मैं दिन भर कैफ़े में काम करता और शाम को सज संवर कर निकल जाता अपनी हीरोइन की तलाश में, जो मुझे ज़िंदगी के सारे सुख दे — पैसा, पावर, लग्ज़री लाइफ़।
हाँ, मैं आपको बता दूँ मेरी पर्सनैलिटी अच्छी खासी ठीक ठाक है। मेरी उम्र 24 की हो चुकी है, रंग साफ़ है बिल्कुल मेरी माँ की तरह, ऊँचा कद मेरे पापा जैसा और जिम जाकर बॉडी भी अच्छी बना चुका था।
कुल मिला कर अगर देखा जाए तो कोई भी अच्छी खूबसूरत लड़की भी मुझे मिल सकती थी, लेकिन मुश्किल सवाल ये था कि कोई भी खूबसूरत लड़की… आहां, सिर्फ खूबसूरत नहीं, कोई भी खूबसूरत और अमीर लड़की मुझ जैसे फटीचर से दोस्ती क्यों करेगी?
इसलिए मैंने अपना टारगेट नहीं बदला...
खूबसूरत अमीरज़ादी की जगह एक सिंपल-सादा अमीर लड़की की तलाश जारी रखी। मैं कभी ऊँचे-ऊँचे रेस्टोरेंट्स में जाकर बैठ जाता, जहाँ मेरी ही उम्र के अमीर घरों के बच्चे अक्सर मौज-मस्ती करने आते, या कभी किसी शॉपिंग मॉल में लेडीज़ कलेक्शन के स्टोर के आसपास, या ब्यूटी प्रोडक्ट्स की तरफ मंडराता कि शायद मुझे कोई तो मिल जाएगी यहाँ।
लेकिन बहुत दिन यही सब करता रहा — शॉपिंग मॉल्स के चक्कर, ऊँचे और महंगे कैफ़े-रेस्टोरेंट्स… सब में बैठकर टाइम स्पेंड किया, पर मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं मिली जो मेरे टारगेट पर पूरी उतर सकती थी।
मैं मायूस हो चला था कि शायद ये किताबों में बस बकवास ही है सब… कहाँ से लाऊँ ऐसी लड़की जो मेरी किस्मत बदल दे…
लेकिन एक दिन आ ही गया मेरी ज़िंदगी में वो दिन, जब वो मेरी ज़िंदगी में आई…
वो… यानी मीरा…
मैं उस दिन भी सज-संवर कर अपनी फ़ेवरेट ब्लू शर्ट और स्काई ब्लू जींस पहनकर, सलीके से बाल बनाए, आँखों पर सनग्लासेस लगाए शहर के बड़े नामी रेस्टोरेंट में एक खाली टेबल पर कोने में बैठा था, जहाँ वेटर बार-बार आकर मुझे ऑर्डर के लिए डिस्टर्ब ना करे… क्योंकि यहाँ की एक कॉफ़ी भी मेरी औकात से बाहर थी।
हाँ, तो मैं अकेले कोने की टेबल पर बैठा था और बाकी बैठे लोगों पर नज़र डाल रहा था। तभी 3-4 लड़कियों का एक ग्रुप एंटर हुआ। वो सब तकरीबन एक ही उम्र की थीं। सबके महंगे कपड़े, मेकअप और महंगे पर्स देखकर दूर से ही अंदाज़ा हो रहा था कि सब की सब अमीर घरानों से हैं।
वो चारों आकर मेरे से थोड़ा दूर की टेबल पर बैठ गईं। उनमें से दो लड़कियाँ बहुत खूबसूरत थीं, एक थोड़ा ठीक-ठाक… और जिस पर मेरी नज़र रुक गई, वो थी मीरा।
बिल्कुल ऐसी जैसी मैं ढूँढ रहा था… एक अमीरज़ादी, बस थोड़ी कम खूबसूरत।
मीरा अपनी फ्रेंड्स के साथ खाने का ऑर्डर दे रही थी और मैं बस उसे देखे जा रहा था। मैं ये सोच रहा था कि क्या ये मेरी तलाश है… और साथ ही उसे जाँच भी रहा था।
सांवली सी रंगत, कोई खास बात वाली बात नहीं थी। ब्लैक कलर की ड्रेस और हाई हील में ज़रा ठीक लग रही थी, पर दूसरी लड़कियों के मुकाबले वो बिल्कुल मामूली थी।
