Money Vs Me - Part 4 fiza saifi द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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Money Vs Me - Part 4

उस दिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी मन की मुराद अब बस पूरी होने ही वाली है। जैसे उस किताब में लिखे सारे आइडियाज़ सच में काम करते हों।
उस शाम मैं रेस्टोरेंट में मीरा से मिला… या यूँ कहूँ कि मैंने पहली बार मीरा को देखा था।

वो अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी। शायद मेरी चोरी-छिपे उठती नज़रों को उसकी सहेलियों ने नोटिस कर लिया था। उन्हें लगा होगा कि मैं मीरा में दिलचस्पी रखता हूँ… वही प्यार-व्यार वाला चक्कर।
लेकिन मैं कहाँ प्यार करने वालों में से था। मीरा… या कोई भी लड़की… मेरे लिए बस एक मौका थी। अपनी बेरंग ज़िंदगी को ब्लैक एंड व्हाइट से ईस्टमैन कलर बनाने का मौका।

थोड़ी देर बाद मीरा की एक दोस्त मेरे पास आई। उसने अगले दिन मिलने का पूरा प्रोग्राम बताया और मुस्कुराते हुए जल्दी से चली गई।
मैं कुछ पल वहीं खड़ा रह गया। हैरान… सुन्न… जैसे समझ ही नहीं पा रहा था कि ये सब सच में हो रहा है या मैं कोई सपना देख रहा हूँ।

उनके जाने के बाद मैं भी धीरे-धीरे वहाँ से निकला और अपने कमरे की तरफ चल पड़ा।
दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। अंदर अजीब-सा तूफान चल रहा था। डर, घबराहट, खुशी… सब कुछ एक साथ उमड़ रहा था।

“कल क्या होगा?”
“मीरा से मिलकर क्या बोलूँगा?”
“कैसे उसे अपने झूठे प्यार के जाल में फँसाऊँगा?”
“क्या ये सब सच में इतना आसान होगा?”

इन्हीं सवालों में उलझा मैं कमरे तक पहुँचा।
अचानक याद आया—कल के लिए कपड़े भी तो चुनने हैं।

मैंने पूरी अलमारी अस्त-व्यस्त कर दी। कपड़ों के ढेर के बीच आखिर मुझे वो मिल ही गया जिसे मैं सिर्फ खास मौकों के लिए संभाल कर रखता था—लाइट ब्लू शर्ट और सफेद ट्राउज़र।

उस आउटफिट में मैं खुद को जरूरत से ज्यादा हैंडसम महसूस करता था। मेरा गोरा रंग और निखर जाता था, और ऊपर से मेरे सुनहरे-भूरे बाल… पूरा लुक ही अलग लगता था।

उस रात बेचैनी ने मुझे सोने नहीं दिया।
अगली शाम तक इंतज़ार करना मेरे लिए मुश्किल हो गया था।

पूरा दिन मैंने जल्दी-जल्दी अपने जरूरी काम निपटाए। मैं अभी भी कुलदीप सेठ के यहाँ अकाउंट्स का काम देखता था। पार्ट टाइम नौकरी थी। जितने पैसे मिलते, उनसे बस कमरे का किराया और जैसे-तैसे बाकी खर्च निकल पाता था।

लेकिन उस दिन…
पहली बार मुझे लग रहा था कि शायद मेरी किस्मत बदलने वाली है।

पूरा दिन मेरी बेचैनी में गुज़रा।
शाम के ठीक पाँच बजे मैं तैयार खड़ा था। जाने के लिए पूरी तरह तैयार।

मैंने आख़िरी बार आईने में खुद को देखा… और कुछ पल खुद को ही देखता रह गया।
ऐसा लग रहा था जैसे आईने में मैं नहीं, कोई और खड़ा हो।
लाइट ब्लू शर्ट, सफेद ट्राउज़र, करीने से संवारे हुए सुनहरे-भूरे बाल… शायद ज़िंदगी में पहली बार मैं खुद को पसंद आया था।

मैं कमरे से बाहर निकला, बाइक स्टार्ट की और उस मॉल की तरफ निकल पड़ा जिसका पता मीरा की दोस्त ने दिया था।

रास्ते भर दिल अजीब तरह से धड़कता रहा।
जैसे हर मोड़ पर कोई नई कहानी मेरा इंतज़ार कर रही हो।

रास्ते में मैंने एक छोटा-सा खूबसूरत बुके भी खरीद लिया।
गुलाब नहीं… बस हल्के गुलाबी रंग के फूल।
पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे लगा मीरा पर वही अच्छे लगेंगे।

कुछ देर बाद मैं मॉल पहुँच गया।
पार्किंग में बाइक लगाकर मैंने एक बार फिर खुद को ऊपर से नीचे तक देखा।
सब ठीक था।

