उस दिन के बाद मैं मीरा से अक्सर मिलने लगा। और हर मुलाकात के साथ एक अजीब सा खिंचाव और भी गहरा होता जा रहा था। मीरा के शौक इतने महंगे थे कि उसके लिए गिफ्ट लेते-लेते मेरी पूरी सैलरी जैसे हवा में उड़ जाती थी। महीने के बाकी दिन कैसे कटते थे, यह सिर्फ मैं जानता था—और शायद मेरी खामोशी भी।
लेकिन मैं खुद को समझा लेता था कि बस थोड़ा सा वक्त और… फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। शायद किस्मत भी, और हालात भी, अपने हिसाब से लौट आएँगे।
इसी उम्मीद के सहारे मैं जिंदा सा चल रहा था।
एक दिन हिम्मत जुटाकर मैंने मीरा के सामने अपना दिल खोल दिया।
“मीरा… मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। और इसके लिए मुझे तुम्हारे पापा से मिलना होगा।”
वह उस वक्त अपनी सहेलियों के साथ मॉल में शॉपिंग कर रही थी। भीड़, शोर और रोशनी के बीच मैंने जैसे अपनी दुनिया की सबसे बड़ी बात कह दी हो। कुछ पल के लिए सब थम गया।
उसकी सहेलियों ने, हमेशा की तरह, मुस्कुराते हुए मुझे आगे बढ़ाया।
संजना ने कहा, “तुम खुद मिलोगे मीरा के डैड से? तुम्हारे पेरेंट्स तो होंगे ना… उन्हें भेजो।”
मैंने एक गहरी सांस ली।
“मेरे… पेरेंट्स नहीं हैं,” मैंने धीमे लेकिन भारी शब्दों में कहा।
एक पल को हवा भी जैसे रुक गई। चेहरे बदल गए, मुस्कानें ठहर गईं, और आँखों में एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य होने का नाटक करने लगे।
“ठीक है… कोई बात नहीं,” संजना ने संभलते हुए कहा। “मैं मीरा के डैड से पहले बात कर लूंगी। फिर तुम आ जाना।”
मुझे लगा जैसे एक दरवाज़ा खुल भी रहा है और बंद भी—एक साथ।
मेरे अंदर एक सवाल, जो मुझे तब से काट रहा था—
कि जब उसके पिता मेरे बारे में जानेंगे, तो क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे… या मेरी पूरी कहानी वहीं खत्म कर देंगे
कभी-कभी इंतज़ार कितना जानलेवा हो सकता है, यह मैं अब समझ रहा था। हर गुजरता दिन मेरी बर्बादी की एक नई कहानी लिखकर चला जाता था। अगर जल्दी कुछ नहीं किया, तो मैं खुद को खत्म समझो।
मेरी जो भी थोड़ी-बहुत सेविंग्स थीं, मेरी सारी जमा पूँजी—मैं इस चक्करों में पहले ही उड़ा चुका था।
और फिर… दो दिन बाद संजना का फोन आया।
“Hello… shitij,” उसकी आवाज़ आई।
“हाँ संजू, बोलो,” मैंने बेचैनी से कहा।
“shitij, मेरी बात ध्यान से सुनो…” वह थोड़ी गंभीर थी। “मैंने मीरा के डैड से बात कर ली है।”
मेरे अंदर जैसे किसी ने बिजली छोड़ दी। दिल एक पल के लिए रुककर फिर तेज़ धड़कने लगा।
“उनके पापा ने तुम्हें मिलने के लिए कल बुलाया है। मैंने उन्हें बता दिया है कि तुम्हारे पेरेंट्स नहीं हैं, तुम खुद आओगे।”
मैं चुप रह गया।
फिर उसकी आवाज़ आई—
“लेकिन अगर कोई अंकल या रिलेटिव हो तो अच्छा रहेगा, उन्हें साथ ले आना। तुम समझ सकते हो, शादी की बात है… कोई छोटी बात नहीं।”
ये सुनते ही मेरे अंदर जैसे बजते हुए सारे सुर एकदम से टूट गए।
“अंकल… मामा… चाचा…” मैं बुदबुदाया।
मेरे पास तो कोई था ही नहीं… और जो कभी थे, वो भी मैं खुद छोड़ चुका था।
दुनिया अचानक बहुत बड़ी और मैं बहुत अकेला लगने लगा।
फोन बंद होते ही मैं वहीं बैठ गया… सिर हाथों में।
“अब मैं किसे लेकर जाऊँ…?” मेरे अंदर की आवाज़ चीख रही थी।
तभी अचानक मुझे एक नाम याद आया—कुलदीप सेठ।
मैं तुरंत उठा और लगभग दौड़ता हुआ उनके केबिन की तरफ चला गया। बिना रुके, बिना सोचे।
अनुमति लेकर मैं अंदर दाखिल हुआ। उन्होंने मुझे सवालिया नज़रों से देखा।
मैंने एक सांस में सारी बात कह दी—मीरा, उसके पापा से मुलाकात, शादी, और यह अजीब सा दबाव।
उन्होंने सब सुनकर हल्की सी मुस्कान दी।
“अच्छा… तो ये बात है। चोरी-छुपे लड़की भी ढूंढ ली, शादी की तैयारी भी कर ली?”
