बृजेश!"

मैं घबरा गया।

"आप पहले आराम से बैठिए, मैं सब समझाता हूँ..."

तभी बृजेश दौड़ता हुआ कमरे में आया।

"जी ठाकुर साहब! आप ठीक तो हैं ना?"

लेकिन ठाकुर साहब की निगाहें लगातार मुझ पर टिकी हुई थीं।

"आपकी... तारीफ?" उन्होंने धीमे स्वर में पूछा।

बृजेश हैरान हो गया।

"अरे ठाकुर साहब, आप इन्हें नहीं पहचानते? रात को तो आप इनसे फोन पर बात कर रहे थे..."

उसकी बात सुनकर मुझे खतरे की घंटी सुनाई दी। अगर उसने ज्यादा कुछ कह दिया तो मैं खुद शक के घेरे में आ सकता था।

मैंने तुरंत बात संभाली।

"बृजेश, रहने दो। मैं बताता हूँ।"

फिर मैंने ठाकुर साहब की तरफ देखा।

"सर, मैं सहारा कस्टमर केयर से हूँ। अगर आपको याद हो तो कल रात मैं आपके प्रोडक्ट के बारे में आपको गाइड कर रहा था।"

ठाकुर साहब की आँखें सिकुड़ गईं। वे याद करने की कोशिश कर रहे थे।

मैंने आगे कहा—

"बात करते-करते आपकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। मैं अभी भी कॉल पर था। आप बार-बार 'हेल्प... हेल्प...' कह रहे थे।"

"मैं घबरा गया। समझ नहीं आया क्या करूँ। फिर मेरे पास मौजूद कस्टमर केयर ऐप से आपकी लोकेशन मिली और मैं खुद यहाँ आ गया।"

बृजेश तुरंत बोल पड़ा—

"ठाकुर साहब, अगर ये समय पर नहीं आते तो पता नहीं क्या हो जाता!"

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

ठाकुर साहब बिना कुछ कहे बस मुझे देखते रहे।

और न जाने क्यों, उनकी निगाहों से मुझे एक अजीब-सा डर महसूस होने लगा।

मैं धीरे से उनके सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया।

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छाया रहा।

नौकरानी ठाकुर साहब को दवा दे रही थी। उन्होंने बिना कुछ कहे दवा निगली, पानी का गिलास खाली किया और वापस उसकी ओर बढ़ा दिया। नौकरानी सिर झुकाकर कमरे से बाहर निकल गई।

अब कमरे में सिर्फ हम दोनों थे।

ठाकुर साहब कुछ क्षण तक मुझे देखते रहे, फिर बोले—

"नाम क्या है तुम्हारा?"

इस बार उनकी आवाज में पहले जैसी कठोरता नहीं थी। उसमें एक अपनापन और जिज्ञासा थी।

मैं थोड़ा सहज हुआ।

"जी... मेरा नाम क्षितिज है।"

"क्षितिज..." उन्होंने नाम दोहराया और हल्की मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा।

फिर सामने रखी कॉफी की तरफ इशारा करते हुए बोले—

"कॉफी पी लो बेटा, ठंडी हो रही है।"

मैंने कॉफी उठाने के बजाय उनसे पूछा—

"आपकी तबीयत अब कैसी है, सर?"

"अब ठीक हूँ।" उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।

"पता नहीं क्या हुआ था। फोन पर बात करते-करते अचानक सिर भारी होने लगा। फिर ऐसा चक्कर आया कि मैं खुद को संभाल नहीं पाया। बृजेश को बुलाने तक का होश नहीं रहा।"

उन्होंने एक क्षण रुककर मेरी ओर देखा।

"और उस समय तुम फोन पर थे। तुम्हें परेशान किया, उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ बेटा।"

उनके मुँह से निकला "बेटा" शब्द सुनकर मेरे भीतर का तनाव काफी हद तक खत्म हो गया।

मैं मुस्करा पड़ा।

"ऐसी कोई बात नहीं है सर। किसी की मदद करना तो इंसानियत है।"

फिर न जाने कैसे मेरे होंठों से एक ऐसी बात निकल गई, जो मैं शायद ही कभी किसी से कहता था।

"मेरे पिता अगर आज ज़िंदा होते... तो शायद बिल्कुल आपके जैसे ही होते।"

बात कहते ही मैं खुद चौंक गया।

मैं कभी किसी के सामने अपने माता-पिता का ज़िक्र नहीं करता था।

लेकिन न जाने क्यों, ठाकुर साहब के सामने मेरे मन की दीवारें अपने आप टूटती जा रही थीं।