लेकिन तभी अचानक मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आया।

“इतने बड़े मॉल में मीरा को ढूँढूँगा कैसे?”
उस दिन जो कुछ हुआ था सब अचानक हुआ था। अगर फोन नंबर ले लिया होता तो आज इतनी परेशानी नहीं होती।

मैंने हल्के से सिर झटका।

“कोई बात नहीं… उसकी दोस्त ने मल्टीप्लेक्स का ही तो कहा था।”

मैं धीरे-धीरे मॉल के अंदर बढ़ने लगा।
चारों तरफ नजरें दौड़ाते हुए मैं उन्हें ढूँढने की कोशिश कर रहा था।

वीकेंड होने की वजह से मॉल लोगों से भरा हुआ था।
हर तरफ चमकती रोशनियाँ… महंगे शोरूम… बड़े-बड़े ब्रांड्स… खुशबुओं से भरी हवा… और अमीर लोगों की भीड़।

लेकिन उस दिन…
मुझे ये सब देखकर जलन नहीं हो रही थी।
बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया रंगों और खूबसूरती से भर गई हो।

मैं अपनी ही धुन में चलता हुआ उन्हें ढूँढ रहा था कि तभी…

अचानक पीछे से किसी ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे तेजी से एक तरफ खींच लिया।

मैं हक्का-बक्का रह गया।
दिल एक पल के लिए जैसे धड़कना ही भूल गया।

मैंने खुद को संभालते हुए सामने देखा।
वो मीरा की वही दोस्त थी जिसने मुझे यहाँ आने के लिए कहा था।

उसने हल्के गुलाबी रंग का फ्रॉक-सूट पहना हुआ था। खुले बाल उसके कंधों पर बिखरे थे। गोरा चेहरा, हल्की पिंक लिपस्टिक और चमकती हुई आँखें…
एक पल के लिए मैं जैसे उसे देखता ही रह गया।

लेकिन तभी उसकी गुस्से भरी आवाज़ ने मुझे फिर हकीकत में लौटा दिया।

“इतनी देर लगा दी तुमने! देखो… पूरे पंद्रह मिनट लेट हो।”

वो अपनी घड़ी दिखाते हुए बोली।

मैंने जल्दी से आँखों पर चढ़ा सनग्लास उतारा और हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“सॉरी… वो असल में मैं आप लोगों को ढूँढ रहा था। इतना बड़ा मॉल है… और कोई कॉन्टैक्ट नंबर भी तो नहीं था।”

“अच्छा-अच्छा, ठीक है… कोई बात नहीं। अब सुनो…”

वो जल्दी-जल्दी बोलने लगी।

“प्लान में थोड़ा बदलाव हो गया है। पहले हमने मूवी देखने का सोचा था, लेकिन अब हम सब फूड कोर्ट जा रहे हैं। और हाँ… आज मीरा का बर्थडे भी है। बस उसी की छोटी-सी पार्टी रखी है हमने।”

मैं हैरानी से उसे देख रहा था और वो लगातार बोले जा रही थी।

“लेकिन तुम्हारे आने के बारे में मीरा को कुछ नहीं पता।”

इतना कहकर वो कुछ पल के लिए रुकी।
फिर उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।

उसकी आँखों में हल्की-सी चमक आई… शायद वो मेरे लुक से इंप्रेस हुई थी… या शायद मुझे ही ऐसा लगा।
लेकिन एक बात तय थी—मैं उससे बहुत ज्यादा इंप्रेस हो चुका था।

उसके पास से आती भीनी-भीनी खुशबू मेरे होश उड़ा रही थी।

एक पल को मेरे मन में अजीब-सा ख्याल आया—

“क्या मेरे प्लान में भी बदलाव हो सकता है?
क्या मीरा की जगह… मैं इससे दोस्ती कर लूँ?”

“ए मिस्टर… नाम क्या है तुम्हारा?”

उसने मेरा हाथ हल्का-सा हिलाते हुए पूछा तो मैं तुरंत अपनी सोच से बाहर आया।

“श… क्षितिज,” मैंने जल्दी से जवाब दिया।

“ठीक है क्षितिज, ध्यान से सुनो,” वो फिर धीरे आवाज़ में बोली,
“हम लोग वहाँ सबसे किनारे वाली टेबल पर बैठे हैं। तुम मौका देखकर हमारी टेबल पर आ जाना। उसके बाद का काम हम संभाल लेंगे।”

फिर उसने उंगली दिखाते हुए चेतावनी दी—

“लेकिन मीरा को इंप्रेस करने के चक्कर में कोई फिल्मी डायलॉग मत बोल देना। उसे फिल्मी और झूठे-बनावटी लोगों से सख्त नफरत है। ओके?”

मैं बस गर्दन हिलाकर ‘हाँ’ कह सका।

“और हाँ…”
वो हल्का मुस्कुराई,
“मेरा नाम संजना है।”

इतना कहकर वो मुड़ी और जाते-जाते बोली—

“अब मैं जा रही हूँ… ज्यादा देर मत करना।”