मैं बस इतना ही कह पाया—
“मैं कैसे बताता… सब कुछ अचानक ही हो गया।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर उन्होंने धीरे से कहा,
“ठीक है। कल शाम चलेंगे। मैं तैयार रहूँगा।”
उनके ये शब्द मेरे लिए जैसे किसी डूबते हुए इंसान को मिला आख़िरी सहारा थे… या शायद एक और अनजानी परीक्षा की शुरुआत।
यह रहा आपका हिस्सा ज्यादा ड्रामैटिक, विज़ुअल और भावनात्मक फ्लो में:
फोन पर संजना का मैसेज आया था। मैंने जैसे ही उसे खोला और एड्रेस पढ़ा, मेरी आँखें जैसे चकाचौंध से भर गईं।
ये उस शहर के सबसे पॉश इलाके का पता था…
मैं कुछ पल वहीं जम सा गया।
“ये तो… मेरी पहुँच से भी कहीं ऊपर है…” मेरे मन में एक ही बात घूम रही थी।
मैं बस घूरता रहा—उस मैसेज को, उस एड्रेस को… जैसे शब्द नहीं, कोई नई दुनिया मेरे सामने खुल गई हो।
और फिर अचानक मेरे अंदर एक अजीब सा उफान उठा।
“शिटिज… निकल गई लॉटरी तुम्हारी…” मेरे अंदर कोई खुशी से चीख पड़ा।
मैं मुस्कुराया… फिर हँसा… और फिर लगभग पागलपन की हद तक खुश हो गया।
“हुर्रे!”
मैं जैसे अपने ही ख्यालों में नाचने लगा।
“अब बस… कुलदीप सेठ संभाल लो अपना रेस्टोरेंट का हिसाब-किताब,” मेरे मन में तंज भी था और खुशी भी। “आज से मुझे ‘सेठ’ कहने की आदत डाल लो…”
उस पल मैं पूरी तरह अपने ही बनाए हुए सपनों में खो गया था।
आँखें बंद थीं… और सामने एक ऐसी दुनिया चल रही थी, जो अभी हुई भी नहीं थी—लेकिन मुझे सच लग रही थी।
मैं अभी उन्हीं सपनों में डूबा ही था कि अचानक कुलदीप सेठ की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
“चलो shitij, ज्यादा उड़ने की जरूरत नहीं है… कल असली जमीन पर उतरना है।”
मैंने आँखें खोलीं। एक पल को समझ ही नहीं आया कि मैं सपने में था या हकीकत में।
वो हल्की सी मुस्कान लिए मेरी तरफ देख रहे थे,
मैंने खुद को संभाला और सिर हिलाया।
लेकिन अंदर कहीं, जो खुशी अभी-अभी पंख फैलाकर उड़ रही थी… वो अचानक भारी होने लगी थी।
रात धीरे-धीरे उतर आई थी। लेकिन मेरी नींद गायब थी।
मैं बिस्तर पर लेटा था, और दिमाग में सिर्फ एक ही चीज घूम रही थी—
“कल…”
मीरा का चेहरा बार-बार सामने आ रहा था… और उसके साथ ही वो पॉश इलाके का एड्रेस भी—जैसे कोई बहुत बड़ा दरवाज़ा हो, जिसके पीछे मेरी किस्मत खड़ी हो या फिर मेरा सबसे बड़ा सच छिपा हो।
मैं करवटें बदलता रहा। और पहली बार मुझे एहसास हुआ कि ये सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी…ये मेरी पूरी जिंदगी का इम्तिहान था।
इंतज़ार बहुत लंबा था, लेकिन आखिरकार वो दिन आ ही गया। मैं तैयार था।
मीरा ने मुझे कुछ महंगे कपड़े गिफ्ट किए थे, जो इस मुलाकात के लिए बिल्कुल परफेक्ट थे। मैं अच्छे से तैयार होकर निकल पड़ा।
कुलदीप सेठ ने मुझे देखा तो उनकी आँखों में एक हल्की सी तारीफ चमक उठी।
“वाह… तुम तो बिल्कुल किसी फिल्म के हीरो लग रहे हो यार। अब तो लड़की वाले मना ही नहीं कर सकते,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
मैं हल्का सा शरमा गया।
“आपको क्या पता… क्या-क्या पापड़ बेले हैं मैंने,” मैंने धीमे से कहा। “चलो, अब एड्रेस देखिए… कहाँ चलना है।”
कुलदीप सेठ ने गाड़ी में बैठते हुए कहा, “लाओ दिखाओ।”
मैंने एड्रेस उनके आगे कर दिया।
जैसे ही उन्होंने एड्रेस देखा, उनका चेहरा बदल गया।
“ये… ये एड्रेस है? यहाँ जाना है?” वो थोड़े हक्के-बक्के रह गए।
“तुम जानते भी हो ये शहर की सबसे पॉश और महंगी सोसाइटी है? शिटिज… सच में वो लड़की यहाँ रहती है?”
उनके माथे पर हल्का पसीना चमक आया।
“हाँ… पता तो यही दिया है उसने,” मैंने शांत होकर कहा।
“कहीं ये कोई मज़ाक तो नहीं है?” उनकी आवाज़ में अब भी हैरानी थी।
मैंने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “एड्रेस सही है… आप परेशान न हों।”
लेकिन अंदर ही अंदर मैं उनकी घबराहट का मज़ा ले रहा था।
क्योंकि मुझे तो लग रहा था—अभी तो शुरुआत है…
कुलदीप सेठ को असली झटके तो अभी और भी मिलने बाकी थे।