शायद उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो भरोसा दिलाता था।

ठाकुर साहब मुझे ध्यान से देखते रहे।

फिर उनके चेहरे पर एक गहरी, स्नेहभरी मुस्कान फैल गई।

"तुम्हारी सोच बहुत अच्छी है, बेटा।"

उन्होंने धीरे से कहा।

"आजकल तुम्हारी उम्र के लड़के तो बड़ों की इज़्ज़त करना जैसे भूल ही गए हैं।"

मैं चुपचाप उनकी बात सुनता रहा।

अचानक जैसे उन्हें कुछ याद आया।

"रुको... तुम रात से यहीं हो?"

उन्होंने आश्चर्य से पूछा।

"जी।"

"पूरी रात?"

"जी सर। यहाँ और कोई नहीं था। इसलिए मैंने सोचा कि अगर रात में आपको कोई तकलीफ़ हो जाए तो कम से कम कोई साथ रहने वाला हो।"

मैंने अब कॉफी का कप उठा लिया और धीरे-धीरे घूँट भरने लगा।

ठाकुर साहब कुछ देर तक मुझे देखते रहे।

उनकी आँखों में अब हैरानी साफ दिखाई दे रही थी।

शायद उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि आज के समय में कोई अजनबी भी किसी के लिए इतनी चिंता कर सकता है।

"कितना पढ़े हो, क्षितिज?"

उन्होंने अचानक पूछा।

"जी, ग्रेजुएशन पूरी कर ली है।"

मेरे जवाब पर उनकी भौंहें हल्की-सी उठीं।

"अच्छा! फिर आगे पढ़ाई क्यों नहीं की?"

इस सवाल पर मैं कुछ क्षण के लिए चुप हो गया।

वे शायद समझ रहे थे कि गरीबी या किसी मजबूरी ने मुझे रोक दिया होगा।

लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

असल में मैं हमेशा जल्दी अमीर बनने के सपने देखता रहा था। मेहनत और लंबी पढ़ाई का रास्ता मुझे कभी आकर्षित नहीं कर पाया।

लेकिन यह बात मैं उन्हें कैसे बताता?

इसलिए मैंने बस हल्की मुस्कान देकर बात टाल दी।

ठाकुर साहब ने भी ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा।

"अभी क्या करते हो?"

"एक कॉल सेंटर में नौकरी करता हूँ, सर।"

"कितना मिल जाता है?"

"यही कोई आठ-दस हज़ार रुपये महीने।"

मेरी बात सुनकर वे सचमुच चौंक गए।

"बस इतना?"

मैंने सिर हिला दिया।

"और उसी में घर का खर्च चल जाता है?"

इस बार मेरे चेहरे पर हल्की उदासी उतर आई।

"घर कहाँ है, सर..."

मैं धीमे स्वर में बोला।

"माँ-पापा दोनों कई साल पहले गुजर चुके हैं। इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। एक कॉलेज के दोस्त के साथ किराए पर रहता हूँ।"

मैंने गहरी साँस ली।

"कोशिश तो बहुत कर रहा हूँ कोई अच्छी नौकरी मिल जाए, लेकिन आजकल अच्छी नौकरी मिलती कहाँ है..."

बात पूरी करते हुए मैंने जानबूझकर चेहरे पर थोड़ी मायूसी ला दी।

और सच कहूँ तो उस समय मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था।

न जाने क्यों...

ठाकुर साहब के हर सवाल के साथ मुझे महसूस हो रहा था कि किस्मत मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने वाली है।

ऐसा लग रहा था मानो मेरी ज़िंदगी का बंद ताला खोलने वाली चाबी इसी आदमी की जेब में रखी हो।

और शायद...

वह चाबी मुझे मिलने ही वाली थी।

क्या मेरी यह भलाई मुझे महंगी पड़ने वाली थी?

तभी दरवाजा खुला।

एक नौकरानी ट्रे लेकर अंदर आई। उसमें ठाकुर साहब की दवाइयाँ, पानी का गिलास और मेरे लिए गर्म कॉफी रखी थी।

ठाकुर साहब ने कुछ क्षण सोचा।

फिर उन्होंने बृजेश को बाहर जाने का इशारा किया।

गार्ड चुपचाप कमरे से निकल गया।

कमरे में अब सिर्फ हम दोनों थे।

ठाकुर साहब ने कॉफी की तरफ इशारा किया और गंभीर आवाज में कहा—

"बैठो..."