तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई और हमारी नज़र उधर उठ गई।
एक नौकर हाथों में चाँदी जैसी चमकती ट्रे लिए खड़ा था। ट्रे में बर्फ से ठंडे शरबत के गिलास सजे हुए थे। वह बड़े सलीके से हमारे पास आया और एक-एक गिलास हमारे सामने रख दिया।
मैंने और कुलदीप सेठ ने अपने-अपने गिलास उठा लिए।
"लीजिए सर।"
इतना कहकर नौकर वापस चला गया।
कमरे में फिर से खामोशी छा गई।
कुलदीप सेठ धीरे-धीरे शरबत की चुस्कियाँ लेते हुए पूरे कमरे का जायज़ा ले रहे थे। उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रहा था कि वे अंदर ही अंदर काफी परेशान हैं। इस घर की रईसी और ठाठ-बाट देखकर शायद उनके मन में बार-बार यही सवाल उठ रहा था कि आखिर इतने बड़े घराने के सामने रिश्ते की बात कैसे रखी जाएगी।
कहीं सामने वाले लोग उन्हें कम न समझ लें।
कहीं कोई ऐसी बात न हो जाए जिससे उन्हें शर्मिंदा होना पड़े।
उनकी आँखों में वही चिंता साफ़ झलक रही थी।
उधर मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था।
क्योंकि मुझे तो पूरा यकीन था कि यह सब सिर्फ़ एक औपचारिकता है। असली बात तो पहले ही तय हो चुकी है। अब तो बस रस्म के तौर पर मुलाकात और बातचीत बाकी थी।
मैं अपने इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि तभी एक बार फिर बाहर से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
इस बार आहट पहले से ज्यादा साफ़ थी।
मैं और कुलदीप सेठ लगभग एक साथ सतर्क हो गए।
हमने हाथों में पकड़े गिलास सामने रखी सेंटर टेबल पर रख दिए और दरवाज़े की तरफ देखने लगे।
अगले ही पल दरवाज़ा खुला।
सबसे पहले एक लगभग पचास-पचपन साल के सज्जन अंदर आए।
उनका व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली था।
उन्होंने बेहद कीमती दिखने वाला मेहंदी रंग का टू-पीस सूट पहन रखा था। उनकी कलाई पर बंधी महंगी घड़ी और चेहरे पर दिखाई देने वाला आत्मविश्वास साफ़ बता रहा था कि वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं।
उनके पीछे संजू भी अंदर आई।
संजू को देखते ही मेरे चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
मैंने तुरंत अनुमान लगा लिया कि सामने बैठे व्यक्ति शायद मीरा के पिता होंगे। और चूँकि संजू पहले से मेरे बारे में सब कुछ जानती थी, इसलिए संभव है कि उसने भी उनके सामने मेरी काफी तारीफ़ की हो।
यही सोचकर मेरे भीतर का आत्मविश्वास और बढ़ गया।
मैं अपनी बैठने की मुद्रा थोड़ा संभालकर सीधा होकर बैठ गया।
दोनों हमारे सामने रखी कुर्सियों पर आकर बैठ गए।
कुछ क्षणों के लिए कमरे में एक अजीब-सी खामोशी छा गई।
सिर्फ़ ए.सी. की हल्की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
मैं उत्सुकता से उस व्यक्ति को देख रहा था, जबकि कुलदीप सेठ के चेहरे पर हल्की घबराहट अब भी बनी हुई थी।
ऐसा लग रहा था कि अगले कुछ पल इस मुलाकात की दिशा और शायद हमारे भविष्य का फैसला करने वाले थे।
"हाय शितिज, कैसे हो?"
सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए संजू ने मुस्कुराकर पूछा।
उसकी आवाज़ सुनकर मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।
"हैलो... मैं ठीक हूँ। तुम कैसी हो?" मैंने जवाब दिया।
"मैं भी बिल्कुल ठीक हूँ।"
कुछ पल सामान्य बातें करने के बाद संजू ने अपने साथ आए व्यक्ति की तरफ इशारा किया।
"शितिज, ये मेरे डैड हैं।"
फिर उसने उनकी तरफ देखकर कहा,
"डैड, ये शितिज हैं... और ये इनके अंकल, कुलदीप अंकल।"
मैं और कुलदीप सेठ आदर से अपनी जगह से थोड़ा उठे और उन्हें नमस्ते की।
उन्होंने भी हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया।
इसके बाद संजू ने बड़ी सहजता से कहा,
"डैड, मैंने आपको बताया था ना... मीरा की शादी के सिलसिले में ये लोग आपसे मिलने आए हैं।"
उसकी बात सुनते ही मेरे चेहरे की मुस्कान जैसे एक पल के लिए जम गई।
मीरा की शादी...?
और उसके लिए संजू के डैड से मुलाकात...?
मेरे दिमाग में अचानक कई सवाल एक साथ घूमने लगे।
मैंने एक नज़र संजू पर डाली, फिर उसके पिता पर।
अब तक तो मैं यही समझ रहा था कि यह मीरा का घर है। यही उसके पिता हैं और हम उसी रिश्ते की बात करने आए हैं जिसके बारे में पिछले कई दिनों से चर्चा चल रही थी।
लेकिन अब...
अब मामला कुछ अलग लग रहा था।
अगर यह सचमुच मीरा का घर होता, तो अभी तक मीरा या उसके परिवार का कोई सदस्य यहाँ दिखाई क्यों नहीं दिया?
न उसकी माँ...
न उसके पिता...
और न ही खुद मीरा।
सिर्फ संजू और उसके डैड।
मेरे मन में बेचैनी-सी होने लगी।
मैंने कमरे के चारों ओर एक बार फिर नज़र दौड़ाई, जैसे दीवारों पर ही मेरे सवालों के जवाब लिखे हों।
क्या यह संजू का घर है...?
या फिर मीरा और संजू दोनों एक ही परिवार से हैं...?
या कहीं मैं शुरू से ही किसी गलतफहमी में तो नहीं था...?
मेरे मन में उठ रहे सवालों ने कुछ देर पहले तक बने हुए सारे रोमांटिक सपनों पर जैसे ब्रेक लगा दिया।
अभी कुछ ही मिनट पहले मैं खुद को इस बंगले का भावी दामाद समझकर सपने देख रहा था, लेकिन अब मुझे लगने लगा था कि शायद कहानी उतनी सीधी नहीं है जितनी मैं समझ रहा था।
मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही संजू के डैड ने मेरी तरफ देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"तो बेटा... तुम ही हो शितिज?"
उनकी आवाज़ में अपनापन तो था, लेकिन साथ ही ऐसा आत्मविश्वास भी था जिसने मुझे और ज्यादा सतर्क कर दिया।
मैंने तुरंत खुद को संभाला और सिर हिलाते हुए कहा,
"जी... अंकल।"
लेकिन अंदर ही अंदर मेरा दिमाग अब भी उसी सवाल में उलझा हुआ था—
आखिर मीरा है कौन... और इस पूरे मामले में संजू और उसके परिवार का क्या रिश्ता है...?