मैं अभी ये सोच ही रहा था कि तभी उसकी एक फ्रेंड ने उसके कान में कुछ कहा और मेरी तरफ इशारा किया। मैं थोड़ा संभल कर बैठ गया… क्योंकि उसके ऐसा करते ही वो चारों मुझे घूर कर देखने लगी थीं। मैंने जल्दी से अपना चेहरा घुमा लिया।
लगभग 5 मिनट तक मैंने उधर नहीं देखा। मुझे डर भी लग रहा था कहीं बाज़ी उल्टी ही ना पड़ जाए… हीरो बनने की जगह लड़कियाँ मुझे विलेन ना समझ लें ऐसे घूर-घूर कर देखने पर।
मैंने थोड़ी देर बाद डरते-डरते उधर देखा। उनका ऑर्डर आ चुका था और वो सब की सब खाने में मसरूफ हो गई थीं। मैंने सुकून की साँस ली और सोचा — बेटा, ये इतना भी आसान नहीं है… लड़की चाहे गोरी हो या काली, पटाना इतना आसान नहीं होता।
और अभी मैं उठने का सोच ही रहा था कि उन चारों ने फिर से मेरी तरफ देखा। मैंने चेहरा घुमा लिया। अब मुझे थोड़ा सा डर लगने लगा था।
मैंने हिम्मत जुटाते हुए तीसरी दफा देखा तो इस बार वो चारों मेरी तरफ मुस्कुरा दीं… और मीरा ने नज़र दूसरी तरफ फेर ली। मीरा के पास बैठी एक लड़की ने उसे कोहनी मारी तो वो उसे गुस्से से देखने लगी।
और फिर अचानक वो उठ खड़ी हुई। बिल मंगवाया और पेमेंट करके चली गई…
लेकिन जाते-जाते मीरा ने एक बार गेट से मुड़कर मुझे देखा…
मेरा तो दिल खुशी से धड़क गया…
उनका ध्यान खाने में कम और बातों में ज़्यादा था। किसी बात पर वो चारों ज़ोर-ज़ोर से हँसती भी जा रही थीं।
मीरा की हँसी में कुछ बात थी। मैं न जाने क्यों उसे देखते हुए एक पल के लिए बस खो सा गया। मैंने किसी की हँसी इतनी खूबसूरत नहीं देखी थी आज तक।
उसमें कोई खास बात नहीं थी — ना गोरी रंगत, ना ही सुनहरी आँखें, ना कुछ और… बस सादा सा चेहरा, नॉर्मल सी आँखें और नॉर्मल से होंठ।
फिर भी… उसकी हँसी में कुछ था।
अचानक उसकी नज़र मुझ पर फिर से पड़ी और उसे मेरी नज़रों की गहराई का एहसास हुआ…
वो हँसते-हँसते एकदम रुक गई…
मीरा के उठते ही उसकी दोस्त भी उसके साथ ही जाने के लिए तैयार हो गई। मीरा बिना मेरी तरफ देखे बाहर की ओर बढ़ गई, पर उसकी तीनों सहेलियाँ मुझे देखकर एक अजीब सी स्माइल दे रही थीं, और वो सब मीरा के पीछे बाहर निकल गईं।
मैं बस कुछ समझने की कोशिश करता हुआ वहीं बैठा था कि दो मिनट बाद रेस्टोरेंट के गेट से मैंने मीरा की एक सहेली को अंदर आते देखा। वो सीधी मेरी तरफ बढ़ती चली आ रही थी और मैं थोड़ा घबरा गया।
वो आकर मेरे सामने खड़ी हो गई… और फिर बिना पूछे मेरे सामने वाली चेयर पर बैठ गई। मैं ज़रा सा हैरान था।
“कल शाम मीरा और हम सबका मल्टीप्लेक्स में पिक्चर का प्लान है… यू कैन जॉइन अस।”
वो जल्दी से बोली तो मैं चौंक गया।
“जी… जी… मैं कुछ समझा नहीं…”
मैं संभलकर बोला।
वो थोड़ा सा हँसी।
“कोई बात नहीं… कल समझ लीजिएगा। अगर मीरा से बात करनी है तो कल शाम प्रोमिनोड मॉल मल्टीप्लेक्स मिलते हैं… और हाँ, मीरा को पता ना चले मैंने आपको ये सब बताया है।”
वो ये सब बोलकर वापस उठ खड़ी हुई और चली गई।
मैं हैरान सा बैठा रह गया…